HINDI BLOG : October 2024

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Thursday, 17 October 2024

छोटा जादूगर


 पठित गद्यांश 
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न 

दस बज चुके थे-----------------------------------------मोटर वाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा। 

(क) लेखक ने छोटे जादूगर को कहाँ और किस स्थिति में देखा ?
 उत्तर - लेखक ने छोटे जादूगर को साफ धूप में सड़क के किनारे देखा था, जहाँ एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा हुआ था। मगर खेल दिखाते समय वह स्वयं काँप जाता था। उसकी वाणी में प्रसन्नता नहीं थी।

(ख) दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर क्यों लड़खड़ा रहा था ?
 उत्तर - दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर लड़खड़ा रहा था, क्योंकि उसकी माँ ने कहा था कि जल्दी वापस आना। मेरी घड़ी समीप है।

(ग) भीड़ में लेखक को देखकर छोटे जादूगर की स्थिति कैसी हो गई ?
 उत्तर - भीड़ में लेखक को देखकर छोटा जादूगर क्षण भर के लिए मूर्तिमान हो गया।

(घ) छोटे जादूगर द्वारा "क्यों न आता!" कहने से कौन-सा भाव झलकता है ?
 उत्तर - छोटे जादूगर द्वारा 'क्यों न आता!' कहने से विवशता और आर्थिक विपन्नता का भाव झलकता है। इन शब्दों से स्पष्ट है कि आना उसकी मज़बूरी थी। इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।



लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क)  लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का क्या कारण बताया ?
 उत्तर - लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का कारण बताते हुए कि माँ बीमार हैं इसलिए मैं उसकी दवा-दारू खरीदने और पथ्य देने तथा स्वयं का पेट भरने के लिए कुछ पैसे कमाने आया हूँ, क्योंकि मेरे पिताजी जेल में हैं।

(ख) लेखक ने लड़के को कितने टिकट खरीदकर दिए ?
 उत्तर - लेखक ने लड़के को बारह टिकट खरीदकर दिए।

(ग) हिंडोले से लेखक को किसने पुकारा ?
 उत्तर - हिंडोले से लेखक को छोटे जादूगर ने पुकारा।

(घ) लेखक की पत्नी द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने क्या-क्या खरीदा ?
 उत्तर - लेखक की पत्नी के द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने पकौड़ी और एक सूती कंबल खरीदा।

(ङ) लता-कुंज का वर्णन कीजिए। 
 उत्तर - लता-कुंज एक छोटा सा बनावटी महल था। वहाँ संध्या होने पर साँय-साँय की आवाज़ आती थी। डूबते हुए सूर्य की अंतिम किरणें पत्तियों से विदाई लेती नज़र आती थीं। यह लता-कुंज चारों तरफ से सुनसान था

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क) पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक क्यों          दिखाई दी ?
 उत्तर - पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक दिखाई दी, क्योंकि वह सबको खाते-पीते देख रहा था। मगर किसी से कुछ माँग नहीं रहा था। अभावग्रस्त होते हुए भी उसके मन में संतोष और तृप्ति का भाव था।

(ख) तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी क्यों उठा रहा था ?
 उत्तर - तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहा था, क्योंकि उसके पिता देश के लिए जेल में थे और घर पर उसकी माँ बीमार थी, जिसकी देखभाल के लिए उसके सिवा घर पर और कोई नहीं था।

(ग) बॉटेनिकल -उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट क्यों हो गए ?
 उत्तर -बॉटेनिकल उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए, क्योंकि उसके सभी खिलौने अभिनय करने लगे थे। भालू मनाने लगा था। बिल्ली रूठने लगी थी। बंदर घुड़कने लगा था। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला आदि सभी कार्य जादूगर की बातों से हो रहे थे।

(घ) लड़का खेल-तमाशा क्यों दिखाना चाहता था ?
उत्तर-  लड़का खेल-तमाशा दिखाना चाहता था, क्योंकि उसको ऐसा करने से कुछ पैसे मिल जाएँगे, तो वह अपनी बीमार माँ को दवाइयाँ व पथ्य देगा और खुद का भी पेट भरेगा।

(ङ)  “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक क्या स्पष्ट करना चाहते हैं ?
 “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक ने संसार के सत्य को अनावृत्त करना चाहा है। संसार की स्वार्थपरता और भौतिकता की चकाचौंध के बीच जीवन का सार्वभौमिक सत्य लेखक के समक्ष उपस्थित हो जाता है। इसे देखकर लेखक किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में खड़ा रह जाता है और सारा संसार उसे एक जादू की भाँति नाचता हुआ प्रतीत होता है।

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर) CLASS 8

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर)
(क) हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव इतना सुव्यवस्थित कैसे हो गया था ?
उत्तर - हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव तो वैसे का वैसा ही था। हॉस्टल में उसकी सब चीजें अस्त-व्यस्त रहती थी। उसे व्यवस्था और करीने की आदत नहीं थी। घर की बैठक की सजावट उसकी पत्नी रमा ने की थी, जिसको देखकर लेखक को लगा था कि उसका मित्र अब सुव्यवस्थित हो गया है।

(ख) वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए क्या कहा ?
 उत्तर - वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए कहा कि उसने एम०ए० प्रथम श्रेणी में पास कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। अब पी.एच.डी कर रही है। डी लिए भी करना चाहती है। वह कॉलेज पढ़ाने जाती है और घर का सारा काम भी करती है। साथ ही साथ सास-ससुर दोनों की सेवा भी करती है।

(ग) वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना क्या थी ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना यह थी कि वे पचास हजार रुपए दहेज में लेकर मैट्रिक पास बहू को घर लाए थे। यदि उससे कोई भी काम करने के लिए कहता, तो फौरन उलटा जवाब देती थी कि वह घर की बेगारी करने नहीं आई है। वह अपने पिताजी द्वारा दिए गए रुपयों का जिक्र करते हुए कहती कि उससे नौकर रख लो।

(घ) राव ने 'ऐश-ट्रे' को उनके थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न क्यों कहा ?
उत्तर - राव तो दहेज लेना नहीं चाहते थे, परंतु अपनी पत्नी रमा के दबाव में आकर उन्हें दहेज माँगना पड़ा। इसके फलस्वरूप उन्हें साठ हजार रुपयों के सहित चाँदी का बना 'ऐश-ट्रे', जो उलटे पैर के जूते की आकृति का था, मिला, जिसको उन्होंने अपने थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न कहा था।

(ङ) वह कौन-सी विवशता थी, जिसके तहत लेखक ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही ?
उत्तर - दहेज माँगने के लिए रमा ने अपने पति पर दबाव डाला था, जिसके तहत राव ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही। रमा उनकी पत्नी थी और पुत्र के विवाह को लेकर उसकी अनेक आकांक्षाएँ थीं। वह स्वयं दहेज की माँग करने की अपेक्षा पति पर दवाब बना रही थी कि वे दहेज की रकम माँगे। उसके आगे वेंकटेश्वर राव झुक गए।

(च) वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो क्या वे अपने साथ न्याय करते ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो वह अपने साथ तो न्याय करते ही, साथ ही सीमा और पूरे समाज की लड़कियों के साथ भी न्याय करते। पत्नी के दबाव में आकर भी किया गया गलत कार्य तो गलत ही कहलाता है। मात्र पत्नी के आग्रह और प्रसन्नता का तो उन्होंने विचार किया, परंतु उन्होंने न स्वयं के विचारों का मान रखा और न दूसरों के।

CLASS 9 वैज्ञानिक चेतना के वाहक : रामन


(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

1. कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर - कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा यही थी कि वे अपना सारा जीवन शोध कार्यों को समर्पित कर दें। परंतु उन दिनों कैरियर के रूप में शोधकार्य को जीवन भर के लिए अपनाने की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी।

2. वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर - वाद्य यंत्रों पर की गई खोजों और वैज्ञानिक सिद्धांतों के 
(ख) आधार पर रामन् ने पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्य-यंत्रों की तुलना में घटिया हैं। उन्होंने वाद्ययंत्रों के कंपन के पीछे छिपे गणित पर अच्छा-खासा काम किया और कई शोध-पत्र भी प्रकाशित किए।

3. रामन् के लिए नौकरी संबंधी कौन-सा निर्णय कठिन था और क्यों ? 
                                            अथवा

सरकारी नौकरी छोड़ना रामन् के लिए एक कठिन निर्णय क्यों था? 'वैज्ञानिक चेतना के वाहक' पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर -उस ज़माने के प्रसद्धि शिक्षा शास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी ने रामन् के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में रिक्त प्रोफेसर पद को स्वीकार कर लें। रामन् के समक्ष नौकरी संबंधी यह निर्णय अत्यंत कठिन था कि वे सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी में बने रहें या उसे छोड़कर इस पद को स्वीकार कर लें। अंततः रामन् ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार किया और माँ सरस्वती की साधना हेतु सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को त्याग दिया।

4. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को समय-समय पर किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर -'रामन् प्रभाव' की खोज ने रामन् को विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों की श्रेणी में प्रतिस्थापित कर दिया। समय-समय पर उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता, 1929 में 'सर' की उपाधि तथा 1930 में विश्व के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें रोम के मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी के ह्यूज पदक, फिलोडेल्फिया इंस्टीट्यूट के फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस के लेनिन पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया।

5. रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय-चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?

उत्तर- रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया क्योंकि उन्हें ये सम्मान और पुरस्कार उस दौर में मिले, किब भारत अंग्रेज़ों के अधीन था। दासता की बेड़ियों में जकडी भारतीय जनता के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का निरंतर हास हो रहा था। ऐसी परिस्थिति में रामन् की इन उपलब्धियों ने भारत को एक नई गरिमा प्रदान की और इसे विश्व में शीर्ष स्थान पर प्रतिस्थापित कर दिया।

 निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए- 

1. रामन् के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर - कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी रामन् ने अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा और स्वाभाविक रुचि को अक्षुण्ण बनाए रखा। दफ्तर से छुट्टी मिलते ही वे बहू बाजार स्थित 'इंडियन एसोसिऐशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की प्रयोगशाला में कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य करते थे। इस संस्था की प्रयोगशाला में संसाधनों का नितांत अभाव था। यह एक आधुनिक हठयोग ही था, जिसमें साधक रामन् दिनभर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के पश्चात् सीमित संसाधनों की सहायता से प्रयोगशाला में शोधकार्य करते थे। रामन् अपनी इच्छाशक्ति के बल पर भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने का प्रयास करते रहे और उन्होंने विज्ञान को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान की।

2. रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश किरणों के प्रभाव का अध्ययन किया और यह पाया कि, जब एक वर्षीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से होकर गुज़रती है तो गुज़रने के पश्चात् उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। कारण यह है कि एकवर्षीय प्रकाश किरण के फोटॉन जब तरल अथवा ठोस रखे से गुज़रते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इसके परिणामस्वरूप उसकी ऊर्जा का कुछ अंश या तो खो जाता है या उसमें बढ़ोत्तरी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। एक वर्षीय प्रकाश की किरणों में सर्वाधिक ऊर्जा बैंगनी तथा सबसे कम ऊर्जा लाल वर्ण के प्रकाश में होती है। रामन् की इसी खोज को 'रामन् प्रभाव' के नाम से जाना जाता है।

3. 'रामन् प्रभाव' की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य संभव हो सके ?
उत्तर - रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' की सहायता से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन करना सरल हो गया। पहले इसके लिए 'इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी' की मदद ली जाती थी, जिसमें त्रुटियों की संभावना अधिक रहती थी परंतु रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से यह कार्य अत्यंत सहज हो गया। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक जानकारी प्रदान करती है। इससे प्रयोगशाला में पदार्थों का संश्लेषण तथा अनेक पदार्थों का कृत्रिम रूप से निर्माण संभव हो गया है।

4. देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालिए ।
                             अथवा
रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी। इस कथन के आलोक में चंद्रशेखर वेंकट रामन् के योगदान पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था ' उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था 'रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट' के नाम से जानी जाती है। रामन् के अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि तथा चिंतन के विकास में उन्होंने सैकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने आगे चलकर बहुत अच्छा काम किया। इस प्रकार ज्योति से ज्योति प्रज्वलित होती रही और कई छात्र उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने 'करेंट साइंस' नामक एक पत्रिका का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त भौतिकी में अनुसंधान के विकास हेतु 'इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स' नामक शोध-पत्रिका भी निकाली। वे लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति पूर्णतः समर्पित थे।

5. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
                                                  अथवा
रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर - सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् ने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से संपूर्ण देश को आलोकित किया। वे वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें सदैव यही संदेश दिया कि हम अपने इर्द-गिर्द घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तथा उसी के अनुसार उसकी जाँच-पड़ताल करें। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों, समुद्र की अथाह जलराशि तथा प्रकाश की किरणों में से वैज्ञानिक सिद्धांतों को ढूँढ़ निकाला। उनका व्यक्तित्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम भी अपने आसपास बिखरी चीजों और विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और रहस्यों पर से पर्दा उठाएँ और विज्ञान को समुन्नत बनाने का प्रयास करें।


 निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

1. उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर- यह कथन सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के विशिष्ट व्यक्तित्व और वैज्ञानिक चेतना के प्रति उनके समर्पण का सूचक है। कलकत्ता के वित्त विभाग में अफसर के रूप में तैनात रामन् दफ्तर से छुट्टी मिलने के बाद बहू बाज़ार स्थित प्रयोगशाला में जाकर शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते थे। विज्ञान के प्रति उनके इस समर्पण ने उन्हें सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी को छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। इससे स्पष्ट होता है कि रामन् के लिए माँ सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

2. हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर - यह कथन हमें रामन् के जीवन से प्रेरणा लेते हुए प्रकृति के विभिन्न क्रियाकलापों और घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने और सोचने की शिक्षा देता है। हमारे आसपास प्रकृति में अनगिनत चीजें बिखरी पड़ी हैं। ब्रह्मांड के कई रहस्य ऐसे हैं, जिनपर पर्दा पड़ा हुआ है। आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति और अटूट लगन के साथ विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और वस्तुओं की वैज्ञानिक दृष्टि से छानबीन करने तथा उसपर गहराई से मनन करने की। जाने कितने ही रहस्य वैज्ञानिक करकमलों द्वारा परदे से बाहर आने की प्रतीक्षा में है। परंतु इसके लिए हमें रामन् की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होना होगा।

3. यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था। 
उत्तर - यह कथन विज्ञान के प्रति रामन् के स्वाभाविक रुझान और समर्पण को व्यक्त करता है। 'हठयोग' प्राचीन योग साधना का वह अंग है, जिसमें साधक अत्यंत कठिन मुद्राओं और आसनों के द्वारा सिद्धि प्राप्त करता है। सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् कलकत्ता के वित्त विभाग में अफ़सर के रूप में तैनात थे। दिन भर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के बाद छुट्टी मिलते ही वे बहू बाज़ार स्थित 'इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की मामूली-सी प्रयोगशाला में पहुँचते और कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते। सीमित संसाधनों वाली उस अभावग्रस्त प्रयोगशाला में दिन भर के थके रामन् विज्ञान को समृद्ध करने का प्रयास करते। उनकी यह कठिन साधना आधुनिक हठयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।