HINDI BLOG : July 2023

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Thursday, 6 July 2023

पद - रैदास सार

पद - रैदास 
सार 
प्रस्तुत प्रथम पद में संत कवि रैदास ने विभिन्न उदाहरणों द्वारा अपने आराध्य से स्वयं के अटूट संबंध को व्यक्त किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्हें राम नाम की रट लग गई है, जो छूट नहीं सकती । परमात्मा और स्वयं के बीच इस अटूट संबंध को कवि ने चंदन-पानी, बादल-मोर, चाँद-चकोर, दीपक बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा तथा स्वामी दास के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । कवि ने परमात्मा के साथ अपना दास्य भाव प्रकट करते हुए अपनी भक्ति की गहराई और प्रभु के प्रति अपनी भावनाओं को सहज और प्रभावशाली रूप से व्यक्त किया है । 

द्वितीय पद में कवि ने परमात्मा की अपार कृपा का वर्णन किया है। ईश्वर की उदारता, दया, कृपा और उनकी समान दृष्टि का चित्रण करते हुए संत रैदास ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार की कृपा तुम्हारे सिवा और कौन कर सकता है। जिसे संसार अछूत मानता है, तुम उसी पर कृपा कर उसे उच्च बना देते हो। कवि रैदास ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सघना तथा सैन के उदाहरणों द्वारा प्रभु के समदर्शी स्वभाव का अनूठा चित्रण करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रभु की उदारता और उनकी दया-दृष्टि ने इन्हें महान बना दिया है अर्थात ईश्वर की कृपा से सब कुछ संभव है।

Tuesday, 4 July 2023

कहानी - अनाथ

कहानी - अनाथ

वह अनाथ बालक भीख माँगता हुआ एक गाँव आ पहुँचा। आमने-सामने दो विशाल | कोठियों, बाड़ों को देखकर उसके पैर अपने आप ही उस और बढ़े। उसमें से किसी एक में पेटभर खाना मिलने की कल्पना से उसके मुँह में पानी भर आया। पहला बाड़ा किसी विशाल मंदिर जैसा दिखाई दे रहा था। दरवाज़े पर एक मुस्तैद पहरेदार ।

खड़ा था। लड़के ने उससे कहा, "मैं मालिक से मिलना चाहता हूँ।'

पहरेदार गुर्राया, "मालिक पूजा-पाठ कर रहे हैं।"

"पूजा खत्म कब होगी ?"
 "थोड़ी देर के बाद। " 

बालक को थोड़ी-सी देर भी भूख के कारण युगों जैसी लग रही थी। फिर भी वह बड़े धैर्य के साथ बाड़े के दरवाज़े पर खड़ा रहा। बहुत देर बाद वह मालिक के दर्शन कर पाया। मालिक के कानों में कनौती का मोती कितना सुंदर था। बालक मगन होकर कनौती देखता रहा।

मालिक ने कहा, "अरे भाई! यह सब ईश्वर की कृपा है। बोलो, क्या काम है?"

"महाराज, मैं दो दिनों से भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने के लिए- "

"तुम ईश्वर पर विश्वास करते हो न ?"

"हाँ........"

" फिर इस तरह भीख माँगते हुए क्यों दर-दर घूम रहे हो? अरे पागल! उस परमात्मा की लीला अनूठी है। चिड़ियों के बच्चों को वह सिर्फ चोंच ही नहीं देता, वह उसके लिए दाना भी बना देता है। तुम्हारे पेट का भी वैसा ही इंतज़ाम उसने जरूर कहीं-न-कहीं किया होगा। ईश्वर पर भरोसा कर थोड़ा सब करो। "

मालिक जप करने के लिए निकल गया।

लड़का निराश होकर बाड़े से बाहर आ गया। वह ऐसा दिख रहा था, जैसे कोई लाश उठकर चलने लगी हो ।

सामने ही दूसरा बाड़ा उन्मत्त हाथी की तरह खड़ा था। इस बाड़े का बुर्ज किसी हाथी द्वारा अपनी सूँड़ से ऊपर उछाले पानी की फुहार के जैसा दिख रहा था। वहाँ कई लोग ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोल रहे थे। उसे सुनकर क्रुद्ध समुंदर की याद आती।

वह बालक डरा-सहमा सा बाड़े की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। दरवाजे पर एक गोल-मटोल
पहरेदार खड़ा था। पहरेदार झल्ला उठा, "ऐ, कहाँ जा रहे हो? क्या चोरी का इरादा है ?"

गिड़गिड़ाते हुए बालक ने कहा, "मालिक से मिलना चाहता हूँ।" 
"मालिक पंडितों के साथ बहस में उलझे हुए हैं। "

"फिर कब मिल पाएँगे ?"

"थोड़ी देर बाद।"

लड़के को एक पल भी युग की तरह लग रहा था। लेकिन पेट से बढ़ कर मुहताज क्या हो सकता है? वह चुपचाप उस बाड़े के दरवाज़े में प्रतीक्षा करता रहा। थोड़ी ही देर में बहस खत्म हुई। कितने ही पंडित बगल में पोथियों को दबाए बाड़े से निकल पड़े।

लड़के ने मालिक के दर्शन किए। मालिक ने प्रश्न किया, "क्या काम है?"

" महाराज दो दिनों से भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने के लिए- "
 "ईश्वर पर तुम भरोसा करते हो ?"

इसके पहले "हाँ" कहा था, परंतु कोई उपयोग न हुआ। अब यही उचित होगा कि "ना" कहा जाए। ऐसा विचार कर उसने जवाब दे डाला, "नहीं"। अपनी ऊँची कलाबत्तू और उसमें सितारे से सजाई बैठक से उतर कर मालिक आगे बढ़ा। बालक को थपथपाते हुए उसने कहा, "शाबाश! इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा ज्ञान शायद ही मैंने कहीं देखा है !"

"मुझे कुछ खाने के लिए" बीच में ही लड़का बोल उठा। “खाने के लिए? अरे पागल ! तुम जानते हो कि दुनिया में ईश्वर नहीं है। फिर भला तुम्हें खाने को कौन देगा? उसे खुद ही हासिल करना होगा। दो बातें ध्यान रखो। 
धरती विशाल है और कोशिश ही आदमी का ईश्वर है। तुम कहीं भी अपना पेट भर सकते हो।"

निराश होकर बालक बाड़े से बाहर निकल आया। अब उसमें गाँव के दूसरे घरों की और झाँकने तक का साहस नहीं था। किसी शैतान की तरह वह चुपचाप चलने लगा। गिद्ध मरे हुए खरगोश पर अपनी नुकीली चोंच से जैसे बार-बार प्रहार करता रहता है, वैसे भूख पेट की आंतों को कुरेद रही थी।

बालक किसी तरह गाँव से दूर आ गया। उसके पेट में भूख अब दावानल की तरह जल उठी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस आग को कैसे बुझाया जाए।

अचानक उसने पेड़ के तले बैठी एक बुढ़िया को पत्तलों में फैले सूखे रोटी के टुकड़ों को
चबाते देखा। उसकी आँखें उन टुकड़ों पर गड़ गईं। लेकिन वह पैर न बढ़ा सका।

ऐसे ही उन सूखे टुकड़ों को चबाते उस बुढ़िया ने नज़र दौड़ाई। वह बालक उसे दिखाई दिया। उसकी आँखों में दिख रही भूख को बुढ़िया जान गई। उसने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। कलेजा थामकर वह आगे बढ़ा। उसका हाथ पकड़ कर बुढ़िया ने उसे अपने पास बिठा लिया। उस पत्तल पर पड़ी सूखी रोटी का एक कौर उठाकर उसने उसके मुँह में डाला। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन बोल न पाई। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आए। उसमें से एक बूँद बालक के गाल पर गिरी।

बालक को लगा जैसे उसके पेट का दावानल बुझ गया। उसकी सारी छटपटाहट शांत हो गई, उसे जैसे जगत माता मिल गई। दो-चार कौर निगलकर बालक ने पूछा, "दादी माँ ! क्या इस दुनिया मैं ईश्वर है ?" 

विस्मित ढंग से हाथ मटकाते हुए उसने जवाब दिया, "कौन जाने। मैं तो एक पागल बुढ़िया हूँ बेटे।"


कहानी - भाग्य का चक्र

भाग्य का चक्र

एक नगर में चार ब्राह्मण मित्र रहते थे। चारों ही निर्धन और दरिद्र थे। एक दिन चारों ने धनोपार्जन के लिए कहीं बाहर जाने का निश्चय किया। वे अपना घर, नगर, बंधु-बांधव सब छोड़कर विदेश यात्रा के लिए निकल पड़े। चलते-चलते वे अवंती पहुँचे। शिप्रा नदी में स्नानकर । उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में भगवान की आराधना की। वे मंदिर से बाहर निकले ही थे कि उनका सामना भैरवानंद महायोगी से हो गया। वे योगीराज के साथ उनके मठ पर जा पहुँचे। 
भैरवानंद के पूछने पर उन्होंने अपनी यात्रा का प्रयोजन उन्हें बताया और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगे, "योगीराज, आप ही हमें धनोपार्जन का कोई उपाय बताइए।" भैरवानंद ने अनेक कार्यों को सिद्ध करने वाली चार सिद्धि वर्तिकाएँ बनाई और चारों ब्राह्मणों को एक-एक वर्तिका देते हुए कहा, "आप लोग हिमालय की ओर जाइए। जहाँ भी कोई वर्तिका गिरे, उस स्थान पर खुदाई करने पर निश्चित ही आपको धन प्राप्त होगा। उस धन को लेकर लौट आइएगा।"

चारों ब्राह्मण वर्तिका लेकर हिमालय की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचने पर एक ब्राह्मण के हाथ से वर्तिका गिर पड़ी, उसने उस स्थान पर खुदाई की तो वहाँ ताँबे की खान मिली। उसने अपने साथियों से कहा, "मित्रों! इच्छानुसार तांबा लेकर अब यहाँ से वापिस चलते हैं।" उसके साथी | बोले, "तुम तो मूर्ख हो। इस ताँबे से क्या हमारी दरिद्रता मिट जाएगी? हम तो आगे जाएँगे।" पहला ब्राह्मण अपनी इच्छानुसार ताँबा लेकर लौट गया। शेष तीनों आगे चल दिए।

कुछ दूर आगे जाने पर एक और ब्राह्मण की वर्तिका गिर गई। उसने उस स्थान की खुदाई की तो वहाँ चाँदी की खान निकली। वह अपने साथियों से बोला, “मित्रों! यथेच्छ चाँदी लेकर वापिस लौट चलते हैं।" उसके दोनों साथी बोले, "क्या बात करते हो। आगे अवश्य सोने की खान मिलेगी। हम तो आगे जाएँगे।" दूसरा ब्राह्मण चाँदी लेकर वापिस चला गया। अब दोनों ब्राह्मण आगे बढ़े।

वे कुछ दूर ही गए थे कि उनमें से एक के हाथ की वर्तिका गिर पड़ी। उसने उस स्थान को खोदा तो वहाँ सोने की खान मिली। वह अपने साथी से बोला, "मित्र! अब आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। सोने से हमारी सारी दरिद्रता मिट जाएगी।" उसका साथी कहने लगा, “तुम समझते क्यों नहीं हो ? पहले ताँबे की, फिर चाँदी की और फिर सोने की खान मिली है। अब आगे अवश्य ही रत्नों की खान होगी। चलो आगे चलते हैं। "

तीसरा ब्राह्मण बोला, "नहीं तुम जाओ, मैं यहीं रहकर तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा । " चौथा ब्राह्मण अकेला ही आगे चल पड़ा। कुछ दूर जाने पर ही उसे भयंकर गरमी सताने लगी और प्यास भी लगने लगी। परेशान होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसे रक्त से लथपथ एक व्यक्ति दिखाई दिया जिसके सिर पर एक चक्र घूम रहा था। ब्राह्मण दौड़ कर उसके पास पहुँचा और उत्सुकता से पूछने लगा, “आप कौन हैं? इस प्रकार इस दशा में क्यों बैठे हैं? क्या यहाँ आस-पास जल मिलेगा ? मुझे बहुत प्यास लगी है।'

ब्राह्मण की बात समाप्त होते ही चक्र उस व्यक्ति के सिर से उतर कर ब्राह्मण के सिर पर घूमने लगा। ब्राह्मण ने घबराकर पूछा, "यह क्या हुआ ? मेरे सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी हैं।"" वह व्यक्ति बोला, "मेरे सिर पर भी यह चक्र इसी प्रकार आया था। आपकी ही तरह जब कोई दूसरा व्यक्ति यहाँ आकर इसी प्रकार प्रश्न करेगा जैसे आपने मुझसे किए थे, तभी यह चक्र आपके सिर से उतर कर उसके सिर पर घूमने लगेगा।"

ब्राह्मण ने चिंतित स्वर में पूछा, "आप यहाँ कितने दिनों से हैं ? " वह व्यक्ति बोला, “ठीक-ठीक समय तो मैं नहीं बता सकता। पर इतना कह सकता हूँ कि दरिद्रता दूर करने के लिए सिद्धि वर्तिका के साथ मैं इसी मार्ग से जा रहा था। यहाँ मैंने इस विषय में पूछा ही था कि यह चक्र मेरे सिर पर आकर घूमने लगा। वैसे तो कोई इधर आता ही नहीं और यदि कोई आ भी जाए तो उसकी यही दशा होती है। कुबेर ने ही धन की चोरी हो जाने के भय से इधर आने वाले व्यक्तियों के लिए चक्र का भय दिखाया है। अच्छा, अब मुझे जाने की अनुमति दीजिए।"

यह कहकर वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। उधर तीसरा ब्राह्मण काफ़ी समय तक अपने चौथे साथी की प्रतीक्षा करता रहा। जब वह नहीं लौटा तो वह उसे खोजने आगे बढ़ा। उसी स्थान पर पहुँच कर उसने अपने मित्र को उस दयनीय दशा में देखा तो बड़ा दुखी हुआ। चौथा ब्राह्मण अपने मित्र को देखकर बोला, "मित्र, देखो यह सब भाग्य का चक्र है।" यह सुनकर मित्र ने कहा, 'मैंने आपको कितना कहा था कि चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। किंतु आपने मेरी एक नहीं सुनी। विद्वान और कुलीन होने पर भी आप बुद्धिहीन हैं। किसी ने ठीक कहा है कि विद्या की अपेक्षा बुद्धि बड़ी होती है। चौथा ब्राहमण बोला, "नहीं मित्र, यह सब भाग्य का चक्र है। भाग्य प्रतिकूल हो तो बुद्धिमान व्यक्ति भी कष्ट उठाते हैं, सुरक्षित वस्तु भी नष्ट हो जाती है।' तीसरा ब्राह्मण अपने मित्र की बात सुनकर उसे भाग्य के भरोसे छोड़ घर वापिस लौट गया।


CLASS 10 डायरी का एक पन्ना -सीताराम सेकसरिया

डायरी का एक पन्ना

-सीताराम सेकसरिया


पाठ का भावार्थ

प्रस्तुत पाठ के लेखक सीताराम सेकसरिया आज़ादी की कामना करने वाले स्वतंत्रताप्रिय लोगों में से एक थे वे गुलामी के दिनों में दिन-प्रतिदिन जो भी देखते सुनते और महसूस करते थे, अपनी निजी डायरी में दर्ज कर लेते थे यह क्रम कई वर्षों तक चला। इस पाउ में उनका डायरी का 26 जनवरी 1931 तक का लेखाजोखा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और स्वयं लेखक सहित कलकत्ता (कोलकाता) वासियों ने देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस किस जोश-खरोश से मनाया, अंग्रेज़ प्रशासकों ने इसे उनका अपराध मानते हुए उन पर और विशेषकर महिला कार्यकर्ताओं पर कैसे-कैसे जुल्म ढाए,  इस पाठ में वर्णित है। यह पाठ हमारे क्रांतिकारियों की कुर्बानियों की याद तो दिलाता ही है, साथ ही यह भी उजागर करता कि एक संगठित समाज दृढ़संकल्प हो तो ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके।

राष्ट्रीय ध्वज का फहराना 

पिछले साल इसी दिन सारे भारत में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस बार यह दिवस फिर से मनाया जा रहा था। सबको बता दिया गया था कि प्रत्येक कार्य हमें स्वयं ही करना है। इसके प्रचार हेतु लगभग 2000 रुपये खर्च हुआ। बड़े बाजार के सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया था। कई मकान तो ऐसे सजाए गए थे मानो आजादी मिल गई हो। झंडे और साज-सज्जा को देखकर सब लोग उत्साहित थे। पुलिस गश्त लगा रही थी। ट्रैफिक पुलिस को भी इसी काम में लगाया गया था। घुड़सवार पुलिस भी थी।

पुलिस का घेराव

बड़े-बड़े पार्कों व सार्वजनिक स्थलों को पुलिस सुबह ही घेर लिया था। उन्हें अधिकारियों का आदेश था कि लोग एकत्रित न होने थाएँ मोनुमेंट के नीचे शाम को सभा होती थी। उसे तो सुबह छह बजे ही पुलिस ने घेर लिया था। फिर भी कई जगह सुबह झंडा फहराया गया। श्रद्धानंद पार्क में विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तारा सुंदरी पार्क में बड़ा बाज़ार कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से पुलिस की ऐसी मार-पीट हुई कि लोगों के सिर फट गए। गुजराती सेविका संघ की लड़कियों ने जुलूस निकाला तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मारवाड़ी विद्यालय में भी अंडोत्सव मनाया गया।

जुलूस रोकने का प्रयास

सुभाष बाबू के पूरे जुलूस का भार पूर्णोदास पर था। 2-3 बजे के करीब पूर्णोदास व उनके साथियों को पकड़ लिया गया। स्त्रियों की टोलियाँ भी निर्धारित समय पर पहुंचने की कोशिश कर रही थीं। तीन बजे तक हजारों की भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। लोग भी टोलियाँ बनाकर मैदानों में घूम रहे थे। पुलिस कमिश्नर ने नोटिस निकाला कि अमुक धारा के तहत सभा नहीं हो सकती इसमें भाग तेनेवाले को दोषी समझा जाएगा। उधर कॉसिल ने खुली चुनौती दी कि चार बजकर चौबीस मिनट पर झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

सुभाष बाबू के नेतृत्व में संघर्ष

सुभाष बाबू 4 बजकर 10 मिनट पर जुलूस लेकर आए। भीड़ की अधिकता के कारण पुलिस जुलूस रोक न सकी। पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। बहुत आदमी घायल हो गए। सुभाष बाबू पर भी लाठियाँ बरसाई। चे बड़े जोर से वंदेमातरम बोल रहे थे। वे आगे बढ़ने के लिए कह रहे थे। उन्हें पकड़ लिया गया और गाड़ी में बिठाकर लाल बाजार लोकजप में बंद कर दिया गया।

स्त्रियों द्वारा सहयोग दिया जाना

कुछ ही देर बाद स्त्रियों ने भी जुलूस निकाला। पुलिस बीच-बीच में उन पर लाठियाँ बरसाने लगती। अनेक लोग घायल हो गए। धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस टूट गया। 50-60 स्त्रियाँ वहीं बैठ गईं। पुलिस ने उन्हें पकड़कर लाल बाज़ार भेज दिया। कुल मिलाकर 105 स्त्रियाँ पकड़ी गईं जिन्हें रात को नौ बजे छोड़ा गया।

घायलों का कांग्रेस कार्यालय जाना

आठ बजे कांग्रेस कार्यालय से फोन आया कि वहाँ अनेक घायल पहुँचे हुए हैं। लेखक जानकी देवी के साथ वहाँ पहुँचा। डॉक्टर दासगुप्ता उनकी देखरेख के साथ-साथ उनके फ़ोटो उतरवा रहे थे।

महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन

यह अपने आप में महत्त्वपूर्ण व अपूर्व प्रदर्शन था। कोलकाता के नाम पर यह कलंक था कि यहाँ स्वतंत्रता आंदोलन का काम नहीं हो पा रहा। आज यह कलंक धुल गया। लोगों को आशा बँधी कि यहाँ भी काम हो सकता है।



Sunday, 2 July 2023

साया

साया  

नन्हे-नन्हे दुधमुँहे बच्चे! अकेली रुग्ण पत्नी। नाते-रिश्ते का ऐसा कोई नहीं जो ज़रूरत पर काम आ सके। पति सुदूर अफ्रीका में, अस्पताल में बीमार! महीनों तक कोई पत्र नहीं।

हर रोज वे रंग-बिरंगे टिकटों वाले पत्र की राह देखते, परंतु डाकिया भूल से भी इधर झाँकता न था।

हाँ, बहुत लंबे अर्से बाद एक पत्र, एक दिन मिला। बड़ा अजीब-सा था वह। बड़ा करुण। बड़ा दर्द भरा। नैरोबी के किसी अस्पताल से लिखा था। रंगभेद के कारण पहले यूरोपियन लोगों के अस्पताल में जगह नहीं मिली, इस अनावश्यक विलंब के कारण रोग काबू से बाहर हो गया है। डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी है, किंतु उसमें भी अब सार लगता नहीं। चंद दिनों की मेहमानदारी है। उसके बाद तुम लोगों का क्या होगा, कुछ सूझता नहीं।

पास होते तो.... भरोसा रखना.... भगवान सबका रखवाला है.

जिसने पैदा किया है, वह परवरिश भी करेगा....।

पत्नी पत्र पढ़ती, रोती। अबोध बच्चे रुलाई भरी आँखों से माँ मुँह ताकते । ताइए का

फिर चिट्ठी पर चिट्ठियाँ डालीं उन्होंने, फिर तार, तब कहीं केन्या की मोहर लगा एक विदेशी लिफ़ाफ़ा मिला। लिखा था, परमात्मा का ही चमत्कार है, हालत सुधर रही है। एक नया जनम मिला है.... । थोड़े दिनों बाद फिर पत्र आया। पहले की ही तरह किसी से बोलकर लिखवाया हुआ.... हालत पहले से अ चिंता की अब कोई बात नहीं।

पहले की तरह कुछ रुपए भी पहुँच गए इस बार।

बच्चों के मुरझाए मुखड़े खिल उठे। रुग्ण पत्नी का स्वास्थ्य तनिक सुधार की ओर बढ़ा। चिट्ठियाँ नियमि रहीं। रुपए भी पहुँचते रहे। 

उसमें लिखा था, हाथ के ऑपरेशन के बाद अब वह पत्र नहीं लिख पाता, इसलिए किसी से लिखवा लेता है। एक नया टाइपराइटर खरीद लिया है उसने अपने कारोबार का भी कुछ विस्तार कर रहा है, धीरे-धीरे । कुछ नई ज़मीन खरीदने का भी इरादा है-शहर के पास एक 'फार्म हाउस' की योजना है.... | 

घर के बारे में, पत्नी के बारे में, बच्चों की पढ़ाई के बारे में कितने ही प्रश्न थे। बड़ी उत्साहजनक बातें थीं... विस्तार से। इतना अच्छा पत्र पहले कभी भी न आया था। सबको स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता हुई। डूबती नाव फिर पार लग रही थी, धीरे-धीरे ।

लगभग तीन बरस बीत गए। घर की ओर से पत्र पर पत्र जाते रहे कि अब उसे थोड़ा-सा समय निकालकर कभी घर भी आना चाहिए।

बच्चे बहुत याद करते हैं। उसे देखने भर को तरसते हैं। जो-जो हिदायतें चिट्ठी में लिखी रहती हैं उनका अक्षरशः पालन करते हैं। माँ को किसी किस्म का कष्ट नहीं देते। कहना मानते हैं। पढ़ने में बहुत मेहनत करते हैं। अज्जू कहता है कि बड़ा होकर वह भी पापा की तरह अफ्रीका जाएगा। इंजीनियर बनेगा। पापा के साथ खूब काम करेगा। अब वह पूरे बारह साल का हो गया है। छठी कक्षा में अव्वल आया है, मास्टर जी कहते हैं कि उसे वज़ीफ़ा मिलेगा। तनु अब अट्ठारह पार कर रही है। उसका भी ब्याह करना है। कहीं कोई अच्छा-सा लड़का अपनी जात-बिरादरी का मिले तो चल सकता है....।

चिट्ठी के जवाब में बहुत-सी बातें थीं। लिखा था कि इस समय तो नहीं, हाँ अगले साल तनु के ब्याह पर अवश्य पहुँचेगा। योग्य वर तो वहाँ भी मिल सकते हैं, पर विदेश में, अफ्रीका जैसे देश में लड़की को ब्याहने के पक्ष में वह नहीं है । दहेज की चिंता न करना। कहीं वर की खोज करना ।

वर की तलाश में भटकने की अधिक आवश्यकता न हुई आसानी से खाता- -पीता घर मिल गया। शायद इतना अच्छा घराना न मिलता, लेकिन इस भ्रम से कि कन्या का बाप अफ्रीका में सोना बटोर रहा है, सब सहज हो गया।

शादी की तिथि निश्चित हो गई। नैरोबी से पत्र आया कि वह समय से पहुँच रहा है। गहने, कपड़े सब बनाकर वह साथ लाएगा। लेकिन शादी के समय वह चाहकर भी पहुँच नहीं पाया। विवशताओं से भरा लंबा पत्र आया कि इस बीच जो नया कारोबार शुरू किया है, उसमें मजदूरों की हड़ताल चल रही है। ऐसे संकट के समय यह सब छोड़कर वह कैसे आ सकता है। हाँ, गहने कपड़े और रुपए भिजवा दिए हैं। वर-वधू के चित्र उसे अवश्य भेजें, वह प्रतीक्षा करेगा। खैर, ब्याह हो गया धूमधाम के साथ विवाह के सारे चित्र भी भेज दिए।

अज्जू ने इस वर्ष कई ईनाम जीते। हाई स्कूल की परीक्षा में जिले में सर्वप्रथम रहा। खेलों में भी पहला। बहुत से सर्टीफ़िकेट मिले, वज़ीफ़ा मिला। ईनाम में मिली सारी वस्तुओं को फोटो वे पापा को भेजना न भूले।

बदले में कीमती कैमरा आया। गर्म सूट का कपड़ा आया। सुंदर घड़ी आई और मर्मस्पर्शी लंबा पत्र आया । लिखा था कि वह बच्चों की उम्मीद पर ही जी रहा है। पत्नी का स्वास्थ्य अच्छा रहना चाहिए। बच्चे इसी तरह नाम रोशन करते रहें। उनके सहारे वह जिंदगी की डोर कुछ और लंबी खींच लेगा...। यह सारा कारोबार उन्हीं के लिए तो है।

पर, अनेक वादे करने पर भी घर आना संभव न हो पाता। हर बार कुछ न कुछ अड़चनें आ जातीं और उसका आना स्थगित हो जाता।

समय पंख बाँधकर उड़ता रहा, अबाध गति से ।

बच्चों ने लिखा कि यदि उसका घर आ पाना कठिन हो रहा है तो वे ही सब अफ्रीका आने की सोच रहे हैं। कुछ वर्ष वहीं बिता लेंगे।

उत्तर में केवल इतना ही था कि काम बहुत बढ़ गया है। नैरोबी, मोंबासा के अलावा अन्य स्थानों पर भी उसे नियमित रूप से जाना पड़ता है। यहाँ विश्वास के आदमी मिलते नहीं, इसलिए उसे स्वयं ही खटना पड़ता है। यहाँ की आबोहवा, बच्चों की पढ़ाई, अनेक प्रश्न थे। अज्जू जब तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता तब तक कुछ नहीं हो सकता। समय निकालकर कभी वह स्वयं घर आने का प्रयास करेगा। बच्चों की बहुत याद आती है। घर की बहुत याद आती है। लेकिन, विवशता के लिए क्या किया जाए?

अंत में एक दिन वह भी आ पहुँचा जब अज्जू ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। कहीं अच्छी नौकरी की तलाश शुरू, पर पिता के अब भी घर आने की संभावना न दिखी तो उसने लिखा-"अम्मा बीमार रहती है। एक बार, अंतिम बार हुई, देखना जी भर चाहती है।

प्रत्युत्तर में विस्तृत पत्र मिला। इलाज के लिए रुपए भी परंतु इस बार अज्जू ने ही जाने का कार्यक्रम बना लिया अकस्मात् पहुँचकर पापा को चौकाने की पूरी-पूरी योजना
टिकट खरीद लिया। 

पासपोर्ट वीजा भी देखते-देखते बन गया। और एक दिन दिल्ली से वह विमान से रवाना भी हो गया।

उसके मन में एक गहरी उत्कंठा थी कि उसे देखकर कितने चकित होंगे। उन्होंने कल्पना भी न की होगी कि एकाएक वह इतनी दूर एक दूसरे देश में इतनी आसानी से आ जाएगा। उनकी निगाहों में तो अभी वह उतना ही छोटा होगा, जब वह निक्कर पहनकर आँगन में गुल्ली-डंडा खेलता था।

नैरोबी के हवाई अड्डे पर उतरकर वह सीधा उस पते पर गया, जो पत्र में दिया हुआ था। परंतु वहाँ ताला लगा था। हो, उसके पिता -की पुरानी धुंधली नेमप्लेट अवश्य लगी थी। 

आसपास पूछताछ की तो पता चला कि एक वृद्ध भारतीय अप्रवासी अवश्य वहाँ रहते
हैं। रात को देर से दफ़्तर से घर लौटते हैं। किसी से मिलते-जुलते नहीं। निपट अकेले हैं। वह बाहर बरामदे में रखी बेंच पर प्रतीक्षा करता रहा। रात को एक बूढ़ा व्यक्ति ताला खोलने लगा तो देखा एक युवक सामने बैठा ऊँघ रहा था। 

उसका नाम-धाम पूछा तो उसे अपनी बाँहों में भर लिया। बड़े उत्साह से स्वागत किया। भोजन के बाद वे उसे अपने कमरे में ले गए। दीवार की ओर उन्होंने इंगित किया- एक नन्हा बच्चा माँ की गोद में लुढ़का किलक रहा है।

"यह किसका चित्र है?"

युवक ने गौर से देखा। कुछ झेंपते हुए कहा, "मेरा"। वृद्ध इस बार कुछ ज़ोर-ज़ोर से खिलखिलाए, "मेरे बच्चे ! तुम इतने बड़े हो गए हो। सच! इतने साल बीत गए। जैसे कल की बात है।" उन्होंने उसके चेहरे की ओर देखा, "तुम शायद नहीं जानते, तुम्हारे पिता का मैं कितना जिगरी दोस्त हूँ। कितने लंबे समय तक हम साथ-साथ रहे, दो दोस्तों की तरह नहीं, सगे भाइयों की तरह। उसी ने मुझे हिंदुस्तान से यहाँ बुलाया था। बड़ी लगन से सारा काम सिखाया ।"

साथ-साथ साझे में हमने यह कारोबार शुरू किया। नैरोबी की आज यह बहुत अच्छी फ़र्म है। यह सब उसकी ही बदौलत है...। कहते-कहते वे ठिठक गए।

उसका हाथ अपने हाथों में थामते हुए वे बोले, "तुम्हारी माँ कैसी है?"
"अच्छी है.....?"

"भाई बहन.....।"

"सब ठीक हैं।"

"कहीं कोई कठिनाई तो नहीं?"

"न, सब ठीक है।"

"बस, यही मैं चाहता था। यही ।" हौले से उन्होंने उसका हाथ सहलाया। देर तक तक शून्य में पलकें टिकाए सोचते रहे। कुछ क्षणों का मौन भंग कर खोए-खोए से बोले, "देखो बेटे, तिनकों के सहारे तो हर कोई जी लेता है। लेकिन कभी-कभी हम तिनकों के साए मात्र के आसरे, भँवर से निकलकर, किनारे पर आ लगते हैं। हमारा जीवन कुछ ऐसे ही तंतुओं के सहारे टिका रहता है। 
यदि वे टूट जाएँ, छिन्न-भिन्न होकर, बिखर जाएँ तो पल भर में पानी के बुलबुलों की तरह सब समाप्त हो जाता है।"

".... जरा सोचो बेटे!" वे खाँसे, "तुम्हारे पिता की मृत्यु आज से पंद्रह-बीस साल पहले हो जाती, तो क्या होता? भले ही वे एक अच्छी रकम तुम्हारे नाम छोड़ जाते।” उन्होंने युवक के असमंजस में डूबे, गंभीर चेहरे की ओर देखा, " हमार रेत में गिरे पानी की तरह विलीन हो जाते और तुम अनाथ हो जाते। तुम्हारी माँ घुट-घुट कर कब की मर चुकी होती। तुम इतने हौसले से पढ़ नहीं पाते। जहाँ तुम आज हो, वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। निराशा की, हताशा की तथा असुरक्षा की इतनी गहरी खाई में होते कि वहाँ से अँधेरे के अलावा कुछ भी न दीखता तुमको....।" 

उन्होंने अपने सूखे होंठों को जीभ की नोंक से भिगोया, “हम दुर्बल होते हुए, असहाय, अकेले होते हुए कितने-कितने बीहड़ वनों को पार कर जाते हैं सहारे की एक अदृश्य डोर के सहारे....।" 

उनका गला भर आया, “तुम्हारे पिता तो तब ही गुजर गए थे बेटे। अपने साझे कारोबार से, उनके हिस्से के पैसे तुम्हें नियमित रूप से भेजता रहा। कितने वर्षों से मैं इसी दिन के इंतजार में था.... अब तुम बड़े हो गए हो। अपने इस कारोबार में मेरा हाथ बटाओ। तुम सरसब्ज हो गए. , मेरा वचन पूरा हो गया जो मैंने उसे मरते समय दिया था ....।" उनका गला भर आया। वे दीवार पर टंगे एक धुंधले से चित्र को न जाने क्या-क्या सोचते हुए देखते रहे।

                                                                                                                       -हिमांशु जोशी