HINDI BLOG : कहानी - भाग्य का चक्र

कहानी 'आप जीत सकते हैं'

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Tuesday, 4 July 2023

कहानी - भाग्य का चक्र

भाग्य का चक्र

एक नगर में चार ब्राह्मण मित्र रहते थे। चारों ही निर्धन और दरिद्र थे। एक दिन चारों ने धनोपार्जन के लिए कहीं बाहर जाने का निश्चय किया। वे अपना घर, नगर, बंधु-बांधव सब छोड़कर विदेश यात्रा के लिए निकल पड़े। चलते-चलते वे अवंती पहुँचे। शिप्रा नदी में स्नानकर । उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में भगवान की आराधना की। वे मंदिर से बाहर निकले ही थे कि उनका सामना भैरवानंद महायोगी से हो गया। वे योगीराज के साथ उनके मठ पर जा पहुँचे। 
भैरवानंद के पूछने पर उन्होंने अपनी यात्रा का प्रयोजन उन्हें बताया और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगे, "योगीराज, आप ही हमें धनोपार्जन का कोई उपाय बताइए।" भैरवानंद ने अनेक कार्यों को सिद्ध करने वाली चार सिद्धि वर्तिकाएँ बनाई और चारों ब्राह्मणों को एक-एक वर्तिका देते हुए कहा, "आप लोग हिमालय की ओर जाइए। जहाँ भी कोई वर्तिका गिरे, उस स्थान पर खुदाई करने पर निश्चित ही आपको धन प्राप्त होगा। उस धन को लेकर लौट आइएगा।"

चारों ब्राह्मण वर्तिका लेकर हिमालय की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचने पर एक ब्राह्मण के हाथ से वर्तिका गिर पड़ी, उसने उस स्थान पर खुदाई की तो वहाँ ताँबे की खान मिली। उसने अपने साथियों से कहा, "मित्रों! इच्छानुसार तांबा लेकर अब यहाँ से वापिस चलते हैं।" उसके साथी | बोले, "तुम तो मूर्ख हो। इस ताँबे से क्या हमारी दरिद्रता मिट जाएगी? हम तो आगे जाएँगे।" पहला ब्राह्मण अपनी इच्छानुसार ताँबा लेकर लौट गया। शेष तीनों आगे चल दिए।

कुछ दूर आगे जाने पर एक और ब्राह्मण की वर्तिका गिर गई। उसने उस स्थान की खुदाई की तो वहाँ चाँदी की खान निकली। वह अपने साथियों से बोला, “मित्रों! यथेच्छ चाँदी लेकर वापिस लौट चलते हैं।" उसके दोनों साथी बोले, "क्या बात करते हो। आगे अवश्य सोने की खान मिलेगी। हम तो आगे जाएँगे।" दूसरा ब्राह्मण चाँदी लेकर वापिस चला गया। अब दोनों ब्राह्मण आगे बढ़े।

वे कुछ दूर ही गए थे कि उनमें से एक के हाथ की वर्तिका गिर पड़ी। उसने उस स्थान को खोदा तो वहाँ सोने की खान मिली। वह अपने साथी से बोला, "मित्र! अब आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। सोने से हमारी सारी दरिद्रता मिट जाएगी।" उसका साथी कहने लगा, “तुम समझते क्यों नहीं हो ? पहले ताँबे की, फिर चाँदी की और फिर सोने की खान मिली है। अब आगे अवश्य ही रत्नों की खान होगी। चलो आगे चलते हैं। "

तीसरा ब्राह्मण बोला, "नहीं तुम जाओ, मैं यहीं रहकर तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा । " चौथा ब्राह्मण अकेला ही आगे चल पड़ा। कुछ दूर जाने पर ही उसे भयंकर गरमी सताने लगी और प्यास भी लगने लगी। परेशान होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसे रक्त से लथपथ एक व्यक्ति दिखाई दिया जिसके सिर पर एक चक्र घूम रहा था। ब्राह्मण दौड़ कर उसके पास पहुँचा और उत्सुकता से पूछने लगा, “आप कौन हैं? इस प्रकार इस दशा में क्यों बैठे हैं? क्या यहाँ आस-पास जल मिलेगा ? मुझे बहुत प्यास लगी है।'

ब्राह्मण की बात समाप्त होते ही चक्र उस व्यक्ति के सिर से उतर कर ब्राह्मण के सिर पर घूमने लगा। ब्राह्मण ने घबराकर पूछा, "यह क्या हुआ ? मेरे सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी हैं।"" वह व्यक्ति बोला, "मेरे सिर पर भी यह चक्र इसी प्रकार आया था। आपकी ही तरह जब कोई दूसरा व्यक्ति यहाँ आकर इसी प्रकार प्रश्न करेगा जैसे आपने मुझसे किए थे, तभी यह चक्र आपके सिर से उतर कर उसके सिर पर घूमने लगेगा।"

ब्राह्मण ने चिंतित स्वर में पूछा, "आप यहाँ कितने दिनों से हैं ? " वह व्यक्ति बोला, “ठीक-ठीक समय तो मैं नहीं बता सकता। पर इतना कह सकता हूँ कि दरिद्रता दूर करने के लिए सिद्धि वर्तिका के साथ मैं इसी मार्ग से जा रहा था। यहाँ मैंने इस विषय में पूछा ही था कि यह चक्र मेरे सिर पर आकर घूमने लगा। वैसे तो कोई इधर आता ही नहीं और यदि कोई आ भी जाए तो उसकी यही दशा होती है। कुबेर ने ही धन की चोरी हो जाने के भय से इधर आने वाले व्यक्तियों के लिए चक्र का भय दिखाया है। अच्छा, अब मुझे जाने की अनुमति दीजिए।"

यह कहकर वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। उधर तीसरा ब्राह्मण काफ़ी समय तक अपने चौथे साथी की प्रतीक्षा करता रहा। जब वह नहीं लौटा तो वह उसे खोजने आगे बढ़ा। उसी स्थान पर पहुँच कर उसने अपने मित्र को उस दयनीय दशा में देखा तो बड़ा दुखी हुआ। चौथा ब्राह्मण अपने मित्र को देखकर बोला, "मित्र, देखो यह सब भाग्य का चक्र है।" यह सुनकर मित्र ने कहा, 'मैंने आपको कितना कहा था कि चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। किंतु आपने मेरी एक नहीं सुनी। विद्वान और कुलीन होने पर भी आप बुद्धिहीन हैं। किसी ने ठीक कहा है कि विद्या की अपेक्षा बुद्धि बड़ी होती है। चौथा ब्राहमण बोला, "नहीं मित्र, यह सब भाग्य का चक्र है। भाग्य प्रतिकूल हो तो बुद्धिमान व्यक्ति भी कष्ट उठाते हैं, सुरक्षित वस्तु भी नष्ट हो जाती है।' तीसरा ब्राह्मण अपने मित्र की बात सुनकर उसे भाग्य के भरोसे छोड़ घर वापिस लौट गया।


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