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Saturday, 15 May 2021

ख़ुशी के आँसू - लघुकथा

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ख़ुशी के आँसू 

गली-गली सब्जी बेचते हुए सब्जी वाला एक गली से गुज़रा उसने एक बड़ी-सी इमारत की पाँचवीं मंजिल के घर की घंटी बजाई।ऊपर से बालकनी का दरवाजा खुला और एक महिला बाहर आई। उस महिला ने नीचे झाँककर देखा...सब्जी वाले ने महिला की और देखते हुए कहा:"बहन! सब्जी लाया हूँ। नीचे आकर सब्जी ले लो ...

बताओ बहन क्या तौलना है? क्या कोई और सब्जी वाला यहाँ सब्जी देने आता है क्योंकि आप तो मुझसे सब्जी लेती थीं पर आपने तो बहुत दिनों से मुझसे कोई सब्जी नहीं खरीदी। 

सब्जी वाला नीचे चिल्लाकर बोला ।सब्जीवाले की बात सुनकर महिला बोली:"रुको भाई! मैं नीचे आकर बात करती हूँ ।"

महिला इमारत से नीचे गली में आई। गली में खड़े सब्जी वाले के पास जाकर वह कहने लगी -"भाई!  अब हमारी घंटी मत बजाना । हमें अभी सब्जियों की ज़रूरत नहीं है।"

"यह कैसी बात कर रही हो आप दीदी! सब्ज़ी खाना तो बहुत ज़रूरी है। सच बोलो दीदी, क्या तुम किसी और से सब्जी लेती हो?" सब्जी वाले ने महिला से कहा।

"नहीं भाई! दरअसल बात यह है कि उनके(पति) पास अभी कोई काम नहीं है और किसी तरह हम खुद को इस हालात में जीवित रख रहे हैं। 

लेकिन जब सब कुछ ठीक होने लगेगा, पति काम पर जाएँगे और घर में कुछ पैसे आने लगेंगे, तब मैं तुमसे ही सब्जी लूँगी । आप इस तरह से घंटी बजाते हो  तो उन्हें बहुत बुरा लगता है, अपनी  मजबूरी पर उन्हें दुख होता है। इसलिए भाई, अब से हमारी घंटी मत बजाना ।" यह बात कहकर वह महिला अपने घर वापस लौटने लगी।

"अरे दीदी! थोड़ा रुको। हम इतने सालों से तुम्हें सब्जियाँ दे रहे हैं। जब आपका दिन अच्छा रहा, तो आपने हमसे बहुत सारी सब्जियाँ और फल ले लिए। अब अगर आपको कोई समस्या है, तो क्या हम आज छोड़ देंगे। तुम ऐसे ही हो?

 अरे दीदी, हम सब्जी वाले हैं, कुछ नेता हैं, जिन्हें आज जब आपको मेरी जरूरत है, तो हम आपको ऐसे ही छोड़ देते हैं, परेशान। दीदी, दो मिनट रुको। ”

और एक बैग में टमाटर, आलू, प्याज, घी, कद्दू और करेला डालने के साथ ही सब्जी वाले ने उसमें धनिया और मिर्च डाली।.यह सब देखकर महिला हैरान रह गई। 

उसने सब्जीवाले से तुरंत कहा- "भैया! इसे तोलो तो सही, तुम मुझे उधार सब्जी दे रहे हो, कम से कम इसे तोलो, और मुझे इसके पैसे भी बताओ। मैं तुम्हारा सब्जी का हिसाब लिख लूँगी । 

भैया जब मेरे हालात ठीक हो जाएँगे, तब आपके सब्जी के सारे पैसे मैं आपको दे दूँगी ।" उस महिला ने सब्जी वाले कहा।"वाह... क्या हुआ बहन ? 

मैंने सब्जी इसलिए नहीं तोली क्योंकि कोई मामा अपनी भतीजी और भतीजे से पैसे नहीं लेता है। और बहन! मैं भी कोई एहसान नहीं कर रहा हूँ। यह सब, यहीं से उसने कमाया है, इसलिए उसने आप में उसका हिस्सा है।

मैं यह थोड़े से 'आम' गुड़िया के लिए और कुछ 'मौसम्बी' भतीजे के लिए सब्जी के साथ रख रहा हूँ ।बच्चों का अच्छे से ख्याल रखना बहन। यह कोरोना रोग बहुत ही बुरा है। और हाँ, एक बात और सुन.लो .. मैं यहाँ से जब भी निकलूँगा तो तुम्हारी घंटी जरूर बजाऊँगा । "

सब्जी वाले ने हँसते हुए उस महिला के हाथ में दोनों थैले पकड़ा दिए। महिला की आँखों में लाचारी व मज़बूरी की जगह स्नेह के आँसू भर आए थे ।

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