पाठ का सार
इस पाठ में लेखक ने महान् भारतीय वैज्ञानिक श्री चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन संघर्ष तथा उनकी असाधारण उपलब्धियों का बखूबी चित्रण किया है। सन् 1921 में एक समुद्री यात्रा के दौरान समुद्र की नीलवर्णीय आभा उनकी जिज्ञासा का कारण बनी। इन्होंने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और विश्व भर में विख्यात बन गए।
स्कूल और कॉलेज में उच्च अंक तथा स्वर्णपदक पाने वाले रामन् को मात्र अठारह वर्ष में भारत सरकार के वित्त-विभाग में नियुक्ति मिली। सन् 1930 में नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय वैज्ञानिक रामन् के मन में अपने देश के प्रति अथाह श्रद्धा थी। भारत की स्वतंत्रता के पक्षधर तथा भारत में विज्ञान की उन्नति के अभिलाषी वेंकट रामन् के जीवन संघर्ष तथा एक प्रतिभावान छात्र से एक महान वैज्ञानिक तक की गाथा को लेखक ने प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में जन्में श्री रामन् बचपन से ही वैज्ञानिक रहस्यों को सुलझाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। अपने कॉलेज के दिनों से ही इन्होंने शोधकार्यों में दिलचस्पी लेना प्रारंभ कर दिया था। उनका प्रथम शोधपत्र 'फिलॉसॉफिकल मैगजीन' में प्रकाशित हुआ था। बहू बाज़ार स्थित 'इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की प्रयोगशाला में अभावों के बावजूद वे भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने की साधना करते रहे। इन्हीं दिनों रामन् वाद्य यंत्रों की ओर आकृष्ट हुए और विभिन्न देशी तथा विदेशी वाद्ययंत्रों पर शोध करके पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ा कि भारतीय वाद्य यंत्र विदेशी वाद्य यंत्रों की अपेक्षा घटिया हैं। इन्होंने अनेक ठोस रवेदार तथा तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरणों का अध्ययन किया तथा 'रामन् प्रभाव' की खोज ने भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति उत्पन्न कर दी। रामन् की खोज के परिणामस्वरूप अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सरल हो गया। रामन् प्रभाव की खोज ने इन्हें विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। सन् 1929 में रामन् को 'सर' की उपाधि प्रदान की गई। इन्हें विश्व के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' तथा देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की प्रतिमूर्ति थे। रामन् ने अपने बचपन में संसाधनों के अभाव को झेला इसीलिए उन्होंने बंगलौर में 'रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट' नामक शोध संस्थान की स्थापना की तथा 'इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स' नामक शोध-पत्रिका प्रारंभ की। आज हमें भी रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने और प्रकृति में छिपे रहस्यों को अनावृत करने की आवश्यकता है।
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