दुःख का अधिकार
लेखक परिचय :यशपाल
प्रमुख कृतियाँ : देशद्रोही, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, झूठा सच तथा मेरी,तेरी, उसकी बात (सभी उपन्यास), ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजड़े की उड़ान, फूलों का कुर्ता, उत्तराधिकारी (सभी कहानी संग्रह) और सिंहावलोकन।
साहित्य अकादमी पुरस्कार - 'तेरी,मेरी, उसकी बात' ।
यशपाल की कहानियों में कथा रस सर्वत्र है।
कहानी की विशेषताएँ : उनकी कहानियाँ की मुख्य विशषताएँ वर्ग-संघर्ष, लोगों का मनोविश्लेषण और समाज पर पैना व्यंग्य है ।
यशपाल के विचार थे कि समाज को उन्नत बनाने का एक ही रास्ता है - सामाजिक समानता के साथ-साथ आर्थिक समानता।
भाषा : कहानियों में हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग।
दुःख का अधिकार कहानी :
प्रस्तुत कहानी बहुत ही मर्मस्पर्शी है जो देश में फैले अंधविश्वासों और ऊँच-नीच के भेद-भाव को बेनकाब करती है।यह कहानी हमें यह बताती है कि दुःख की अनुभूति सभी को यानि हर वर्ग को समान रूप से होती है।
इस कहानी में धनी लोगों की अमानवीयता पूर्ण व्यवहार और समाज के गरीब व असहाय लोगों की मजबूरी को भी पूरी तरह स्पष्ट किया है ।
दुःख तो आखिर दुःख ही होता है। यह बिलकुल सही है कि दुःख हर इंसान को तोड़ देता है, दुःख में दुखी होना, शोक या मातम करना हर कोई चाहता है, दुःख का आमना-सामना होने पर सब अवश हो जाते हैं, इस देश में ऐसे कई अभागे लोग भी हैं जिन्हें न तो दुःख मनाने का अधिकार होता है और न ही दुःख मनाने का अवकाश ही मिल पाता है ।
पाठ का सार :
दुख का अधिकार' यशपाल जी की एक व्यंग्यपूर्ण रचना है।
इस पाठ में इस बात पर दुख प्रकट किया गया है कि समाज के लोग गरीबों वर्ग के लोगों के दुख को दुख नहीं समझते।
हमारे देश में कुछ ऐसे लोग या वर्ग भी हैं जिन्हें दुख मनाने का भी अधिकार व अवसर नहीं मिलता है ।
पोशाक द्वारा स्तर निर्धारण:
हमारा स्तर निर्धारित करने में हमारी पोशाक बहुत अहम भूमिका निभाती है। हमारी पोशाक देखकर ही समाज के लोग हमारा स्तर निर्धारित करते हैं।
इस समाज मनुष्य की पहचान केवल उसकी पोशाक से होती है।
यही पोशाक उसे समाज में अधिकार व दर्जा दिलाती है। कीमती पोशाक मनुष्य के लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है।
हमारे जीवन में कई बार ऐसा समय भी आता है जब वर्ग-भेद भूलकर हम नीचे झुककर गरीबों की मनोस्थिति को जानने का प्रयास करते हैं।
तब उन निचली श्रेणियों की अनुभूति हमारे मन को छू जाती है, हम उनकी मदद तो करना चाहते हैं,परंतु उस समय हमारी पोशाक बंधन बनकर अड़चन डाल देती है।
हमारी पोशाक कई खास मौकों या परिस्थितियों में हमें नीचे झुकने से रोकती है।
लोगों का दुर्व्यवहार:
खरबूजे बेचने वाली घुटनों में मुँह छुपाकर डलिया में कुछ खरबूजे रखकर रो रही थी।
उसकी पोशाक को देखकर कोई भी खरबूजे खरीदने के लिए आगे नहीं बढ़ रहा था।
बाजार में खड़े लोग उसे धिक्कार रहे थे तथा तरह-तरह की बातें बना रहे थे।
वह कह रहे थे कि सूतक लगे हुए हैं। एक आदमी ने घृणा से थूकते हुए कहा, "क्या जमाना है।
जवान लड़के को मरे पूरा दिन भी नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगाकर बैठी है।"
एक ने लापरवाही से कहा कि इन कमीनों का धर्म-ईमान कुछ नहीं, बस रोटी का टुकड़ा ही सब कुछ है।
परचून की दुकान चलाने वाले एक दुकानदार ने कहा - "इसे अपने धर्म-ईमान की चिंता नहीं है तो न सही परंतु इसे सूतक के तेरह (13) दिनों में खरबूजे बेचकर दूसरों का धर्म-ईमान नहीं बिगाड़ना चाहिए।"
बुढ़िया माँ की कहानी :
लेखक ने पास-पड़ोस की दुकानों से पूछ कर पता लगाया कि उसका तेईस (23) साल का जवान लड़का भगवाना साँप के काटने से मर गया।
वह शहर के पास डेढ़ बीघा जमीन में खेती करके परिवार का निर्वाह करता था।
परसों सवेरे एक साँप ने उसे डस लिया। माँ ने ओझा को बुलाया झाड़ना -फूँकना हुआ।
नाग देव की पूजा करवाई गई।
दान-दक्षिणा दी। घर में जो अनाज और आटा था वह दान दक्षिणा में चला गया। परंतु उसका पुत्र भगवाना बच न सका।
बुढ़िया के पास बेटे को विदा करने के पैसे भी न थे। सुबह होते ही बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे।
दादी ने उन्हें खाने के लिए खरबूजे दिए। बहू भी बुखार से तप रही थी।
अब उन्हें कोई उधार देने वाला नहीं था इसलिए वह रोते-रोते खरबूजे लेकर बेचने चल पड़ी थी।
लेखक को बुढ़िया की दशा देखकर अपने पड़ोस की एक संभ्रांत महिला की याद आई। वह संभ्रांत महिला अपने पुत्र की मृत्यु के अढ़ाई मास तक पलंग से न उठ सकी थी।
उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट बाद पुत्र-वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे।
हरदम सिर पर बर्फ़ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र वियोगी माँ के लिए द्रवित हो उठे थे।
लेखक दोनों पुत्र वियोगी ने माताओं की तुलना कर रहा था।
उसके मन में विचार आया कि शोक करने और दुख मनाने के लिए भी सुविधा और अधिकार दोनों चाहिए।
https://youtu.be/ZwJP7MNf-NM
शब्दार्थ :
पृष्ट(पेज)- 14(१४)
पोशाक- पहनावा
श्रेणी -विभाजन
दर्जा - स्थान
अनुभूति -अनुभव, संवेदना
डलिया- टोकरी,
अधेड़ -ढलती उम्र का
पृष्ट(पेज)- 15 (१५ )
व्यथा - पीड़ा
व्यवधान- रुकावट
बेहया- बेशर्म
नीयत - इरादा
बरकत - वृद्धि
खसम - पति
लुगाई - पत्नी
परचून की दुकान -आटा, चावल, दाल आदि की दुकान।
सूतक - परिवार में किसी बच्चे के जन्म होने या किसी के मरने पर कुछ निश्चित समय तक की अपवित्रता।
कछियारी - खेतों में तरकारियाँ बोना।
निर्वाह -गुजारा
मुँह -अँधेरे - सुबह-सुबह, भोर का समय
मेड़ -खेत के चारों ओर का घेरा
तरावट - गीलापन
ओझा - झाड़-फूँक करने वाला
दान-दक्षिणा -दान में दिया जानेवाला धन
पृष्ट(पेज)- 16 (१६ )
बजाज - कपड़े का व्यापारी
छन्नी-ककना - मामूली गहना
चूनी-भूसी - पशुओं को खिलाने का चारा
बिलबिलाना - तड़पना
दुअन्नी-चवन्नी - दो-चार आने
संभ्रांत - उच्च वर्ग से संबंधित
मूर्छा - बेहोशी
द्रवित - पसीजा हुआ
नाक ऊपर उठाना - सम्मान की रक्षा करना।
पृष्ट(पेज)- 17 (१७ )
गम मनाना - मृत्यु का दुःख प्रकट करना।
सहूलियत - सुविधा
अधिकार - हक
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