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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Tuesday, 11 May 2021

कहानी- सौभाग्य

Top Best Famous Moral Stories In Hindi  
सौभाग्य

एक गाँव में एक चोर रहा  करता था।

बहुत समय बीत जाने पर भी उसे कई दिनों तक चोरी करने का मौका नहीं मिला, जिस कारण उसके घर में खाना और अनाज बचा था।
इसी चिंता में डूबा वह सोच-सोचकर परेशान हो रहा था कि अब वह क्या करे क्या न करे ,इसी उधेड़बुन में वह करीब रात के बारह बजे गाँव  से बाहर की ओर निकल जाता है। 
गाँव के बाहर उसे एक कुटिया नज़र आती है। वह एक साधु की कुटिया थी। चोरी के इरादे से वह उस कुटिया के अंदर चला जाता है ।
वह जानता था कि ऋषि महान त्यागी होते हैं, वे अपने पास कुछ भी नहीं रखते।
परंतु वह सोच रहा था कि शायद उसे यहाँ कुछ तो खाने-पीने के लिए मिलेगा।
 इसी से उसके  एक या दो दिन बीत जाएँगे तब यहाँ से चला जाऊँगा। 
जब चोर झोपड़ी में प्रवेश करने लगा, संयोग से उसी समय साधु बाबा 
ध्यान से उठे  और चोर अदूरदर्शिता के कारण  बाहर आया। 
उसका सामना एक साधु और भिक्षुओं से हुआ। भिक्षुओं ने उन्हें पहचान लिया क्योंकि पहले कई बार देखा था, लेकिन साधुओं को पता नहीं था कि वह चोर है।
साधु को उसे वहाँ देखकर हैरानी हुई और वह सोचने लगे कि आधी रात को यह यहाँ पर क्यों आया होगा?
साधु ने बड़े प्यार से  चोर से पूछा: "बेटा कहो! तुम्हें कैसा कष्ट हुआ है जो आधी रात को तुम यहाँ आए हो ?" या तुम्हें हमसे कोई काम है?"
साधु की बात सुनकर चोर ने कहा: "महाराज! मैं कई दिनों का भूखा हूँ।" 
साधु ने उस चोर से कहा, बेटा! तुम यहाँ मेरे पास बैठ जाओ। मैंने कुछ शकरकंद राख में दबाई थी ,शायद अब वे भुन गई होगी , मैं तुम्हें वह शकरकंद देता हूँ। उसे खाकर शायद तुम्हारा पेट भर जाएगा।
अगर तुम शाम  समय आते तो हम साथ में ही खाना खाते।
 पेट क्या है? बेटा ! मन में संतोष हो तो जो मिलता है उसी में सुखी हो सकता है।" जैसे संतोष प्राप्त करना बस । "
साधु ने दीप प्रज्ज्वलित किया। चोर को बैठने के लिए जगह दी, उसे पानी पिलाया और कुछ भुने हुए शकरकंद को एक पत्ते पर रखकर उसे परोस दी ।
फिर उसी के पास बैठ कर उसे ऐसे खिलाया जैसे एक माँ अपने बच्चों को खिलाती है। 
साधु बाबा का ऐसा प्रेमभरा व्यवहार देखकर चोर बहुत दुखी हुआ, वह सोचने लगा, 'एक मैं हूँ कितना नीच' 
और एक हैं ये बाबा।
मैं यहाँ चोरी करने के इरादे से आया था और ये मुझे कितने प्यार से खिला रहे हैं! हम दोनों ही समान हैं -ये भी इंसान हैं और 
मैं भी हूँ। 
किसी ने सत्य ही  कहा  है: 'मनुष्य और मनुष्य में अंतर है, कोई हीरा है, तो कोई कंकड़। मैं उनके सामने कंकड़ से भी बदतर हूँ ।'
हर इंसान में बुराई के साथ अच्छाई के गुण भी होते हैं, जो समय पाकर जाग जाते हैं।जैसे बीज उचित खाद और पानी पाकर फलता-फूलता है, वैसे ही संत की संगति होती है मनुष्य  सज्जनों से मिलता है तो उनसे मिलने के बाद वे गुण पैदा हो जाते हैं।
*चोर के हृदय की सारी गड़गड़ाहट वाष्पित हो गई है। उन्होंने संत को देखा,
ध्यान और अमृतवर्षा दृष्टि का लाभ। *
* एक घड़ी आधी घड़ी, आधी आधी। *
* तुलसी संगत साध की, हरे श्रेणी के अपराध। *
उन ब्रह्मास्त्रीय साधुपुरुषों की आधे घंटे की बैठक से कितने चोर
के बुरे संस्कार नष्ट हो गए होंगे।
* उसने साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने के लिए अधीरता महसूस की। *
तब उसने सोचा कि 'साधु बाबा को पता चल जाएगा कि मैं चोरी करने के इरादे से आया हूँ ।'
मैं होता तो उसकी नज़रों में मेरी क्या इज्जत होती!
बाबा क्या सोचेंगे, क्या अशुद्ध प्राणी है, जो मेरे संत के घर को चुरा सकता है?
वो आया !'
* लेकिन फिर सोचा, 'मुनि मन में जो कुछ भी समझ सकते हैं, मैं उनके सामने हूँ। 
मैं अपना अपराध स्वीकार करके पश्चाताप करूँगा । *
आप कितने महान महापुरुष हैं, आप मेरे अपराध को अवश्य क्षमा करेंगे। यह सत्य है कि 'साधु-संतों के 
सामने पश्चाताप करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
भोजन समाप्त होने के बाद साधु ने कहा: "बेटा! तुम इतनी रात को कहाँ जाओगे, 
मेरे पास यही चटाई बिछाओ और आराम से यही सो जाओ। सुबह होते ही चले जाना । "
*धर्म के प्रहार से चोर को दबाया जा रहा था। वह साधु के चरणों में गिर पड़ा
और फूट-फूट कर रोने लगा। *
भिक्षु समझ नहीं पाए कि क्या हुआ। साधु ने उसे प्यार से, प्यार से पाला
 सिर पर हाथ फेरते हुए उसने पूछा: "बेटा! क्या हुआ?"
चोर रोने लगा। उसने  अपने आप से बहुत संघर्ष किया। 
अपनेआप को सँभालकर चोर ने कहा:  "महाराज! मैं एक बहुत बड़ा अपराधी हूँ।" 
साधु ने कहा: "सुनो बेटा, ईश्वर सबके गुनाहों को माफ़ करता है। जब मनुष्य उसकी शरण में जाता है तो वह उसके बड़े-से-बड़े अपराधों को माफ कर देते हैं। तुम भी ईश्वर की शरण में जाओ। वह ही तुम्हारा भला करेंगे। 
* चोर: "महाराज! मेरे जैसे पापी को बचाया नहीं जा सकता।" *
* साधु: "अरे पगले! भगवान ने कहा है: यदि कोई अत्यंत शातिर है
अनोखे ढंग से मेरा भक्त होने के नाते मेरी पूजा करता है, तो वह साधु होना चाहिए।"*
"नहीं महाराज! मैंने बड़ी चोरी की है। मैं आज भी भूख से व्याकुल हूँ
वह तुमसे चोरी करने आया था, लेकिन तुम्हारा अच्छा व्यवहार
मेरी जिंदगी बदल दी। 
*आज मैं आपके सामने कसम खाता हूँ कि मैं फिर कभी चोरी नहीं करूँगा,
मैं किसी भी जीव पर अत्याचार नहीं करूंगा। *
तुम मुझे अपनी शरण में ले लो और मुझे अपना शिष्य बनाओ। "
* साधु के दिखाए मार्ग और प्रेम-व्यवहार ने चोर को साधु बना दिया। *
उन्होंने अपना पूरा जीवन उन साधुओं के चरणों में हमेशा के लिए समर्पित कर दिया अमूल्य मानव जीवन ने अमूल्य-से-अमूल्य भगवान के लिए अपना रास्ता खोज लिया दिया।
*महापुरुषों द्वारा यह सीखा जाता है कि "आपको सबसे अधिक स्वार्थी व्यवहार करना चाहिए क्योंकि सच्चा निस्वार्थ प्रेम ही सुखी जीवन की वास्तविक खुराक है। *
*दुनिया इस भूख से मर रही है, इसलिए प्यार बाँटों। 
हृदय के आध्यात्मिक प्रेम को अपने हृदय में मत छिपाओ।

* इसे उदारता से बाँटों, संसार के बहुत से दु:ख दूर हो जाएँगे। "*

Sunday, 9 May 2021

CLASS -9 REDAS KE PAD /रैदास के पद.....भावार्थ सहित

पद 

कवि परिचय :रैदास 

-संत रैदास जो रविदास के नाम से जाने जाते हैं वे भक्ति कालीन काव्यधारा के निर्गुण भक्ति शाखा के विख्यात संत थे और उनका जन्म सन 1388 में बनारस में हुआ था। 
- रैदास भी कबीर की तरह मूर्ति पूजा व तीर्थयात्रा आदि कर्म कांडों में विश्वास नहीं करते थे।
 - वे हृदय द्वारा अनुभव की गई अनुभूति और मन से की गई श्रद्धा को ही सच्चा धर्म मानते थे। 
-रैदास व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं की कद्र करते थे और धर्म के बाहरी आडंबरों को ढोंग समझते थे। 
-सिकंदर लोदी इन से  इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने इन्हें दिल्ली बुलाया।
 -रैदास की रचनाओं में कई भाषाओं का मिश्रण है। 
-उन्होंने अपनी रचनाओं में अधिकतर व्यवहारिक ब्रज भाषा का ही प्रयोग किया है परंतु खड़ी-बोली, अवधी, -राजस्थानी तथा उर्दू-फ़ारसी भाषाओं के शब्दों की भी छटा उनके काव्य में दिखाई देती है। 
-रैदास सरल और सीधे शब्दों में लिखने वाले कवि थे। 
-उन्होंने हृदय के भावों को समझकर बड़े ही स्पष्ट रूप में व्यक्त किया है। 
-उपमा और रूपक अलंकारों का स्वाभाविक ढंग से प्रयोग करते हुए कवि ने अपनी सहज भक्ति, आत्मनिवेदन और दैन्यभाव को व्यक्त किया है। 
- 'गुरुग्रंथ' साहिब में उनके चालीस पद भी सम्मिलित हैं। 
-उनका निधन सन 1518 में बनारस में हुआ। 
                                                 

   पद -1
   अब कैसे छूटे------------------ भक्ति करै रैदासा।। 

भावार्थ:

संत  रैदास अपने आराध्य देव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि

- हे प्रभु! अब आपका नाम रखने की आदत ऐसी पड़ गई है कि वह किसी हाल में और किसी भी तरह छूट ही नहीं सकती। 

-कवि कहते हैं कि अब तो मैं आपका अनन्य भक्त बन गया हूँ।  

-अब मैं आपकी भक्ति और नाम जपने से कभी विमुख हो ही नहीं सकता। मैं अब आपसे दूर नहीं रह सकता। 

-अपने और अपने आराध्य के बीच संबंधों को रैदास अनेक प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 

-जिस प्रकार चंदन का संपर्क प्राप्त कर पानी के कण-कण  में सुगंध समा जाती है,

- उसी प्रकार मेरे शरीर के प्रत्येक अंग में यानी अंग-अंग में आपके प्रेम व  भक्ति की सुगंध समा गई है। 

-हे प्रभु! आप उन आकाश में छाए काले घने बादलों के समान हो और मैं जंगल में नाचने वाले उस मोर के समान हूँ। जो काले घने बादलों को देखकर प्रसन्नता से नाच उठता है।  

-प्रभु जिस प्रकार बादलों की आहट सुनते ही मोर नाचने लगते हैं, 

-उसी तरह मैं भी आपके दर्शन पाते ही, प्रसन्नता से नाच उठता हूँ अर्थात प्रभु भक्ति में भाव-विभोर हो जाता हूँ।  

-जैसे चकोर पक्षी बिना पलकें झपकाए चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता रहता है, 

-वैसे ही मैं अपने प्रभु के सुंदर रूप को निहारता रहता हूँ। 

 -हे प्रभु! तुम यदि दीपक के समान हो, तो मैं उस दीपक में दिन-रात जलने वाली रुई की बत्ती के समान हूँ, 

-जो प्रति पल जलकर दीपक का प्रकाश बिखेरती है। 

- ठीक उसी प्रकार एक भक्त दिन-रात अपने प्रभु की भक्ति के प्रेम में लीन होकर उनकी भक्ति के इस अलौकिक प्रकाश को पूरे संसार में बिखेरता है। 

-हे प्रभु! आप मोती के समान पवित्र, उज्ज्वल, सुंदर और बहुमूल्य हो, तो मैं आपका भक्त उस मोती में पिरोया हुआ धागा हूँ। 

-हे प्रभु! आपका और मेरा मिलन उस प्रकार का है जैसे सोने में सुहागे को मिलाया जाता है। 

-जिस प्रकार सोने में सुहागे को मिला देने से उसमें और निखार आ जाता है तथा वह और अधिक टिकाऊ, खरा और उपयोगी हो जाता है। 

-उसी प्रकार प्रभु के संपर्क में आने से हर भक्त की भक्ति और निखर उठती है। 

-हे प्रभु! आप मेरे स्वामी हैं, मैं आपका दास हूँ। 

-मैं रैदास इसी प्रकार की दास्य भाव की भक्ति अपने प्रभु,  अपने ईश्वर को समर्पित करता हूँ। 

काव्य-सौंदर्य/शिल्प-सौंदर्य:

(i) ब्रज, अवधी व राजस्थानी मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया है। 

(ii) सरल, सहज व रोचक भाषा का प्रयोग किया गया है। 

(iii)  भावात्मक व उदाहरणात्मक पद की शैली का प्रयोग है। 

(iv) उपमा अलंकार द्वारा तुलनात्मक भावों को दर्शाया गया है।

 पद -2

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै। 

---------------------ते सभै सरै।। 


भावार्थ:

-प्रभु की असीम कृपा का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि

- स्वामी! आपके अतिरिक्त दीन-हीन भक्तों पर ऐसी कृपा और कौन कर सकता है?

 -ऐसी कृपा तुम्हारे अलावा कोई ओर नहीं कर सकता है।

 -हे गरीब निवाजु! हे स्वामी!! हे प्रभु!! आप ही ऐसे दयालु तथा गरीबों पर दया दृष्टि रखने वाले हो, 

-जिसने मेरे जैसे तुच्छ,नीच व अछूत व्यक्ति के सर पर राजाओं के समान  छत्र रख दिया है। 

-अर्थात जिसे यह संसार अछूत मानता है, आप उसी पर कृपा कर उसे इस संसार में उच्च बना देते हो और उसे राजाओं जैसा सम्मान प्रदान करते हो। 

-तुमने मुझ जैसे तुच्छ प्राणी को भक्त के रूप में अपनाकर मुझ पर अपार कृपा की तथा मुझे संसार में उच्च स्थान प्रदान किया है। 

-हे स्वामी! आपने अपनी असीम कृपा मुझ जैसे दीन पर की है।

-कवि उन्हें ईश्वर की दयालुता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि 

-हे प्रभु! जिसके छूने मात्र से संसार के लोग अपवित्र हो जाते हैं, 

-ऐसे मुझ अछूत पर तुम ही द्रवित हुए और तुमने ही अपनी दया दृष्टि दिखाई।

- हे गोविंद! आपने ही मेरे जैसे तुच्छ,नीच और अछूत व्यक्ति को बिना किसी से डरे संसार में इतना उच्च स्थान प्रदान किया है। 

-ऐसा करते हुए आपको किसी का भय भी नहीं हुआ। 

-आपकी ही कृपा से संत नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे, त्रिलोचन जैसे सामान्य, साधना जैसे कसाई और सैनु जैसे नाई  संसार रूपी सागर से तर गए अर्थात मुक्त हो गए। 

-उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। प्रभु की कृपा और भक्ति के आलोक से उनका जीवन सँवर गया।

- रैदास जी कहते हैं कि यह संतो! सुनो, हरि जी की कृपा से ही सब कुछ संभव है यानी हरि जी सब कुछ करने में समर्थ हैं।

-वे  कुछ भी कर सकते हैं। उनकी कृपा से ही निम्नकोटि के भक्त का जीवन भी सँवर जाता है। 

काव्य-सौंदर्य/शिल्प-सौंदर्य:

(i) प्रभु की कृपालुता और भक्त वत्सला को वाणी प्रदान की गई है। 

(ii)  सरल, सरल व रोचक भाषा का प्रयोग किया गया है। 

(iii)  भावात्मक पद की शैली प्रयोग किया गया है। 

(iv) अन्य संत कवियों का उल्लेख प्रशंसनीय है।  

(v) अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। 


Saturday, 8 May 2021

सेवा का फल,सच्चा सहयोगी,मलिन मन - लघु कथाएँ

Top Best Famous Moral Stories In Hindi  
1.सेवा का फल 

 इंग्लैंड के एक गाँव में थॉमसन नामक व्यक्ति अपनी  पुत्री के साथ रहते थे। 
थॉमसन की पुत्री का नाम लिली था। लिली बहुत परोपकारी थी। वह  हर सप्ताह शहर जाती थी और वहाँ से खाने-पीने का सामान लेकर आती थी। 
एक दिन जब वह शहर खाने -पीने का सामान लेने गई थी। 
जब वह अपनी घोड़ा गाड़ी पर सामान लादकर गाँव वापस लौट रही थी तब रास्ते में उसने देखा कि एक व्यक्ति सड़क के किनारे दर्द से कराह रहा था। 
वह व्यक्ति बहुत बीमार लग रहा था। लिली को उस पर दया आ गई। उसने उस बूढ़े व्यक्ति को उठाकर अपनी गाड़ी में बिठा लिया और उसे अपने साथ अपने  घर ले आई। 
पिता और पुत्री दोनों ने उस बूढ़े व्यक्ति की खूब सेवा की। उन दोनों की सेवा रंग लाई।  वह बूढ़ा व्यक्ति कुछ दिनों में ही निरोग हो गया।
ठीक होने के बाद बूढ़ा व्यक्ति उन दोनों का धन्यवाद करके वहाँ से चला गया। 
कुछ दिनों बाद वह बूढ़ा व्यक्ति वापस थॉमसन और उसकी पुत्री लिली के पास आया। वह अपने साथ एक संदूकची लेकर आया। 
उस बूढ़े व्यक्ति ने लिली से कहा, "आपने मेरी बहुत सहायता और सेवा की है। इसलिए आप इसे मेरी तरफ से भेंट स्वीकार करें।"
लिली ने उस संदूकची को खोलकर देखा। उसमें बहुत कीमती गहने थे। गहने देखकर लिली का मन ज़रा भी विचलित नहीं हुआ।
 लिली ने बूढ़े व्यक्ति से कहा -"बाबा,  मुझे इन गहनों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें आप अपने पास रखें। हमने तो केवल अपना फ़र्ज पूरा किया है।" 
बूढ़ा व्यक्ति उस संदूकची के साथ वापस अपने घर लौट आया। बूढ़े व्यक्ति की कोई संतान नहीं थी। 
जब उसकी मृत्यु हुई तो उसने अपनी सारी संपत्ति लिली के नाम कर दी। 
लिली को इस बारे में कुछ दिनों बाद पता चला कि वह कितनी धनवान हो गई है। 
इसलिए कहते हैं कि हमें सदा अच्छे कर्म करने चाहिए। शुभ कर्मों का फल हमेशा शुभ ही होता है। 
                                                                                                                2.सच्चा सहयोगी 
अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर समुद्र में जहाज बहुत तीव्र गति से चला जा रहा था।  किसको मालूम था कि थोड़ी देर में  मौसम परिवर्तन से जहाज को बचाना कठिन हो जाएगा। 
देखते-ही-देखते तूफान भी आ गया और जहाज के टूट जाने से उसमें बैठे अनेक खलासी समुद्र में डूबने लगे। 
जो अच्छी तरह तैरना जानते थे उनके प्राण बचने की तो कुछ आशा की जा सकती थी, पर जिन्होंने अभी तक अभी हाथ-पैर चलाना ही सीखा था उनके समुद्र में से तैर कर किनारे पर किसी को विश्वास न था।  
 उस समय जहाज पर एक हब्सी गुलाम भी था। वह तुरंत अथाह जल में कूद पड़ा। 
उसने अपने प्राणों की तनिक भी चिंता न की। 
 उसने सोचा कि मनुष्य ही मनुष्य के संकट में सहयोगी न बन पाया तो क्या पशु-पक्षी को उसकी सहायता करने आना पड़ेगा ?
 एक क्षण उसके मन में यह विचार भी आया, कि क्यों जान-बूझकर अपने जीवन को इस संकट में डाला जाए।
पर तुरंत ही उसका विवेक बोल उठा, "यदि दूसरों की सहायता के प्रथम प्रयास में मैं अपने जीवन को खतरे में डालना पड़े, फिर भी चिंता नहीं करनी चाहिए।"
यह सोचकर वह एकदम ही पानी में कूद पड़ा। अपने कठोर परिश्रम से वह पाँच  खलासियों को जीवित बचाने में सफल हो गया। 
अब उसका शरीर थक कर चूर-चूर होने लगा था। छठी बार वह कूदना चाहता था कि जहाज का कप्तान बोला उठा, "बस भाई, तुमने कमाल कर दिया। जाओ, अब तुम मुक्त हुए। 
हब्सी बोला, "मेरी मुक्ति तो अभी थोड़ी देर और प्रतीक्षा कर लेने दो, तब तक मैं एक व्यक्ति की और जान बचा लेता हूँ।"
 इतना कहकर वह गुलाम फिर पानी में कूद पड़ा और सचमुच सदा के लिए जीवन मुक्त हो गया। 


3. मलिन मन
 एक समय की बात है जब आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद फर्रुखाबाद में धर्म प्रचार के लिए रुके हुए थे। 
तभी एक मज़दूर वहाँ आया। उसका जीवन-निर्वाह बड़ी मुश्किल से मजदूरी से ही होता था। वह अपने घर से दाल-चावल बना कर महर्षि के लिए लाया था। 
स्वामी जी ने उसके हाथों से बना भोजन सहज स्वीकार कर लिया बल्कि भोजन के लिए धन्यवाद भी कहा। 
महर्षि से 'धन्यवाद' शब्द सुनते ही वहाँ उपस्थित एक ब्राह्मण ने कहा, "आपने भोजन स्वीकार कर इस पर अहसान किया है किंतु आप भ्रष्ट हो गए हैं। आप संन्यासी हैं। यह हीन कुल का व्यक्ति है।"
महर्षि ने मुस्कुराते हुए पूछ लिया, "भाई यह तो बताओ कि क्या यह अन्न दूषित था ?ब्राह्मण देवता बताओ तो।"
हाँ,  आपको यह स्वीकार नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह अन्न दूषित ही था। 
महर्षि दयानंद ने उनसे पूछा, "कैसे दूषित ?"....अन्न दो प्रकार से दूषित होता है। 
एक तो वह जो मनुष्य को तकलीफ देकर, उसका शोषण करके प्राप्त किया जाए। और.....  दूसरा वह जहाँ भोजन बनाते समय कुछ ऐसा पदार्थ पड़ जाए जो खाने योग्य ही न हो। 
अगर ऐसा होता है तो इस हालत में भोजन को भ्रष्ट माना जाता है। परंतु मेरा मानना यह है कि इस व्यक्ति द्वारा लाया गया अन्न दोनों ही श्रेणी में नहीं आता। 
यह तो परिश्रम की कमाई का है। मैं इसे दूषित कैसे मान लूँ ?
 ऐसे में मैं कैसे भ्रष्ट हुआ ? ज़रा बताइए तो। 
संभवतः आपका अपना मन मलीन है। तभी तो आपको दूसरों की चीजें मलिन नज़र  आती हैं। 
आप अपनी इस सोच को बदल लो, तभी अच्छा होगा।  स्वामी जी ने इस प्रकार उस ब्राह्मण को झकझोर दिया। यह सुनकर उस ब्राह्मण की आँखें शर्म से झुक गई। 

लघु कथाएँ - सलाह नहीं, साथ दो / किसने किसको पकड़ा है /सच्चा व्यापारी/ सच बोलने की हिम्मत

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सलाह नहीं, साथ दो

एक बार एक पक्षी समुंदर में चोंच मारकर चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था।
दूसरा पक्षी उड़ता हुआ वहाँ आया और उसने उस पक्षी से पूछा, "भाई ये क्या कर रहे हो ?"
पहला पक्षी बोला, "मैं इस समंदर को सूखा कर ही रहूँगा क्योंकि इसने मेरे बच्चों को डूबो दिया है।" 
पहले पक्षी की बात सुन कर दूसरा बोला, "भाई, तुमसे यह समुंदर कैसे सूखेगा। तुम छोटे-से और यह इतना विशाल समंदर । इस काम में तो तुम्हारा पूरा जीवन ही लग जाएगा। 
पहला पक्षी दूसरे पक्षी से बोला, "भाई! देना है तो साथ साथ दो। साथ चाहिए,आपकी राय नहीं चाहिए,"
 उसकी बात सुनकर दूसरा पक्षी भी पहले पक्षी के साथ उसके काम में हाथ बाँटने में गया । इस तरह हज़ारों पक्षी वहाँ आते चले गए और हर दूसरे पक्षी को यही कहते गए कि "सलाह नहीं, साथ चाहिए।" 
यह सब देखकर विष्णु के वाहन गरुड़ जी ने भी भगवान विष्णु से आज्ञा माँगी कि  इस काम में वह भी उसकी मदद करने जा रहे हैं।"
 भगवान विष्णु ने उससे कहा, "अगर तुम चले गए तो मेरे काम रुक जाएँगे । तुम सब पक्षियों से मिलकर भी ये समुद्र नहीं सूखेगा।" 
विष्णु की बात सुन कर गरुड़ बोला, भगवन! आपकी राय नहीं चाहिए,आपका  साथ चाहिए ।" 
गरुड़ के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु जी भी समुंदर सुखाने वहाँ आ पहुँचे। भगवान विष्णु के वहाँ आते ही समुंदर उनसे डर गया और उसने उसी क्षण उस  पक्षी के बच्चे लौटा दिए।

किसने किसको पकड़ा है

एक बार काठियावाड़ में रविशंकर महाराज ने कुछ लोगों से शराब न पीने की प्रतिज्ञा करवाई। 
तब उनमें से एक व्यक्ति उनसे बोला, "महाराज प्रतिज्ञा तो कर ली हमने, पर ऐसा लगता है शराब  ने मेरी रग-रग पकड़ी हुई है। मुझसे तो शायद ही छूट पाएगी।"
अगले दिन जब आश्रम में वह व्यक्ति आया तो उसने देखा कि महाराज ने दोनों हाथों से एक खंभे को बड़े ज़ोर से पकड़ रखा है। 
व्यक्ति को बहुत आश्चर्य हुआ।  
उसने इसका कारण जानना चाहा और उन्हें उस खंभे को छोड़ने को कहा। 
उसकी बात सुनकर महाराज बोले, "सुनो भाई, तुमने शराब को जिस तरह नहीं पकड़ा, तुम्हें शराब ने पकड़ा हुआ है। ठीक उसी तरह इस खंभे ने मुझे पकड़ा हुआ है, मैंने खंभे को नहीं पकड़ रखा है।"
अब यह मुझे कहा छोड़ेगा। अगर यह छोड़ेगा तो ही छूटूँगा न ।  वह व्यक्ति महाराज की बात का अर्थ समझ गया। 
वह अपने कहे कथन पर बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि महाराज अब मैं जीवन भर शराब को हाथ नहीं लगाऊँगा। 

सच्चा व्यापारी

रायचंद भाई मुंबई के एक बहुत बड़े जौहरी थे। उन्होंने एक व्यापारी से सौदा किया कि अमुक तारीख तक अमुक भाव में इतने जवाहरात वह उन्हें देगा।

 उसकी लिखा पढ़ी भी हो गई। 
संयोग की बात थी कि जवाहरात के मूल्य इसी बीच इतने अधिक बढ़ गए कि यदि  वह व्यापारी अपने वादे के अनुसार सारे जवाहरात रायचंद जी को लाकर देता तो उसका घर तक नीलाम हो जाता। 
रायचंद भाई को जब जवाहरात के बाजार-भाव के मूल्य का पता चला तो वे उसी क्षण उस व्यापारी के पास पहुँच गए। 
 व्यापारी ने उनसे कहा, "मैं आपके सौदे के लिए खुद चिंतित हूँ।  चाहे जो भी घाटा  हो जाए वादे के मुताबिक नियम समय तक मैं आपको सारा माल जरूर दे दूँगा। आप चिंता न करें।"
 रायचंद भाई उनसे बोले, "जब तुम चिंताग्रस्त हो गए हो, तो मुझे भी चिंतित होना चाहिए। हम दोनों की चिंता का एक ही कारण है। वो है कागज़ी लिखा-पढ़ी किसने हम दोनों को चिंता में डाल दिया है। अगर कागज़ी लिखा-पढ़ी को खत्म कर दिया जाए तो फिर दोनों की चिंता खत्म हो जाएगी।"
व्यापारी उनसे बोला, ऐसा बिलकुल नहीं है। मैं सब चुका दूँगा। आप बस मुझे दो-चार दिन की मोहलत और दे दीजिए।"
 रायचंद भाई ने लिखा-पढ़ी के कागज़ को टुकड़े-टुकड़े करते हुए कहा, "इस लिखा- पढ़ी से ही तुम बंध गए थे लेकिन मैं तुम्हारी हालत जानता हूँ कि इस सौदे से तुम्हारी क्या दशा होगी ?"
रायचंद व्यापार में किसी के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता।"
 रायचंद के सामने उस व्यापारी ने बड़ी कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गया।
 रायचंद भाई को महात्मा गांधी जी ने अपना मित्र और गुरु बनाया था। इनके जीवन से उन्होंने बड़ी सीख ली थी।
 अहिंसा एवं सत्य को अपने जीवन में उतारा उसके आधार पर ही उन्होंने देश को आजाद करवाया।


सच बोलने की हिम्मत 
स्वामी विवेकानंद शुरू से ही एक बुद्धिमान छात्र थे और उनकी वाणी और उनके व्यक्तित्व से सभी बहुत प्रभावित रहते थे। जब वे साथी छात्रों को कुछ बताते तो सब उनकी बातें बहुत ही मंत्रमुग्ध होकर सुनते। 
एक दिन इंटरवल के दौरान वह कक्षा में अपने कुछ  कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी कहानी सुनने में इतने मगन थे किउन्हें बिलकुल भी पता ही नहीं चला कि मास्टर साहब कब कक्षा में आ गए और उन्होंने आते ही पढ़ाना शुरू कर दिया है। 
मास्टर जी ने को कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी जब उन्होंने पढ़ाना शुरू ही किया था।  
"कौन बात कर रहा है?"
मास्टर जी ने गुस्से में बच्चों से पूछा। कक्षा के सभी बच्चों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे उन बच्चों की तरफ़ संकेत किया। 
मास्टर जी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उन छात्रों को तुरंत अपने पास बुलाया और पढ़ाए जा रहे पाठ से संबंधित प्रश्न पूछा। 
उन छात्रों में से जब कोई भी उस प्रश्न का उत्तर न सुना सका तो उन्होंने अंत में मास्टर जी ने स्वामी जी को अपने पास बुलाकर उनसे भी वही प्रश्न किया, बड़ी आसानी से स्वामी जी ने मास्टर जी के प्रश्न का उत्तर दे दिया, जैसे वे सब कुछ पहले से ही जानते हों। 
उनका उत्तर सुनकर मास्टर जी को विश्वास हो गया कि उनके पढ़ाए पाठ स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे किंतु बाकी के सभी छात्र आपस बातचीत करने में लगे हुए थे। 
फिर क्या था, उन्होंने उन सभी को बैंच पर खड़े होने की सज़ा दे दी पर उन्होंने स्वामी जी को छोड़ दिया। 
एक के एक करके सारे बच्चे  बाद बैंच पर खड़े होने लगे, उन बच्चों की तरह स्वामी जी ने भी यही किया। जब मास्टर जी ने स्वामी को उनके साथ बैंच पर खड़ा देखा तो वे बोले, "नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) तुम क्यों खड़े हो गए। तुम अपनी जगह पर बैठ जाओ।" 
स्वामी जी ने मास्टर जी से कहा, "मास्टर जी!  मुझे भी इन बच्चों के साथ खड़ा होना है क्योंकि मैं ही इनसे बात कर रहा था ।"  
असल में स्वामी जी को शुरू से ही सच बोलने की आदत थी इसलिए उन्होंने मास्टर जी से आग्रह किया कि वे भी उन बच्चों के साथ ही खड़ा होना चाहते हैं।

Sunday, 2 May 2021

लघु कथा - बोलना एक कला है/निडरता: आजाद की

बोलना एक कला है 

एक राजा बहुत बड़ा भक्त था भगवान का और अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता था। 

राजा का परिवार बहुत बड़ा था। एक बार राजा को सोते समय एक सपना आया।  राजा ने सपने में देखा कि महल के सामने पीपल का वृक्ष जो है, उसके सारे पत्ते नीचे गिर गए। बस एक पत्ता पेड़ पर रह गया था। 

दूसरे दिन उठते ही राजा ने एक विद्वान ब्राह्मण को महल में बुला कर रात के इस स्वपन के विषय पूछा कि इस स्वप्न का क्या अर्थ है ? 

वह ब्राह्मण विद्वान तो थे पर ज्ञानी नहीं थे। 

विद्वान और ज्ञानी होने में बहुत फर्क होता है। उसने राजा के प्रश्न का उत्तर अपने प्रश्न लग्न के अनुसार दिया।  

~"महाराज! केवल आप ही जीवित बचेंगे और आपका समस्त परिवार मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।"

 राजा को ब्राह्मण की इस बात पर बहुत क्रोध आया और उसने क्रोध में उस ब्राह्मण को जेल में डलवा दिया। 

राजा ने दूसरे दिन  दूसरे ब्राह्मण को बुलाया और उन्हें अपना सपना सुनाया। सपना सुनाकर उन्होंने उस सपने का अर्थ जानना चाहा। वह ब्राह्मण विद्वान के होने साथ-साथ ज्ञानी भी बहुत थे। 

वह अच्छी तरह जानते थे कि किससे किस समय में किस व्यक्ति से किस तरह बात करनी चाहिए ।

उस पंडित जी ने कहा, " जय हो महाराज! आप तो बड़े ही किस्मत वाले और भाग्यशाली हैं, आपके पूरे परिवार में आपकी ही सबसे लंबी उम्र है। 

राजा ने अपने मंत्री को कहा, " ज्ञानी विद्वान को इनकी इच्छा अनुसार इनाम दीजिए ताकि ये प्रसन्न हो जाएँ।"

ब्राह्मण ने कहा, "महाराज! आप यदि मुँह माँगा इनाम ही देना चाहते हैं तो कल जिस ब्राह्मण को आप ने जेल में डाला था,उसको मुक्त कर दीजिए क्योंकि वही बात मैंने कही है।

महाराज! आपके पूरे परिवार में सबसे लंबी उम्र आपकी ही होगी।  इसका अर्थ यह है महाराज कि आपके परिवार के सभी सदस्य मर जाएँगे केवल आप ही जीवित बचेंगे अर्थात आपकी ही पूरे परिवार में लंबी आयु है।

मित्रों बात वही थी पर कहने का तरीका बिलकुल अलग था - सच में बोलना भी एक कला है।

# ओरछा के राजा छत्रसाल थे और उनके दरबार में राज कवि केशवदास भी शामिल थे । एक बार केशवदास ने एक ग्रंथ की रचना की और उस *रामचंद्रिका* नामक नामक ग्रंथ को उन्होंने अपने राजा को भेंट किया ।

 राजा ने राज कवि की रचना से प्रसन्न होकर उन्हें इनाम में एक लाख रुपए दिए। इनाम देने के बाद उन्होंने कविराज से कहा, "कविराज आप प्रसन्न हो गए हो न इनाम पाकर।" शायद राजा को घमंड आ गया कि वे बहुत बड़े दानी हैं -कवि केशव दास जी ने अपने मन में विचार किया।  

केशव दास ने कहा, "महाराज! एक लाख देकर आपने कौन- सी बहुत बड़ी बात कर दी है । 

इस पुस्तक में बहुत-सी महत्त्वपूर्ण बातें हैं और हर एक बात के लिए  ₹ एक लाख मिलते हैं।

राजा ने कहा कि इसका प्रमाण दो तभी कवि ने कहा कि मेरे पीछे आप अपने विश्वसनीय दो जासूस लगा दीजिए मैं किस व्यक्ति से क्या बात करूँ? इसकी सूचना आपको देते रहें ।

राजा ने बिलकुल वैसा ही किया ।राज कवि केशवदास जी वहाँ से आगरा पहुँचकर एक जगह रुके फिर उन्होंने वहाँ से अकबर बादशाह के पास अपने दूत को भेजा।

वह दूत बादशाह से कहता है कि "ओरछा के राजकवि केशव दास जी आए हैं और थोड़ी देर के लिए ही ठहरेंगे" बादशाह अकबर ने बीरबल को पता लगाने के लिए वहाँ भेजा कि ये कवि कितने इनाम के वास्तविक हकदार हैं ।

बीरबल कवि की अगवानी करने के लिए पहुँचा। केशव दास जी ने दूर से ही झुक कर बीरबल को देखने अभिनय करते हुए देखा।

 ज्यों ही बीरबल पास में आया केशव दास जी ने अपना मुँह फेर लिया। 

बीरबल ने जब उन्हें ऐसा करते देखा तो उन्होंने उनसे कहा- मैं इतना गया गुज़रा भी नहीं हूँ कविराज! कि आप मेरी शक्ल ही भी देखना नहीं चाहते हो । 

कविराज ने कहा, "नहीं नहीं  ऐसी बात नहीं है। मैंने तो सुना था कि जो बीरबल का एक बार ही मुँह  देख लेता है उसकी दरिद्रता उसी क्षण भाग जाती है।मैं पीछे मुड़ कर अपनी दरिद्रता को देख रहा था कि अब वह कितनी दूर भाग गई है ।"  

केवल इस एक ही बात से बीरबल बहुत-ही प्रसन्न हो गए और वे बादशाह से बोले - महाराज! यह कवि बहुत ही महान कवि हैं। इनको तो भेंट में कम-से-कम 2 लाख रुपए और एक हाथी दिया जाना चाहिए ।

निडरता: आजाद की 

यह घटना 1925 की है। ब्रिटिश सरकार का तख्ता काकोरी कांड ने बुरी तरह हिला दिया था। उस समय आजाद की उम्र 20 वर्ष की थी और तगड़े शरीर के थे। काकोरी कांड के बाद वे भूमिगत हो गए ताकि उनकी गिरफ्तारी न हो सके। आजाद को जीवित या मृत पकड़ने के लिए उत्तर प्रदेश की कई जगहों स्टेशनों, पुलिस थाने और  नगरों में उनकी फोटो लगाकर हज़ारों रुपए इनाम देने की घोषणा की गई थी। लेकिन इतनी आसनी से आजाद किसी के हाथ आने से रहे। 

आजाद को एक दिन एक मज़ाक सुझा और वे अपने एक साथी को लेकर थाने पहुँच गए। उनकी इस हिम्मत पर उनका साथी भी बहुत आश्चर्यचकित हुआ। आजाद ने थाने पहुँच कर ज़ोर-ज़ोर से अपनी गिरफ़्तारी के पोस्टर पढ़ना शुरू कर दिया। 

उसी समय एक पुलिस अधिकारी ने उनसे आकर पूछा कि "तुम क्या पढ़ रहे हो ?"

बड़ी निडरता से आजाद ने उनसे कहा, "आपको क्या बताऊँ कि 3 हजार का घाटा मुझे मूँगफली के व्यापर में हो गया है। सोच रहा हूँ कि क्यों न इस आजाद को गिरफ़्तार करवाऊँ किसी पुलिस वाले के साथ मिलकर, तब तो मेरा काम बन जाएगा।"

आजाद के साथी ने उनसे कहा, "आजाद का निशाना बड़ा अचूक है। आप इस चक्क्र में न पड़ों , लालजी। अगर आजाद ने आपको गोली मार दी तब तो आपका सारा घाटा ही पूरा हो जाएगा।"

साथी की यह बात सुनते ही वहाँ खड़ा पुलिस अधिकारी बोल पड़ा, "यही तो मुसीबत है , मेरे भाई। अगर ऐसा नहीं होता तो पुलिस कब की उसे पकड़ लेती।"

पुलिस अधिकारी की ये बात सुनते ही आजाद मुस्कुराते हुए थाने से बाहर चले गए। पुलिस अदिखारी को जा बाद में यह पता चला कि मूँगफली का वह व्यापारी जो उनसे बात कर रहा था वो चंद्रशेखर आजाद था, तो वो हैरान रहा गया। 

खलील जिब्रान की दो लघुकथाएँ/ दौलत : ईमानदारी और विश्वास की

आलोचक

एक घुड़सवार जब समुद्र की ओर यात्रा पर जा रहा था। रास्ते में रात होने पर वह  एक रात गुज़ारने के लिए सड़क के किनारे बनी एक धर्मशाला पर पहुँचा। 

उसने वहाँ धर्मशाला के दरवाज़े के पास ही एक पेड़ से अपने घोड़े को बाँध दिया  और फिर उस धर्मशाला के अंदर चला गया।

आधी रात का समय बीतने के बाद, जब सब गहरी नींद में सो रहे थे, उस समय एक चोर वहाँ आया। उसने वहाँ बँधा यात्री का घोड़ा खोला और उसे चुराकर कर अपने साथ ले गया।

यात्री जब सुबह उठा तो उसे अपने घोड़े के चोरी होने का पता चला। घोड़ा चोरी होने से वह बहुत दुखी हो गया। वह मन-ही-मन उस आदमी को कोसने लगा, जिसने उसके घोड़े को चुराया था।  

चोरी की खबर सुनकर धर्मशाला में रुके दूसरे लोग भी उसके पास इकट्ठा हो गए और चोरी को लेकर बातें करने लगे।

वहाँ खड़े एक व्यक्ति ने कहा कि, "घोड़े को अस्तबल में ही बाँधना चाहिए था। उसे अस्तबल के बाहर बाँधना तो बड़ी बेवक़ूफ़ी का काम है।"

वहीं खड़े दूसरे व्यक्ति ने भी कहा, "अगर घोड़े को बाँधना ही था, तो घोड़े के आगे और पीछे वाले पैरों को आपस में भी बाँधा जा सकता था ।"

बीच में कूदते हुए वहीं खड़े तीसरे आदमी ने भी कहा, "इतनी लंबी यात्रा घोड़े पर करना बिलकुल नासमझी का काम है।"

चौथे ने आदमी ने कहा, "सवारी के लिए घोड़ा तो केवल कमज़ोर और आलसी लोग ही रखते हैं।"

यात्री को उनकी बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ, उसे उनकी बातें बुरी लगने लगी। वह गुस्से से उन पर चिल्लाते हुए बोला, "आप सब मेरा घोड़ा चोरी हुआ है इसलिए मेरी कमियाँ और गलतियाँ बताने को उत्सुक हो रहे हो।

किसी ने भी घोड़ा चुराने वाले चोर कोई कुछ नहीं कहा ।बस मुझे ही दोष दे रहे हैं। आप सब तो घोड़ा चुराने वाले के इस घृणित कार्य पर कुछ नहीं बोले।"

कविता

एक बड़े ही प्रसिद्ध शहर के सड़क पर दो महान कवियों की भेंट हो गई। दोनों को आपस में मिलकर बहुत खुश हुए।"

पहले कवि ने दूसरे कवि से पूछा, ‘‘तुमने कोई नई कविता लिखी है?’’

दूसरे कवि ने बड़े गर्व पहले कवि से कहा, ‘‘मैंने अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने एक कविता लिखी है, यह कविताओं पहले की कविताओं में भी उत्तम है। 

मैंने यह कविता अपने गुरु की स्तुति में लिखी है। यह ग्रीक भाषा में लिखी मेरी उन  सभी कविताओं से भी सबसे उच्चतम है।"

फिर उस कवि ने अपने कुर्ते से अपनी पांडुलिपि निकली और उस कवि से कहा, ‘‘अरे! यह तो मेरी जेब में ही पड़ी थी, देखो। चलो मित्र, उस पेड़ के नीचे छाया में बैठकर तुम्हें मैं अपनी यह रचना सुनाता हूँ। इसे सुनाकर मुझे भी ख़ुशी होगी।" 

फिर उस कवि ने अपनी रचना पढ़नी शुरू की पढ़ी, जो बहुत लंबी थी।

दूसरे कवि ने बड़ी विनम्रता से रचना सुनकर अपनी प्रतिक्रिया दी, ‘‘आपकी यह रचना आपको बहुत प्रसिद्धि दिलवाएगी। यह बहुत ही महान रचना है।"

पहले कवि ने बड़ी बेरुखी से पूछा, ‘‘और आजकल तुम क्या लिख रहे हो?’’

दूसरे कवि ने उत्तर दिया, ‘‘बस थोड़ा बहुत लिखा है। बस सात-आठ पंक्तियाँ –एक बगीचे में खेल रहे बच्चे की याद में।’’ उसने अपनी लिखी पूरी रचना उस कवि को सुनाई।

पहले कवि ने बड़ी नीरसता से कहा, ‘‘ज्यादा बुरी तो नहीं है, ठीक ही है।’’

 हजारों साल बीत जाने पर भी कुछ पंक्तियाँ आज भी हर भाषा में बड़े प्रेम के साथ पढ़ी जाती हैं।

कई हजार वर्षों से पुस्तकालयों और विद्वानों की अलमारियों में दूसरे कई कवि की रचना सुरक्षित हैं तो अवश्य पर उन्हें कोई पढ़ता भी नहीं है।

दौलत : ईमानदारी और विश्वास की 

बरमाहा नामक का एक विद्वान सऊदी अरब में रहते थे। वे बहुत ईमानदार थे और अपनी ईमानदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। एक बार वे लंबी यात्रा के लिए समुद्री जहाज से निकले। उन्होंने एक हज़ार दीनार अपने सफ़र के खर्च के लिए अपनी पोटली में बाँध कर रख लिए। समुद्री यात्रा के दौरान उनकी जान-पहचान दूसरे यात्रियों से भी हुई। 

एक दिन बरमाहा ने एक व्यक्ति को बातों-बातों में अपनी पोटली दिखा दी। उस पोटली को देखकर उस व्यक्ति के मन में लालच आ गया। उसने योजना बनाई कि वह किसी तरह ये पोटली बरमाहा से हथिया लेगा। 

एक दिन वह सुबह-सुबह ज़ोर से चिल्लाने लगा कि मेरे पोटली जिसमें एक हज़ार दीनार थे वे चोरी हो गए हैं। जहाज़ पर सवार कर्मचारियों ने उसे हौंसला दिया कि वे हर मुसाफिर की तलाशी लेंगे और तलाशी के दौरान चोर पकड़ा जाएगा। 

उसी समय एक-एक करके सभी यात्रियों की तलाशी होने लगी।बरमाहा की बारी  आने पर सभी यात्रियों और जहाज़ के कर्मचारियों ने उनकी तलाशी लेना मुनासिब न समझा। उन्होंने कहा कि आपकी तलाशी लेना और आप पर शक करना तो गुनाह है। 

उनकी ये बातें सुनकर बरमाहा बोले, "जब सब की तलाशी हुई है तो मेरी भी होनी चाहिए। कर्मचारियों ने उनकी तलाशी ली पर उनके पास से कुछ न मिला। 

उस यात्री ने दो दिन बाद बरमाहा से बड़े उदास मन पूछा, "आपके पास तो पोटली थी न। एक हज़ार दीनार की, अब वे कहाँ हैं ?"

उन्होंने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा और कहा, "मैंने तो उन्हें समुद्र में फेंक दिया था और तुम जानना चाहते होंगे कि क्यों मैंने ऐसा किया ? क्योंकि ईमानदारी और लोगों का विश्वास ये दो दौलत ही मैंने अपने जीवन में कमाई है। अगर तलाशी में मेरे पास से दीनार मिल जाते और अगर मैं सबसे कहता कि ये मेरे हैं तो वे लोग इस पर विश्वास भी कर लेते लेकिन तब भी कहीं-न-कहीं लोगों को मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर शक होता। मैं अपनी दौलत गँवाने को तैयार हूँ पर अपनी ईमानदारी और विश्वास को खोना नहीं चाहता।"


Saturday, 1 May 2021

MCQ CLASS 10 SAKHI -KABIR./ साखी -बहुविकल्पीय प्रश्न

HINDI NCERT SOLUTIONS  CLASS 8, 9,10 SPARSH 
बहुविकल्पीय प्रश्न

1. ऐसी ----------------------- सुख होइ।।

1.कवि कैसी वाणी को प्राथमिकता देते हैं ?
(i) जो हमें प्रसन्नता दे                   
(ii) जो खुशियाँ लाएँ   
(iii) जो स्वयं को भुला दे             
(iv) जो मधुर हो
उत्तर- (iv) जो मधुर हो

2.मीठी वाणी का दूसरे लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
(i) दूसरों को दुख में देती है।       
(ii) दूसरों का अहं समाप्त होता है। 
(iii) सुख देने वाली होती है।         
(iv) लाभ पहुँचाने वाली होती है।  
उत्तर- (iii) सुख देने वाली होती है। 

3.दोहे की पंक्ति 'मन का आपा खोए ' से कवि क्या कहना चाहते हैं  -
(i) अपनत्व खोना                         
(ii) स्वयं डूब जाना 
(iii) अहंकार खोना                    
(iv) लीन होना 
उत्तर- (iii) अहंकार खोना

4.'औरन कौं सुख होइ' पंक्ति का अर्थ  है ?
(i) मधुर वाणी सुनने वाले को सुख प्रदान करती है।
(ii) मधुर वाणी सुनने से सुख में वृद्धि हो जाती है। 
(iii) मधुर वाणी सुनने से दुख कम हो जाते हैं।  
(iv) मधुर वाणी परायों को भी अपना बना लेती है। 
उत्तर- (i) मधुर वाणी सुनने वाले को सुख प्रदान करती है।

5. इस दोहे की भाषा है-
(i) सधुक्कड़ी   
(ii) अवधि      
(iii) ब्रज      
(iv) राजस्थानी 
उत्तर- (i) सधुक्कड़ी 

2.   कस्तूरी कुंड़लि ---------------------- देखै नाँहि।।

1. मृग वन में किस कारण से भटकता-फिरता है?
(i) कस्तूरी       
(ii) सुगंध         
(iii) ईश्वर          
(iv) प्रेम 
उत्तर- (i) कस्तूरी   

2. मृग किसका प्रतीक है?
(i) अज्ञानी जीव का    
(ii) अध्यात्मिक जीव का    
(iii) भक्त का    
(iv) भ्रष्ट व्यक्ति का 
उत्तर- (i) अज्ञानी जीव का

3.कस्तूरी कहाँ बसती है?
(i) जंगल में    
(ii) मनुष्य की नाभि में    
(iii) मानव के मन में   
(iv) मृग की नाभि में 
उत्तर- (iv) मृग की नाभि में

4.'कुंडली/घटि घटि' का अर्थ है-
(i) कान के कुंडल/कम होना   
(ii) कुंडली मारना/छोटा होना 
(iii) नाभि/घट-घट में                
(iv) रुद्राक्ष/छोटा-सा 
उत्तर- (iii) नाभि/घट-घट में

5. मृग द्वारा कस्तूरी को वन में ढूँढ़ने के क्या कारण हैं ?
(i) वह उसकी सुगंध से उन्मत्त हो जाता है।    
(ii) उसे यह अहसास नहीं होता कि कस्तूरी उसी की नाभि में है।   
(iii) उसकी सोच है कि कस्तूरी उसे वन में ही मिलेगी।  
(iv) उपर्युक्त सभी
उत्तर- (iv)उपर्युक्त सभी

3. जब मै---------------------------देख्या माँहि।।

1.दोहे में 'मैं' शब्द का आशय है-
(i) कबीर     
(ii) अहंकार   
(iii) मोह-माया 
(iv) अज्ञान 
उत्तर- (ii) अहंकार

2.'सब अँधियारा मिटि गया' पंक्ति का प्रयोग किस अर्थ  संदर्भ में किया गया है ?
(i) घना अँधेरा                       
(ii) विषय-वासना रूपी अंधकार     
(iii) मोह-माया रूपी अंधकार 
(iv) अज्ञान रूपी अंधकार 
उत्तर- (iv) अज्ञान रूपी अंधकार

3.'दीपक देख्या माहि 'पंक्ति  का आशय है-
(i) आनंद को अपने अंदर देखना     
(ii) परमात्मा को मन में देखना  
(iii) सुख का मन में ही मिलना   
(iv) सांसारिक सुख अपने ही हाथ में है
उत्तर- (ii) परमात्मा को मन में देखना

4. प्रस्तुत दोहे में कवि ने किस अंधकार की बात की है?
(i) रात के अंधेरे की                             
(ii) अज्ञान के अंधेरे की 
(iii) दीये के बुझने से पैदा होने वाले अंधेरे की 
(iv) पुत्र पैदा होने से उत्पन्न अंधेरे की 
उत्तर- (ii) अज्ञान के अंधेरे की 

5. इस दोहे का आशय है-
(i) प्रभु-प्रेम के लिए साधना आवश्यक है।
(ii) प्रभु-प्रेम के लिए अहंकार-त्याग आवश्यक है। 
(iii) प्रभु-प्रेम के लिए अहंकार आवश्यक है।
(iv) प्रभु-प्रेम के लिए हरी का भजन आवश्यक है। 
उत्तर- (ii) प्रभु-प्रेम के लिए अहंकार-त्याग आवश्यक है।

4.  सुखिया सब ------------------------अरू रोवै।।

1.संसार की किस विशेषता का उल्लेख किया गया है ?
(i) अधिकतर लोग साधु-संतों के उपदेशों पर ध्यान नहीं देते। 
(ii) अधिकतर लोग ईश्वर को पाने का प्रयास नहीं करते। 
(iii) अधिकतर लोग किसी की परवाह नहीं करते। 
(iv) अधिकतर लोग भौतिक सुखों में जीवनयापन करके सुख का अनुभव करते हैं। 
उत्तर- (iv) अधिकतर लोग भौतिक सुखों में जीवनयापन करके सुख का अनुभव करते हैं।

2. कबीर के अनुसार 'जागा हुआ' कौन है ?
(i) जो ईश्वर का नाम ले।                      
(ii) जो ईश्वर से मिलकर एक हो जाए। 
(iii) जो संसार का वियोग अनुभव करें। 
(iv) जो सांसारिक सुख पाए। 
उत्तर- (iii) जो संसार का वियोग अनुभव करें।

3. कबीर के अनुसार सारा संसार सुखी क्यों है ?
(i) क्योंकि वह सब ज्ञानी है।      
(ii) क्योंकि वे चिंता रहित हैं। 
(iii) क्योंकि वह अज्ञान के कारण भोग-विलास में लिप्त हैं।
(iv) क्योंकि वह अंधेरे में डूबे हुए हैं। 
उत्तर- (iii) क्योंकि वह अज्ञान के कारण भोग-विलास में लिप्त हैं।

4. कबीर किस कारणवश जागते और रोते हैं ?
(i) कबीर को नींद नहीं आती। 
(ii) कबीर सब को सुखी देख कर रोते रहते हैं। 
(iii) कबीर को दुनिया की चिंता सताती रहती है। 
(iv) कबीर को वास्तविक ज्ञान प्राप्ति हो गई है।  
उत्तर- (iv) कबीर को वास्तविक ज्ञान प्राप्ति हो गई है।

5. कबीर में और संसार के बाकि लोगों में क्या अंतर है?
(i) जागने और सोने का      
(ii) दुखी और खुश रहने का 
(iii) ज्ञानी और अज्ञानी का 
(iv) असुविधा और सुविधा का
उत्तर- (ii) दुखी और खुश रहने का 

5.   बिरह -----------------------------बौरा होइ।।

1.आत्मा किस प्रकार की व्याकुलता का अनुभव कर रही है?
(i) जैसी किसी के विरह में होती है। 
(ii) जैसी किसी साँप द्वारा काटे जाने पर होती है। 
(iii) जैसी पागल हो जाने पर होती है। 
(iv) उपरोक्त सभी 
उत्तर- (i) जैसी किसी के विरह में होती है।

2. मंत्र न लागै कोइ' का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है ?
(i) साँप के काट लेने पर मंत्रों से उपचार नहीं किया जा सकता।
(ii) ऐसा कोई मंत्र नहीं है जो कि विरह की पीड़ा को कम कर सके। 
(iii) ईश्वर वियोगी की पीड़ा का कोई उपचार नहीं है।  
(iv) इनमें से कोई नहीं। 
उत्तर- (ii) ऐसा कोई मंत्र नहीं है जो कि विरह की पीड़ा को कम कर सके।

3. वियोगी की दशा कैसी होती है ?
(i) बेचैन रहता है 
(ii) व्याकुलता का अनुभव करता है 
(iii) उन्मत्त हो जाता है 
(iv) उपरोक्त सभी
उत्तर- (iv) उपरोक्त सभी 

4. 'बिरह भुवंगम तन बसै' शीर्षक दोहे का मुख्य विषय क्या है ?
(i) प्रिया के विरह के कारण प्रेमिका की बेचैनी। 
(ii) ईश्वर के विरह के कारण आत्मा की बेचैनी। 
(iii) प्रेमिका के विरह  के कारण प्रिय की बेचैनी। 
(iv) सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य की बेचैनी। 
उत्तर- (ii) ईश्वर के विरह के कारण आत्मा की बेचैनी।

5.'बौरा' शब्द का तात्पर्य है-  
(i) अहंकार   
(ii) शांत   
(iii) मूर्ख     
(iv) उन्मत्त 
उत्तर- (iv) उन्मत्त 

6.    निंदक नेड़ा -------------------------करै सुभाइ।।

1.कबीर के अनुसार कैसे व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए ?
(i) आलोचक को
(ii) प्रशंसक को
(iii) प्रेमी को
(iv) संबंधी को
उत्तर- (i) आलोचक को

2. निंदक को कबीर ने कहा रखने का परामर्श दिया है?
(i) घर में 
(ii) दिल में
(iii) आँगन में
(iv) अपने से दूर 
उत्तर- (iii) आँगन में

3.निंदक की तुलना किससे की गई है ?
(i) साबुन के झाग से 
(ii) मिट्टी से
(iii) पानी से 
(iv) साबुन और पानी से 
उत्तर- (iv) साबुन और पानी से 

4.'निंदक नेड़ा राखिए' का आशय है-
(i) नींद को दूर रखना चाहिए। 
(ii) निंदक से सतर्क रहना चाहिए। 
(iii) निंदक को अपने निकट रखना चाहिए। 
(iv) निंदक पर विश्वास नहीं करना चाहिए। 
उत्तर- (iii) निंदक को अपने निकट रखना चाहिए।

5.निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखने से क्या लाभ होगा ?
(i) स्वभाव कठोर हो जाएगा। 
(ii) स्वभाव निर्मल हो जाएगा। 
(iii) व्यक्ति निंदा करने वालों के निकट नहीं जाएगा।
(iv) व्यक्ति उसकी बातों में आ जाए। 
उत्तर- (ii) स्वभाव निर्मल हो जाएगा। 

7.    पोथी पढ़ि -----------------------पंडित होइ।।

1.कबीर पंडित किसे मानते हैं ?
(i) पढ़े-लिखे व्यक्ति को 
(ii) कम पढ़े लिखे व्यक्ति को 
(iii) प्रेम का एक अक्षर पढ़ने वाले को 
(iv) साक्षर व्यक्ति को
 उत्तर- (ii) कम पढ़े लिखे व्यक्ति को 

2.'पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा' का आशय है-
(i) बड़े-बड़े शास्त्रों को पढ़-पढ़कर सारा ईश्वर सारा संसार ईश्वर तक पहुँचता है।  
(ii) बड़े-बड़े शास्त्र पढ़-पढ़कर संसार भ्रमित हो रहा है। 
(iii) बड़े-बड़े शास्त्रों को पढ़-पढ़कर अनेक लोग इस संसार से विदा हो गए। 
(iv) बड़े-बड़े शास्त्र पढ़-पढ़कर संसार ज्ञान प्राप्त कर रहा है। 
उत्तर- (ii) बड़े-बड़े शास्त्र पढ़-पढ़कर संसार भ्रमित हो रहा है।

3.'ऐकै अषिर' का अर्थ है -
(i)थोड़ा-सा भी ज्ञान 
(ii) थोड़ी-सी भी अच्छी बातें 
(iii) गुरु की एक भी सीख 
(iv) ईश्वर-प्रेम का एक अक्षर
उत्तर- (iv) ईश्वर-प्रेम का एक अक्षर

4.कबीर 'पंडित भया न कोई' पंक्ति के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं ?
(i) कोई पंडित नहीं बन पाया। 
(ii) कोई सदाचारी नहीं बन पाया। 
(iii) कोई संन्यासी नहीं बन पाया। 
(iv) किसी को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 
उत्तर- (iv) किसी को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 

5.कबीर की भाषा कौन-सी थी?
(i) सधुक्कड़ी 
(ii) ब्रज 
(iii) अवधी 
(iv) खड़ी बोली
उत्तर- (i) सधुक्कड़ी

8.  हम घर ------------------------हमारे साथि।।

1.यहाँ घर किसका प्रतीक है ?
(i) निवास स्थान का 
(ii) विपत्तियों का 
(iii) विषय-वासनाओं का 
(iv) संसार का 
उत्तर- (iv) संसार का

2. 'मुराड़ा' शब्द का क्या अर्थ है?
(i) जलता हुआ घर 
(ii) जलता हुआ अहंकार 
(iii) जलती हुई लकड़ी 
(iv) जलता हुआ संसार 
उत्तर- (iii) जलती हुई लकड़ी

3. कबीर का घर जलाने से क्या आशय है ?
(i) धन-दौलत को जलाना 
(ii) परमात्मा के मार्ग को प्रकाशित करना 
(iii) हमेशा त्याग के लिए तत्पर रहना 
(iv) लोभ, माया, मोह, घृणा को जलाना 
उत्तर- (iv) लोभ, माया, मोह, घृणा को जलाना 

4. कबीर किस पथ के पथिक हैं ?
(i) आनंद-पथ  के 
(ii) प्रभु-प्राप्ति के 
(iii) सुख-समृद्धि के 
(iv) उन्नति-पथ के 
उत्तर- (ii) प्रभु-प्राप्ति के

5. कवि का अपना घर जलाने पीछे क्या कारण है ?
(i) प्रभु को पाने के लिए 
(ii) सांसारिकता नष्ट करने के लिए 
(iii) मुक्ति पाने के लिए 
(iv) बैरागी होने के लिए
उत्तर- (i) प्रभु को पाने के लिए