HINDI BLOG : February 2022

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Monday, 28 February 2022

लघु कथा - पवित्र हाथ, जीवन का रहस्य


1.पवित्र हाथ 
एक बार गुरु गोविंद सिंह कहीं धर्म चर्चा कर रहे थे । श्रद्धालु भक्त उनकी धारा प्रवाह वाणी को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। चर्चा समाप्त होने पर गुरु गोविंद सिंह को प्यास लगी। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा- कोई पवित्र हाथों से मेरे पीने के लिए जल ले आए । गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि एक शिष्य उठा और तत्काल ही चाँदी के गिलास में जल ले आया। जल से भरे गिलास को उसने गुरु गोविंद सिंह जी की ओर बढ़ाते हुए कहा- लीजिए गुरुदेव ! गुरु गोविंद सिंह जी ने जल का गिलास हाथ में लेते हुए उस शिष्य की हथेली की ओर देखा और बोले- वत्स, तुम्हारे हाथ बड़े कोमल हैं । गुरु के इन वचनों को अपनी प्रशंसा समझते हुए शिष्य को बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने बड़े गर्व से कहा- गुरुदेव, मेरे हाथ इसलिए कोमल हैं क्योंकि मुझे अपने घर का कोई काम नहीं करना पड़ता। मेरे घर में बहुत सारे नौकर-चाकर हैं । वही मेरा और मेरे पूरे परिवार का सब काम कर देते हैं। गुरु गोविंद सिंह जी पानी के गिलास को अपने होंठों से लगाने ही वाले थे कि उनका हाथ रुक गया। बड़े गंभीर स्वर में उन्होंने कहा- वत्स, जिस हाथ ने कभी कोई सेवा नहीं की, कभी कोई काम नहीं किया, मजदूरी से जो मजबूत नहीं हुआ और जिसकी हथेली में मेहनत करने से गाँठ नही पड़ी, उस हाथ को पवित्र कैसे कहा जा सकता है । गुरुदेव कुछ देर रुके फिर बोले- पवित्रता तो सेवा और श्रम से प्राप्त होती है। मैं तुम्हारा पानी नहीं पी सकता। इतना कह कर गुरुदेव ने पानी का गिलास नीचे रख दिया।

2. जीवन का रहस्य 
राजा सुषेण के मन में कुछ प्रश्न थे, जिनके उत्तर की तलाश में वह एक महात्मा के पास पहुँचे । महात्मा ने कहा, 'अभी मेरे पास समय नहीं है। मुझे अपनी वाटिका बनानी है। ' राजा भी उनकी मदद करने में जुट गए। इतने में एक घायल आदमी भागता-भागता आया और गिरकर बेहोश हो गया। महात्मा जी ने उसके घाव पर औषधि लगाई । राजा भी उसकी सेवा में लग गए। जब वह आदमी होश में आया तो राजा को देखकर चौंक उठा। वह राजा से क्षमा माँगने लगा। जब राजा ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि वह राजा को मारने के इरादे से निकला था, लेकिन सैनिकों ने उसके मंसूबों को भाँप लिया और उस पर हमला कर दिया। वह किसी तरह जान बचाकर भागता हुआ इधर पहुँचा है। महात्मा जी के कहने पर राजा ने उसे क्षमा कर दिया। लेकिन तब राजा ने महात्मा से प्रश्न किया, 'मेरे तीन प्रश्न हैं।' सबसे उत्तम समय कौन-सा है? सबसे बढ़िया काम कौन-सा है और सबसे अच्छा व्यक्ति कौन है ?  महात्मा बोले, 'हे राजन, इन तीनों प्रश्नों का उत्तर तो तुमने पा लिया है। फिर भी सुनो । सबसे उत्तम समय है वर्तमान आज तुमने वर्तमान समय का सदुपयोग करते हुए मेरे काम में हाथ बँटाया और वापस जाने को टाला, जिससे तुम बच गए। अन्यथा वह व्यक्ति बाहर तुम्हारी जान ले सकता था  और जो सामने आ जाए, वही सबसे बढ़िया काम है। आज तुम्हारे सामने बगीचे का कार्य आया और तुम उसमें लग गए। वर्तमान को सँवार कर उसका सदुपयोग किया। इसी कर्म ने तुम्हें दुर्घटना से बचाया और बढ़िया व्यक्ति वह है, जो प्रत्यक्ष हो। उस आदमी के लिए अपने दिल में सद्भाव लाकर तुमने उसकी सेवा की. इससे उसका हृदय परिवर्तित हो गया और तुम्हारे प्रति उसका वैर भाव धुल गया । इस प्रकार तुम्हारे सामने आया व्यक्ति, शास्त्रानुकूल कार्य व वर्तमान समय उत्तम हैं।  जीवन के इस रहस्य को जान कर राजा महात्मा के सामने नतमस्तक हो गए। 

Wednesday, 23 February 2022

Class 10 'कर चले हम फ़िदा परीक्षोपयोगी प्रश्न-उत्तर Important Questions Based On Kavita KAR CHLEY HAM FIDA


लघु उत्तरीय प्रश्न ( उत्तर सहित ) 
1. सैनिक वतन को किनके हवाले कर रहे हैं ? 
उत्तर- देश पर बलिदान होते सैनिक यह जानते हैं कि अब उनके पास ज्यादा समय नहीं है । वे चाहते हैं कि इस संसार से जाते-जाते कुछ अन्य सैनिकों को यह देश हवाले करके जाएँ ताकि वे देश की रक्षा कर सके । इसलिए वे देशवासियों से यह आग्रह कर रहे हैं कि अब देश की बागडोर उनके हाथों में है । 
2. हिमालय का सर से कवि का क्या तात्पर्य है ? 
उत्तर- 'हिमालय का सर' से कवि का तात्पर्य देश की आन बान व शान से है। कवि कहना चाहते हैं कि हम हिमालय का सर झुकने नहीं देंगे यानी अपने प्राणों का बलिदान देकर भी भारत माँ की लाज बचाएँगे। 
3. 'रावण' शब्द का प्रयोग कवि ने किसलिए किया है ? 
उत्तर- 'रावण' शब्द का प्रयोग कवि ने देश के दुश्मनों के लिए किया है। कवि कहते हैं हम बलिदान होकर भी देश की रक्षा करेंगे। शत्रु रूपी रावणों को देश की सीमा के अंदर कभी नहीं आने देंगे। 
4 . कविता में किस रस की प्रधानता है और क्यों ? 
उत्तर- कविता में वीर रस की प्रधानता है क्योंकि पूरी कविता में वीरों के शौर्य, बलिदान व देशभक्ति का वर्णन किया गया है। कवि ने शत्रुओं से मुकाबला करने वाले वीरों को वीरता को बताते हुए लिखा है कि उन्होंने झुकना नहीं सोखा, वे मर जाएँगे, मगर देश की रक्षा अवश्य करेंगे।
5.  'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए । 
उत्तर- यह कथन एक बलिदान सैनिक अपने अन्य साथी सैनिकों से कहता है। इसका आशय है कि देश की रक्षा करते-करते असंख्य सैनिक बलिदान दे चुके हैं, बलिदानों का यह सिलसिला टूटना नहीं चाहिए, अब अन्य सैनिकों को एक के बाद एक बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए।
6. एक सैनिक को किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है ? 
उत्तर- एक सैनिक को भीषण संकटों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से युद्ध के समय जब उसके सिर पर मौत का खतरा मँडराता रहता है। प्रस्तुत गीत में सैनिकों को हिमालय की बर्फीली घाटियों में घुसकर संघर्ष करना पड़ा। बर्फ के कारण उनके लिए साँस लेना कठिन हो गया। ठंड के कारण उनकी नसें जमने लगीं। फिर भी जीते-जी उन्होंने अपने देश का सिर झुकने नहीं दिया । 
7. धरती को दुलहन कहने के पीछे कवि का भाव स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- सबसे प्रिय कहने के लिए 'दुलहन' उत्तर कवि ने धरती को उपमान दिया है। जिस प्रकार दूल्हा अपनी दुलहन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो जाता है उसी प्रकार भारतीय सैनिक भी देश को बचाने के लिए सहर्ष अपने प्राण छोड़ने को तैयार हो जाते हैं। 
8. 'कर चले हम फ़िदा' गीत के आधार पर सैनिक जीवन की दो विशेषताएँ लिखिए। 
उत्तर- सैनिक का जीवन उसके देश के लिए समर्पित होता है। वीरगति प्राप्त होने पर भी वह दुखी नहीं होता बल्कि देश के लिए समर्पण उसके लिए अत्यधिक गर्व की बात होती है। सैनिक मरते-मरते भी अपनी भारतमाता की चिंता करता है और देशवासियों को सदा भारत की पवित्रता की रक्षा करने के लिए उत्साहित करता रहता है। 
9.  'फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है' पंक्ति में 'इस जश्न' पद से क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- फ़तह अर्थात विजय का उत्सव मनाने से पूर्व देश पर कुर्बान होने का जश्न मनाना आवश्यक है। 'इस जश्न' से तात्पर्य देश पर बलिदान होने का जश्न मनाना है। वीरों के जीवन का बलिदान लिए बिना 'जीत' की खुशी हासिल नहीं होती है।
10. 'जिंदगी मौत से मिल रही है गले' से कवि का क्या आशय है ? 
उत्तर- जिंदगी मौत से मिल रही है गले' से कवि का तात्पर्य यह है कि वीर सैनिक अब वतन पर कुर्बान हो रहे हैं अर्थात उनकी ज़िंदगी अब देश पर न्योछावर होने के लिए स्वयं मौत को गले लगा रही है। 
11. 'सर से कफ़न बाँधने' का क्या अर्थ है ? 
उत्तर- 'सर से कफ़न बाँधने' का अर्थ है, बलिदान के लिए तैयार होना। वीर सैनिक अपने देशवासियों एवं नौजवानों को यह संदेश दे रहे हैं कि देश पर मर-मिटने के लिए अब वे कफ़न का साफ़ा बाँधकर तैयार हो जाएँ। 
12. जमीं (ज़मीन) पर खून की रेखा खींचने से क्या तात्पर्य है ? 
उत्तर- ज़मीं (ज़मीन) पर खून की रेखा खींचने से तात्पर्य है अपने जीवन का बलिदान देकर शत्रु को रोकना अर्थात देश की रक्षा के लिए युद्ध करते हुए खून बहा देना।
13. देशवासियों को राम-लक्ष्मण क्यों कहा गया है ? 
उत्तर- भारत माता रूपी सीता की पवित्रता की रक्षा देश के प्रत्येक नागरिक एवं नौजवान को साहस, धैर्य और वीरता से राम-लक्ष्मण की भाँति ही करनी चाहिए। इसलिए कवि ने देशवासियों को राम-लक्ष्मण कहा है। 
14. सैनिक को देश पर बलिदान होते समय भी जोश क्यों रहता है ? 
उत्तर- सैनिक के जीवन का प्रति-पल देश के लिए होता है। वह देश के लिए ही जीता है और जब तक जीता है, उसके मान-सम्मान की सुरक्षा करता है। उसकी मृत्यु भी देश के लिए होती है। वह सदैव हँसते-हँसते तथा पूरे जोश से अपने प्राणों की कुर्बानी देता है ताकि जन्मभूमि उसके जाने का शोक न करे, अपितु उस वीर सपूत पर गर्व करे। 
15. हिमालय किसका प्रतीक है ? 
उत्तर- हिमालय देश के मान और सम्मान का प्रतीक है। उसे भारतमाता के सिर का मुकुट माना गया है। उसे कोई भी शत्रु पद-दलित न कर सके, ऐसी प्रत्येक देशभक्त सैनिक की इच्छा होती है, जिसे वह अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर भी पूर्ण करता है।
16. गीत में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे जीवनभर याद रह जाते हैं ? 
उत्तर- गीत अपनी कई विशेषताओं के कारण जीवनभर याद रह जाते हैं । ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
i. गीत के मार्मिक तथा प्रभावशाली बोल ।
ii. सजीव तथा अमिट प्रभाव छोड़ने वाली शैली। 
iii. मीठे सुर तथा जन-मानस की भावनाओं के साथ जुड़ाव। 
iv. लय-ताल 
v. गीत का जीवन के साथ संबंध जोड़ना।

Monday, 21 February 2022

कहानी आत्मबोध


चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएँगे। यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो। हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है। जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं।  कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है। विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है।  हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया। 
दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी। सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया। साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे। बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी। अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में, मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा।”
पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा। कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें। ‘रजत’ पुकारा करें। अब मैं इतनी ऊँची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूँ। समाज में मेरा एक अलग रुतबा है। ऊँचा क़द है, मान-सम्मान है। बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा। मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है। मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूँ?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियाँ छा गईं। मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था। भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न।”
“हाँ, हाँ,बैठ गए हैं। गाड़ी भी चल पड़ी है।” “देखो, पापा का ख़्याल रखना। रात में मेडिसिन दे देना। भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना। पापा को वहाँ कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए।”
“नहीं होगी।” मैंने फोन काट दिया। “रितु का फोन था न। मेरी चिंता कर रही होगी।”
पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था। रात में खाना खाकर पापा सो गए। थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया।  तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी। 
एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था। हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी। हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूँ, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी।  शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी। कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया। मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया। 
दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुँचा। कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे। बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था। यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया। पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर।” मैं सकपका गया। फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई। इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था। वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था। उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया। यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया। कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा। हुंह, आज मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया और वह…
पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुँचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध माँ को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया। एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं। तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं।” मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”
“ठीक हूँ सर।”
“कोटा कैसे आना हुआ?”
“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था। अब मुंबई जा रहा हूँ। शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था।”
“छोटा भाई, हाँ याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.
“सर, आप इतने ऊँचे पद पर हैं। आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं। आपको कहाँ याद होगा? देवेश नाम है उसका सर।”
पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई।उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो। हाँ, तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”
“हाँ रजत, उसने वहाँ मकान ख़रीदा है। दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है। 
चार-पाँच दिन वहाँ रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएँगे।”
“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?” “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी।इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएँ तो नहीं मरतीं न।”
“हाँ, यह तो है।  पिताजी कैसे हैं?”
“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था। अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं। अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है।”
“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा। क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे।” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था। आशा के विपरीत रमाशंकर बोला, “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता। अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं। उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है। मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए। कभी इधर, तो कभी उधर। कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा। वह हम पर बोझ हैं।”
मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए। जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है। अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों माँ-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे।”
“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूँ। मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है। कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए। माँ-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं। समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी सँवर जाए।”
मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो। मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी।रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं। इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था। प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका। क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है। नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है। 
आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आँखों को सपने देखने सिखाए। जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी। रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए। मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूँ। दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी। सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं। 
एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पाँव ठिठक गए। मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी। कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुँह मोड़ना चाह रहे हैं।”
“मैं क्या करूँ पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है।  कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूँ। रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता।”
इस घटना के पाँच  दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं। कितने टूट गए थे पापा। बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा। यूँ भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी। उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं। इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए। अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊँ ? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएँ ? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है। छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे। पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर। चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं।  उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी। सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी। सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी साँस ली। 
आँखों से बह रहे पश्‍चाताप के आँसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे। उफ्… यह क्या कर दिया मैंने। पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुँचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया। आज वह जहाँ कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी। क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएँगी ? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था। उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती। वह तो दिल में होती है।  अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है।  इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था। पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊँचा था। 
गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुँचा। उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूँ। यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा।” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया। 
आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था। मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे।”
"आऊँगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है।” ख़ुशी से उसकी आवाज़ काँप रही थी। अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया। स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा। पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए। हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं। अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे।” पापा की आँखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा। 
“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे।” वह बुदबुदाए। कुछ पल के लिए उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा। मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला।

Saturday, 19 February 2022

Anuchched Lekhn For Class 7, 8, 9,10

अनुच्छेद लेखन 
कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर अनुच्छेद निम्नलिखित हैं- 

1.कथनी और करनी समान होनी चाहिए 
संकेत-बिंदु: •  वाणी पर संयम      • कथनी और करनी में संबंध      • दोनों की एकरूपता 
कथनी करनी एक समान मिलता जीवन में सम्मान मानव क्रियाशील प्राणी है । चुपचाप बैठना उसके लिए संभव नहीं है । इसलिए जो कुछ भी वह अपनी वाणी से बोलता है, उसे करने की सोचता है । लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि मनुष्य जो कहता है, वह कर नहीं पाता, जैसे अगर आप कहते हैं कि मैं तारों को जमीन पर ला सकता है, तो क्या यह संभव है ? नहीं न, इसलिए हमारी कथनी और करनी में अंतर देखने को मिलता है । हमें अपनी वाणी पर संगुम रखना चाहिए तथा जो करने के लिए हम समर्थ हो, वही बात अपनी वाणी से कहनी चाहिए, जिससे हमारी कथनी और करनी एक समान हो । कई बार आपने देखा होगा कि व्यक्ति कह देता है कि मैं आज जरूर यह कार्य कर लूँगा लेकिन यदि वह समर्थ नहीं होता तो उस कार्य को नहीं कर पाता। हमें स्वयं को इतना समर्थ बनाना है कि जो बात हम अपनी वाणी से बोलें, उसे अवश्य पूर्ण कर सकें। हमें अपनी कथनी और करनी में एकरूपता रखनी चाहिए, तभी हम समाज में सम्मान और प्रशंसा के पात्र बन सकते हैं । 

2.परंपराएँ जीवनदायक होती हैं । 
संकेत बिंदु: • परंपराओं का महत्त्व     • परंपराओं का विभाजन     • निष्कर्ष 
मनुष्य के जीवन में परंपराएँ वास्तव में विशेष महत्त्व रखती हैं क्योंकि परंपराए जीवन-मूल्य का इस्पाती स्तंभ हैं परंपराएँ व्यक्ति का मार्गदर्शन करती हैं । परंपराएँ धार्मिक तथा रोजाना चलने वाली प्रक्रिया भी हो सकती हैं । हमारी संस्कृति में इन परंपराओं का बहुत महत्त्व है । कुछ परंपराएँ ऐसी होती हैं , जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं । कुछ परंपराएँ ऐसी भी होती हैं , जिन्हें हम अपनी आदतों के रूप में स्वीकारते हैं , जैसे प्रभात बेला में जागना, बड़ों को नमस्कार करना अतिथि सत्कार करना, छोटों के प्रति स्नेह भाव रखना आदि । परंपराएँ व्यक्ति की आत्मा में बसी होती हैं । धार्मिक परंपराओं के अंतर्गत व्यक्ति संस्कारों का पालन करते हुए धर्म निभाता है । व्यक्ति के मार्ग को संतुलित करने के लिए परंपराएँ निरंतर चलती रहती हैं । परंपराएँ मनुष्य को व्यवस्थित ढंग से जीना सिखाती हैं और उसे अपनी संस्कृति से अवगत कराती हैं ।

3.पुस्तकों का महत्त्व 
संकेत बिंदु - ● पुस्तकों का जीवन में महत्त्व     ●  विद्यालय के पुस्तकालय     ●  पुस्तकें हमारी सच्ची                       मित्र              ● ज्ञान एवं मनोरंजन का असीम भंडार 
प्रत्येक प्राणी के जीवन में पुस्तकों का अत्यधिक महत्त्व है , लेकिन विद्यार्थियों के जीवन में पुस्तकों का विशेष महत्व होता है । सभी विद्यालयों में बड़े-बड़े पुस्तकालय होते हैं , जिनमें विद्यार्थियों के पढ़ने वाले सभी विषयों, सामान्य ज्ञान की तथा अन्य पुस्तकें होती हैं । वास्तव में, ये पुस्तकें ही तो पुस्तकालय की शान है, जो विद्यार्थियों के जीवन में विशेष भूमिका निभाती हैं। पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र होती हैं, जो उसके एकांत के समय को सरसता से भर देती हैं। मनुष्य अकेले होते हुए भी पुस्तक के प्रत्येक शब्द से जुड़ जाता है, प्रत्येक घटना से, व्यक्ति विशेष से, दृश्यों से जुड़कर स्वयं को पूर्ण सा मानने लगता है। सच्चे मित्र की तरह पुस्तकें मनुष्य के तनावों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

4.आत्मनिर्भरता 
संकेत- बिंदु :  ● आत्मनिर्भरता का अर्थ          स्वतंत्रता      ● देश में आत्मनिर्भरता 
                       विकास में सहायक 
 आत्मनिर्भरता सफलता की कुंजी है। कोई भी देश, राज्य, समाज, परिवार या व्यक्ति अपना विकास तभी कर सकता है जब वह आत्मनिर्भर होगा। आत्मनिर्भरता का अर्थ है-अपने ऊपर निर्भर होना। शिक्षा और कर्म आत्मनिर्भरता के मूल आधार है।  शिक्षा से विवेकशोलता आती है और कर्म से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। आत्मनिर्भर होने से स्वाभिमान विकसित होता है। आत्मनिर्भर व्यक्ति सच्चा सुख प्राप्त करता है और उसे दूसरों से सहायता नहीं माँगनी पड़ती। आत्मनिर्भर होने परतंत्र व्यक्ति को अपनी आत्मा को दबाना पड़ता है। आत्मनिर्भर व्यक्ति परिश्रम करके आत्मनिर्भर होना चाहिए। आधारभूत संरचनाओं का विकास, आय के नियमित साधन और स्वशासन किसी भी देश के लिए आत्मनिर्भरता के मूलतत्व है। शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करना शासन का दायित्व है। आर्थिक विकास के लिए देशो संसाधनों का विकास करना आवश्यक होता है। हमारे देश का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो आत्मनिर्भर नहीं है। धर्म-परिवर्तन का मामला भी वैसे क्षेत्रों में नजर आता है, जहाँ लोग आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं और अशिक्षित हैं देश में महिलाओं की स्थिति कमजोर है और वे अशिक्षित है। हमारा देश तब तक विकसित नहीं हो सकता, जब तक देश का प्रत्येक नागरिक आत्मनिर्भर नहीं होगा और विकास में समान रूप से भागीदार नहीं बनेगा। 

5.विज्ञापन और हमारा जीवन 
संकेत-बिंदु : ●  विज्ञापन का उद्देश्य       दायित्व          विज्ञापनों के विविध प्रकार   
                    विज्ञापनों की भूमिका     ● विज्ञापनों का सामाजिक 
किसी भी वस्तु , व्यक्ति या विचार के प्रचार - प्रसार को विज्ञापन कहते हैं । विज्ञापन का उद्देश्य श्रोता , पाठक या उपभोक्ता के मन पर गहरी छाप छोड़ना है ताकि वह उससे प्रभावित हो सकें विज्ञापनों के अनेक प्रकार होते हैं । सामाजिक विज्ञापनों के अंतर्गत दहेज, नशा, परिवार नियोजन आदि संदेश आते हैं । विभिन्न कार्यक्रमों, रैलियों, आंदोलनों के विज्ञापन भी इसके अंतर्गत आते हैं। कुछ विज्ञापन विवाह, नौकरी, संपत्ति की खरीद बेच संबंधी आते हैं। सबसे लोकप्रिय और लुभावने विज्ञापन होते हैं व्यापारिक विज्ञापन उद्योगपति अपने माल को दूर-दूर तक बेचने के लिए अत्यंत आकर्षक विज्ञापनों का प्रयोग करते हैं । विज्ञापन खरीददारी में अहम् भूमिका निभाते हैं । ग्राहक प्रसिद्ध वस्तुओं के विज्ञापन को देख व सुनकर उन्हें खरीदता है। चाहे अन्य श्रेष्ठ उत्पादन वहाँ मौजूद क्यों न हो । विज्ञापन प्रभावकारी होते हैं इसलिए उनका सामाजिक दायित्व भी बहुत बड़ा होता है। प्राय: माल बेचने के लिए ग्रामक विज्ञापन दिए जाते हैं। गलत व दूषित माल बेचने के लिए भी आकर्षक सितारों का उपयोग किया जाता है । विज्ञापनों में समाज को प्रभावित करने की अद्भुत शक्ति है । ये सरकार, व्यापार तथा समाज के लिए वरदान है परंतु गलत हाथों में पड़कर इसका दुरुपयोग भी हो सकता है । इस दुरुपयोग से बचा जाना चाहिए । 
 
6.पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं 
संकेत-बिंदु : ● पराधान का अर्थ          स्वतंत्रता का महत्त्व    पराधीनता का कलक         
                     ● पराधीनता के प्रकारा 
गोस्वामी तुलसीदास जी ने जो कुछ भी लिखा उसके पीछे गहरा चिंतन एव अनुभूति थी । उनकी यह उक्ति- 'पराधीन सपनेहु सुख नाही' अर्थात् पराधीन व्यक्ति को सपने में भी सुख प्राप्त नहीं होता, जीवन की कसौटी पर खरी उतरती है । पराधीनता नरक के समान है। पराधीन के लिए दुख-सुख में कोई अंतर नहीं होती। वह पशु समान जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाता है । लोकमान्य तिलक ने कहा था- 'स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।' मनुष्य हा क्या प्रत्येक प्राणी स्वतंत्र रहना चाहता। है । जंजीरों से बंधा-पशु और पिंजड़े में बंद पक्षी स्वतंत्र होने के लिए सदैव छटपटाते रहते हैं । इतिहास साक्षी है कि जब-जब किसी शक्तिशाली राष्ट्र ने अन्य राष्ट्रों को गुलाम बनाया तो वहां की जनता स्वतंत्रता के लिए छटपटा उठी और अपने प्राणों का मूल्य चुकाकर भी इसे प्राप्त किया तथा इसे लेकर रहे स्वतंत्रता का अर्थ अपनी शक्तियों का उपयोग आत्मोन्नति एवं मानव-कल्याण के लिए करने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र होना है, न कि मनमाने ढंग से निर्बल को कष्ट पहुंचाना एवं गलत ढंग से स्वार्थ पूर्ति हेतु धन आदि इकट्ठा करना। पराधीनता मनुष्य के लिए अभिशाप है। इसमें मनुष्य का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है । उसमें विचारों की स्वतंत्रता नहीं होती, आत्मोन्नति की ललक नहीं होती, उसकी अपनी इच्छाओं का कोई महत्त्व नहीं होता ऐसा व्यक्ति आलसी हो जाता है। उसकी मानसिक सोच कुंठित हो जाती है। उसकी खुशी दुख में बदल पराधीनता उसे विकास के सभी सुखों से वंचित कर देती है। वास्तव में ईश्वर ने सभी को स्वतंत्र उत्पन्न किया है और वह स्वतंत्र हो जीना चाहता है। 

7. नर हो न निराश करो मन को 
संकेत बिंदु : • निराश न होने की प्रेरणा        हिम्मत और शक्ति आवश्यक         • निराशा से जूझना 
                   • कर्म करके निराशा समाप्त करना । 
' नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो।' जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं सुख - दुःख का क्रम रहता है । सफलता और असफलता आती-जाती रहती है पर किसी एक घटना को याद कर निराश नहीं होना चाहिए । हमेशा अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। संघर्ष मानव जीवन का अभिन्न अंग है। इसके बिना जीवन के अस्तित्व चलता को बचाना कठिन है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने भी कहा है- " कर्म के बिना किसी भी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। स्वयं मैं भी इससे वंचित नहीं हूँ, सफलता और असफलता जीवन के आवश्यक अंग है। असफलताओं को जीवन का अंग मानकर अपने कार्य में जो लगा रहता है , सफलता उसे ही मिलती है। निराश होकर बैठ जाने वाले कभी सफल नहीं हो पाते। निराशा तो एक ऐसी बीमारी है जो कैंसर और एड्स से भी खतरनाक है। जो व्यक्ति एक बार इसका शिकार हुआ उसका इलाज कोई नहीं कर सका। 'कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' इस सूक्ति को ध्यान में रखकर मनुष्य को हमेशा कर्म करते रहना चाहिए । मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करना है। फल की इच्छा करना नहीं मनुष्य को हमेशा आशावादी होता चाहिए और अपने मन को कभी भी निराश नहीं होने देना चाहिए।

8. साँच बराबर तप नहीं ( सत्यमेव जयते ) 
संकेत-बिंदु : • सत्य का अभिप्राय             • आवश्यकता     • सत्य की भूमिका      
                    • सत्य का मार्ग कठिन         • सत्य की जीत 
कबीरदास के अनुसार "साँच बराबर तप नहीं , झूठ बराबर याप। जाके हृदय साँच है- ताक हिरदय प्रभु आप।" अर्थात सत्य ही वह तपस्या है , जिसके बल से अपने आप में ही प्रभु और सभी प्रकार की सफलता को पाया जा सकता है । मन, वचन, कर्म, में एकरूपता ही सत्य है। संसार में सत्य की उसी प्रकार आवश्यकता है, जिस प्रकार अंधकार में दीपक की। जब तक सत्य छिपा रहता है, तब तक झूठ, पाखंड, छल-कपट, धोखा, रिश्वत और भ्रष्टाचार आदि दुर्गुण फैलते हैं। सत्य प्रकट होने पर झूठ के पाँव उखड़ जाते हैं । पाखंड का मंडा फूट जाता है। छल-कपट रूपी बादल फट जाता है। धोखा धुलकर बह जाता है। रिश्वत और भ्रष्टाचार समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप जीवन और समाज का सारा वातावरण उज्ज्वल हो जाता है ।पारस्परिक व्यवहार और सभी प्रकार के व्यापार का तो आधार ही सत्य है। राष्ट्रों का व्यवहार भी सत्य के सहारे चलता है। सभी धर्मों, जातियों और देश के सभी धर्म-ग्रंथ सत्य का प्रचार करते हैं । यहाँ तक कि बुरे से बुरा व्यक्ति भी यही चाहता है कि उसके सामने कोई झूठ न बोले । सत्यवादी के सामने कठिनाइयों अवश्य आती है। उनका देखते है कि झूठ बोलनेवाले छूट जाते हैं और सत्य बोलनेवाले यदी बना लिए जाते हैं । इससे दूसरे लोगों का सत्य के प्रति विश्वास हिल अधिक देर तक सूर्य आचरण करत किरणों के समान एक-न-एक दिन उजागर होकर अपने प्रकाश से सभी को चमत्कृत कर दिया करता है । सत्य का जाता है । सत्य को दबाया नहीं जा सकता। वह बादलों को फाड़कर प्रगट होनेवाली निश्चय ही कठिन होता है, किंतु दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास से सत्य को सफल साधना कर पाना कठिन और असभव नहीं है। इतिहास ऐसे ही पुरुषों को मान्यता और अमरत्व प्रदान किया करता है , जो सत्य को जीवन का दृढ आधार बनाती है। इसलिए सत्य पर अटल रहने का भरसक अभ्यास करना और आदत डालनी चाहिए। अंतिम विजय निश्चित है।

9. नशा और आज का युवा 
संकेत-बिंदु:   नशे के प्रकार              कारण और दुष्परिणाम                  दूर रहने के उपाय । 
युवा वर्ग जोश और शक्ति का प्रतीक है । किसी भी देश की शक्ति युवा शक्ति पर ही निर्भर करती है । परंतु खेद का विषय है आज का युवा तेज़ी से नशे के मकड़जाल में फंसता चला जा रहा है । देश को उन्नति के शिखर पर ले जाने का उत्तरदायित्व युवाओं के कंधों पर है । ऐसे लड़खड़ाते कदमों से ये युवा देश को कहाँ ले जाएंगे , ये प्रश्न विचारणीय है । आज नशे का व्यापार तेजी से है । शराब, तंबाकू, ड्रग्स इत्यादि की ओर युवाओं के आकर्षण के कई कारण हैं । इनमें बुरी संगत, शौक, घरेलू कारणवश तनाव , निग जिज्ञासा इत्यादि प्रमुख हैं । एक बार नशा शुरू करने के बाद वे इसके आदी हो जाते हैं । नशे के कुप्रभाव के कारण उन्हें प्रारंभ में आनंद आता है और वे स्वयं को हल्का महसूस करते हैं परंतु बाद में नशा इनकी कमजोरी बन जाती है । इसके कुप्रभाव स्वरूप उन्हें कम उम्र में ही बीमारियाँ घेर लेती हैं । सोचने-समझने व निर्णय की क्षमता, आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण आदि कम होता जाता है । अतः इनसे दूर रखने में ही समझदारी है । इसके लिए बुरी संगत से बचें तथा अपने दिनचर्या में खेलकूद, व्यायाम और योगाभ्यास को शामिल करें ।

10. जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान 
संकेत बिंदु :   अभिप्राय     • सुख-शांति का मूलमंत्र       असंतोष से हानियाँ । 
मानव एक संवेदनशील सामाजिक प्राणी है।  उसकी समस्त परेशानियों का एक प्रमुख कारण है तृष्णा तृष्णा एक ऐसी इच्छा कभी तृप्त नहीं होती। वह सदैव अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने में लगा रहता है, लेकिन इच्छाएँ कमी समाप्त नहीं होतीं। इच्छाओं का क्रम निरंतर चलता ही रहता है। वह संसार की हर वस्तु की लालसा में रहता है। जिस प्रकार एक प्यास की खोज में मरुस्थल में जा निकलता है और दूर चमकता रेत उसे बहता हुआ पानी दिखाई देता है, उसी प्रकार भी संसार के साधनों को ही असली सुख मान लेता है। संतोष मनुष्य की वह दशा है, जिसमें वह अपनी वर्तमान स्थिति में प्रसन्न है, तृप्त है। अधिक की कामना उसे नहीं है। संतोष जीवन में सुख-शांति प्रदान करता है । इससे मन में ईर्ष्या, कुंठा, दूद्वेष, घृणा जैसे विकार नहीं उत्पन्न होते। इसके विपरीत असंतोष दुख, वैमनस्य, द्वेष आदि का जनक बनता है। वह इंसान की भावनाओं को संतुष्ट नहीं होने देता। जो कुछ जाता है, उससे खुश न रहकर वह व्यक्ति को और पाने के लिए बेचैन करता है। इसीलिए हमारे धर्म और दर्शन में संतोष को सबसे बहुमूल्य धन माना गया है, जिसे पाकर व्यक्ति को और कोई कामना नहीं रहती ।वह हर तनाव, परेशानी से मुक्त हो जाता है।

11. " सादा जीवन, उच्च विचार" 
संकेत-बिंदु : • सूक्ति से आशय                 • जीवन में सादा जीवन और उच्च विचारों का महत्त्व 
                    • मानवता का कल्याण ।
 ' सादा जीवन, उच्च विचार- यह सूक्ति जीवन के दो अलग तथ्यों रूपों को प्रदर्शित करने वाली होते हुए भी मूलतः एक ही सत्य को स्वीकार या उजागर करने वाली है। सादा जीवन उन्हीं का हुआ करता है, जो उच्च विचारशील व्यक्ति हुआ करते रहस्य पहचानकर जीवन के रहन-सहन, खान-पान, कार्य- पद्धति आदि को सादा बनाकर व्यवहार किया करते हैं । ऐसा करके वे संसार के लिए । आदर्श तो स्थापित करते ही हैं , लोगों के लिए आदरणीय एवं चिरस्मरणीय भी बन जाते हैं । यदि व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक कर्म और व्यवहार में सादगी को अपना लेता है तो उसके लिए जीवन सरल तथा तनावरहित हो जाता है । सादा जीवन जीने वाला व्यक्ति प्राय : ईर्ष्या-द्वेष जैसे मनोविकारों से भी बचा रहता है । संसार ने आज तक आध्यात्मिक, भौतिक, वैज्ञानिक सामाजिक क्षेत्र में जितनी और जिस प्रकार की भी प्रगति की है, वह सादे जीवन के साथ उच्च विचार की अवधारणा के साथ ही की है । जीवन में सादगी अपनाकर ही उच्च विचारों की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है । विचारों की उच्चता पा लेने वाले व्यक्ति के पास सादगी स्वतः ही आ जाती है इसलिए उन्नति और सफलता के इच्छुक व्यक्ति को अपनी चेतना को हीनभावना और दूषित-विचारों से ग्रस्त नहीं होने देना चाहिए । सूक्ति में व्यक्त आदर्श को अपनाने में ही मानवता का सच्चा कल्याण निहित है । इसी से उदात्त मानवीय समाज की परिकल्पना की जा सकती है । 

12. गया वक़्त फिर हाथ नहीं आता 
संकेत बिंदु : • बीता समय फिर हाथ नहीं आता • समय सबसे बड़ा धन जीवन में सफलता का आधार समय • समय नष्ट करने वाले को समय ही नष्ट कर देता है । 
कहा जाता है कि जिस प्रकार मुँह से निकली बात, कमान से छूटा तीर, देह से निकली आत्मा, शाखा से टूटे पत्ते और बीता हुआ बचपन फिर नहीं लौटते, उसी प्रकार हाथों से रेत की तरह फिसलता समय अर्थात् गया हुआ वक़्त फिर कभी हाथ नहीं आता । वेदों में भी कहा गया है कि समय लगातार अग्रसर अश्व के समान है, जो एक बार निकल जाए तो लौटकर नहीं आता। समय तो जगत्-नियंता से भी अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि रूठे हुए प्रभु को तप, आराधना और भक्ति से पुनः मनाया जा सकता है, परंतु रूठे हुए कल का अर्थात् बीते हुए समयको बहुमूल्य निधि है, समय ही सबसे बड़ा घन है; अत : समय की करोड़ों उपाय करके भी वापस नहीं बुलाया जा सकता है । उसे प्रसन्न नहीं किया जा सकता है । समय मानव को धनी है, सिद्ध पुरुष है । समय जब द्वार पर दस्तक देता है तो होते हैं और जो दैव-दैव पुकारते रहते हैं , वे जीवन की मार से कब बचा है ? समय सत्य का पथ-प्रदर्शक लाभान्वित समय गति को पहचानकर कार्य करने वाला भाग्यशाली में जो उसकी आवाज़ पर कर्म करने वाले होते है में पिछड़ जाते हैं। समय की अवहेलना करने वाल है। समय की पाबंदी ही सफलता की कुंजी है। बस का काम आज निपटाना ही यशस्वी बनने का साधन है। समय को नष्ट करने वालों को एक दिन समय हो नष्ट कर देता है; क्योंकि गया हुआ वक़्त फिर हाथ नहीं आता।

13. विपति कसौटी जे कसै, ते ही साँचे मीत/सच्चा मित्र 

संकेत-बिंदु : • मित्र को आवश्यकता     • सच्चे मित्र के गुण        • मित्रों का चुनाव । 
जीवन में सच्चा मित्र का मिलना ईश्वर का वरदान है । यह एक ऐसी नियामत है, जिसके अभाव में जीवन सूना और दुःखमय हो जाता है । व्यक्ति उदास और खोया-खोया रहता है। सच्चा मित्र जीवन में उत्साह और प्रदान नई चेतना प्रदान करने वाला, निष्पाप, निष्कपट और निःस्वार्थ व्यक्ति होता है , जो हृदय की गहराइयों और आपसे जुड़ जाता है । एक सच्चा मित्र जीवन में औषधि के समान होता है वह केवल सुख का साथी नहीं, बल्कि विपत्ति में भी सहायक और सहयोगी बनता है। वह व्यक्ति का शुभेच्छु और हितचितक होता है । वह स्वार्थ के शुद्र बंधनों से ऊपर उठकर मित्र को सही मार्ग दिखाता है। एक अनुभवी वैद्य की तरह मित्र के दुर्गुणों और बुराइयों को परखकर उनका उपचार करता है । सच्चा मित्र विपत्ति में धैर्यपूर्वक मित्र का साथ देकर उसे दुःखों से उबारता है । सुख के समय या धन-संपत्ति पास होने पर तो व्यक्ति के अनेक मित्र बन जाते हैं , किंतु संकट के समय साथ देने वाला ही सच्चा मित्र होता है । सच्चा मित्र जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग होता है। जीवन के उत्थान-पतन में मित्रों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है ; अतः मित्रों का चुनाव करते समय हमेशा सतर्कता बरतना आवश्यक है । छात्र जीवन में कई बार ऊपरी दिखावे के वशीभूत हो छात्र बिना सोचे-समझे मित्र बना लेते हैं और बाद में उन्हें इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है । मित्र बनाने से पहले उनके आचरण पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। मित्रता करने में कभी भी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, बल्कि भली प्रकार परखकर ही मित्र बनाने चाहिए । 

14. समय का सदुपयोग  

संकेत-बिंदु:  • समय का महत्त्व     समय का सदुपयोग     समय-पालन की आवश्यकता । 

"समय और लहर किसी की प्रतीक्षा नहीं करते हैं ।" समय का पहिया सदा घूमता रहता है। समय कभी रुकता नहीं है। जीवन में सब चीज़ों की क्षतिपूर्ति हो सकती है, पर समय की नहीं समय ऐसे लोगों को कभी क्षमा नहीं करता, जो उसका निरादर करते हैं और व्यर्थ में उसे बरबाद करते हैं। जो समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी कद्र नहीं करता। जो व्यक्ति समय का सदुपयोग नहीं करते और अवसर पाकर चूक जाते हैं, वे बाद में पछताते हैं और हाथ मलते रह जाते हैं। समय गंवाकर पश्चात्ताप करना मूर्खता है ; अतः उचित समय पर उचित कार्य करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। एक बार गांधी जो से किसी ने पूछा कि जीवन की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं- शिक्षा, शक्ति अथवा धन को ? गांधी जी ने उत्तर दिया- " ये वस्तुएं जीवन को सफल बनाने में सहायक अवश्य हैं, परंतु सबसे महत्त्वपूर्ण है समय की परख। जिसने समय की परख करना सीख लिया, उसने जीने की कला सीख ली। "समय का सदुपयोग करने से जीवन में निश्चितता आती है । सभी कार्य सुचारु रूप से व्यवस्थित ढंग से होते हैं। व्यर्थ का तनाव व चिंता नहीं होती। छात्र जीवन वह समय है, जब पूरे जीवन को आधारशिला रखी जाती है; अतः छात्र जीवन में समय के महत्व को समझना और एक-एक क्षण का सही उपयोग करना आवश्यक है। इधर-उधर व्यर्थ समय बरबाद करने वाले छात्रों को सदैव असफलता का मुँह देखना पड़ता है।

15. टी० वी० रियल्टी शो का समाज पर प्रभाव 
संकेत-बिंदु:  
अर्थ         रियल्टी शो का आकर्षण            इसका प्रभाव 
रियल्टी शो टेलीविजन पर चल रहे ऐसे सीरियल कार्यक्रम को कहते हैं, जिसमें देश की जनता सीधे-सीधे कार्यक्रम का हिस्सा बनती है। उसमें कथा-कहानी की तरह काल्पनिक संबंध नहीं होते, बल्कि उस शो में वास्तविक लोग वास्तविक स्थितियों में भाग लेते हैं। संगीत, नृत्य, हास्य, प्रश्नोत्तरी, खतरों के खेल आदि ऐसे कार्यक्रम हैं, जो टेलीविजन पर बहुत लोकप्रिय हैं। लोग बढ़-चढ़कर इन कार्यक्रमों को देखते हैं। इनमें अधिकतर आम लोग ही भाग भी लेते हैं। इन कार्यक्रमों में इनाम के रूप में रुपये वाहन, आधुनिक यंत्र आदि मिलते हैं। 'सा रे गा मा पा', 'नच बलिए' , 'बिग बॉस', 'कौन बनेगा करोड़पति' आदि कई ऐसे रियल्टी शो हैं, जिनके कारण न जाने कितने ही गुमनाम कलाकारों को देशभर में फलने-फूलने का अवसर मिला। इन कार्यक्रमों के फलस्वरूप देश के गली-कूचों में कलाकारों के बीच कला और प्रतिभा का बल दिखाने की एक स्पर्धा-सी छिड़ गई हैं । यह अपने आप में एक शुभ संकेत है । 

16. मोबाइल फोन सुविधा या असुविधा 
संकेत-बिंदु : 
आवश्यक अंग         ढेरों सुविधाएँ          हानियाँ      उचित प्रयोग आवश्यक 
वर्तमान समय में मोबाइल फोन जीवन का अभिन्न हिस्सा बनकर रह गया है। इसके बिना जीवन सूना-सूना लगता है। आज के युग में हर व्यक्ति चाहे वो उच्च वर्ग का हो या निम्न वर्ग का, मोबाइल फोन जरूर रखता है। यह सभी के पास हो भी क्यों न ? इससे हम फोटोग्राफी कर सकते हैं, हिसाब-किताब लगा सकते हैं, संगीत सुन सकते हैं। अब यह केवल बातचीत का जरिया मात्र नहीं रह गया है, इसे इंटरनेट से जोड़कर आप कोई भी खबर पलक झपकते ही मोबाइल में देख सकते हैं। इससे प्राप्त सुविधाओं का कोई अंत नहीं। जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही इसके भी कुछ लाभ हैं तो कुछ नुकसान भी। इससे समय की बरबादी होती है, स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है यहाँ तक कि जान का खतरा भी हो सकता है। आजकल बच्चे इस पर कई तरह के गेम्स खेलते हैं, जिससे कुछ बच्चों को 'ब्लू वेल' गेम खेलते हुए अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। इसलिए इसका सदुपयोग करें और जितनी आवश्यकता हो, उतना ही प्रयोग करें। कहीं ऐसा न हो कि इससे लाभ मिलने के स्थान पर हानि अधिक हो जाए। 

17. वृक्षारोपण का महत्त्व
संकेत-बिंदु:   वृक्षारोपण का अर्थ      वृक्षारोपण क्यों          हमारा दायित्व 
'वृक्षारोपण' शब्द वृक्ष + आरोपण दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है वृक्ष को आरोपित करना (लगाना)। अर्थात् पृथ्वी पर वृक्ष का लगाया जाना ही 'वृक्षारोपण' कहलाता है। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि कहीं भी मिट्टी कुरेदकर बीज दबा देना या कोई पौधा लाकर लगा देना। सही मायनों में वृक्षारोपण का अर्थ है-उपयुक्त मिट्टी तथा हवा, पानी की उपलब्धता वाले स्थान पर सही मौसम में किसी पौधे या बीज को मिट्टी में लगाना (बोना)। किसी पौधे को लगा देने भर से ही हमारा वृक्षारोपण का दायित्व पूरा नहीं हो जाता है। उस पौधे के साथ आत्मीयता स्थापित करते हुए परिपक्व होने तक उसकी देख-रेख करना भी वृक्षारोपण का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। विकास प्रक्रिया के दौरान वनों की इतनी अंधाधुंध कटाई हुई है कि आज प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। प्रदूषण, प्राकृतिक आपदाएँ, नित नयी-नयी बीमारियों का प्रकोप आदि इसी का परिणाम हैं। इस प्राकृतिक क्षतिपूर्ति के लिए आज अधिक से अधिक वृक्ष लगाना प्रत्येक मनुष्य का दायित्व बन गया है। मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन, जल तथा भोजन की आपूर्ति पौधों से ही होती है। अतः यदि इस धरती पर जीवन उसी प्रकार अपना दायित्व मानकर चलना होगा, जिस प्रकार हम शरीर के पोषण के लिए भोजन तथा को, विशेष रूप से मानव-जीवन को बचाकर रखना है, तो हम सभी को वृक्षारोपण ( वृक्षों को लगाना) उसी प्रकार अपना दायित्व मानकर चलना होगा, जिस प्रकार हम शरीर के पोषण के लिए भोजन तथा जल की व्यवस्था करके रखते हैं । 

18. शांति किसे प्रिय नहीं है । 
संकेत-बिंदु:   भारत : एक शांतिप्रिय देश           अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म 
                       शांति से बढ़कर कोई हथियार नहीं  
 इस बात से कोई भी असहमत नहीं हो सकता कि भारत एक शांतिप्रिय देश है। इस देश की जड़ों में सत्य, अहिंसा, त्याग और प्रेम की भावनाएँ भरी हुई हैं। इस देश ने स्वयं को ही नहीं, सारे विश्व को प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया है। महात्मा गौतम बुद्ध ने सत्य और अहिंसा का जो संदेश दिया, उससे न केवल भारत, बल्कि चीन, जापान, कोरिया, वर्मा, श्रीलंका, तिब्बत जैसे देशों के लोग भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए। विश्व के अन्य परतंत्र देशों ने जहाँ अपनी आज़ादी रक्त बहाकर प्राप्त की, वहीं भारत ने अपनी आज़ादी महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसा के बल पर प्राप्त की। भारत की शांतिप्रियता का इससे बड़ा उदाहरण हो ही नहीं सकता। हमारे ऋषि-मुनियों ने तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का ही संदेश दिया है और हमने भी यही कामना की है कि सबका कल्याण हो तथा सब सुखी हों । 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की कामना करने वाला देश शांतिप्रियता की मिसाल है, पर हमारी शांति की भावना को हमारी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। हम अपनी किसी से शत्रुता नहीं रखना चाहते, पर यदि कोई जान-बूझकर हमसे टकराता है, तो हम उसे चूर-चूर करने का हौसला भी रखते हैं । वास्तव में शक्ति की चादर में लिपटी हुई शांति ही श्रेयस्कर होती है।

19. समाचार पत्र 
संकेत बिंदु :    • समाचार से लाभ     • समाचार पत्र का महत्त्व         •प्रचार का सशक्त माध्यम 
समाचार-पत्र वह मुद्रित पत्र है, जिसके द्वारा देश-विदेश की घटनाओं की जानकारी मिलती है। यह बहु शृंखला है जो हमें विश्व के साथ जोड़ती है। यह जन-जागरण का सशक्त माध्यम है। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब-जब आवश्यकता पड़ी, तब-तब समाचार पत्रों ने ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाई । पिछले 68 वर्षों में पर्यावरण प्रदूषण, आरक्षण, नारी सुरक्षा, दहेज प्रथा, परिवार नियोजन इत्यादि सामाजिक समस्याओं को जितना समाचार-पत्रों ने उजागर किया है, इतना किसी अन्य ने नहीं। यह ज्ञानवृद्धि व शिक्षा का साधन है। इससे देश-विदेश साथ-साथ ज्ञानवर्धक लेख भी पढ़ने को मिलते हैं। खान-पान संबंधी मौसम की जानकारी, शिक्षा के समाचारों धर्म, सेल, व्यापार, नौकरी विज्ञान, आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो इससे अछूता हो। मनोरंजन के क्षेत्र में यह और भी आगे बढ़ गया है। बच्चों के लिए कहानियाँ, पहेलियाँ, चित्रकारी, मानसिक व्यायाम की सामग्री इत्यादि इसमें पर्याप्त मात्रा में छपती है। 

20. करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान 
संकेत बिंदु :    • अभ्यास का अर्थ             • महत्त्व               • सफलता का सर्वोत्तम साधन । 
यह पंक्ति वृंद कवि के एक दोहे की है । अभ्यास का अर्थ है, ' निरंतर और बार-बार प्रयत्न तब तक प्रयास करते रहना, जब तक इच्छित कार्य में सफलता न मिल जाए । निरंतर अभ्यास से जो मूर्ख हैं, वे भी सुजान अर्थात् विद्वान हो जाते हैं और जो सुजान होते हैं । वे अपनी कला में निपुण हो जाते हैं संसार में कोई व्यक्ति जन्म से ही विद्वान नहीं होता । प्रारम्भ में सभी अबोध होते हैं । अभ्यास ही उन्हें विद्वान बनाता है । निरंतर अभ्यास से ही व्यक्ति कुछ भी कर पाने में समर्थ होता है। शिशु गिर-गिरकर ही चलना सीखता है । सवार गिर-गिरकर ही थोड़े पर सवारी करना सीखता है। बिना अभ्यास के सिद्धि प्राप्त नहीं होती । उसे बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यास आत्म-विश्वास का सर्वोत्तम साधन और सफलता की कुंजी है।

21. ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए अथवा मधुर वाणी 
संकेत-बिंदु:  • वाणी व्यक्ति की पहचान     • मधुर वाणी औषधि के समान  
                    • कटु वाणी के बुरे प्रभाव 
मधुर वाणी में शक्ति वाणी व्यक्ति की पहचान करने का महत्त्वपूर्ण साधन है। जिस प्रकार कौए और कोयल की पहचान उनकी वाणी से ही हो पाती है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति के आचार-व्यवहार तथा स्वभाव की परख उसकी वाणी द्वारा ही होती है। मीठों वाणी वास्तव में ऐसी औषधि है जिससे हम सभी को अपने वश में कर सकते हैं। जब हम मधुर वाणी को सुनते हैं तो हमारा चित्त प्रसन्न हो उठता है। हम उसकी हर बात मानने के लिए तैयार हो जाते हैं। सज्जन सर्वदा मधुर वाणी का ही प्रयोग करते हैं जबकि दुर्जनों की वाणी कटु तथा कर्कश होती है। मीठी वाणी बिगड़े कार्य बना सकती है, शत्रु को मित्र बना सकती है तथा निराश व्यक्तियों में आशा और उत्साह का संचार कर सकती है। इसके विपरीत कटु वाणी बने बनाए कार्य को बिगाड़ देती है तथा मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। कड़वी बात हृदय में शूल की भाँति चुभती है। कड़वे वचन कभी-कभी युद्ध का कारण भी बन जाते हैं। इतिहास गवाह है कि द्रौपदी के कटु वचन महाभारत के संग्राम का कारण बने। अतः व्यक्ति को कुछ बोलने से पहले अपने वचनों को हृदय के तराजू पर तौल लेना चाहिए । जिस व्यक्ति ने अपनी वाणी को वश में करके मधुर वचनों का प्रयोग करना सीख लिया, मानो उसने सब कुछ पा लिया। मृदुभाषी अपनी वाणी से सबको अपने वश में कर लेता है। मधुर वाणी अमृत के समान कार्य करती है। महाकवि तुलसीदास जी ने भी कहा है- वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।

22. विपति कसौटी जे कसै, ते ही साँचे मीत / सच्चा मित्र 
संकेत-बिंदु : • मित्र को आवश्यकता     • सच्चे मित्र के गुण       • मित्रों का चुनाव 
नई सच्ची चेतना भावना से साथी नहीं, बल्कि जीवन में सच्चा मित्र का मिलना ईश्वर का वरदान है। यह एक ऐसी नियामत है, जिसके अभाव में जीवन सूना और दुःखमय हो जाता है। व्यक्ति उदास और खोया-खोया रहता है । सच्चा मित्र जीवन में उत्साह और प्रदान करने वाला, निष्पाप, निष्कपट और निःस्वार्थ व्यक्ति होता है, जो हृदय की गहराइयों और आपसे जुड़ जाता है। एक सच्चा मित्र जीवन में औषधि के समान होता है वह केवल सुख का विपत्ति में भी सहायक और सहयोगी बनता है। वह व्यक्ति का शुभेच्छु और हितचितक होता है। वह स्वार्थ के शुद्र बंधनों से ऊपर उठकर मित्र को सही मार्ग दिखाता है। एक अनुभवी वैद्य की तरह मित्र के दुर्गुणों और बुराइयों को परखकर उनका उपचार करता है । सच्चा मित्र विपत्ति में धैर्यपूर्वक मित्र का साथ देकर उसे दुःखों से उबारता है। सुख के समय या धन-संपत्ति पास होने पर तो व्यक्ति के अनेक मित्र बन जाते हैं, किंतु संकट के समय साथ देने वाला ही सच्चा मित्र होता है। सच्चा मित्र जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग होता है । जीवन के उत्थान-पतन में मित्रों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है ; अतः मित्रों का चुनाव करते समय हमेशा सतर्कता बरतना आवश्यक है। छात्र जीवन में कई बार ऊपरी दिखावे के वशीभूत हो छात्र बिना सोचे-समझे मित्र बना लेते हैं और बाद में उन्हें इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है । मित्र बनाने से पहले उनके आचरण पर ध्यान देना अत्यावश्यक है। मित्रता करने में कभी भी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, बल्कि भली प्रकार परखकर ही मित्र बनाने चाहिए। 

23. स्वयं से प्रेम करो 
संकेत बिंदु:  • प्रेम का स्वरूप     • स्वयं को प्रेम तक पहुँचाने का मार्ग      • स्वयं के दोष  
प्रत्येक मनुष्य के अंदर परमात्मा का वास है और परमात्मा प्रेम का स्वरूप है। प्रेम ही परमात्मा है और परमात्मा ही प्रेम है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं प्रेम करता है। अगर हम स्वयं से प्रेम करेंगे तो दूसरे व्यक्ति भी हम से प्रेम करेंगे। प्रेम में विश्वास होता है, जिसके माध्यम से हम दिलों को जीत लेते हैं। प्रेम के कई रूप होते हैं। प्रेम जीवन जीने की कला है। प्रेम व्यक्ति को शांत स्वभाव व भाईचारे से जीना सिखाता है। अगर हम स्वयं से प्रेम करेंगे तो अपने जीवन को सुखद बनाकर दूसरों को भी प्रेम से सिंचित करेंगे। व्यक्ति को अपने क्रोध पर भी नियंत्रण करना चाहिए। जब वह क्रोध, हिंसा, मोह, माया जैसे स्वभाव को दूर करेगा, तो वह निश्चय ही प्रेम के पथ पर चलेगा और न केवल स्वयं से, बल्कि सबसे प्रेम ही करेगा। प्रेम तो सबको जोड़ता है। इसलिए जब हम स्वयं से प्रेम करेंगे तो सबकी आत्मा से जुड़ जाएँगे। 

24. पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव 
संकेत बिंदु: • प्राचीन काल से संबंध    •  पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव   •  पश्चिमी सभ्यता पर रोक । 
आज पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन भारत की प्राचीन सभ्यता में केवल शरीर पुष्टि व आवश्यकताओं की पूर्ति का ही उद्देश्य नहीं था, बल्कि उसमें उत्कृष्ट संस्कार, भावनाएँ व अध्यात्म का भी समावेश था। निजी स्वार्थ के अलावा पड़ोस में रहने वाले व्यक्तियों तथा समाज व देश के प्रति जिम्मेदारियों व कर्तव्यों का पालन करना भी परम आवश्यक है। दीन-दुखियों की सेवा करना भी धर्म समझा जाता है, परंतु पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से मनुष्य अपने संस्कार छोड़कर लोभ में पड़ रहा है। आज केवल स्वार्थ पूर्ति तथा धन बटोरने की होड़ लगी हुई है। वास्तव में, पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित फैशन, टेलीविज़न इत्यादि के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी को पथभ्रष्ट किया जा रहा है। यदि समय रहते पाश्चात्य सभ्यता के अंधे अनुकरण पर अंकुश न लगाया गया, तो देश का भविष्य अंधकारमय हो सकता है ।

25. जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि 
संकेत बिंदु:  •  एक विचारणीय विषय     •  प्रकृति से संबंध     • दृष्टि और सृष्टि का एकरूप  
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि यह एक अतिसुंदर विचार है। जब हम प्रकृति की सुंदरता को निहारते हैं, तो उसकी सुंदरता मन को भा जाती है। ठीक उसी तरह, हम अपने जीवन को जिस दृष्टि से देखेंगे, वह उसी प्रकार से हमें दिखेगा। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो मन में कुछ तथा सामने कुछ और दिखाते हैं। व्यक्ति अगर अपने मन को निर्मल रखे तथा अपने व्यवहार में शुद्धता लाए तो वह निश्चय ही सृष्टि को सुंदर रूप में देखेगा। व्यक्ति को अपने विचारों में शालीनता व शुद्धता लानी चाहिए तथा अपने सुंदर मन से सृष्टि को देखना चाहिए। हम अपने आस-पास के लोगों के बारे में जिस तरह से सोचेंगे, वैसा ही हमें लोगों से मिलेगा। यदि हमारी सोच सकारात्मक है तो हमें सब वैसा ही दिखेगा। अर्थात जैसी दृष्टि-वैसी सृष्टि। हम जिस रंग के चश्मे को पहनकर सृष्टि को देखेंगे, हमें वैसी ही सृष्टि दिखाई देगी। इसलिए हमारी दृष्टि सुंदर होनी चाहिए, तभी संपूर्ण सृष्टि हमें सुंदर दिखाई देगी।

Saturday, 12 February 2022

Class 8 NCERT Solutions For Lesson Baaz Aur Saap/पाठ-17 बाज और साँप

पाठ के प्रश्न-उत्तर 
1. घायल होने के बाद भी बाज ने यह क्यों कह , " मुझे कोई शिकायत नहीं है।" विचार प्रकट कीजिए। 
उत्तर- घायल होने के बाद भी बाज ने यह कहा कि- " मुझे कोई शिकायत नहीं है।" उसने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वह किसी भी कीमत पर समझौतावादी जीवन शैली पसंद नहीं करता था। वह अपने अधिकारों के लिए लड़ने में विश्वास रखता था। उसने अपनी जिंदगी को भरपूर भोगा। वह असीम आकाश में जी भरकर उड़ान भर चुका था। जब तक उसके शरीर में ताकत रही तब तक ऐसा कोई सुख नहीं बचा जिसे उसने न भोगा हो। वह अपने जीवन से पूर्णतः संतुष्ट था। 
2. बाज जिंदगी भर आकाश में ही उड़ता रहा फिर घायल होने के बाद भी वह उड़ना क्यों चाहता था ? 
उत्तर- बाज जिंदगी भर आकाश में उड़ता रहा, उसने आकाश की असीम ऊँचाइयों को अपने पंखों से नापा। बाज साहसी था। वह किसी भी कीमत पर समझौतावादी जीवन शैली पसंद नहीं करता था। अतः कायर की मौत नहीं मरना चाहता था। वह अंतिम क्षण तक जीवन की आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना चाहता था।
3. साँप उड़ने की इच्छा को मूर्खतापूर्ण मानता था। फिर उसने उड़ने की कोशिश क्यों की ? 
उत्तर- साँप उड़ने की इच्छा को मूर्खतापूर्ण मानता था क्योंकि वह मानता था कि वह उड़ने में सक्षम नहीं है। पर जब उसने बाज के मन में आकाश में उड़ने के लिए तड़प देखी तब साँप के मन में भी उत्सुकता जागी कि आकाश का मुक्त जीवन कैसा होता है ? इस रहस्य का पता लगाना ही चाहिए। तब उसने भी आकाश में एक बार उड़ने की कोशिश करने का निश्चय किया। 
4. बाज के लिए लहरों ने गीत क्यों गाया था ? 
उत्तर- बाज की साहस और वीरता के लिए लहरों ने उसके सम्मान में गीत गाया। बाज ने जिस तरह अपने प्राणों की परवाह न करते हुए अपना जीवन यापन किया व अपने अन्त समय भी बहादुरी का परिचय देते हुए व्यतीत किया , लहरों के लिए बहुत शिक्षाप्रद था। वह इसका प्रसार समस्त संसार में अपने गीत के माध्यम से कर देना चाहती थी ताकि समस्त संसार बाज के जीवन से प्रेरणा ले और अपना जीवन स्वतंत्रता, साहस पूर्वक बिताए व समाज में मिसाल कायम कर सके। लहरों का गीत उन दीवानों के लिए था जो मर कर भी मृत्यु से नहीं डरते बल्कि उसका सामना हँसकर करते हैं।
5. घायल बाज को देखकर साँप खुश क्यों हुआ होगा ? 
उत्तर- साँप का शत्रु बाज है चूँकि वो उसका आहार होता है। घायल बाज उसे किसी प्रकार का आघात नहीं पहुँचा सकता था इसलिए घायल बाज को देखकर साँप के लिए खुश होनास्वाभाविक था। 
6. कहानी में से वे पंक्तियाँ चुनकर लिखिए जिनसे स्वतंत्रता की प्रेरणा मिलती हो। उत्तर- कहानी की स्वतंत्रता से संबंधित पंक्तियाँ - 
1. जब तक शरीर में ताकत रही, कोई सुख ऐसा नहीं बचा जिसे न भोगा हो। दूर-दूर तक उड़ानें भरी हैं, आकाश की असीम ऊँचाइयों को अपने पंखों से नाप आया हूँ। 
2. “आह ! काश, मैं सिर्फ एक बार आकाश में उड पाता।" 
3. पर वह समय दूर नहीं है, जब तुम्हारे खून की एक-एक बूँद जिंदगी के अँधेरे में प्रकाश फैलाएगी और साहसी, बहादुर दिलों में स्वतंत्रता और प्रकाश के लिए प्रेम पैदा करेगी।
7. मानव ने भी हमेशा पक्षियों की तरह उड़ने की इच्छा की है। आज मनुष्य उड़ने की इच्छा किन साधनों से पूरी करता है। 
उत्तर- मानव ने आदिकाल से ही पक्षियों की तरह उड़ने की इच्छा मन में रखी है। किंतु  शारीरिक असमर्थता की वजह से उड़ नहीं पा रहा था जिसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य हवाईजहाज का आविष्कार कर दिखाया। आज मनुष्य अपने उड़ने की इच्छा की पूर्ति हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, गैस-बैलून आदि से करता है। 
 भाषा की बात 
8. कहानी में से अपनी पसंद के पाँच मुहावरे चुनकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए । 
उत्तर- 1. भाँप लेना – बच्चों का मुँह देखकर माता जी ने परीक्षा का क्या नतीजा आया होगा यह भाँप लिया। 
2. हिम्मत बाँधना - मित्र के आने पर ही परीक्षा के लिए राहुल की हिम्मत बँधी। 
3. अंतिम साँस गिनना-दादाजी की गिरती साँसें देखकर माता जी ने स्थिति भाँप ली वे कि वे उनकी अंतिम साँस गिन रहे हैं । 
4. मन में आशा जागना- शिक्षिका की कहानी ने मेरे मन में आशा जगा दी। 
5. प्राण हथेली में रखना- सिपाही ने देशवासियों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों को हथेली में रख देते हैं। 
9. 'आरामदेह' शब्द में 'देह' प्रत्यय है । यहाँ 'देह' 'देनेवाला' के अर्थ में प्रयुक्त है । देनेवाला के अर्थ में 'द' , 'प्रद' , 'दाता' , 'दाई' आदि का प्रयोग भी होता है, जैसे- सुखद, सुखदाता, सुखदाई, सुखप्रद। उपर्युक्त समानार्थी प्रत्ययों को लेकर दो-दो शब्द बनाइए । 
उत्तर : - प्रत्यय शब्द 
1. द- सुखद, दुखद 
2. दाता - परामर्शदाता, सुखदाता 
3. दाई - सुखदाई, दुखदाई 
4. देह - विश्रामदेह, लाभदेह, आरामदेह 
5. प्रद - लाभप्रद, हानिप्रद, शिक्षाप्रद

Friday, 11 February 2022

Extra Question Answer for Class 9 Hindi Sanchayan Book Chapter HAMID KHAN

हामिद खाँ 
लघु प्रश्न-उत्तर:
 1. 'हामिद खाँ' हिंदू-मुसलमान संबंधों के विषय में क्या चाहता था ? 
उत्तर- हामिद खाँ चाहता था कि हिंदुओं और मुसलमानों में आपसी प्रेम, सद्भाव, विश्वास और भाईचारा हो। हिंदू लोग मुसलमानों को अत्याचारी और अपवित्र न मानें उसे इस बात का दुःख था कि हिंदू लोग मुसलमानों को अत्याचारियों की संतान मानते हैं और उनके होटलों में खाना नहीं खाते। 
2. हामिद खाँ ने लेखक को पैसे किसलिए वापस किए ? 
उत्तर- हामिद खाँ चाहता था कि हिंदू-मुसलमान के बीच सद्भाव और बढ़े। इसलिए उसने पैसे न लेकर अपनी सद्भावना का परिचय दिया। उसने यह भी कहा कि वह उन पैसों से भारत के मुसलमानी होटल से पुलाव खाए। इससे भी उसकी सांप्रदायिक भावना का पता चलता है। 
3. लेखक पाकिस्तान किस उद्देश्य से गया था ? 
उत्तर- लेखक पाकिस्तान में स्थित तक्षशिला के खंडहरों को देखने हेतु वहाँ की यात्रा पर गया था। 
तक्षशिला के गाँव के बाजार का दृश्य कैसा था ? 
उत्तर- तक्षशिला के गाँव के बाजार में हस्तरेखाओं के थी, कहीं-कहीं सढ़े हुए चमड़े की बदबू भी। 
5. दुकान के कोने में खाट पर कौन लेटा हुआ था ? वह क्या कर रहा था ? 
उत्तर- खाट पर एक दढ़ियल बूढ़ा गर्द तकिए पर कोहनी टेके हुए दीन-दुनिया से बेखबर हुक्का पी रहा था। वह व्यक्ति हामिद खाँ का पिता था। समान तंग गलियाँ फैली थीं। हर जगह धुआँ, मच्छर और गंदगी लंबे कद के पठान मस्त चाल से चलते नजर आ रहे थे। 
6. हामिद खाँ को किस बात पर आश्चर्य हुआ और क्यों ? 
उत्तर- 'हामिद खाँ' को एक हिंदू द्वारा मुसलमानी होटल में खाना खाने पर आश्चर्य हुआ। पाकिस्तान के हिंदू मुसलमाना के यहाँ भोजन नहीं किया करते। इसलिए हामिद खाँ को आश्चर्य होना स्वाभाविक था।

निबंधात्मक प्रश्न-उत्तर 
1. हामिद खाँ का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
उत्तर- हामिद खाँ की कहानी का नायक, तक्षशिला के होटल का मालिक, अतिथि सत्कार में निपुण अपने वृद्ध पिता की देखभाल करने वाला, एक ऐसा चरित्र है, जो कहानी के आदि से लेकर अंत तक बना रहता है। भूखे-प्यासे लेखक जब तक्षशिला पहुँचते हैं तो हामिद खाँ के होटल में चपाती, सालन और चावल खाकर तृप्ति का अनुभव करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हामिद खाँ अतिथि-सत्कार में निपुण है। हामिद खाँ अपने मुल्क में हिंदू-मुसलमानों में एकता देखना चाहते हैं इसलिए लेखक से भोजन के पैसे लेना अस्वीकार कर देते हैं। पश्तो भाषा के धनी हामिद खाँ इस कटु सत्य से भी परिचित हैं कि जालिमों की इस दुनिया में शैतान को भी लुक छिप कर चलना पड़ता है इसलिए ईमान और मुहब्बत के साथ मुसलमानी होटल में खाना खाने आए, हिंदुस्तानी मित्र को यह जता देना चाहते हैं कि परस्पर प्रेम, सद्भाव एवं भ्रातृत्व की भावना जैसे मानवीय मूल्य धार्मिक बंधन से परे होते हैं। 
2. तक्षशिला की गलियों को सँकरी और गंदी लिखकर लेखक क्या जताना चाहते हैं ? ग्रामीण इलाकों के धूल भरे वातावरण में भी सच्ची मित्रता का दृश्य किस प्रकार उभरकर सामने आया ?
उत्तर- तक्षशिला की गलियों का वर्णन करते हुए लेखक ने उन्हें हस्तरेखाओं के समान फैली गलियों कहा क्योंकि जहाँ तक उनकी नज़र जाती थी, धुआँ, मच्छर गंदगी और सड़े हुए चमड़े की बदबू की आती थी। उन्हीं धूल भरी, गंदी बदबूदार गलियों के एक छोर पर हामिद खाँ का होटल था। ग्रामीण इलाकों के धूल भरे वातावरण में भी हामिद खाँ और लेखक के विधर्मी होने पर भी गहरी दोस्ती उभरकर सामने आती है। लेखक ने रोटी, चावल और सालन का भरपूर आनंद लिया और हामिद खाँ ने भी बड़े प्रेम से अपने अतिथि का सत्कार किया लेखक द्वारा भोजन के लिए पैसे देने पर हामिद खाँ ने उसे मित्रता का वास्ता देते हुए पैसे लेने से इंकार कर दिया। इससे इस स्पष्ट होता है कि वातावरण कैसा भी हो, सच्ची मित्रता का स्वरूप उभरकर सामने अवश्य आता है। हामिद खाँ की आवाज़ उसके साथ बिताए क्षणों की यादें आज भी लेखक की स्मृति में उभरती रहती हैं। इसलिए तक्षशिला में आगजनी की खबर पढ़ते ही लेखक को मित्र हामिद खाँ की याद आई और वे ईश्वर से उसकी कुशलता की कामना करने लगे।
3. लेखक का परिचय हामिद खाँ से किन परिस्थितियों में हुआ ?
उत्तर- लेखक भारत में स्थित मालाबार के निवासी थे और हामिद खाँ पाकिस्तान का रहने वाला था। लेखक तक्षशिला के पौराणिक खंडहर देखने पाकिस्तान गए थे। वहाँ की कड़कड़ाती धूप में भूख और प्यास से व्याकुल होकर रेलवे स्टेशन से पौन मील की दूरी पर बसे एक गाँव की ओर निकल गए थे। वहीं चपातियों की सोंधी महक ने उन्हें हामिद खाँ के होटल में पहुँचा दिया। बातचीत करते हुए दोनों में मैत्री संबंध स्थापित हो गए। एक हिंदू का मुसलमानी होटल में खाना खाना, पुलाव और चाय की तारीफ़ करना, भारत में हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे का नहीं के बराबर होना जैसी बातों ने हामिद को लेखक का प्रशंसक बना दिया। उसने रोटी, चावल और सालन परोसकर लेखक की मेहमाननवाज़ी की। इस प्रकार हामिद खाँ से लेखक का परिचय उसके होटल में खाना खाने के दौरान हुआ।
4. हामिद खाँ लेखक के मुल्क जाकर अपनी आँखों से क्या देखना चाहता था ?  
उत्तर- लेखक जब हामिद खाँ से मिलता है तो उसे बताता है कि उनके मुल्क में हिंदू-मुसलमान में कोई फ़र्क नहीं है। सब लोग आपस में प्यार से रहते हैं। वहाँ पर कौम के नाम पर झगड़े न के बराबर हैं। सब लोग एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हैं। हामिद खाँ ने जब लेखक के मुँह से ऐसी बातें सुनीं तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसे तो यही लगता था कि हिंदू उन्हें आततायियों को औलाद समझते हैं। हामिद खाँ लेखक के मुल्क जाकर हिंदू-मुसलमानों की परस्पर एकता को देखना चाहता था। यह भी जानना चाहता था कि बिना दंगे के से दो विरोधी धर्मों के लोग आपस में प्यार से कैसे रहते हैं। ऐसा क्या है वहाँ पर जो भेदभाव को समाप्त कर रहा है। वास्तव में हामिद खाँ ने इन दो धर्मों के लोगों को हमेशा ही एक-दूसरे के विपरीत ही देखा था। उसे इन बातों पर विश्वास ही नहीं होता था कि ये लोग कभी मिलजुल कर भी रह सकते हैं इन्हीं बातों की सच्चाई जानने के लिए वह लेखक के मुल्क जाना चाहता था। 
5. तक्षशिला में आगजनी का समाचार पढ़ने के बाद लेखक को अचानक किसका ध्यान आया और क्यों ? 
उत्तर- लेखक एक दिन समाचार पत्र पढ़ रहा था। अचानक ही उसकी निगाह एक ऐसी खबर पर पड़ी जिसने लेखक को भावविभोर कर दिया। यह खबर थी कि तक्षशिला (पाकिस्तान) में आगजनी की वारदात। यह पढ़ते ही लेखक को हामिद खाँ का ख्याल आया, जो उसे तक्षशिला। दौरे के समय मिला था। हामिद खाँ एक छोटा-सा होटल चलाता था और यही उसकी जीविका थी। लेखक तक्षशिला में हामिद खाँ के में हो खाना खाने गया था। जबकि हामिद खाँ उसे देखकर अचंभित भी हो गया था कि एक मुसलमान के होटल में खाना जैसे खा सकता है ? आगजनी की खबर पढ़कर लेखक ने भगवान से प्रार्थना को कि हामिद खाँ और उसके होटल को कुछ न हुआ हो। खाँ के प्रति लेखक के आत्मीयता और मानवीयता के भाव थे। वह हामिद खाँ के प्रति स्नेह व आदर रखता था। हामिद खाँ एक नेक इनसान था और लेखक की भूख-प्यास को उसने शांत किया था। भले हो वह मुसलमान था, फिर भी उसने लेखक से खाने के पैसे लेने नहीं लिए थे। उसने लेखक को अतिथि मानकर अपना अतिथि धर्म निभाया था। यही वजह थी कि लेखक उसकी भलाई के विषय में ईश्वर से विनती करता है।
6. हामिद को लेखक की किन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था ? 
उत्तर- हामिद को लेखक द्वारा बताई गई भारत में हिंदू-मुसलमानों की एकता, प्रेमपूर्ण व्यवहार, मुसलमानी होटल में चाय पीने और पुलाव खाने एक साथ उत्सव मनाने जैसी बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वह इस बात पर विश्वास नहीं कर सका कि लेखक हिंदू थे। तक्षशिला के निकटवर्ती क्षेत्रों में हामिद खाँ ने कभी किसी हिंदू को मुसलमानों की तारीफ़ करते हुए नहीं सुना था। उसके अनुसार हिंदू तो हमेशा मुसलमानों को आततायियों की संतान समझते थे। हिंदू मुसलमानों में आपसी एकता नहीं थी। पाकिस्तान में वे एक दूसरे के त्योहारों में सम्मिलित नहीं होते थे। कोई हिंदू-मुसलमान के होटल में खाना नहीं खाता था और कोई मुसलमान हिंदू की दुकान पर नहीं जाता था। इसलिए हिंदू-मुसलमानों की एकता की बातें हामिद खाँ के लिए आश्चर्यजनक ही थीं । 
7. हामिद खाँ ने खाने का पैसा लेने से इंकार क्यों किया ? 
उत्तर- लेखक की मेहमाननवाज़ी करते हुए हामिद खाँ ने उन्हें गरम-गरम चपातियाँ, चावल और सालन परोसा। उसके सहायक अब्दुल ने पानी से भरा एक कटोरा मेज पर रख दिया। लेखक ने बड़े चाव से भरपेट भोजन किया। भोजन करने के बाद लेखक ने पैसे देने चाहे तो हामिद खाँ ने अपनी मुहब्बत की कसम देते हुए पैसे लेने से इंकार कर दिया। हामिद खाँ लेखक का प्रेमपूर्ण व्यवहार और भाईचारा देखकर बहुत प्रभावित हुआ था। वह चाहता था कि लेखक भारत लौटकर उस रुपए से किसी मुसलमानी होटल में (खाना) पुलाव खाकर तक्षशिला में मिले भाई हामिद खाँ को याद करें। वास्तव में वह हिंदू-मुसलमानों की एकता, परस्पर भाई-चारे के संबंध को पाकिस्तान में भी देखने की कामना कर रहा था। इसलिए मित्र और सद्भावपूर्ण संबंध को पैसे से न तौलकर हामिद खाँ ने सच्ची मित्रता की मिसाल कायम की। 
8. सांप्रदायिक दंगों का प्रभाव समाज के किस वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करता है ? यह भी स्पष्ट कीजिए कि इस प्रकार के दंगों को रोकने के लिए आप क्या उपाय करेंगे ?  
उत्तर- सांप्रदायिक दंगों का प्रभाव समाज के मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग के लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है । इसका प्रमुख कारण यह है कि ये लोग बहुत धनी या अमीर नहीं होते प्रतिदिन की कमाई से ही इनके घर की रोजी-रोटी चलती है। आगजनी, तोड़-फोड़, कर्फ्यू इत्यादि की परिस्थितियों में इनका काम काज ठप हो जाता है, दुकानें बंद हो जाती हैं, आग लग जाती है, दुकानें जला दी जाती है या फिर इन पर दबाव डाला जाता है कि ये अपना कारोबार बंद रखें। गरीब बेचारा बे-मौत ही मारा जाता है। उसकी प्रतिदिन की आमदनी बंद हो जाती है। उसके बच्चे भूख से बिलखने लगते हैं तो फिर वह इस बात को नहीं सोचता कि वह हिंदू है या मुसलमान। वह इन सांप्रदायिक दंगों से दूर भागता है, जिनसे किसी का भला नहीं होता। इस प्रकार के दंगों को रोकने के लिए आपसी प्रेम-प्यार को बढ़ाना होगा। एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करना होगा। मंदिर हो या मसजिद दोनों ही आदरणीय एवं पूजनीय होने चाहिए। धर्म के भेदभाव को समाप्त करना होगा। हमें चाहिए कि हम मिलजुल कर केवल एक ही बात कहे यह धरती न हिंदू की है न मुसलमान। यह तो केवल एक इनसान की है। 
9. हामिद खाँ लेखक से खाने के पैसे क्यों नहीं लेना चाहता था ? 
उत्तर- हामिद खाँ तक्षशिला का रहने वाला एक मुसलमान था, जो कि एक छोटा-सा होटल चलाता था। लेखक जब तक्षशिला के खंडहर देखने जाता है तो गर्मी में भूख-प्यास से व्याकुल होकर हामिद खाँ के होटल में जाता है। हामिद खाँ लेखक के व्यवहार से उसकी बातों से उसके बोलचाल से बहुत प्रभावित होता है। वह लेखक को अपना अतिथि मानता है क्योंकि उसने ऐसे बहुत कम हिंदू देखे थे, जिनके मन में मुसलमानों के प्रति शत्रुता का भाव नहीं होता। लेखक की दृष्टि में हिंदू-मुसलमान सब एक थे। इसलिए हामिद खाँ लेखक को एक भला व्यक्ति लगता है। हामिद को खाने के पैसे लेना बहुत छोटी-सी बात लगती है क्योंकि जहाँ मानवीय मूल्यों की प्रधानता हो, वहाँ पैसा तुच्छ हो जाता है। वह एक रुपया भी यह कहकर लौटा देता है कि लेखक उसकी तरफ से कभी पुलाव खा ले। लेखक और हामिद खाँ के संबंध प्यार और भावुकता से जुड़ जाते हैं। ऐसे संबंधों में यदि पैसा बीच में आ जाए तो स्वार्थ पनपने लगता और इंसानियत समाप्त हो जाती है।
10. किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए हामिद और लेखक जैसे व्यक्तियों का होना आवश्यक है- स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए हामिद खाँ और लेखक जैसे व्यक्तियों का होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि ऐसे लोगों के मन में परस्पर विरोध की भावनाएँ नहीं होती। ये लोग धर्म के नाम पर आपस में नहीं झगड़ते। राष्ट्र की उन्नति के लिए अधिक से अधिक ऐसे लोगों का होना आवश्यक है क्योंकि कोई भी देश आर्थिक, राजनैतिक या तकनीकी रूप से उन्नति तभी कर पाएगा जब देशवासियों को ऊर्जा, धन तथा समय का दुरूपयोग झगड़ों और दंगों में नहीं होगा। यदि देश के भीतर ही हिंसा की आग भड़कने लग जाएगी तो फिर वह देश दूसरे देश से मुकाबला कैसे कर पाएगा। यदि हमें उन्नत बनना है, प्रगति करनी है। विभिन्न देशों के समक्ष एक सबल राष्ट्र की छवि बनानी है, तो अवश्य ही आपसी मन-मुटाव, भेदभाव और धर्म तथा जाति के नाम पर झगड़े समाप्त करने होंगे। राष्ट्र की उन्नति इन बातों पर निर्भर करती है कि वहाँ की तकनीकी कैसी है ? वहाँ की अर्थ-व्यवस्था कैसी है ? वहाँ शिक्षा को कितना महत्व दिया जाता है न कि इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ किस धर्म की प्रबलता है। हामिद खाँ एक मुसलमान था और लेखक एक हिंदू, फिर भी उनमें आपस में आत्मीयता के भाव थे। दोनों में परस्पर प्यार और भाईचारे की भावना थी। राष्ट्र को आवश्यकता है- हामिद और लेखक जैसे व्यक्तियों की।
11.'हामिद खाँ' नामक पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है ? 
उत्तर- 'हामिद खाँ' नामक पाठ से हमें प्रेम, शांति, सद्भाव, भाईचारे और एकता की शिक्षा मिलती है। यह पाठ हमें सिखाता है कि धर्म और जाति के नाम पर इंसान में भेद करना गलत है। हिंदू और मुसलमान के बीच उत्पन्न भ्रम और अलगाव अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। परस्पर मेल-मिलाप से आपसी मतभेदों का दूर करके हमें एकता और भाईचारे की भावना पर बल देना चाहिए । 
12.हिंसा और आगजनी की घटनाएँ समाचार पत्रों की सुर्खियों कैसे बन जाती हैं ? लेखक समाचार पढ़कर दुखी क्यों हुए ?
उत्तर- हिंसा और आगजनी की घटनाएँ जानमाल की हानि करती है, इसलिए समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बन जाती हैं। तक्षशिला में हस्तरेखाओं के समान फैली गलियों से भरा तंग बाजार था। हामिद खाँ के जिस होटल में लेखक की भूख मिटी थी, उस तक्षशिला में आगजनी हुई है ऐसी ख़बर पढ़कर लेखक का दिल दहल उठा। वे आगजनी की भयानक घटना की कल्पना करके सिहर उठे। मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि सांप्रदायिक दंगों की चिंगारियाँ हामिद खाँ के उस होटल से दूर रहें, जिसने लेखक को छाया प्रदान की और उसकी क्षुधा को शांत किया था। दुनिया के किसी भी कोने में आग लगी हो, समाचार पत्र, रेडियो, दूरदर्शन उसे दुनिया के सभी हिस्सों में दिखा देते हैं। तक्षशिला के खंडहरों में लगी आग की खबर ने लेखक को इस विचार से दुखी कर दिया कि कहीं अग्निकांड में उसके मित्र और उसके होटल को कोई नुकसान तो नहीं पहुँचा। 
13. लेखक द्वारा वर्णित मालावार में हिंदू-मुसलमानों की एकता ने हामिद खाँ को किस सीमा तक प्रभावित किया ? 
उत्तर- लेखक ने हामिद खाँ को बताया कि भारत में हिंदू-मुसलमान मिलजुलकर रहते हैं। उनके बीच आपस में दंगे नहीं के बराबर होते हैं। हिंदुओं को अगर बढ़िया चाय पीनी होती है या बढ़िया पुलाव खाना होता है तो वे मुसलमानों के होटल में जाते हैं । हिंदू-मुसलमानों द्वारा एक साथ दोनों के पर्व-उत्सव मनाने तथा देवालय-मस्जिद बनाने जैसी गतिविधियाँ तक्षशिला में नहीं दिखाई देती थीं। तक्षशिला के हिंदू मुसलमानों के साथ सद्व्यवहार नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में मुसलमान आततायियों की औलादें हैं और अपनी इस दूषित छवि को मिटाने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता था। वस्तुतः हामिद खाँ को भी यही अपेक्षा थी कि उसके देश में भी मानवीय मूल्यों का विकास तथा सभी जातियाँ प्रेमपूर्वक आपस में मिलजुल कर रहें। 
14.  'हामिद खाँ' पाठ के अनुसार ईमानदारी और प्रेम मानवीय रिश्तों को कैसे प्रभावित करते हैं ? 
उत्तर- हामिद खाँ ने तक्षशिला के पौराणिक खंडहरों को देखने के लिए आए लेखक के साथ एक अच्छे मित्र का बर्ताव करते हुए बड़ी ईमानदारी से मित्रता का नाता निभाया। लेखक द्वारा हामिद खाँ के होटल में किए गए भोजन का मूल्य चुकाए जाने पर हामिद खाँ ने उसे लेने से इंकार कर दिया एवं लेखक से आग्रह किया कि वे भारत जाकर किसी मुसलमानी होटल में चाय और बिरयानी का आनंद लेते हुए हामिद खाँ की मित्रता को याद रखें। इस प्रकार रिश्तों के निर्वाह में निपुण हामिद खाँ ने मुसलमान होते हुए भी हिंदू मित्र के साथ बड़ी ईमानदारी से सच्ची मित्रता का नाता निभाया। धर्म के नाम पर ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव करते हुए यदि वह मित्रता का फर्ज न निभाता तो कदाचित लेखक भी उसे भूल जाते ओर बरसों बाद आगजनी की खबर सुनकर मन ही मन मित्र हामिद खाँ की सलामती की दुआ न माँगते।
15. हामिद खाँ ने लेखक की किस बात का विश्वास नहीं किया और क्यों ? स्पष्ट कीजिए । लेखक के द्वारा दिए गए उत्तर से हमें क्या सीख मिलती है ? बताइए। 
उत्तर- जब लेखक ने बड़े गर्व के साथ यह कहा कि भारत में हिंदू मुसलमानों में कोई फर्क नहीं है। सब मिल-जुलकर रहते हैं। भारत में मुसलमानों ने जिस पहली मस्जिद का निर्माण करवाया था वह भी उन्हीं के राज्य में स्थित है हामिद खाँ को उनकी बातों पर पहले तो विश्वास नहीं हुआ। फिर उसने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि वह स्वयं उनके मुल्क में आकर हिंदू मुसलम की एकता का नजारा अपनी आँखों से देखना चाहता है। हामिद खाँ के मुल्क में हिंदू मुसलमानों की एकता का दृश्य तो दिखाई ही नहीं देता क्योंकि हिंदू उन्हें आतातायियों की औलादें कहते हैं और मुसलमानों को भी अपनी आन बचाने के लिए लड़ना पड़ता है। लेखक की गर्वोक्ति से यही शिक्षा मिलती है कि धर्म के नाम पर मानवमात्र में भेदभाव करना उचित नहीं है। परस्पर एकता, सद्भाव और भाईचारा ही हमारे देश भारत की पहचान है। लेखक को अपने भारतवासी होने पर गर्व था और उन्होंने बड़े गर्व के साथ अपने देश की इस विशेषता को हामिद खाँ के समक्ष प्रकट किया। 
16. 'काश में आपके मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता'- हामिद ने ऐसा क्यों कहा ? 
उत्तर- हामिद खाँ ने लेखक के मुल्क (भारत) आकर स्वयं अपनी आँखों से हिंदू-मुसलमानों की मित्रता का भव्य दृश्य देखने की चाह इसलिए व्यक्त की क्योंकि उसे लेखक की बातों पर विश्वास नहीं था। लेखक जिस आत्मविश्वास से मुसलमानों की प्रशंसा कर रहे थे, हिंदुओं के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार की चर्चा कर रहे थे, वैसा तक्षशिला और निकटवर्ती गाँव में कोई भी हिंदू किसी मुलसमान से नहीं कह सकता था। हिंदुओं की नज़र में मुसलमान आततायियों की औलादें थीं। ऐसी हालत में मुसलमानों को भी अपनी आन की हिफ़ाज़त के लिए लड़ना पड़ता था। लेखक उसके कथन के पीछे छिपी सच्चाई को भली-भाँति समझ गए।
17. 'आगजनी' शब्द से क्या तात्पर्य है ? आपके विचार से तक्षशिला में आगजनी होने का क्या कारण हो सकता है ? लेखक ने आगजनी में हामिद खाँ की दुकान बची रहने की प्रार्थना ईश्वर से क्यों की ? आप लेखक की जगह होते तो क्या करते और क्यों ? 
उत्तर-  'आगजनी' का अर्थ होता है आग लगाना। इसका तात्पर्य वास्तव में दंगो, झगड़ों या विरोध प्रदर्शन में आग लगाकर किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या किसी के पुतले को जलाना इत्यादि। 'तक्षशिला' में आगजनी का मुख्य कारण वहाँ फैले सांप्रदायिक भेदभाव या धर्म के नाम पर परस्पर विरोधी प्रदर्शन हो रहा होगा। वहीं हिंदुओं और मुसलमानों में परस्पर मतभेद पाया जाता है। धर्म के नाम पर ये लोग आपस में लड़ते हैं। एक-दूसरे के धर्म को अपमानित किया जाता है। वहाँ आपसी मेल-जोल न के बराबर है। 'हामिद खाँ' पाठ में इस प्रकार के भेद-भाव की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। वहाँ हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे का आदर नहीं, अनादर करते हैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सभी उँगलियाँ बराबर नहीं होती, यानी यह जरूरी नहीं कि सभी हिंदुओं और मुसलमानों में शत्रुता का भाव हो। 'हामिद खाँ' एक मुसलमान था और लेखक था एक हिंदू परंतु दोनों के संबंध आत्मीयतापूर्ण थे। जब लेखक समाचार पत्र में तक्षशिला की आगजनी की खबर पड़ता है तो उसे हामिद खाँ का ही ख्याल आता है। वह उसे अपना मित्र समझता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि इस आगजनी में हामिद खाँ और उसके होटल को कोई नुकसान न हुआ हो। ऐसा व्यक्ति उसी के लिए सोचता है, जो आपका प्रिय हो, जिसके लिए आपके मन में प्यार हो। यदि हम लेखक की जगह होते तो हम भी सोचते जो लेखक की सोच थी। हामिद खाँ जैसे व्यक्ति के लिए किसी के भी मन में प्यार उमड़ना या उसकी चिंता करना स्वाभाविक है । 
 18. 'सांप्रदायिकता' और 'धर्म निरपेक्षता' में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- विभिन्न धर्मों में परस्पर भेदभाव, दंगे-फसाद, लड़ाई-झगड़ा होना सांप्रदायिकता है। जहाँ पर लोग धर्म के नाम पर विरोध प्रदर्शन करते हैं, एक-दूसरे के धर्म का अपमान करते हैं या फिर धर्म के नाम पर आगजनी और दंगे करते हैं, वहाँ सांप्रदायिकता प्रबल हो जाती है। इससे समय तथा धन दोनों को ही बरबादी होती है। लोग धर्म की आड़ में अपना फ़ायदा उठाकर धर्म को बदनाम करते हैं। सांप्रदायिक दंगों से कभी किसी का भला नहीं होता। सांप्रदायिकता सदैव विनाश को जन्म देती है। सांप्रदायिकता के नाम पर लड़ने वाले लोग देश की उन्नति को बात को भूलकर स्वयं को ऊपर उठाने की कोशिश करते हैं।
19. 'हामिद खाँ' पाठ के माध्यम से लेखक ने क्या समझाने का प्रयास किया है ? 
उत्तर- प्रस्तुत पाठ हमें हिंदू-मुस्लिम एकता का पाठ पढ़ाता है। हामिद खाँ एक मुसलमान है। वह तक्षशिला का रहनेवाला है। वह हिंदू मुस्लिम के मतभेदों को लेकर दुखी है। लेखक से बातें करने पर वह सहज भाव से इस बात को स्वीकार नहीं कर पाता कि हिंदुस्तान में हिंदू-मुसलमानों में कोई भी भेद नहीं किया जाता। तक्षशिला में हामिद खाँ के होटल में लेखक खाना खाने जाता है, उनकी इसी मुलाकात से दोनों के हृदय में एक-दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना प्रकट होती है। लेखक ने भी पाया कि सभी जगह मानव की समस्याएँ और संवेदनाएँ समान होती हैं। हामिद खाँ चाहता है कि सभी एक-दूसरे के साथ मुहब्बत से रहें तो सहयोग, भाईचारा बढ़े। आपसी, द्द्वेष समाप्त हो जाए, सभी मिल-जुलकर रहें, क्योंकि हम किसी पर धौंस जमाकर प्यार नहीं पा सकते।

Wednesday, 9 February 2022

Class 10 Kavita Ki Vyakhya Utsah, Poet Suryakant Tripathi 'Nirala'/पाठ -5 उत्साह, अट नहीं रही है कविता की व्याख्या,लेखक -सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला '

पाठ -5 उत्साह .
लेखक -सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' ( 1899-1961 ) 
कवि-परिचय :
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म बंगाल में मेदिनीपुर जिले के महिषादल गाँव में हुआ था। उनका पितृग्राम गढ़ाकोला (जिला उन्नाव) है। इनकी विधिवत स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक हुई थी। पत्नी की प्रेरणा से ही इनकी साहित्य और संगीत में रुचि पैदा हुई । इनका जीवन दुखों और संघर्षों से भरा हुआ था। छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ निराला के साहित्य-संसार में भारतीय इतिहास, दर्शन और परंपरा का व्यापक बोध होता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति का विराट तथा उदात्त चित्र, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता तथा दार्शनिकता दृष्टिगोचर होती है। इन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। एक ओर इनकी कविताओं में शोषित, उपेक्षित, पीड़ित और प्रताड़ित जन के प्रति गहरी सहानुभूति का भाव मिलता है, वहीं शोषक वर्ग और सत्ता के प्रति आक्रोश का भाव भी दृष्टिगोचर होता है। 
रचनाएँ – ' परिमल , गीतिका, अनामिका, तुलसीदास , कुकुरमुत्ता ,अणिमा ,नए पत्ते, बेला, अर्चना ,  आराधना, गीतगुंज  इत्यादि। इनका संपूर्ण साहित्य 'निराला रचनावली' के आठ खंडों में प्रकाशित है। 
I- उत्साह 
पाठ-परिचय : 'उत्साह' कविता में कवि ने बादल को क्रांति दूत मानकर उसका आह्वान किया है कि वह अपनी पौरुषमयी गर्जना से समस्त आकाश को गुंजायमान दे । कवि ने काले घुँघराले बालों तथा बाल कल्पनाओं के समान पालित मानकर उसे नव - जीवन प्रदान करने वाले कवि का रूप भी प्रदान किया है । 

काव्यांश: 
1. बादल, गरजो !
घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ ! 
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के से पाले, 
विद्युत छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले ! 
वज्र छिपा, नूतन कविता 
फिर भर दो-
बादल गरजो !

शब्दार्थ गरजो - गर्जना करो , घेर - बेर - घिर - घिरकर ; चोर - अत्यधिक गगन - आकाश : धाराबर - बादल ; ललित सुंदर विद्युत छवि बिजली की चमक , उर हृदय , वज्र कठोर , भीषण ; नूतन - नई । 
भावार्थ : प्रस्तुत कविता में कवि ने बादल के बारे में लिखा है । कवि बादलों से गरजने का आह्वान करते हुए कहता है कि हे बादल! तुम चारों ओर से घिर-घिरकर घोर ढंग से गरजो । कवि का कहना है कि बादलों की रचना में एक नवीनता है । काले काले घुंघराले बादलों का अनगढ़ रूप ऐसा लगता है जैसे उनमें किसी बालक की कल्पना का विस्तार समाया हुआ है । तुम्हारे हृदय में बिजली की आभा है , चमक है । तुम नये जीवन का संचार करने वाले हो । तुम्हारे अंदर वज्र की अपार शक्ति मौजूद है । उन्हीं बादलों से कवि कहता है कि वे पूरे आसमान को घेर कर घोर ढंग से गर्जना करें । किसी कवि की नयी कविता की तरह बादल के हृदय में असीम ऊर्जा भरी हुई है । इसलिए कवि बादलों से कहता है कि वे किसी नई चेतना की रचना करके सबको असीम ऊर्जा से भर दें । 

2. विकल विकल, उन्मन थे उन्मन 
विश्व के निदाघ के सकल जन, 
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन 
तप्त घरा, जल से फिर 
शीतल कर दो 
बादल, गरजो ! 
शब्दार्थ: विकल - परेशान / व्याकुल उन्मन- अनमनेपन का भाव ; निदाघ गर्मीः सकल - सब अज्ञात - जिसका पता नहीं ; अनंत - जिसका अंत न हो आसमान ; घन - बादल , तप्त - तपती हुई ; घरा - घरती शीतल ठंडा 
भावार्थ- इन पंक्तियों में कवि ने लिखा है कि बादल बरसने के लिए व्याकुल थे । विश्व के सभी लोग तपती गर्मी से घिर आए और कवि उन बादलों से कहता है कि तपती धरती को वे अपने जल से शीतल कर दें । सभी का पीड़ा बहाल थे और उनका मन उदासान था । वे तुम्हारा गाए बैठे थे । ऐसे में कई दिशाओं में क्रांति रूपी बादल समाप्त हो और वे सुख का अनुभव करें । 
 कविता का प्रतिपाद्य:
प्रस्तुत कविता में कवि ने बादल का आह्वान किया है । कवि ने बादल के अनेक रूप प्रस्तुत किए हैं । कभी उसके झूमन और कोमलता का चित्रण करता है , तो कभी नचात में कवि बादलों से लोक - मंगलकारी रूप धारण करने की प्रार्थना करता है । कवि बादलों की बाधित करते हुए कि है बादल धना गर्जना कर सार आकाश का भर दो अयंत गगन का कोई कोना कठोर गर्जना करते हुए पृथ्व जल बरसाआ आकाश में फेल हुए बादल अपना कालता का सुंदर और दुल है । काली - काली बदलियों काल घुघराल बाला के समान शाम हो रहा है । पनाति है । बीम का देख का का लगता है कि जैसे बदला ने अपने हृदय में बिजली की कठिाया हुआ था । शीतलता प्रदान करने वाली परोपकारता है । दिल करते है कि अपनी जैसी कठोरता को छिपा कर एक नवीन कविता से आकाश काका मानना है कि कपल का काम चल वाला नहीं है । बादल की नई - नई वाहन के लिए चल रहा लिए । नवजीवन देने वाले हैं । कवि निराला अपने जीवन में भी बादल की  डरता , बिजली जैसी ओजस्विता और विप्लव और आवश्यक होते है ।

II- अट नहीं रही है 
पाठ परिचय :  इस कविता में कवि निराला फागुन मास की शोभा और मस्ती का वर्णन करते हुए कहते हैं - फागुन मास का सौंदर्य इतना अधिक है कि वह भीतर समा ही नहीं पा रहा व भार छलक छलक पर पड़ता है। 

1. अट नहीं रही है 
आभा फागुन की तन 
सट नहीं रही है। 
कहीं साँस लेते हो, 
घर-घर भर देते हो, 
उड़ने को नभ में तुम 
पर-पर कर देते हो, 
आँख हटाता हूँ तो 
हट नहीं रही है।
शब्दार्थ : अट- समाना ; आभा- चमक ; फागुन- फाल्गुन महीना ; नभ- आकाश ; पर- पंख। 
भावार्थ :  प्रस्तुत कविता में कवि ने फागुन महीने की सुंदरता का बखान किया है। वसंत ऋतु का आगमन हिंदी के फागुन महीने में होता है। ऐसे में फागुन की आभा इतनी अधिक है कि उसकी सुंदरता कहीं समा नहीं पा रही है। कवि कह रहा है कि हे फागुन ! जब तुम साँस लेते हो, तब अपनी साँस के साथ सारे वातावरण को सुगंधित कर देते हो अर्थात अपनी खुशबू से हर घर को महका देते हो। कभी ऐसा लगता है कि आसमान में उड़ने के लिए फागुन अपने पंख फड़फड़ाता है। कहने का अर्थ है कि फागुन की बयार अपने संग फागुन की सुंदरता को सबके सामने लाकर खड़ी कर देती है। कवि उस सौंदर्य से अपनी आँखें हटाना चाहता है, लेकिन उसकी आँखें हट नहीं रही हैं।

2.पत्तों से लदी डाल 
कहीं हरी, कहीं लाल, 
कहीं पड़ी है उर में 
मंद-गंध-पुष्प-माल, 
पाट-पाट शोभा-श्री 
पट नहीं रही है।
शब्दार्थ: लदी– बोझिल ; उर– हृदय ; मंद- धीरे ; गंध - सुगंध ; पुष्पमाल- फूलों की माला ; पाट-पाट - जगह-जगह ; शोभा- श्री सौंदर्य से भरपूर ; पट नहीं रही- समा नहीं रही। 
भावार्थ - कवि की आँखें फागुन महीने की सुंदरता को देख अघाती नहीं। वह अपनी नज़र इससे हटा नहीं पाता। पेड़ो पर नए पत्ते निकल आए हैं। उनकी डालियाँ पत्तों से लद गई हैं, जो कई रंगों के हैं। कहीं हरे पत्ते हैं, तो कहीं लाल कोंपलें। लगता है कि कहीं-कहीं कुछ पेड़ों के गले में भीनी-भीनी खुशबू देने वाले फूलों की माला लटकी हुई है। हर तरफ सुंदरता बिखरी पड़ी है और वह इतनी अधिक है कि धरा पर समा नहीं रही है। 
कविता का प्रतिपाद्य:
फागुन की आभा का मानवीकरण करते हुए निराला जी कहते हैं कि फागुन की शोभा सर्वव्यापक है। वह प्रकृति और तन-मन में समा नहीं पा रही है। उसका प्रभाव सभी पर देखा जा सकता है। फागुन में साँस लेते हो। चारों ओर का वातावरण सुगंधित हो उठता है। मन उल्लास से भर उठता है। चारों ओर फागुन का सौंदर्य झलकता है। फागुन की सुगंधित मादकता व्यक्ति को कल्पना के पंख लगाकर गगन के विस्तार में उड़ने को उत्साहित करती है। कवि की आँखें फागुन की सुंदरता से अभिभूत हैं। अतः वह इससे अपनी नज़रें हटा नहीं पाता है। फागुन की सुंदरता की व्यापकता के दर्शन पेड़, पत्ते, फूलों आदि में हो रहे हैं। वृक्षों की डालियाँ हरे-हरे पत्तों से लदने लगी हैं। कहीं हरी तो कहीं लाल आभा प्रतिबिंबित हो रही है। हृदय पर धीमी-धीमी सुहासित पुष्पों की माला शोभायमान हो रही है। समस्त प्रकृति फल-फूलों से लद गई है और इसका प्रभाव लोगों के तन-मन पर भी देखा जा सकता है। सारा वातावरण पुष्पित व सुगंधित हो गया है। चारों ओर फागुन की शोभा झलक रही है। सृष्टि का कण-कण उत्साह व उमंग से भर गया है। फागुन की शोभा जगह-जगह छा गई है, वह समाए नहीं समाती। इस कविता में निराला जी फागुन के सौंदर्य में डूब गए हैं, उनमें फागुन की आभा रच गई है। ऐसी आभा, जिसे न शब्दों से अलग किया जा सकता है, न फागुन से।