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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Saturday, 17 April 2021

VRUTHA MT LO BHARAT KA NAAM ....KAVITA KA BHAV ...वृथा मत लो भारत का नाम (KAVITA)/कविता का भाव : रामधारी सिंह 'दिनकर'


कविता 

मानचित्र पर जो मिलता है, --------------वृथा मत लो भारत का नाम। 

कविता का भाव : प्रस्तुत कविता में राष्ट्रकवि कवि 'रामधारी सिंह दिनकर' जी भारत के प्रति अपने प्रेम की व्यक्त करते हुए  कहते हैं

- कि हमारे भारत का नाम व्यर्थ ही बदनाम मत करो। संसार के मानचित्र पर जो भारत नजर आता है, वह तो केवल भारत का एक भौगोलिक रूप है। 

-भारत वह भाव है जिसे मनों में स्थापित करना चाहिए यानी प्रत्येक भारतवासी को अपने मन में इसे भाव स्थापित  करना चाहिए। भारत  को मन में स्थापित करे भूमि में नहीं।  

-कवि कहते हैं कि भारत एक ऐसा सपना है जो यहाँ रहने वाले भूवासियों को उन्नति के मार्ग पर ले जाने वाला है। उसी तरह भारत एक ऐसा विचार है जो स्वर्ग को भूमि पर लाता है। 

-भारत में ऐसी शक्ति है इसकी भावनाओं और दर्शनों में मनुष्यों को या संसार को जगाने की शक्ति है। 

-भारत एक भाव है जो हर मनुष्य हर भारतवासी के मन में जगता है अर्थात भारत को आगे ले जाने वाली भावना हर भारतीय के मन में भाव बन कर जगती है । 

-भारत संसार रूपी तालाब में खिला एक ऐसा कमल है जिस पर कोई जल का दाग भी नजर नहीं आता। 

-कवि यह कहना कहते है कि जिस प्रकार कमल कीचड़ में उगता है पर फिर भी उस पर कीचड़ का एक अंश तक नहीं दिखता। 

-उसी प्रकार अपने-आस शत्रुओं से घिरे भारत पर उन सब ने दाग लगाने का बहुत प्रयास किया पर वे सफल नहीं हुए और भारत कमल की भाँति अपनी शोभा बिखेरता रहा। 

-कवि कहते हैं कि भारत एक ऐसा ठहराव है जहाँ आकर मनुष्य अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है। 

-भारत एक ऐसी भावना है, जो हर मनुष्य को त्याग की  सीख या प्रेरणा देता है। यह एक ऐसी कल्पना,ऐसी भावना  है जो  मनुष्य को राग और द्वेष से मुक्त करती है। 

-भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रेम के स्वर बहते हैं। यहाँ की एकता अखंडित है। यहाँ अलग-अलग धर्मों के होने के लोग  रहते हैं फिर भी उनमें एकता की भावना है। भारत को इसी एकता ने जोड़ कर रखा है। 

-इसी  एकता की भावना से  हर भारतवासी ओत-प्रोत है। भारत को कवि जीवित सूर्य की संज्ञा दे रहें हैं क्योंकि भारत ने ही पूरे विश्व में प्रेम व  एकता का प्रसार किया है और सूर्य के समान ज्ञान की रोशनी फैलाई है। 

-वर्षों से भारत के लोगों ने जीवन को साधना मान कर तपस्या की है, वह जीवन को लेकर किसी भ्रम में नहीं है। 

-इस धरती पर बड़े-बड़े महाऋषियों और महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने जीवन-साधना और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग बताए हैं। यह ऐसी पवित्र धरती है जहाँ तीन महान नदियों  संगम हुआ है। 

-इस पवित्र धरती पर त्याग की भावना से परिपूर्ण लोग रहते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए अपना जीवन तक त्याग देते हैं।

 -भारत एक ऐसा देश है जहाँ सब रिश्तों में प्रेम है और आदर है। अंत में कवि यही कहते हैं ऐसे भारत को ऐसी पवित्र धरती को प्रणाम करो। 

-कवि यही प्रार्थना करते हैं सभी से कि बेकार में भारत का नाम बदनाम न करो। सभी भारतीयों को अपने देश और इस धरती पर जन्म लेने पर गर्व करना चाहिए।   

संक्षेप में : कवि कहते हैं कि वास्तविक भारत तो मानव के मस्तिष्क में रहनेवाली वह विचारधारा है, जो मानव-मात्र के आचार-व्यवहार में प्रेम, करुणा, विनय, सौहार्द एवं अपनतत्व भरकर धरती पर स्वर्ग का सृजन कर देती है । 

भारत मनों में बसने वाला एक भाव है और भारत में रहने वाले प्रत्येक भारतवासी को अपने-आप को भारतीय कहलाने पर गर्व महसूस होता है। 

भारत ऐसा कोई देश जिस में कोई दाग नहीं है , यह एक पवित्र  देश है। 

हमारे भारत में बहुत-सी पवित्र नदियाँ बहती हैं। यहाँ बहुत से पवित्र स्थल । भारत पूरे विश्व में समानित है। 

भारत एक ऐसा देश है जिसमें एकता है , भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति रिश्तों का बहुत आदर करते हैं और यहाँ के सब रिश्तों में प्रेम है । भारत के लोगों एक-दूसरे के प्रति त्याग भावना है । ऐसे महान भारत को प्रणाम 

कविता से संबंधित प्रश्न-उत्तर:

1.भारत की एकता के बारे में कवि के क्या विचार हैं ?

उत्तर- कवि के अनुसार भारत की एकता अखंड है। इस एकता के बल पर भारत ने विश्व पर विजय पाई है। यहाँ हर धर्म, जाति के लोग भाई-बंधुओं की तरह मिलकर रहते हैं और समय आने पर सभी देशवासी एक होकर अपने देश के लिए जान भी देने के लिए तैयार रहते हैं। भारत के कण-कण में प्रेम बसता है। 

2. कविता में भारत को किस प्रकार का जलज कहा गया है ?

उत्तर- कवि ने भारत को जलज के समान उज्ज्वल बताया है। जिस प्रकार कमल के कीचड़ में खिलने के बावज़ूद भी उस पर जल या कीचड़ का दाग नहीं होता उसी प्रकार भारत अंदर से और बाहर से कई शत्रुओं से घिरा है पर वे चाहकर भी भारत की छवि को खराब नहीं कर पाए और न ही उस पर कोई दाग लगा पाए। 

Friday, 16 April 2021

NCERT Solutions for Class 9........... दुःख का अधिकार Question-Answers

दुःख का अधिकार

अति लघु प्रश्न 

1. हमारे समाज में क्या देखकर किसी व्यक्ति का स्तर निर्धारित किया जाता है ?

उत्तर- हमारे समाज में व्यक्ति की पोशाक देखकर उसका स्तर निर्धारित किया जाता है । उसकी पहचान उसकी पोशाक से ही होती है, क्योंकि वही उसे अधिकार व दर्जा दिलाती है । 

2. पोशाक कब बंधन बनकर अड़चन डाल देती है ? 

उत्तर- जब हम समाज को निम्न श्रेणी के दुःख को देखकर झुकना चाहते हैं अर्थात् दुःख का कारण जानना चाहते हैं, उनसे खुलकर बातें करना चाहते हैं , तब पोशाक बंधन बनकर अड़चन डाल देती है। 

3. लोगों का व्यवहार बुढ़िया के साथ कैसा था ? 

उत्तर- बुढ़िया घुटनों में मुँह छिपाकर रो रही थी। बाजार में खड़े लोग उसकी दयनीय स्थिति से अनजान बनकर उसे धिक्कार रहे थे तथा तरह-तरह की बातें बना रहे थे । 

4. लेखक ने बुढ़िया के दुःख का कारण किस प्रकार पता लगाया ? 

उत्तर- लेखक ने पास-पड़ोस की दुकानों से पूछकर पता लगाया कि उसका तेईस साल का जवान लड़का भगवाना सौंप के काटने से मर गया था। वही एकमात्र कमानेवाला सदस्य था । आर्थिक तंगी ने उसे ऐसा करने पर विवश किया था । 

5. ' जिंदा आदमी नंगा भी रह सकता है' पंक्ति में निहित व्यंग्य को स्पष्ट करें। 

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति में व्यग्य निहित है । जीवित रहते जो लोग फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं, उन्हें मरने पर नया कफन देना आवश्यक नहीं है। मनुष्य को इस रूढ़िवादी परंपरा को नहीं मानना चाहिए क्योंकि जीते जी व्यक्ति को स्वच्छ वस्त्रों की आवश्यकता होती है, मरने पर नहीं। 

6. बुढ़िया के हाथों का छन्नी-ककना क्यों बिक गया ? 

उत्तर- बुढ़िया के बेटे की मृत्यु हो गई थी। उसके अंतिम संस्कार के लिए नया कपड़ा खरीदना आवश्यक था। इसलिए बुढ़िया के हाथों का छन्नी-ककना बिक गया ।

लघु प्रश्न 

1. भगवाना की मृत्यु का क्या कारण था ? 

उत्तर- भगवाना प्रतिदिन खेतों पर जाता था । एक दिन एक साँप पर उसका पैर पड़ गया । साँप ने उसे डस लिया । उसे बचाने के अनेक प्रयास किए गए, परंतु वह बच नहीं पाया। 

2. समाज में किस आधार पर एक मनुष्य का दर्जा निश्चित किया जाता है ?

उत्तर- समाज में मनुष्य का दर्जा उसकी पोशाक निश्चित करती है। पोशाक ही मनुष्य को  विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती है । पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और दर्जा भी निश्चित करती है। 

3. पोशाक कब मनुष्य के लिए बंधन या अड़चन बन जाती है ? 

उत्तर- कई बार जब पोशाक बहुत अच्छी तथा मनुष्य के स्तर अनुसार होती है । ऐसे समय में यदि वह निचली श्रेणी के लोगों से मिलना भी चाहें तो बीच में पोशाक बाधा बनकर उसे झुकने से रोकती है । 

4. लेखक बुढ़िया के दुख का कारण किस प्रकार जान पाया ? 

उत्तर- लेखक ने जब बुढ़िया  को घुटनों में मुँह छिपाकर फफक-फफककर रोते देखा तो आसपास के लोगों से उसके रोने का कारण पूछा । लोगों ने लेखक को बताया कि उसका तेईस साल का लड़का भगवाना मृत्यु को प्राप्त हो चुका है । तभी लेखक बुढ़िया के दुख का कारण जान पाया ।

 5. मुर्दे को नंगा विदा नहीं किया जा सकता । स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर- मुर्द को नंगा विदा इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि यह उसके जीवन की अंतिम यात्रा है । जीते जी तो मनुष्य के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं। मगर मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता । इसलिए आखिरी बार मृतक को नए वस्त्र ( कफन ) पहनाए जाते हैं । 

6. बाजार के लोगों की बुढ़िया के प्रति क्या प्रतिक्रिया थी ? 

उत्तर- बाजार के लोगों का बुढ़िया के प्रति व्यवहार अमानवीय था । वे उसके दुख को समझने की बजाय उस पर तानाकशी कर रहे थे । सूतक के कारण कोई उसके खरबूजों को हाथ भी नहीं लगा रहा था । अधिकतर लोगों का यही मानना था कि बेटे के मरने के बाद यह इतनी जल्दी दुकान क्यों लगाने लगी । 

7. भगवाना को बचाने के लिए बुढ़िया ने क्या प्रयास किया था ? 

उत्तर- भगवाना को बचाने के लिए उसकी माँ झाड़-फूँक करने वाले ओझा को बुलाकर लाई । नागदेवता की पूजा भी करवाई गई । आटे तथा अनाज को दान-दक्षिणा भी दी गई ताकि भगवाना बच जाए । परंतु दुर्भाग्यवश वह बच न पाया । 

8. भगवाना किस प्रकार निर्वाह करता था ? 

उत्तर- भगवाना प्रतिदिन डेढ़ बीघा जमीन पर कछियारी करने जाता था । इस काम से उसे जो भी पैसे मिलते थे, उसी से उसकी जीविका चलती थी । भगवाना अकेला ही अपने परिवार का निर्वाह करता था । वही था केवल परिवार में कमाने वाला ।

निबंधात्मक प्रश्न 

1. बुढ़िया माँ का चरित्र-चित्रण कीजिए । 

उत्तर- भगवाना की बुढ़िया माँ अति निम्नवर्ग की सीधी-सादी, परिवार और पुत्र के प्रति प्रेम और ममता रखने वाली साधारण स्त्री है। अभाव और अंधविश्वासों से घिरे होने के कारण वह भगवाना का इलाज नहीं करवा सकी और ओझा के झाड़-फूँक  के चक्कर में फँसकर अपने बेटे को गँवा बैठी । उसके मन में पुत्रवधू और पोता - पोती के लिए अपार स्नेह और ममता है । कर्तव्यनिष्ठा की भावना से वह दूसरे ही दिन बाज़ार में खरबूजे बेचने चली आई । वह लोगों की जली-कटी बातों को चुपचाप आँसू बहाते हुए सुनती रही । बहू की बीमारी की चिंता ने उसे कठिन परिस्थितियों से लड़ने और जूझने की शक्ति प्रदान की । सामाजिक नियमों की रक्षा के लिए उसने हाथों की छन्नी-ककना बेच कर भगवाना को विदा किया । नाग देवता की पूजा कर देवी-देवताओं के प्रति विश्वास जताया परंतु समाज के लोगों ने उसके दुख-दर्द तथा दयनीय स्थिति को नहीं समझा और उसके कर्तव्यबोध की भावना पर ताने कसे । 

2  क्या आप इस कवन से सहमत हैं कि भगवाना की बूढ़ी माँ समाज में व्याप्त अंधविश्वासों का शिकार बनी । 

उत्तर- हाँ, यह कथन कहानी के संदर्भ में पूरी तरह से सार्थक प्रतीत होता है । जैसे ही बुड़िया माँ को पता चला कि भगवाना को साँप ने काटा है वह बावली होकर ओझा को बुला लाई तथा झाड़-फूँक करवाया और नाग देवता की पूजा करवाई । घर में जो कुछ आटा अनाज था, दान-दक्षिणा में चला गया । इसके स्थान पर यदि बुढ़िया भगवाना को अस्पताल ले जाती या किसी डॉक्टर के पास ले जाती तो कदाचित साँप का जहर निकाल देने तथा समय पर उचित इलाज मिलने से भगवाना की जान बच सकती थी । परंतु अज्ञानता और धन की कमी के कारण गरीब लोग अंधविश्वासों में जकड़े रहते हैं और जीवन गँवा बैठते हैं । 

3 धनी और निधन के शोक मनाने में क्या अंतर होता है ? 

उत्तर- शोक धनी और निर्धन दोनों को तोड़ देता है । शोक से संतप्त होकर धनी और निर्धन दोनों ही आँसू बहाते हैं परंतु लेखक ने इस सत्व को बड़े ही मार्मिक ढंग से उजागर किया है । सुविधा-संपन्न अमीरों को तो शोक मनाने के लिए असवर मिल जाता है परंतु गरीबों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे घर बैठकर शोक मनाएं । यदि वे काम पर नहीं जाएँगे तो भला क्या खाएँगे और क्या खिलाएँगे ? शोक के समय निर्धन लोग भूखे मरने की स्थिति पर पहुँच जाते हैं इसलिए वे चाहकर भी अपना दुख-दर्द नहीं जता सकते । धनी लोगों के पास समय और साधन की कमी नहीं होती है इसलिए वे शोक मनाने का अधिकार रखते हैं । 

4 . भगवाना की बुढ़िया माँ के प्रति लेखक चाहकर भी सहानुभूति क्यों नहीं जता सके ? 

उत्तर- बाज़ार के फुटपाथ पर खरबूजे बेचने के लिए बैठी भगवाना की बुढ़िया माँ  के दुख-दर्द को जानकर लेखक उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करना चाहते थे, परंतु वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाए । उनकी कसी हुई पोशाक फुटपाथ पर नीचे बैठकर सहानुभूति जताने में बाधक बन गई । आस-पास खड़े लोग बुढ़िया को गालियाँ दे रहे थे । कोई उसे 'बेहया', कोई 'धर्म-ईमान भ्रष्ट करने वाली ' तो कोई ' रोटी के टुकड़े पर जान देने वाली ' कहकर ताने दे रहे थे । लेखक भी समाज के उन लोगों से भयभीत होकर मन ही मन उसके दुख-दर्द का अंदाज़ा लगाते रहे परंतु उसके पास जाकर उसकी मदद नहीं कर पाए ।


Thursday, 15 April 2021

लो यह उपहार/पुत्र-प्रेम .........LO YAH UPHAR/PUTRA PREM .......(SHORT STORY)

लो यह उपहार
हिमाचल  के कांगड़ा  जनपद में बहुत पहले एक साहूकार सोहन लालसेठ जी रहते थे। 
 सोहन लालसेठ जी की एक आदत बहुत ही विचित्र  थी । 
वह कहीं रास्ते से कहीं जा रहे होते थे और  उस राह में  अगर उन्हें कहीं अनाज के दाने बिखरे पड़े मिलते, तो वह बस वहीं  रुक जाते। 
और वहीं बैठकर उन अनाज के दानों को  बिनने लगते, एक-एक कर उन्हें उठाते ।  
वे तब तक आगे नहीं बढ़ते थे, जब तक एक-एक दाना न उठा लेते थे । 
धीरे-धीरे सेठ सोहन लाल  की दौलत दिन पर दिन बढ़ती गई।  
 वह सेठ इतने अमीर हो गए कि उन्हें लोग सोहन सेठ की जगह सोहन राजा कहने लगे।  
 कई बार लोग सेठ से पूछते थे कि -"आपके पास भगवान का दिया सब कुछ है सेठ जी  फिर भी आप मुट्ठी भर अनाज के लिए रास्ते में क्यों रुक जाते हैं  ?" 
सेठ कहते  -  कि अन्न तो देवता है। वह हमें बल देता है। मैं अन्न देवता  का अपमान होते नहीं देख सकता। " 
कई बार सेठ जी लोगों को एक कहानी सुनाया करते थे। 
सेठ जी कहते कि धरती पर मनु नाम के राजा थे। वह अपनी प्रजा को संतान की तरह मानते थे। 
प्रजा को सुखी रखने और उन्हें खुश देखने के लिए वे हर तरह के उपाय किया करते थे। 

एक बार विधाता ने मनु को दर्शन दिए। विधाता ने कहा - "हे  राजन, मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें कुछ उपहार देना चाहता हूँ। 
उपहार भी ऐसा जो तुम्हें पसंद हो। विधाता बोले -तुम्हें क्या चाहिए ?"

महाराज मनु बोले - हे प्रभु! आपके दर्शन हुए, इससे बढ़कर भला क्या? 

बस आपका आशीर्वाद  सदा बना रहे, यही मेरे लिए काफ़ी है।"

 विधाता ने ऊपर की ओर हाथ उठाया । 

हाथ ऊपर उठाते ही उनके हाथ में एक चमचमाती  तलवार आ गई  । 

तलवार आगे बढ़ाते हुए विधाता बोले-"राजन, यह तलवार लो । 

इस  तलवार से अपने आसपास के राजाओं को तुम जीत सकते हो । उन्हें जीत कर तुम उनके राज्य को अपने राज्य में मिला सकते हो और भलाई के कार्य करके वहाँ की प्रजा को भी सुखी करो ।" 

मनु महाराज विधाता से बोले - "भगवन, अगर मैं किसी पड़ोसी राज्य करता हूँ तो उन  पर चढ़ाई करने से दोनों ओर के सैनिक मारे जाएँगे। खून-खराबा होगा। फिर राज्य को जीतकर मैं क्या करूँगा ?

 मैं अपने राज्य से ही संतुष्ट हूँ। शांति रहे, इसी  में सुख है।" 

यह बात सुनकर विधाता ने उनसे कहा- "अच्छा, फिर यह पारस पत्थर ले लो । 

इस पत्थर से तुम  जितना चाहो, सोना बना सकते हो । इस पत्थर से तुम और धनवान हो जाओगे ।" 

मनु महाराज क्षण भर सोचते रहे। 

फिर हाथ जोड़कर विधाता से  बोले -"प्रभु, मुझे इस लालच में मत डालिए, इससे बचाइए। 

प्रभु राज्य का कोष मेरे लिए  बहुत है उसमें कोई कमी नहीं है। मुझे जितनी  ज़रूरत होती है उतना धन में वहाँ से लेता हूँ। 

परंतु विधाता चाहते थे कि वे  महाराज मनु को कुछ-न-कुछ अवश्य दें । 

उन्होंने मनु को और बहुत सी वस्तुओं के बारे में कहा, परंतु मनु ने उनसे कुछ भी नहीं लिया। 

मनु के द्वारा कुछ भी न लेने पर  विधाता ने एक पौधा अपनी हथेली पर रखा और मनु से बोले -"लो, यह पौधा तुम ले लो । 

यह पौधा धीरे-धीरे बड़ा होगा। बड़ा होने पर इसमें अन्न के दाने लगेंगे। उन दानों को दोबारा बोने से इस पौधे की तरह अनेक पौधे उग आएँगे। 

उन अनाज दानों से मानव अपनी भूख को शांत करेगा। यह अनाज उसे शक्ति भी देगा।" 

विधाता की यह बात सुनकर महाराज मनु का चेहरा खिल गया। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस पौधा रूपी उपहार को ले लिया।

मनु ने  विधाता को प्रणाम किया। मनु  विधाता से  कुछ कहना चाहते थे, परंतु  विधाता अंतर्धान हो गए । 

साहूकार अंत में सबसे कहते कि अन्न की कथा बहुत लंबी और बहुत ही पुरानी है। अन्न ही मनुष्य को सोचने-समझने और काम करने की शक्ति देता है। 

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पुत्र-प्रेम 

राम, श्याम  और घनश्याम तीनों पक्के मित्र थे। ये तीनों पहाड़ी के नीचे बने कॉलोनी में रहते थे। तीनों मित्रो को संगीत का बहुत शौक था। एक दिन उन्होंने पहाड़ी पर जाकर गीत गाने की योजना बनाई और दोपहर के समय घर में जब सब सो गए, तब  ये तीनों बाँसुरी और बोंगो लेकर पहाड़ी की ओर चल पड़े और एक पेड़ के नीचे निश्चित होकर बैठ गए। 

राम ने बाँसुरी पर धुन बजानी शुरू कर दी, श्याम ने उसकी धुन के साथ बोंगो पर ताल दी और घनश्याम ने उनकी धुन पर गीत गाना शुरू कर दिया। उनकी गीत-संगीत की इस महफ़िल की आवाज़ दूर घाटी में भी गूँजने लगी। उनका एक गीत खत्म होता तो दूसरा गीत शुरू हो जाता। यह क्रम लगातार चल ही रहा था कि उन तीनों ने देखा कि कुछ लोग उनकी ओर ही गुस्से से भरकर चले आ रहे हैं। वे लोग उन तीनों के पास आकर रुक गए  और उनमें से एक व्यक्ति चिल्लाया, "तुम तीनों यहाँ बेपरवाह होकर संगीत में मग्न हो रखे हो और उधर शेर ने दो बकरियाँ को मार दिया है।" 

क्या कहा आपने, शेर ने बकरियाँ को मार डाला है!" घबराते हुए तीनों के मुख से एक साथ निकला। अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वह व्यक्ति फिर से उन पर गरजते हुए बोला, "मेरा मन तो कर रहा है कि तुम तीनों के दो-दो थप्पड़ रसीद कर दूँ ।"

उस व्यक्ति की डाँट से लग रहा था कि जैसे वे अपने ही बच्चों को डाँट रहे हों। 

उनकी डाँट सुनकर तीनों मित्र डर गए। उन्हें लगा कि शयद उन्हें अभी और भी डाँट मिलेगी पर वह व्यक्ति भरे गले से उन्हें समझाने व प्यार करने लगे। उन्होंने कहा यह तो ईश्वर का शुक्र है कि तुम तीनों सही सलामत हो। उसके बाद वे उन  तीनों मित्रों को उनके घर तक छोड़ने गए। कुछ दिनों बाद उन तीनों को पता चला कि उनका पुत्र भी ऐसी प्रकार पहाड़ी पर गया था जहाँ किसी जंगली जानवर ने उसे मार दिया था। उन तीनों को समझ आ गया कि वह व्यक्ति उन्हें अपना बीटा समझकर डाँट रहे थे। 







QUESTIONS-ANSWERS .... सदाचार का तावीज़ (Sadachar ki taveez)

सदाचार का तावीज़  ............... 

प्रश्न-उत्तर :

1.  राज्य में क्या शोर मचा हुआ था ?

उत्तर :  राज्य में चारों ओर शोर मचा कि भ्रष्टाचार बहुत फैल गया है। 

2. राजा ने भ्रष्टाचार ढूँढ़ने की ज़िम्मेदारी किसे सौंपी ?

उत्तर  :  राजा ने विशेषज्ञों को भ्रष्टाचार को खोजने की ज़िम्मेदारी सौंपी । 

 3.  साधु कहाँ तपस्या कर रहे थे ? 

उत्तर :  साधु एक कंदरा में तपस्या थे । 

 4. राजा के आगे किसे पेश किया ?

उत्तर : साधु को राजा के समक्ष पेश किया। 

5. सदाचार का तावीज़ किसने बनाया ?

उत्तर :  सदाचार का तावीज़ साधु ने बनाया। 

6. करोड़ों तावीज़ की आवश्यकता क्यों थी ? 

उत्तर :  राज्य के हर व्यक्ति के हाथ पर बाँधने के लिए इतने सारे तावीज़ों की आवश्यकता थी। 

7 साधु ने भ्रष्टाचार दूर करने का क्या तरीका बताया ? वह क्या चीज़ थी ?

उत्तर: साधु ने एक तावीज़ के बारे में राजा को बताया जिससे भ्रष्टाचार दूर हो सकता था। 

8 सदाचार के तावीज़ को कहाँ बाँधा गया?

उत्तर: सदाचार के तावीज़ को भुजा पर बाँधा गया। 

9. सदाचार का तावीज़ कहानी के लेखक का क्या नाम है ?

उत्तर: 'सदाचार का तावीज़' कहानी के लेखक हरिशंकर परसाई जी हैं। 

10 राजा पहली बार वेश बदल कर कार्यालय गए तब क्या तारीख थी?

उत्तर: राजा जब पहली बार कार्यालय गए तब इकतीस तारीख थी। 

*दीर्घ उत्तरीय प्रश्न  :

 1.  विशेषज्ञों ने भ्रष्टाचार के क्या गुण बताए ?

उत्तर :   विशेषज्ञों ने कहा कि " भ्रष्टाचार मोटा (स्थूल) नहीं अति बारीक है, अगोचर है, पर वह जगह फैला हुआ है। उसे देखा नहीं जा सकता, भ्रष्टाचार को तो केवल अनुभव किया जा सकता है। 

2 .  दरबारियों  योजना में क्या कमियाँ बताई ?

उत्तर: दरबारियों कहा कि "यह योजना नहीं, एक मुसीबत है। इसके अनुसार हमें कई उलट-फेर करने पड़ेंगे।  कितनी परेशानी होगी। सारी व्यवस्था उलट-पलट हो जाएगी। जो चला आ रहा है, उसे बदलने से कई कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं।"

 3.  अंत में भ्रष्टाचार दूर करने का कौन-सा तरीका राजा मिला और वह किसने उसे सुझाया था ?

 उत्तर :  अंत में दरबारियों ने एक साधु को राजा के सामने पेश किया और उस साधु के बारे में बताया कि इन्होंने सदाचार का तावीज़ बनाया है। इस तावीज़ को बाँधने से आदमी सदाचारी हो जाता है। 

 4 . तावीज़ किस प्रकार काम करता था ?

उत्तर: तावीज़ जिस आदमी की भुजा पर बाँधा जाए तो वह सदाचारी हो जाता है। प्रयोग के लिए तावीज़ को एक कुत्ते के गले में बाँध देने भी रोटी नहीं चुराता क्योंकि तावीज़ से सदाचार के स्वर निकलते  हैं। 

 5. साधु ने राजा को तावीज़ में से कैसे स्वर निकलने की बात बताई ?

उत्तर- साधु ने राजा को बताया कि इस तावीज़ में से सदाचार के स्वर निकलते हैं।

6. क)  भ्रष्टाचार को लेकर क्या विचार व्यक्त किए गए ?

उत्तर :  क) भ्रष्टाचार को अनुभव किया जाता है वह एक व्यवहार है, कोई वस्तु नहीं, जो किसी को दिखाई दे। 

- भ्रष्टाचार तो रिश्वत  के रूप में दी जा रही वास्तु के रूप में होता है।  

 ख)   अंत में तावीज़ में से किस तरह के स्वर निकल रहे थे ? 

 उत्तर :  ख) महीने के अंत में तावीज़ में से घूस लेने के स्वर निकल रहे थे क्योंकि कर्मचारी की जेब खाली थी। महीने के शुरुआत में तनख्वाह मिलने पर फिर से सदाचार के स्वर सुनाई देते। 

-सभी कर्मचारियों को पर्याप्त वेतन दिए जाएँ। जब सभी को ज़्यादा वेतन मिलेगा तो वे घूस नहीं लेंगे। इस उपाय के बिना भ्रष्टाचार नहीं मिटाया जा सकता। 

 7 .  'सदाचार का तावीज़' पाठ व्यंग्यात्मक किस प्रकार है ?  

उत्तर :  पाठ में इस बात पर व्यंग्य किया गया है कि बड़ी-बड़ी बाते करके, भाषण देकर, नैतिक मूल्यों का ज्ञान देकर, स्लोगन बनाने  या डंडे मार कर कभी भी भ्रष्टाचार को नहीं मिटाया जा सकता।  

यदि राज्य, अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को उनकी ज़रूरतें या आवश्यकताएँ पूरा करने के लिए ज़रूरत अनुसार वेतन दो तभी नैतिक मूल्यों की स्थापना होगी तो शायद भ्रष्टाचार समाप्त हो जाए। 

 जीवन मूल्यपरक प्रश्न-उत्तर  :

 1.   सदाचार के भ्रष्टाचार में बदलने के क्या कारण हो सकते है ? क्या परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं या विवशता ?

 उत्तर :  क. यह सत्य है कि कभी-कभी परिस्थितियाँ या विवशता ऐसी हो जाती हैं कि वे सदाचार को भ्रष्टाचार में बदलने का काम करती हैं। 

-यह सब हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, कभी यह बहाना भी होता है और सोचने का दृष्टिकोण  सकता है। 

 ख. अगर सबके साथ आदर और प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए, बिना बात किसी को दण्डित नहीं करना चाहिए, किसी को कोई बात या काम बड़े प्यार से समझाना चाहिए यही सब सदाचार के लक्षण हैं। 

  ग. कई कर्मचारी शुरू-शुरू में रिश्वतखोरी नहीं करते, पर दूसरों के दबाव में आकर रिश्वत लेने लगते हैं। इन्हें परिस्थितियों या विवशता के कारण भ्रष्टाचारी बनना कहा जा सकता है। 

 घ. कई लोग तो यह सोचकर भ्रष्टाचारी हो जाते हैं कि जब यहाँ सब भ्रष्टाचारी हैं तो अकेले मेरे सदाचारी बने रहने से क्या अंतर पड़ने वाला है। इसलिए उनके जैसा बनने में ही भलाई है। हर कोई बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है। 

  

MCQ.... Bdey bhai sahab/बड़े भाई साहब ........ ...... MCQs Questions with Answers.

बड़े भाई साहब ........

1. वर्तमान शिक्षा पद्धति के खिलाफ़ बड़े भाई साहब क्यों थे ?

(i) खेल-कूद पर अधिक बल देती है
(ii)  किताबी कीड़ा बनाकर वास्तविकता से दूर ले जाती है 
(iii) बहुत लाभदायक नहीं है

(iv) सभी

Answer: (ii)  किताबी कीड़ा बनाकर वास्तविकता से दूर ले जाती है 

Wednesday, 14 April 2021

class -9 Dukh Ka Adhikaदुःख का अधिकार ........ यशपाल

दुःख  का अधिकार 

लेखक परिचय :यशपाल  


सन 1903 को फिरोजपुर छावनी में यशपाल का जन्म हुआ था। 
स्थानीय स्कूल में उनकी आरंभिक शिक्षा हुई और उच्च शिक्षा लाहौर से प्राप्त की । 
विद्यार्थी काल से ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए थे। 
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अमर शहीद भगतसिंह आदि के साथ मिलकर में भाग लिया। 

प्रमुख कृतियाँ : देशद्रोही, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, झूठा सच तथा मेरी,तेरी, उसकी बात (सभी उपन्यास), ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजड़े की उड़ान, फूलों का कुर्ता, उत्तराधिकारी (सभी कहानी संग्रह) और सिंहावलोकन। 

साहित्य अकादमी पुरस्कार - 'तेरी,मेरी, उसकी बात' । 

यशपाल की कहानियों में कथा रस सर्वत्र  है। 

कहानी की विशेषताएँ : उनकी कहानियाँ की मुख्य विशषताएँ वर्ग-संघर्ष, लोगों का मनोविश्लेषण और समाज पर पैना  व्यंग्य है । 

 यशपाल के विचार थे कि समाज को उन्नत बनाने का एक ही रास्ता है - सामाजिक समानता के साथ-साथ आर्थिक समानता। 

भाषा : कहानियों में हिंदी, उर्दू  और अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग। 

दुःख का अधिकार कहानी : 

प्रस्तुत कहानी बहुत ही मर्मस्पर्शी है जो देश में फैले अंधविश्वासों और ऊँच-नीच के भेद-भाव को बेनकाब करती है।यह कहानी हमें यह बताती है  कि दुःख की अनुभूति सभी को यानि हर वर्ग को समान रूप से होती है। 

इस कहानी में धनी लोगों की अमानवीयता पूर्ण व्यवहार और समाज के गरीब व असहाय लोगों की मजबूरी को भी पूरी तरह स्पष्ट किया है ।

 दुःख तो आखिर दुःख ही होता है। यह बिलकुल सही है कि दुःख हर इंसान को तोड़ देता है, दुःख में दुखी होना, शोक या मातम करना  हर कोई चाहता है, दुःख का आमना-सामना होने पर सब अवश हो जाते हैं,  इस देश में ऐसे कई अभागे लोग भी हैं जिन्हें न तो दुःख  मनाने का अधिकार होता है और न ही दुःख मनाने का अवकाश ही मिल पाता  है । 

पाठ का सार :

दुख का अधिकार' यशपाल जी की एक व्यंग्यपूर्ण रचना है। 

इस पाठ में इस बात पर दुख प्रकट किया गया है कि समाज के लोग गरीबों वर्ग के लोगों के दुख को दुख नहीं समझते। 

 हमारे देश में कुछ ऐसे लोग या वर्ग भी हैं जिन्हें दुख मनाने का भी अधिकार व अवसर नहीं मिलता है । 

पोशाक द्वारा स्तर निर्धारण:

 हमारा स्तर निर्धारित करने में हमारी पोशाक बहुत अहम भूमिका निभाती है। हमारी पोशाक देखकर ही समाज के लोग हमारा स्तर निर्धारित करते हैं। 

इस समाज मनुष्य की पहचान केवल  उसकी पोशाक से होती है।  

यही पोशाक  उसे समाज में अधिकार व दर्जा दिलाती है। कीमती पोशाक मनुष्य के लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है।

 हमारे जीवन में कई बार ऐसा समय  भी आता है जब  वर्ग-भेद  भूलकर हम नीचे झुककर गरीबों की मनोस्थिति को जानने का प्रयास करते हैं। 

तब उन निचली  श्रेणियों की अनुभूति हमारे मन को छू जाती है, हम उनकी मदद तो करना चाहते हैं,परंतु उस समय हमारी पोशाक बंधन बनकर अड़चन डाल देती है। 

हमारी पोशाक कई खास मौकों या परिस्थितियों में हमें नीचे झुकने से रोकती है। 

 लोगों का दुर्व्यवहार:

खरबूजे बेचने वाली घुटनों में मुँह  छुपाकर डलिया में कुछ खरबूजे रखकर रो रही थी। 

उसकी पोशाक को देखकर कोई भी खरबूजे खरीदने के लिए आगे नहीं बढ़ रहा था।  

बाजार में खड़े लोग उसे धिक्कार रहे थे तथा तरह-तरह की बातें बना रहे थे। 

वह कह रहे थे कि सूतक लगे हुए हैं।  एक आदमी ने घृणा से थूकते हुए कहा, "क्या जमाना है। 

जवान लड़के को मरे पूरा दिन भी नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगाकर बैठी है।" 

 एक ने लापरवाही से कहा कि इन कमीनों का धर्म-ईमान कुछ नहीं,  बस रोटी का टुकड़ा ही सब कुछ है। 

परचून की दुकान चलाने वाले एक दुकानदार ने कहा - "इसे अपने धर्म-ईमान की चिंता नहीं है तो न सही परंतु इसे सूतक के तेरह (13) दिनों में खरबूजे बेचकर दूसरों का धर्म-ईमान नहीं बिगाड़ना चाहिए।"

बुढ़िया माँ  की कहानी :

लेखक ने पास-पड़ोस की दुकानों से पूछ कर पता लगाया कि उसका तेईस  (23) साल का जवान लड़का भगवाना साँप  के काटने से मर गया।  

वह शहर के पास डेढ़ बीघा जमीन में खेती करके परिवार का निर्वाह करता था। 

परसों सवेरे एक साँप  ने उसे डस लिया। माँ  ने ओझा को बुलाया  झाड़ना -फूँकना  हुआ। 

 नाग देव की पूजा करवाई गई।  

दान-दक्षिणा दी।  घर में जो अनाज और आटा  था वह दान दक्षिणा में चला गया। परंतु उसका पुत्र भगवाना बच न सका। 

बुढ़िया के पास बेटे को विदा करने के पैसे भी न थे। सुबह होते ही बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे।

 दादी ने उन्हें खाने के लिए खरबूजे दिए। बहू भी  बुखार से तप रही थी। 

अब उन्हें कोई उधार देने वाला नहीं था इसलिए वह रोते-रोते खरबूजे लेकर बेचने चल पड़ी थी। 

लेखक को बुढ़िया की दशा देखकर अपने पड़ोस की एक संभ्रांत महिला की याद आई। वह संभ्रांत महिला अपने  पुत्र की मृत्यु के अढ़ाई मास तक  पलंग से न  उठ सकी  थी। 

उन्हें पंद्रह-पंद्रह  मिनट बाद पुत्र-वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों  से आँसू  न रुकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम  सिरहाने बैठे रहते थे।  

हरदम सिर पर बर्फ़  रखी जाती थी।  शहर भर के लोगों के मन  उस पुत्र वियोगी  माँ  के लिए द्रवित हो उठे थे। 

लेखक दोनों पुत्र वियोगी  ने माताओं की तुलना कर रहा था। 

उसके मन में विचार आया कि शोक करने और दुख मनाने के लिए भी सुविधा और अधिकार दोनों चाहिए। 


https://youtu.be/ZwJP7MNf-NM



शब्दार्थ :

पृष्ट(पेज)- 14(१४) 

पोशाक- पहनावा 

श्रेणी -विभाजन 

दर्जा - स्थान 

अनुभूति -अनुभव, संवेदना 

डलिया- टोकरी,

अधेड़ -ढलती उम्र का

 पृष्ट(पेज)- 15 (१५ )

व्यथा - पीड़ा

 व्यवधान- रुकावट

 बेहया- बेशर्म 

नीयत - इरादा

 बरकत - वृद्धि 

खसम - पति 

लुगाई - पत्नी 

परचून की दुकान -आटा, चावल, दाल आदि की दुकान। 

सूतक - परिवार में किसी बच्चे के जन्म होने या किसी के मरने पर कुछ निश्चित समय तक की अपवित्रता। 

 कछियारी - खेतों में तरकारियाँ बोना। 

  निर्वाह -गुजारा 

मुँह -अँधेरे -  सुबह-सुबह, भोर का समय 

मेड़ -खेत के चारों ओर का घेरा 

तरावट - गीलापन 

ओझा - झाड़-फूँक करने वाला 

दान-दक्षिणा -दान में दिया जानेवाला धन 

पृष्ट(पेज)- 16 (१६ )

बजाज - कपड़े का व्यापारी 

छन्नी-ककना - मामूली गहना 

चूनी-भूसी - पशुओं को खिलाने का चारा 

बिलबिलाना - तड़पना 

दुअन्नी-चवन्नी - दो-चार आने 

संभ्रांत - उच्च वर्ग से संबंधित 

मूर्छा - बेहोशी 

द्रवित - पसीजा हुआ 

नाक ऊपर उठाना - सम्मान की रक्षा करना। 

पृष्ट(पेज)- 17 (१७ )

गम मनाना - मृत्यु का दुःख प्रकट  करना। 

सहूलियत - सुविधा 

अधिकार - हक 

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NCERT SOLUTIONS CLASS 10 HINDI BDEY BHAI SAHAB-----प्रेमचंद ....बड़े भाई साहब ...सरलार्थ

पाठ -1  बड़े भाई साहब ...

पाठ का सरलार्थ  ............

प्रेमचंद : कवि परिचय                              
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के करीब एक गाँव में हुआ था। प्रेमचंद का नाम धनपत राय था।धनपत राय उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे और हिंदी में वे प्रेमचंद के नाम से लेखन कार्य करते थे । 

धनपत राय नाम  से ही वे  निजी व्यवहार और पत्राचार करते थे। 'सोजेवतन' उनका पहला कहानी संग्रह था जो उर्दू में प्रकाशित हुआ लेकिन  अंग्रेज सरकार ने उसे जब्त कर  लिया था । 

प्रेमचंद ने जीविका चलाने के लिए स्कूल मास्टरी, इंस्पेक्टरी और भी मैनेजरी की। इसके अलावा उन्होंने प्रमुख पत्रिकाओं 'हंस', 'माधुरी' का संपादन भी किया। 

प्रेमचंद ने अपने जीवन का कुछ समय मुंबई की फिल्म नगरी में भी बिताया। उनकी कई कहानियों पर यादगार फिल्में भी बनी परंतु फ़िल्म नगरी उन्हें रास नहीं आई।

 प्रेमचंद को उनके जीवनकाल में ही  'कथा सम्राट' उपन्यास सम्राट कहा जाने लगा था। उन्होंने आम आदमी के दुःख-दर्द और उनकी समस्याओं को अपने उपन्यासों में उतरा। 

उन्होंने हिंदी कथा लेखन की परिपाटी पूरी तरह बदल डाली थी। उन्होंने उन लोगों को अपनी रचनाओं में प्रमुख  स्थान दिया जिन्हें जीवन और संसार में केवल शोषण और अत्याचार ही मिले थे। 

 प्रेमचंद का निधन  8 अक्टूबर 1936 को हुआ था।प्रेमचंद की सभी कहानियाँ  'मानसरोवर' शीर्षक से आठ खंडों में संकलित  हैं। 

पाठ का सार :

प्रस्तुत पाठ में दो  प्रमुख  पात्र है - लेखक और उनके बड़े भाई साहब।  बड़े भाई साहब हैं, कहने के लिए तो बड़े हैं, पर उम्र में छोटे ही हैं,  घर में उनसे भी छोटा और  एक भाई था । 

बड़े भाई साहब उम्र में केवल कुछ वर्ष ही बड़े है लेकिन बड़े होने के कारण उनसे बड़ी-बड़ी उम्मीदें और अपेक्षाएँ की जाती हैं। 

बड़े भाई होने के नाते वह खुद भी यही  कोशिश करते हैं कि वह जो भी  कुछ करें वह उनके छोटे भाई के लिए एक उदाहरण बने । 

बड़े भाई साहब पर छोटे भाई की ज़िम्मेदारी है और छोटे भाई से बड़ा होने के नाते इसी ज़िम्मेदारी में उनका बचपन पूरी तरह तिरांजलित हो जाता है। वे हर समय छोटे भाई के सामने अपना उदाहरण रखते हैं और अपने-आप को आदर्श साबित करने का प्रयास करते है।  

बड़े भाई साहब :

लेखक के बड़े भाई साहब चौदह वर्ष हैं और वे स्वयं नौ वर्ष के थे। लेखक के बड़े भाई साहब बहुत अध्ययनशील थे। वे सारा-सारा दिन किताबें खोलकर बैठे रहते थे।

बड़े भाई साहब स्वयं पढ़ाई में कैसे भी थे परंतु लेखक को डॉँट-डपटना और उस पर निगरानी रखना, नज़र रखना  अपना परम-धर्म समझते थे। 

लेखक का मन पढ़ाई में बहुत कम लगता था और मौका मिलते ही वह हॉस्टल से निकलकर मैदान में आ जाते और वहाँ खूब खेलते थे। बड़े भाई साहब भी धर्मोपदेश (उपदेश) देने की कला बहुत ही कुशल और निपुण थे। 

जब भी लेखक खेलकर बाहर से आते तो वे पढ़ाई में आने वाली कठिनाइयों को उसे बताते। उसे स्नेह और रोष भरी हिदायत (उपदेश) देते कि  -"अंग्रेजी को  इतना आसान न समझो। इसे पढ़ना कोई हँसी-खेल का काम नहीं है। मैं दिन-रात आँखें इसमें फोड़ता हूँ, तब जाकर यह वह मुझे विद्या आती है। संसार में कितने ही बड़े-बड़े विद्वान् हों वे भी शुद्ध अंग्रेज़ी नहीं लिख पाते।"

लेखक का टाइम-टेबिल :

लेखक बड़े भाई साहब की लताड़ सुनकर रोता रहता। टाइम टेबिल कर बार-बार इरादा करता  कि आगे से खूब जी लगाकर पढ़ूँगा  किंतु उस पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाता था। 

पढ़ाई शुरू करने से पहले ही प्रकृति का मनमोहक वातावरण उसे अपनी ओर खींच लेता। भाई साहब की फटकार और घुड़कियाँ का भी उस पर कोई असर नहीं होता। लेखक लताड़ खाकर भी खेलकूद का अनादर (तिरस्कार) नहीं कर पाता था।

भाई साहब का फेल होना:

हर वर्ष की तरह फिर से सालाना परीक्षा हुईं। भाई साहब फिर से सालाना परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए यानी वे इस बार भी फेल हो गए। अनुत्तीर्ण होने के कारण अब केवल उन दोनों के बीच दो जमात का ही फ़र्क रह गया था । अब लेखक बोलने का मौका तो मिला था और उनके दिल में आता था कि वे भाई साहब को बहुत कुछ कहें पर वे कह नहीं पाते थे। उनके सामने चुप ही रह जाते । 

पर एक दिन भाई साहब लेखक पर क्रोध में बरस पड़े कि -"इस वर्ष तो पास हो गए हो और  कक्षा में अव्वल आने के कारण तुम्हें अपने ऊपर बहुत अभिमान हो गया है। तुम बहुत घमंड करने लगे होंगे। परंतु याद रखो कि घमंड तो बड़े-से-बड़ों का नहीं रहा, तो सोचो उनके सामने तुम्हारी क्या हस्ती है, तुम तो अभी बहुत छोटे हो ?" उन्होंने लेखक को समझाने के लिए कई मिसालें भी दी  और साथ ही अपने छोटे भाई को अहंकार न करने की सलाह भी दी।

पाठ्यक्रम की मुश्किलें :

भाई साहब बोले-" मेरे भाई फेल होने पर न जाओ। मेरी कक्षा में पहुँचोगे  तो दाँतों  पसीना आ जाएगा।" साथ ही उन्होंने आगे की कठिन पढ़ाई से डराया भी। इतिहास और गणित को कठिन बताते हुए उन्होंने उन विषयों में आने वाली कठिनाइयों के बारे में भी बताया । उन्होंने भाई को समझाया कि परीक्षा में पास होने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। 

भाई साहब ने बड़ी कक्षाओं की बहुत ही भयंकर रुपरेखा अपने छोटे भाई के सामने प्रस्तुत की, जिसे सुनकर छोटा भाई घबरा जाना स्वाभाविक था परंतु भाई साहब की कहि बातों का असर उस पर बिलकुल भी न पड़ा। अब भी लेखक की रुचि पुस्तकों की ओर नहीं  बन पाई थी। बीएस यही फर्क पड़ा था लेखक में कि अब वे भाई साहब से बचकर चोरी चुपके खेलने जाया करते थे। 


भाई साहब का फिर से फेल होना: 

फिर वार्षिक परीक्षा हुई। बड़े भाई साहब  बार भी फेल हो गए और संयोग से लेखक तो पास हो गया। लेखक को खुद पर  बड़ा अचरज हुआ  कि वह कक्षा में अव्वल आ गया । हर बार की तरह इस बार भी भाई साहब ने परीक्षा के लिए बहुत मेहनत की थी। लेकिन फिर भी उनकी आशा के विपरीत परिणाम आया। वे इस साल भी पास नहीं हो पाए।  भाई साहब के पास न होने पर लेखक का दिल भी अब उनके लिए नरम होना  लगा। एक तरह से अब लेखक को अपने बड़े भाई पर दया आने लगी थी। 

लेखक और अब अपने बड़े भाई से केवल एक कक्षा छोटे थे । भाई के फेल होने और दोनों के बीच कक्षा में कम अंतर होने की वजह से अब भाई साहब का स्वभाव  काफी हद तक नरम हो गया था । वह समझने लगे थे कि अब  मुझे डाँटने  का अधिकार उन्हें नहीं रहा। अब लेखक के मन में यह बात बैठ गई कि वह पढ़े  न पढ़े,  पास तो हो ही जाएगा। 

लेखक का पतंग लूटना व भाई साहब का समझाना :

एक  दिन लेखक संध्या के समय हॉस्टल से दूर कनकौआ (पतंग) लूटने के लिए जा रहा था। सहसा  लेखक की मुठभेड़ भाई साहब से हो गई। उन्होंने लेखक को काफी डाँटा- फटकारा। 

बड़े भाई साहब ने लेखक को कहा कि एक समय था जब आठवीं कक्षा पास करके लोग नायब तहसीलदार बन जाते थे, अन्य कई बड़े और अच्छे पदों के अधिकारी बन जाते थे। एक तरफ तुम हो जो इन आवारा लड़कों के साथ आठवीं कक्षा में होकर भी पतंग लूटने दौड़ा जा रहे हो।  

अगले साल हो सकता है, तुम मेरे बराबर आ जाओ,हो सकता है। शायद मुझसे भी आगे भी निकल जाओ, लेकिन मैं तुमसे  बड़ा हूँ और हमेशा बड़ा ही रहूँगा।  समझ दुनिया देखने से आती है न की किताबें पढ़ने नहीं आती। 

घर के कामकाज और खर्च का हिसाब सिर्फ घर के बड़े ही सही तरीके से रखते हैं।  बड़े भाई साहब द्वारा दिए इस तर्क के सामने लेखक ने अपना मस्तक झुका दिया। 

तब लेखक को अपने छोटे होने का अहसास हुआ और  उनके मन में बड़े भाई के प्रति और अधिक सम्मान व श्रद्धा का भाव उत्पन्न होने लगा।  भाई साहब ने लेखक को समझाने के बाद उसे अपने गले लगा लिया। उसी समय एक कनकौआ उन दोनों के ऊपर से निकला। 

भाई साहब लंबे थे इसलिए उन्होंने ऊपर उछलकर उस कनकौए की डोरी को पकड़ा और अपने  हॉस्टल की ओर बड़ी तेज़ी से दौड़े। भाई साहब को दौड़ता देख लेखक भी उनके पीछे दौड़ने लगे।