HINDI BLOG

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Sunday, 25 August 2024

CLASS 10 मनुष्यता


कविता का भावार्थ 

1. विचार लो कि मर्त्य हो.......................................................  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ– मैथिलीशरण गुप्त जी की यह कविता मनुष्यता पर आधारित है। कवि ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में मृत्यु की सच्चाई बताई है। मनुष्य को समझाया है कि जब मृत्यु निश्चित ही है तो फिर इसका भय क्यों? जीवन रहते उसे सार्थक बनाइए और ऐसे कार्य कीजिए कि मरने के बाद भी दुनिया आपको स्मरण करे जब तक जियो गर्व के साथ और मरो भी तो गर्व के साथ कि हम इस संसार में अपनी कुछ अच्छाइयाँ छोड़कर जा रहे हैं। मरने के बाद भी दुनिया तुम्हें स्मरण करेगी। तुम्हारी यह मृत्यु ही सुमृत्यु होगी। स्वयं के लिए जीना तो पशु-तुल्य जीना है जो केवल अपना पेट भरना ही जानते हैं। वास्तव में परहित के लिए जीना ही मनुष्यता की सही परिभाषा है। 

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य –
1.  'सुमृत्यु' को समझाते हुए दूसरों के लिए जीने की प्रेरणा दी गई है। 
2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। 
3.  उद्बोधनात्मक शैली व तुकांत रचना की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। 
4.  जो जिया, पशु-प्रवृत्ति, आप आप शब्दों में अनुप्रास अलंकार व पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की छटा दिखाई देती है।


2. उसी उदार की कथा सरस्वती ........................................................  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि ने उदार मनुष्य के जीवन के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहा है जो दूसरों के लिए जीता है;  उसका जीवन एक कहानी बन जाता है। सरस्वती भी उसका गुणगान करती है। धरती ऐसे उदार मनुष्य को जन्म देकर उसके प्रति अपना आभार प्रकट करती है जो इस संसार में एकता और आत्मीयता का भाव रखता है। ऐसे लोगों का यश पूरे संसार में फैल जाता है। वास्तव में वह सभी प्राणियों में श्रेष्ठ और पूजनीय माना जाता है। वह अपना सारा जीवन कल्याण के कार्यों में लगा देता है। सच्चा मानव संसार के लिए ही जीता है और संसार के लिए ही मरता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि की भाषा सरस, सरल और प्रभाव पूर्ण है।
2.  खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है जो कि  संस्कृत भाषा से प्रभावित है। 
3. अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार है।
4.  'सजीव कीर्ति गूँजती' में मानवीकरण अलंकार है। 
5. सदा-सजीव और समस्त-सृष्टि में 'स' वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
6.  वीर रस की प्रधानता है।

3. क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ------------------------------------ जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने समाज का कल्याण करने वाले कुछ उदाहरणों को प्रस्तुत करते हुए यह समझाने का प्रयास किया है कि उसी मानव का जीवन ही सफल होता है जो दूसरों के लिए जीता है। राजा रंतिदेव ने अपने सामने पड़ा भोजन का थाल भिक्षु को दे दिया था जबकि वे स्वयं भूखे रहे। महर्षि दधीचि ने असुरों के वध के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। दानवीर कर्ण ने अपने कवच व कुंडल उतार दिए थे। गांधार नरेश शिवि ने अपने शरीर का मांस कबूतर की प्राण रक्षा के लिए दे दिया था। यह शरीर तो नश्वर है आत्मा अमर है, फिर हम इस नश्वर शरीर के लिए मृत्यु से क्यो डरते हैं? सच्चा मनुष्य वही है, जो दूसरों के कल्याण के लिए जीता है और परहित के लिए मरता भी है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य – 
1.  अनेक उदाहरणों द्वारा परोपकार का महत्व बताया गया है। 
2.. खड़ी बोली का प्रयोग है जिसमें संस्कृत का प्रभाव दिखता है। 
3...वीर रस की अभिव्यक्ति है और प्रश्न शैली का प्रयोग है। 
4..भाषा अलंकृत है। अनुप्रास अलंकार की झलक है।
5. तुकांत शब्दों का प्रयोग हुआ है। 


4. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही---------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ -  कवि ने सहानुभूति को हमारी सबसे बड़ी पूँजी इसलिए कहा है क्योंकि इससे आप किसी के भी मन को जीत सकते हैं। सहानुभूति आपको उदार तथा महान बनाती है। दूसरों के प्रति दया तथा सहानुभूति का व्यवहार करके संपूर्ण धरती को वश में किया जा सकता है। अच्छे व्यवहार की ओर सभी खिंचे चले आते हैं। महात्मा बुद्ध ने तत्कालीन गलत धारणाओं का विरोध किया था किंतु अंत में लोगों को उनकी बात माननी ही पड़ी थी। सच्चा मनुष्य वास्तव में वही है। जो परोपकारी है। जिसका जीना और मरना दूसरों के लिए है। वही सफल है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य –
 1.  कवि उदारता का संदेश देते हुए सहानुभूति का महत्व बता रहे हैं।
 2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली और प्रश्न शैली प्रयुक्त हुई है। 
3.  भाषा अलंकृत है और अनुप्रास अलंकार की छटा कवि ने बिखेरी है। 
4.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है।


5. रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में  --------------------------------------------जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि ने अहंकारी न बनने के लिए कहा है और यह समझाने का प्रयास किया है कि धनवान होने पर अहंकार में अंधे मत बनो। यह धन तो आता-जाता रहता है। उसे पाकर घमंड करना मूर्खता है। ईश्वर परमपिता हैं। संसार के पालक और संरक्षक हैं। इसलिए कोई स्वयं को अनाथ न समझे। कई बार मनुष्य परिजनों और धन का साथ पाकर स्वयं को सनाथ समझने लगता है और घमंडी हो जाता है, लेकिन ऐसा मानव सच्चा मानव नहीं है। सच्चा मनुष्य तो वही है जो जग-कल्याण करता है। आवश्यकता पड़ने पर अपना शरीर तक बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटता। वह प्राणी भाग्यहीन है जो असंतुष्ट-अशांत और अतृप्त रहता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. मनुष्य को अहंकार न करने का संदेश देते हुए कवि ने संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया है। 
2. लयात्मक भाषा है। 
3.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
4. यथासंभव अलंकारों की छटा बिखरी है।
5. उद्बोधन शैली का प्रयोग किया गया है। 
6. भाषा में प्रवाह है। सामासिक शब्दों का प्रयोग है।


6. अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े ------------------------------------------------- जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि मनुष्य को परोपकार करने तथा मानवीयता का पालन करने के लिए कहते हैं। कवि के अनुसार ऐसा जीवन जीयो जो दूसरों के काम आ सके। एक-दूसरे की मदद करो। ऐसे लोग देव-तुल्य होते हैं। ऐसे लोगों की हमारे देश में कमी नहीं है। इतिहास पर नजर डालें तो असंख्य ऐसे उदाहरण मिलेंगे।
कवि के अनुसार जीवन उसी का सफल है जो परोपकार करता है। एक-दूसरे के सहयोग से महान कार्य करो और अमर हो जाओ। व्यर्थ है वह जीवन जो किसी के काम न आ सके।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि ने देव-तुल्य जीवन बिताने के लिए और परोपकारी बनने का संदेश दिया है। 
2. उद्बोधन शैली का प्रयोग किया गया है। 
3. भाषा खड़ी बोली है और संस्कृत से प्रभावित है।
4. 'अनंत अंतरिक्ष' समक्ष स्वबाहु में अनुप्रास अलंकार है।
5.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। 
6. भाषा में प्रवाह है।


7. 'मनुष्य मात्र बंधु है' यही बड़ा विवेक है ------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि समस्त मानव-जाति एक-दूसरे की सहायक बने। सबको अपना भाई-बंधु माने। संसार में ऐसे लोग ही विवेकी माने जाते हैं। संसार की विविधता केवल मनुष्य के कर्मों द्वारा मिले फल हैं। यह केवल बाहरी भेद हैं। मूल रूप से सभी प्राणी एक हैं। सब एक ही परमपिता की संतान हैं। उनका रचयिता एक है। सब में एक ही चेतना, एक ही प्राण और एक ही ईश्वर समाया है। फिर भी विडंबना देखो कि एक-दूसरे की विपदा और दुख को हरने का प्रयास नहीं किया जाता। यही इस संसार का सबसे बड़ा अनर्थ है। मनुष्य मात्र का यह कर्तव्य है कि परस्पर भाईचारे की भावना स्थापित करे। यही सच्ची मनुष्यता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि के द्वारा परस्पर सहयोग की भावना विकसित करने का संदेश दिया गया है। 
2. खड़ी बोली में संस्कृत का प्रभाव है। 
3. भाषा में लयात्मककता है। 
4. यथासंभव अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
 5. वीर रस की अभिव्यक्ति है।
 तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है।


8. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए-------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में जीवन की अनेक रुकावटों को मार्ग से हटाते हुए आगे बढ़ने का संदेश दिया गया है। हमें विपत्तियों से घबराना नहीं चाहिए और लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। हम सबका अंतिम लक्ष्य समाज में एकता और भाईचारा लाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें प्रयासरत रहना है। आपसी मतभेद को समाप्त करके आपस में मिल-जुलकर रहना है। अपनी सफलता के साथ-साथ दूसरों को भी सफल बनाने की कोशिश करें यही सच्चा समर्थ भाव है। सच्चा मानव वही है जो दूसरों के लिए जीता है और दूसरों के लिए मरता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य – 
1.  कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से परस्पर मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया है। समस्त संसार को एक परिवार 
      मानना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। 
2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। 
3.  लयात्मक भाषा है। 
4.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। 
5.  समास का प्रयोग यथास्थान किया गया है। 
6.  विपत्ति-विघ्न में अनुप्रास अलंकार है।


Thursday, 30 May 2024

कहानी - सही उत्तर


सही उत्तर

राजा भोज बड़े उदार और कुशल शासक थे। अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए वे अकसर वेश बदलकर घूमा करते थे। उनके दरबार में महाकवि कालिदास का बड़ा सम्मान था। कालिदास महाकवि होने के साथ-साथ अत्यंत बुद्धिमान व व्यवहार कुशल भी थे।

एक दिन राजा भोज वेश बदलकर कालिदास के साथ प्रजा का कुशल-क्षेम जानने के लिए नगर में घूम रहे थे। बातों-बातों में राजा भोज ने कालिदास से पूछा, "महाकवि बताओ, खाता कौन है?" प्रश्न बड़ा अटपटा-सा था। कालिदास कुछ सोच में पड़ गए। राजा भोज ने हँसते हुए कहा, "क्यों, पड़ गए न सोच में!" कालिदास बोले, "राजन, बिना सोचे समझे उत्तर देने वाला मूर्ख होता है।"

"प्रश्न तो बड़ा सीधा-सा है महाकवि। ऐसे प्रश्नों के उत्तर के लिए बुद्धिमानों को विचार नहीं करना पड़ता।" राजा ने कहा।

"तो आप ही इसका उत्तर देने की कृपा करें", कालिदास बोले।

"अच्छा ठीक है। सीधे से प्रश्न का सीधा-सरल उत्तर है कि भूखा ही खाता है" राजा भोज उत्तर दिया। "गलत" कालिदास ने कहा। ने

राजा भोज बोले, "प्रमाणित कीजिए।"

"अवश्य। कल मैं अपनी बात प्रमाणित करूंगा," कालिदास ने उत्तर दिया।

अगले दिन कालिदास के कहे अनुसार राजा भोज ने पंडित का और कालिदास ने उनके शिष्य का वेश धारण किया। कालिदास ने राजा से कहा, "राजन ध्यान रखिएगा कि आपको कुछ नहीं बोलना है, जो बोलना है, मैं बोलूँगा। बस आप मेरे साथ चलते रहिएगा।"

राजा भोज ने कहा, "ठीक है।"

दोनों चल दिए। चलते-चलते दोपहर हो गई। दोनों को ज़ोरों से भूख लग रही थी। सामने ही उन्हें एक बड़ी हवेली दिखाई दी। दोनों ने सोचा कि हमने ब्राह्मण वेश धारण किया हुआ है अतः हवेली के द्वार पर भोजन मिल ही जाएगा। वे दोनों हवेली के द्वार पर जा पहुँचे। सेठ का मुनीम वहीं खड़ा था। उसने पूछा, "आप कौन हैं? आपको क्या चाहिए?" कालिदास कटु स्वर में बोले, "मूर्ख, देखते नहीं हो हम कौन हैं? तुम बताओ, तुम कौन हो?" मुनीम को बड़ा क्रोध आया और वह भुनभुनाता हुआ भीतर चला गया। राजा भोज चकित से कालिदास का मुँह देखने लगे।

तभी सेठ की दासी बाहर आई। उन्हें देखकर उसने भी पूछा, "आप लोग कौन हैं?" कालिदास फिर बोले, "आँखें होते हुए भी तुम्हें नहीं दिखाई देता कि हम कौन हैं। दोपहर का समय है, हम भूखे हैं।" दासी को भी क्रोध आ गया। गुस्से से बोली, "भूखे हैं तो मैं क्या करूँ।" यह कहकर वह अंदर चली गई।

तभी सेठ और सेठानी मंदिर से पूजा करके लौटे। द्वार पर दो जनों को खड़ा देखकर सेठ पूछा, "कौन हैं आप लोग ? क्या कुछ दान चाहिए?" कालिदास चिढ़कर बोले, "क्या कहा-दान लगता है इस हवेली में रहने वाले सभी मूर्ख हैं। हमें देखकर भी नहीं पहचानते। हम पंडित हैं। हमारे साथ ये हमारे गुरु हैं। हम भूखे हैं, इसलिए यहाँ आए हैं।" अपने लिए मूर्ख शब्द सुनकर सेठ गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर दरबान से कहा, "इन पंडितों को धक्के देकर बाहर निकाल दो।"

यह सुनते ही दोनों वहाँ से भाग खड़े हुए। कुछ दूर जाकर राजा बोले, "महाकवि, यह नाटक है?"

"नाटक नहीं महाराज, यह आपके उत्तर को गलत सिद्ध करने का प्रमाण था। समझे आप?" कालिदास ने कहा। "अब मैं आपको आपके प्रश्न का सही उत्तर दूँगा।"

कुछ महीने बाद कालिदास और राजा ने फिर से पंडित का वेश धारण किया और उसी हवेली के सामने जा पहुँचे। राजा भोज तो डर रहे थे कि कहीं मार न खानी पड़े पर का "देखते रहिए राजन। आज मैं आपको बढ़िया भोजन खिलवाऊँगा। बस आप कुछ न बोलिएगा।" तभी हवेली में से वही दासी बाहर आई। कालिदास बोले, "धन्य हो, धन्य हो । बड़ी सौभाग्यवती हो बहन। तभी सेठानी भी आ पहुँची। कालिदास उसे देखते ही बोल उठे, "धन्य हो माँ। साक्षात सीता मैया का रूप हो देवी।" संयोग से सेठ और उनका मुनीम भी उसी समय बाहर से हवेली सीता मैया का उस्होंने पूछा, "क्या बात है ? कौन हैं ये लोग ? " कालिदास तुरंत बोल उठे, "धन्य है सेठ जी। मस्तक पर क्या तेज है! आपका सूर्य चमक रहा है। सब मंगल ही मंगल है।" कालिदास की बात सुनकर सेठ बड़ा प्रसन्न हुआ। कालिदास आगे कहने लगे, "आप तो दाता के दाता दानवीर कर्ण हैं। ईश्वर आपका भला करे। हम चलते हैं। भोजन का समय हो गया है।"

सेठ आगे बढ़कर बोला, "नहीं पंडित जी, आप ऐसे नहीं जाएँगे। आज हवेली में भोजन करके ही जाइएगा।" फिर मुनीम से कहा, "मुनीम जी, इनके लिए भोजन की व्यवस्था कीजिए।" आदर के साथ दोनों को आसन पर बिठाकर भोजन परोसा गया।

दोनों ने छककर स्वादिष्ट भोजन किया और दान-दक्षिणा लेकर लौटे।

कुछ आगे चलकर कालिदास ने कहा, "कहिए राजन कैसी रही? यह था आपके प्रश्न का सही उत्तर। भूखा नहीं खाता बल्कि जो पाता है वही खाता है।" राजा भोज कालिदास के कंधे पर हाथ रखकर मुसकराने लगे।




Monday, 27 May 2024

मणि की चोरी - पौराणिक कथा


मणि की चोरी

बहुत समय पहले द्वारिका पुरी में कृष्ण के राज्य में सत्रजित नाम का एक यादव नायक था। वह द्वारिका में सबसे धनवान व्यक्ति था। उसका भवन अत्यंत वैभवशाली था और उसके घोड़े और गायें सर्वोत्तम थीं। सबसे बड़ी बात थी कि प्रभास तीर्थ के देवता भगवान सूर्य की उस पर विशेष कृपा थी। वह भगवान सूर्य का अनन्य उपासक था। भगवान सूर्य ने अपनी कृपा के चिह्न स्वरूप उसे स्यमंतक नाम की मणि प्रदान की थी। स्यमंतक मणि एक ऐसा चामत्कारिक रत्न था जिसकी समुचित पूजा करने पर वह निकृष्ट धातुओं को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देता था।

स्यमंतक मणि की सहायता से सत्रजित ने अकूत संपत्ति एकत्र कर ली थी और वह अभिमानी एवं अहंकारी हो गया था। सत्रजित कृष्ण से घोर शत्रुता रखता था और उन्हें अन्य यादव नायकों की तरह भगवान मानने को तैयार नहीं था। वह अपनी संपत्ति वैभव-विलास में उड़ा रहा था। दूसरी ओर कृष्ण उसकी संपदा का बड़ा भाग राज्य हित में लगाना चाहते थे, जिसके लिए सत्रजित बिलकुल तैयार नहीं था।

यादवों की धर्म रक्षा हेतु कृष्ण सत्रजित से मिलने उसके भवन गए। सत्रजित ने गले में स्यमंतक मणि धारण कर रखी थी। सूर्य के प्रकाश में मणि भव्यता के साथ दमक रही थी। ऐसा लगता था मानो एक छोटा सूर्य अपने प्रभा-मंडल के साथ उग आया हो। कृष्ण की दृष्टि मणि पर टिकी थी ऐसा सत्रजित को लग रहा था। कृष्ण ने सौहार्द्रपूर्ण ढंग से यादवों की रक्षा हेतु संपत्ति की माँग का प्रश्न उठाया पर अहंकारी सत्रजित ने उनकी एक बात भी नहीं मानी। उसे लगा कि कृष्ण उसकी मणि हथियाना चाहते हैं।

कृष्ण को नीचा दिखाने के लिए सत्रजित ने एक षड्यंत्र रचा। उसने मणि अपने भाई प्रसेनजित को देकर उसे जंगल में सूर्य देवता की पवित्र गुफा में रख देने के लिए कहा। प्रसेनजित के जाने के बाद सत्रजित ने पूरी द्वारिका में इस बात का प्रचार कर दिया कि कृष्ण ने उसकी स्यमंतक मणि चुरा ली है। कृष्ण छली और कपटी है। कृष्ण के लिए यह आरोप असहनीय था। वे नहीं चाहते थे कि यादवों का उनमें विश्वास टूट जाए। इसके लिए स्वयं को निरपराध सिद्ध करना आवश्यक था और स्यमंतक मणि को खोज लाना भी बहुत ज़रूरी था। अतः कृष्ण ने घोषणा की कि वे स्यमंतक मणि ढूँढ़ कर लाएँगे या आत्मघात कर लेंगे।

दुर्भाग्य से प्रसेनजित जब जंगल में जा रहा था तो उसका सामना भयंकर सिंह से हो गया। सिंह मणि की चमक से आकर्षित हो गया था। प्रसेनजित ने बहादुरी से सिंह का मुकाबला किया किंतु आखिर में उसके हाथों मारा गया। मणि लेकर सिंह कुछ दूर ही गया था कि उसकी मुठभेड़ एक विशालकाय रीछ से हुई। रोछ अत्यंत बलवान और शक्तिशाली था। सिंह रीछ के हाथों मारा गया और रीछ वह मणि लेकर अपनी गुफा में चला गया।

उधर सत्रजित अपने भाई के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था कि तभी उसे समाचार मिला कि प्रसेनजित जंगल में सिंह के हाथों मारा गया है। सत्रजित पर मानो वज्रपात हुआ। उसका अहंकार, आत्मविश्वास, यादवों पर आधिपत्य जमाने की महत्त्वाकांक्षा, सब ध्वस्त हो गया।

स्यमंतक मणि की खोज में शिकारी वेश में श्रीकृष्ण उसी जंगल में पहुँचे जहाँ प्रसेनजित गया था। बहुत खोजने पर उन्हें एक स्थान पर प्रसेनजित का मृत शरीर पड़ा मिला पर उसके पास स्यमंतक का कोई नामो निशान नहीं था, केवल उस जंजीर का कुछ भाग गले में लटका था जिसमें कृष्ण ने मणि को सत्रजित के गले में देखा था। कृष्ण को विश्वास हो गया कि मणि प्रसेनजित के ही पास थी।

कुछ दूर आगे चलने पर उन्हें झाड़ी के पास सिंह का मृत शरीर दिखाई दिया। सिंह के पंजे में प्रसेनजित के वस्त्र का टुकड़ा फँसा हुआ था। यह वही सिंह था जिसने प्रसेनजित को मारा था। सिंह के पास किसी विशालकाय रीछ के बड़े-बड़े पैरों के निशान थे। ये निशान एक दिशा में जा रहे थे। कृष्ण ने उन पदचिह्नों का पीछा किया तो वे एक गुफा के सामने पहुँच गए। कृष्ण को विश्वास था कि रीछ मणि लेकर इसी गुफा में गया है।

कृष्ण गुफा में प्रवेश कर गए। बड़ी अद्भुत थी वह गुफा। उसमें एक लंबा रास्ता था जो अंत में एक विशाल कक्ष में जाकर समाप्त हुआ। कृष्ण ने वहाँ कुछ रीछ बालकों को उस मणि के साथ खेलते देखा। संभवतः वह रीछों की गुफा थी।

तभी गुफा में घोर गर्जना हुई। श्रीकृष्ण ने देखा कि एक विशालकाय रीछ तेज़ी से उनकी ओर बढ़ा आ रहा है। कृष्ण के पास अवसर न था। अतः दोनों गुत्थमगुत्था होकर युद्ध करने लगे। दोनों एक दूसरे के वार को बचाने का प्रयास कर रहे थे। काफ़ी देर तक दोनों इसी प्रकार लड़ते रहे। रीछ वृद्ध होते हुए भी बड़ा शक्तिशाली था। अंत में कृष्ण ने रीछ को दोनों हाथों से उठाकर गुफा के फर्श पर पटक दिया।

रीछ के अचरज की सीमा न थी। उसे आज तक कोई हरा नहीं सका था। वास्तव में वह रीछ और कोई नहीं, रामायण काल का जांबवान था। जांबवान ने गौर से कृष्ण की ओर देखा। उसे श्रीकृष्ण में अपने प्रभु श्रीराम की छवि दिखाई दी। तुरंत जांबवान को प्रभु का दिया वायदा याद आ गया कि मैं द्वापर युग में एक बार तुमसे फिर मिलूँगा।

जांबवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा माँगने लगा। उसने अपने प्रभु राम को तुरंत क्यों नहीं पहचान लिया, इसका उसे बड़ा दुख था। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, शरीर पुलकित हो उठा। उसके आनंद की सीमा न रही। उसका जीवन सुफल हो गया था।

श्रीकृष्ण से जंगल में आने का कारण और गुफा तक पहुँचने की पूरी कहानी सुनने के बाद जांबवान ने वह मणि आदरपूर्वक कृष्ण को सौंप दी। अपने प्रभु के दर्शन पाने के लिए उसने लंबी प्रतीक्षा की थी। हर्षातिरेक में उसका कंठ अवरुद्ध हो गया। कृष्ण उसकी दशा समझ रहे थे।

जांबवान और उसके परिवार को आशीर्वाद देकर कृष्ण मणि लेकर गुफा से बाहर आ गए और सत्रजित से मिलने चल दिए।

स्यमंतक को दुबारा पाकर सत्रजित की खुशी का ठिकाना न था। उसकी आँखों से मोह व अहंकार का परदा हट गया था। श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर उसने अपने पापों के लिए क्षमा माँगी। कृष्ण को भी इस बात की खुशी थी कि द्वारिका पुरी के समस्त नागरिकों में अपने प्रति विश्वास को बचाने में वे सफल रहे थे। उन्होंने स्वयं को मणि की चोरी के आरोप से मुक्त कर लिया था। 





Tuesday, 5 December 2023

श्रीराम की बाल - लीला सप्रसंग व्याख्या

श्रीराम की बाल - लीला


सप्रसंग व्याख्या


1. कबहूँ ससि -------- । 

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' भाग - 8' के पाठ-9 श्री राम की बाल -लीला से उद्धृत की गई हैं। इनके रचियता  कवि शिरोमणि तुलसीदास जी हैं। तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं।  प्रस्तुत पद्‌यांश में तुलसीदास जी ने श्रीराम के  बाल रूप और महाराज दशरथ के अन्य पुत्त्रों के बाल रूप का  मनोहरी वर्णन किया गया है। 


भावार्थ/व्याख्या : कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि कभी चंद्रमा को माँगने की ज़िद (हठ) करते हैं, तो कभी अपनी परछाई देखकर डरते हैं, कभी हाथ से ताली बजा - बजाकर नाचते हैं, जिससे सब माताओं के हृदय आनंद से भर जाते हैं। कभी - कभी हठपूर्वक कुछ कहते (माँगते) हैं और जिस वस्तु के लिए हठ करते हैं  या अड़ते हैं, उसे लेकर ही मानते हैं।  अयोध्यापति महाराज के वे चरों बालक तुलसीदास के मन रूपी मंदिर में सदैव विहार करते हैं। 

भाव - तुलसीदास जी श्रीराम और उनके भाइयों की बाल -लीला देखकर उन्हें अपने मन-मंदिर में सदैव के लिए बिठा लेते हैं। 



2. बर दंत—----------------------------  बोलन की। 

भावार्थ : कवि तुलसीदास राम के बाल रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि कमल के समान उज्जवल दाँतों की पंक्ति, होठों का खोलना और मुक्त - मालाओं की छवि ऐसी जान पड़ती हैं मानों काले व रंग के बादलों के भीतर चमक रही हो। मुख पर घुँघराली लटें लटक रही हैं। कवि तुलसी जी ऐसा मनोहर रूप देखकर कहते हैं कि लल्ला मैं कुंडलों (लटों) की झलक से सुशोभित तुम्हारे कपोलों (गालों) और इन अमोल बोलों (बातों) पर अपने प्राण न्योछावर करता हूँ।



3. पग नूपुर -------कौन जिए । 

भावार्थ : तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के पैरों में नूपुर घुँघरू हैं, उनके कमल रूपी हाथों में आभूषण हैं तथा गले में मोतियों की माला सुशोभित है । उन्होंने नवीन नीले कमल के समान शरीर पर पीले वस्त्र पहने हुए हैं । राजा दशरथ उन्हें गोद में लिए हुए हर्ष से रोमांचित हो रहे हैं । महाराज दशरथ के नेत्र रूपी भौंरे राम के मुख्य रूपी कमल के रूप-रूपी पराग( रस) को पीकर आनंदित हो रहे हैं अर्थात दशरथ श्री राम की सुंदरता को देखकर मंत्रमुग्ध  हो रहे हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि ऐसा बाल रूप मन में नहीं बस तो संसार में जीवित रहने का कोई लाभ नहीं है।



4. तनकी दुति —-------------- में बिहरैं।।

भावार्थ :  तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के शरीर की कांति चमक नील कमल के समान है। उनके नेत्र कमल की सुंदरता को मात देने वाले हैं । धूल से लिपटे हुए राम के सुंदर शरीर की शोभा कामदेव की अत्यधिक सुंदरता को भी एक कोने में कर देती है अर्थात श्री राम का बाल रूप अत्यंत मनमोहक है । छोटे-छोटे दाँतों की कांति बिजली के समान उस समय चमकती है, जब वह सुंदर बालक बाल विनोद में किलकारी मारते हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि महाराज दशरथ के चारों बालक तुलसी के मन रूपी मंदिर में सदा विहार करें अर्थात सदा उनके मन में बसे रहें।


Sunday, 29 October 2023

पतझर में टूटी पत्तियाँ CLASS 10 FULL EXPLANATION

               पतझर में टूटी पत्तियाँ 

                                             गिन्नी का सोना, झेन की देन                                                           


                                                                                          लेखक : रवींद्र केलेकर

--------------------------------------------------------------------------------

                                      


                                                         गिन्नी का सोना

पहला प्रसंग हमें उन लोगों से परिचित कराता है जिनके कारण यह समाज जीने और रहने योग्य बना हुआ है। लेखक ने तीन प्रकार के लोगों का जिक्र इस पाठ में किया है : आदर्शवादी, व्यावहारिक तथा व्यावहारिक आदर्शवादी व्यक्ति और इन्हें स्पष्ट करने के लिए लेखक ने शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने का उदाहरण दिया है।


प्रसंग का सारांश


शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने में अंतर :


लेखक का मानना है कि शुद्ध सोना गिन्नी के सोने से भिन्न होता है। शुद्ध सोने को मजबूत और चमकदार बनाने के लिए उसमें थोड़ी मात्रा में ताँबा मिलाया जाता है। इससे वह सोना काम में लाने योग्य बन जाता है किंतु उसकी शुद्धता में थोड़ी कमी आ जाती है।


आदर्शवादिता और व्यावहारिकता :


लेखक ने शुद्ध सोने को शुद्ध आदर्शवादी लोगों का प्रतीक बनाया है और गिन्नी के सोने को व्यावहारिक आदर्शवादी लोगों का। जिस प्रकार आदर्शवादी लोग अपने आदर्शों को व्यवहार में लाने के लिए उसमें व्यावहारिकता मिला लेते हैं ताकि उनके आदर्श समाज व देश के हित में प्रयोग में लाए जा सकें, उसी प्रकार शुद्ध सोने में ताँबा मिलाकर उसको प्रयोग में लाया जाता है।


प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट के रूप में गांधीजी परिचय का :


लेखक ने गांधीजी का उदाहरण देते हुए बताया है कि वे व्यावहारिक आदर्शवादी व्यक्ति थे। अपने विलक्षण आदर्शों को चलाने के लिए व्यावहारिकता का महत्व भी समझते थे किंतु उन्होंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि आदशों का स्तर नीचे न गिरे बल्कि व्यावहारिकता आदर्शों के स्तर पर पहुँच जाए। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में हमेशा सोना ही आगे आ रहा । ताँबे की चमक उस पर हावी नहीं हो सकी।


समाज में आदर्शवादी लोगों की भूमिका :


लेखक का मानना है कि हमारा समाज केवल आदर्शवादी लोगों के कारण ही जीने योग्य बना हुआ है। आदर्शवादी लोगों के कारण ही शाश्वत मूल्य जीवित हैं । व्यवहारवादी लोगों ने तो सदा उसे नीचे गिराने का ही काम किया है। यह सच है कि व्यवहारवादी लोग हमें सफल होते हुए, आगे बढ़ते हुए नजर आते हैं किंतु खुद आगे बढ़ें और दूसरों को भी साथ लेकर चलें, यही वास्तविक सफलता है।


झेन की देन        

यह दूसरा प्रसंग बौद्ध दर्शन में प्रचलित ध्यान की एक पद्धति को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कहने को यह एक टी-सेरेमनी है, किंतु इसका वास्तविक उद्देश्य तनावग्रस्त व्यक्ति को तनावमुक्त करना है। लेखक ने ध्यान की इस प्रक्रिया को ही 'झेन की देन' नाम दिया है। झेन बौद्ध दर्शन की एक ऐसी परंपरा है जिसके माध्यम से जापान के लोग तनाव से भरे जीवन में कुछ चैन भरे पल पा जाते हैं, इसीलिए इसे देन कहा गया है।


जापान में मानसिक रोगों की अधिकता


जापान के अधिकांश लोग मानसिक रूप से रोगी हैं। इसका कारण है उनका भाग-दौड़ भरा जीवन। जापान जनसंख्या और भौगोलिक दृष्टि से छोटा देश है जबकि वह बड़े-बड़े देशों से आगे निकलने की कामना करता है। इसकी सारी जिम्मेदारी उस देश के नागरिकों के कंधों पर होती है। ऐसे में उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा व आर्थिक-सामाजिक दबावों के कारण उनके मस्तिष्क में तनाव पैदा होता है। यही तनाव मानसिक रोगों का रूप ले लेता है। तनाव मानसिक रोग के रूप में सामने आता है। हम इससे पूरी तरह सहमत है कि जब दिमाग पर ज़रूरत से बोझ डाला जाता है, तो एक सीमा के बाद वह काम करना बंद कर ही देता है और व्यक्ति को मनोरुग्ण बना देता है।


स्पीड का इंजन


जापान के लोग अपने देश को अन्य देशों से आगे निकालने की होड़ में अपने दिमाग से कहीं अधिक काम लेने की कोशिश करते हैं। हमारा दिमाग वैसे भी बहुत तेज़ गति से चलता है। जब उसे जानबूझकर बहुत तेज़ चलाया जाए, उससे जरूरत से ज्यादा काम लिया जाए तो वह ऐसी स्थिति होती है मानो किसी मशीन पर उसकी क्षमता से ज्यादा बोझ डाला जाए तो वह खराब हो जाती है। ऐसे ही दिमाग को अत्यधिक तीव्र गति से चलाएँ तो वह तनावग्रस्त हो जाता है और यही तनाव मानसिक रोगों का रूप ले लेता है।


जापान की विशेष टी-सेरेमनी


लेखक के मित्र उन्हें एक टी-सेरेमनी में ले गए जो वास्तव में ध्यान की एक विधि थी। इसका आयोजन एक इमारत की ऊपरी मंजिल पर किया गया था। पूर्ण प्राकृतिक वातावरण देने की कोशिश की गई थी। वहाँ पर आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल न करते हुए चाय अँगीठी पर बनाई जा रही थी। चाय बनाकर पिलाने वाला व्यक्ति चाजीन अपने सभी छोटे-बड़े कार्य बड़े सुव्यवस्थित ढंग से कर रहा था । वहाँ एक समय में केवल तीन लोगों को ही प्रवेश दिया जाता था ताकि वातावरण में शांति बनी रह सके।



Sunday, 22 October 2023

आत्मत्राण (प्रार्थना गीत) भावार्थ CLASS 10

आत्मत्राण (प्रार्थना गीत)


पाठ का भावार्थ व संदेश 


रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित यह प्रार्थना गीत परंपरागत प्रार्थना गीतों से अलग है क्योंकि कवि इसमें ईश्वर से जीवन के हर मार्ग को, विपत्ति को या कष्ट को सरल करने या हरण करने की प्रार्थना नहीं करते बल्कि वे तो ईश्वर से विपत्ति का सामना करने की शक्ति चाहते हैं, निर्भयता का वरदान चाहते हैं  ताकि वह संघर्षों से विचलित न हों । वे अपने लिए ईश्वर से सहायता नहीं; आत्मबल और पुरुषार्थ चाहते हैं। सांत्वना-दिलासा नहीं, बहादुरी चाहते हैं। वंचना, निराशा और दुखों के बीच प्रभु की कृपा, शक्ति और सत्ता में अटल विश्वास भाव चाहते हैं । कवि के अनुसार तैरने के लिए स्वयं ही हाथ-पैर मारने पड़ते हैं, तभी कोई तैराक बन पाता है, परीक्षा में सफलता के लिए आशीर्वाद तो लिया जा सकता है, पर परीक्षा स्वयं देनी पड़ती है। इसी प्रकार ईश्वर से निडरता का, शक्ति का और आस्था का वरदान तो लिया जाता है पर जीवन संग्राम में लड़ना तो हमें स्वयं ही करना है। चुनौतियों के बीच रास्ता बनाना हमें स्वयं आना चाहिए । यही इस कविता का संदेश है।



विशेष :

  • आत्मत्राण का अर्थ : स्वयं अपनी रक्षा करना। 

  • मूल रचना - बंगला भाषा में 

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा हिंदी में अनूदित। 

  • कविता में कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि कभी भी किसी विपत्ति में उनकी आंतरिक शक्ति तथा ईश्वर में विश्वास न हिलें। 

  • प्रत्येक मनुष्य को आपदाओं का सामना स्वयं ही करना पड़ता है, अतः उसके लिए उच्च मनोबल आवश्यक है और उसी को पाने के लिए कवि प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं। 

  • कवि प्रभु से बार-बार यही विनती करते हैं कि वे हर मुसीबत में उन्हें निर्भय रखें। किसी भी दुःख में वह ईश्वर पर संशय न करें। 


कविता का भावार्थ 

1. विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं 

    -----------------------------------------------------

    —--------------------------------------------------

    मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं। 


भावार्थ : कवि प्रभु से कहते हैं कि हे प्रभु! मैं आपसे यह प्रार्थना नहीं करता कि आप मुझे संकटों से बचाओ। मैं केवल इतनी प्रार्थना करता हूँ कि आप दयावान हैं, मुझ पर अपनी करुणा बनाएँ रखें ताकि मैं किसी भी संकट में भयभीत न होऊँ । सब संकटों को सहर्ष झेल जाऊँ। यदि मेरा हृदय दुख और कष्ट से पीड़ित हो, तो चाहे आप मुझे सांत्वना के शब्द मत कहना। मैं अपने दुखों को स्वयं सहन कर लूँगा परंतु हे करुणामय प्रभु ! इतनी कृपा करना, मुझे उन दुखों को सहन करने की शक्ति अवश्य देना, उन पर नियंत्रण करने की ताकत जरूर देना । हे प्रभु! यदि मुसीबत में मुझे कोई सहायता करने वाला न मिले तो कोई बात नहीं, मेरी प्रार्थना है कि मेरा अपना बल और पराक्रम डाँवाडोल न हो। मुसीबत में घबरा न जाऊँ। मेरा अपना बल ही मेरे काम आ जाए। यदि लाभ मुझे हर बार धोखा देता रहे और मुझे हानि ही हानि उठानी पड़े, तो भी मैं मन में अपना सर्वनाश न मान बैठूँ, मैं निराशा से न भर जाऊँ। मैं नहीं चाहता कि तुम प्रतिदिन हर संकट में मेरी रक्षा करो। मेरा बचाव करो, यह निवेदन नहीं है।


शिल्प-सौंदर्य-

1. कवि परमात्मा से ऐसी शक्ति चाहते हैं जिससे वह विपत्तियों से भयभीत न हों और उनका सहर्ष मुकाबला   

     कर सकें।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. संस्कृत के शब्दों का प्रयोग ईश्वर की प्रार्थना के कारण किया गया है।

4. भाषा अत्यंत विनयपूर्ण है। अनुवाद होते हुए भी इसमें मौलिक कविता का स्वाद है ।

5. आत्मकथन और संबोधन शैली के कारण यह काव्यांश मनोरम बन पड़ा है।

6. कवि का आस्थावादी व्यक्तित्व प्रकट हुआ है।

7. मुक्त छंद की रचना है ।

8. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।


2. बस इतना होवे (करुणामय)

     —-------------------------------

     —--------------------------------

    तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।




भावार्थ : कवि प्रभु से निवेदन करते हुए कहते हैं  कि हे प्रभु! बस मेरा निवेदन यह है कि तुम मुझे हर संकट से उबरने की अविकल शक्ति दो। मैं स्वस्थ मन से संकट से पार उतर सकूँ। यदि मेरे दुख में आप मुझे तसल्ली नहीं देते तो न दें! मैं मानता | हूँ कि इससे मेरे जीवन का दुख भार कम न होगा, मैं उस दुख भार को सहन कर लूँगा परंतु आपसे विनयपूर्ण प्रार्थना यह है कि आप मुझे इस दुख को सहन करने की शक्ति दो। मैं दुख की इस घड़ी में भयभीत न हो जाऊँ, इतनी शक्ति अवश्य दें। सुख के क्षणों में सिर झुकाकर हर क्षण आपकी छवि को देखूँ। हर सुख को आपकी कृपा मानूँ। जब मैं दुख की रात से घिर जाऊँ तब भी है करुणामय ईश्वर! मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं आप पर किसी प्रकार का संदेह न करूँ। मेरे मन में आपके प्रति भक्ति भाव बना रहे।


शिल्प-सौंदर्य-

1. कवि परमात्मा से प्रत्येक स्थिति में समस्त कठिनाइयों को सहज रूप में स्वीकार कर उनका मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. संस्कृत के शब्दों का प्रयोग ईश्वर की प्रार्थना के कारण किया गया है।

4. भाषा अत्यंत विनयपूर्ण है। अनुवाद होते हुए भी इसमें मौलिक कविता का स्वाद है। 5. आत्मकथन और संबोधन शैली के कारण यह काव्यांश मनोरम बन पड़ा है।

6. कवि का आस्थावादी व्यक्तित्व प्रकट हुआ है।

7. मुक्त छंद की रचना है।

8. (i) अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

    (ii) 'छिन छिन' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ।

    (ii) 'दुख-रात्रि' में रूपक अलंकार है ।




Thursday, 12 October 2023

जितनी चादर, उतना पैर - कहानी

जितनी चादर, उतना पैर कहानी 

अत्यंत गरीब परिवार का एक बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी में सफर कर रहा था। घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियाँ हो रखी थीं। आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी और वह टिफिन में से रोटियाँ निकालकर खाने लगा। उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था। वह रोटी का एक टुकड़ा लता और उसे टिफिन के अंदर कुछ ऐसे डालता, मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियाँ थीं उसकी इस हरकत को आस- पास के दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे। वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता। सभी यह सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्या कर रहा है? आखिरकार, एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने युवक से पूछ ही लिया कि भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं,  फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो, मानो उसमें सब्जी हो?

तब उस युवक ने जवाब दिया, "भैया, इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मैं अपने मन में यह सोचकर खा रहा हूँ कि इसमें बहुत सारा अचार है।"

फिर उस व्यक्ति ने पूछा, "खाली ढक्कन में अचार सोचकर सूखी रोटी को खा रहे हो, तो क्या तुम्हें अचार का स्वाद आ रहा है?"

"हाँ बिलकुल आ रहा है, मैं रोटी के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है।" युवक ने जवाब दिया।

उसके इस बात को आस-पास के यात्रियों ने भी सुना और उन्हीं में एक व्यक्ति बोला- “जब सोचना ही था, तो तुम अचार की जगह पर मटर पनीर सोचते, शाही पनीर सोचते... तुम्हें इनका स्वाद मिल जाता तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने अचार सोचा, तो अचार का स्वाद आया। यदि और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद आता सोचना ही था तो भला छोटा क्यों सोचा, तुम्हें तो बड़ा सोचना चाहिए था।"

बेरोजगार युवक ने उस यात्री से कहा- "भाईसाहब! मैं बहुत ही गरीब परिवार से हूँ। मेरे घर पर बहुत बार ऐसा होता है कि रोटी के साथ सब्जी नहीं बनती है। तब में अचार से ही रोटी खाकर संतुष्ट हो जाता हूँ। यदि मैं आज अचार की बात न सोचकर किसी ऐसी सब्जी की सोचता, जिसे मैंने कभी चखकर ही नहीं देखा, तो उसका स्वाद कैसे आता ? मैं उसी स्वाद की कल्पना कर सकता हूँ, जिसे मैंने चखा हो। यदि मैं यह सब सोचता तो घर पर मुझे सचमुच में भी अचार खाकर खुशी नहीं मिलती। मेरा तो एक सिद्धांत है जितनी चादर, उतना पैर" यह सुनकर सभी यात्री चुप हो गए।