HINDI BLOG : 2023

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Tuesday, 5 December 2023

श्रीराम की बाल - लीला सप्रसंग व्याख्या

श्रीराम की बाल - लीला


सप्रसंग व्याख्या


1. कबहूँ ससि -------- । 

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' भाग - 8' के पाठ-9 श्री राम की बाल -लीला से उद्धृत की गई हैं। इनके रचियता  कवि शिरोमणि तुलसीदास जी हैं। तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं।  प्रस्तुत पद्‌यांश में तुलसीदास जी ने श्रीराम के  बाल रूप और महाराज दशरथ के अन्य पुत्त्रों के बाल रूप का  मनोहरी वर्णन किया गया है। 


भावार्थ/व्याख्या : कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि कभी चंद्रमा को माँगने की ज़िद (हठ) करते हैं, तो कभी अपनी परछाई देखकर डरते हैं, कभी हाथ से ताली बजा - बजाकर नाचते हैं, जिससे सब माताओं के हृदय आनंद से भर जाते हैं। कभी - कभी हठपूर्वक कुछ कहते (माँगते) हैं और जिस वस्तु के लिए हठ करते हैं  या अड़ते हैं, उसे लेकर ही मानते हैं।  अयोध्यापति महाराज के वे चरों बालक तुलसीदास के मन रूपी मंदिर में सदैव विहार करते हैं। 

भाव - तुलसीदास जी श्रीराम और उनके भाइयों की बाल -लीला देखकर उन्हें अपने मन-मंदिर में सदैव के लिए बिठा लेते हैं। 



2. बर दंत—----------------------------  बोलन की। 

भावार्थ : कवि तुलसीदास राम के बाल रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि कमल के समान उज्जवल दाँतों की पंक्ति, होठों का खोलना और मुक्त - मालाओं की छवि ऐसी जान पड़ती हैं मानों काले व रंग के बादलों के भीतर चमक रही हो। मुख पर घुँघराली लटें लटक रही हैं। कवि तुलसी जी ऐसा मनोहर रूप देखकर कहते हैं कि लल्ला मैं कुंडलों (लटों) की झलक से सुशोभित तुम्हारे कपोलों (गालों) और इन अमोल बोलों (बातों) पर अपने प्राण न्योछावर करता हूँ।



3. पग नूपुर -------कौन जिए । 

भावार्थ : तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के पैरों में नूपुर घुँघरू हैं, उनके कमल रूपी हाथों में आभूषण हैं तथा गले में मोतियों की माला सुशोभित है । उन्होंने नवीन नीले कमल के समान शरीर पर पीले वस्त्र पहने हुए हैं । राजा दशरथ उन्हें गोद में लिए हुए हर्ष से रोमांचित हो रहे हैं । महाराज दशरथ के नेत्र रूपी भौंरे राम के मुख्य रूपी कमल के रूप-रूपी पराग( रस) को पीकर आनंदित हो रहे हैं अर्थात दशरथ श्री राम की सुंदरता को देखकर मंत्रमुग्ध  हो रहे हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि ऐसा बाल रूप मन में नहीं बस तो संसार में जीवित रहने का कोई लाभ नहीं है।



4. तनकी दुति —-------------- में बिहरैं।।

भावार्थ :  तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के शरीर की कांति चमक नील कमल के समान है। उनके नेत्र कमल की सुंदरता को मात देने वाले हैं । धूल से लिपटे हुए राम के सुंदर शरीर की शोभा कामदेव की अत्यधिक सुंदरता को भी एक कोने में कर देती है अर्थात श्री राम का बाल रूप अत्यंत मनमोहक है । छोटे-छोटे दाँतों की कांति बिजली के समान उस समय चमकती है, जब वह सुंदर बालक बाल विनोद में किलकारी मारते हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि महाराज दशरथ के चारों बालक तुलसी के मन रूपी मंदिर में सदा विहार करें अर्थात सदा उनके मन में बसे रहें।


Sunday, 29 October 2023

पतझर में टूटी पत्तियाँ CLASS 10 FULL EXPLANATION

               पतझर में टूटी पत्तियाँ 

                                             गिन्नी का सोना, झेन की देन                                                           


                                                                                          लेखक : रवींद्र केलेकर

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                                                         गिन्नी का सोना

पहला प्रसंग हमें उन लोगों से परिचित कराता है जिनके कारण यह समाज जीने और रहने योग्य बना हुआ है। लेखक ने तीन प्रकार के लोगों का जिक्र इस पाठ में किया है : आदर्शवादी, व्यावहारिक तथा व्यावहारिक आदर्शवादी व्यक्ति और इन्हें स्पष्ट करने के लिए लेखक ने शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने का उदाहरण दिया है।


प्रसंग का सारांश


शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने में अंतर :


लेखक का मानना है कि शुद्ध सोना गिन्नी के सोने से भिन्न होता है। शुद्ध सोने को मजबूत और चमकदार बनाने के लिए उसमें थोड़ी मात्रा में ताँबा मिलाया जाता है। इससे वह सोना काम में लाने योग्य बन जाता है किंतु उसकी शुद्धता में थोड़ी कमी आ जाती है।


आदर्शवादिता और व्यावहारिकता :


लेखक ने शुद्ध सोने को शुद्ध आदर्शवादी लोगों का प्रतीक बनाया है और गिन्नी के सोने को व्यावहारिक आदर्शवादी लोगों का। जिस प्रकार आदर्शवादी लोग अपने आदर्शों को व्यवहार में लाने के लिए उसमें व्यावहारिकता मिला लेते हैं ताकि उनके आदर्श समाज व देश के हित में प्रयोग में लाए जा सकें, उसी प्रकार शुद्ध सोने में ताँबा मिलाकर उसको प्रयोग में लाया जाता है।


प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट के रूप में गांधीजी परिचय का :


लेखक ने गांधीजी का उदाहरण देते हुए बताया है कि वे व्यावहारिक आदर्शवादी व्यक्ति थे। अपने विलक्षण आदर्शों को चलाने के लिए व्यावहारिकता का महत्व भी समझते थे किंतु उन्होंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि आदशों का स्तर नीचे न गिरे बल्कि व्यावहारिकता आदर्शों के स्तर पर पहुँच जाए। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में हमेशा सोना ही आगे आ रहा । ताँबे की चमक उस पर हावी नहीं हो सकी।


समाज में आदर्शवादी लोगों की भूमिका :


लेखक का मानना है कि हमारा समाज केवल आदर्शवादी लोगों के कारण ही जीने योग्य बना हुआ है। आदर्शवादी लोगों के कारण ही शाश्वत मूल्य जीवित हैं । व्यवहारवादी लोगों ने तो सदा उसे नीचे गिराने का ही काम किया है। यह सच है कि व्यवहारवादी लोग हमें सफल होते हुए, आगे बढ़ते हुए नजर आते हैं किंतु खुद आगे बढ़ें और दूसरों को भी साथ लेकर चलें, यही वास्तविक सफलता है।


झेन की देन        

यह दूसरा प्रसंग बौद्ध दर्शन में प्रचलित ध्यान की एक पद्धति को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कहने को यह एक टी-सेरेमनी है, किंतु इसका वास्तविक उद्देश्य तनावग्रस्त व्यक्ति को तनावमुक्त करना है। लेखक ने ध्यान की इस प्रक्रिया को ही 'झेन की देन' नाम दिया है। झेन बौद्ध दर्शन की एक ऐसी परंपरा है जिसके माध्यम से जापान के लोग तनाव से भरे जीवन में कुछ चैन भरे पल पा जाते हैं, इसीलिए इसे देन कहा गया है।


जापान में मानसिक रोगों की अधिकता


जापान के अधिकांश लोग मानसिक रूप से रोगी हैं। इसका कारण है उनका भाग-दौड़ भरा जीवन। जापान जनसंख्या और भौगोलिक दृष्टि से छोटा देश है जबकि वह बड़े-बड़े देशों से आगे निकलने की कामना करता है। इसकी सारी जिम्मेदारी उस देश के नागरिकों के कंधों पर होती है। ऐसे में उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा व आर्थिक-सामाजिक दबावों के कारण उनके मस्तिष्क में तनाव पैदा होता है। यही तनाव मानसिक रोगों का रूप ले लेता है। तनाव मानसिक रोग के रूप में सामने आता है। हम इससे पूरी तरह सहमत है कि जब दिमाग पर ज़रूरत से बोझ डाला जाता है, तो एक सीमा के बाद वह काम करना बंद कर ही देता है और व्यक्ति को मनोरुग्ण बना देता है।


स्पीड का इंजन


जापान के लोग अपने देश को अन्य देशों से आगे निकालने की होड़ में अपने दिमाग से कहीं अधिक काम लेने की कोशिश करते हैं। हमारा दिमाग वैसे भी बहुत तेज़ गति से चलता है। जब उसे जानबूझकर बहुत तेज़ चलाया जाए, उससे जरूरत से ज्यादा काम लिया जाए तो वह ऐसी स्थिति होती है मानो किसी मशीन पर उसकी क्षमता से ज्यादा बोझ डाला जाए तो वह खराब हो जाती है। ऐसे ही दिमाग को अत्यधिक तीव्र गति से चलाएँ तो वह तनावग्रस्त हो जाता है और यही तनाव मानसिक रोगों का रूप ले लेता है।


जापान की विशेष टी-सेरेमनी


लेखक के मित्र उन्हें एक टी-सेरेमनी में ले गए जो वास्तव में ध्यान की एक विधि थी। इसका आयोजन एक इमारत की ऊपरी मंजिल पर किया गया था। पूर्ण प्राकृतिक वातावरण देने की कोशिश की गई थी। वहाँ पर आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल न करते हुए चाय अँगीठी पर बनाई जा रही थी। चाय बनाकर पिलाने वाला व्यक्ति चाजीन अपने सभी छोटे-बड़े कार्य बड़े सुव्यवस्थित ढंग से कर रहा था । वहाँ एक समय में केवल तीन लोगों को ही प्रवेश दिया जाता था ताकि वातावरण में शांति बनी रह सके।



Sunday, 22 October 2023

आत्मत्राण (प्रार्थना गीत) भावार्थ CLASS 10

आत्मत्राण (प्रार्थना गीत)


पाठ का भावार्थ व संदेश 


रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित यह प्रार्थना गीत परंपरागत प्रार्थना गीतों से अलग है क्योंकि कवि इसमें ईश्वर से जीवन के हर मार्ग को, विपत्ति को या कष्ट को सरल करने या हरण करने की प्रार्थना नहीं करते बल्कि वे तो ईश्वर से विपत्ति का सामना करने की शक्ति चाहते हैं, निर्भयता का वरदान चाहते हैं  ताकि वह संघर्षों से विचलित न हों । वे अपने लिए ईश्वर से सहायता नहीं; आत्मबल और पुरुषार्थ चाहते हैं। सांत्वना-दिलासा नहीं, बहादुरी चाहते हैं। वंचना, निराशा और दुखों के बीच प्रभु की कृपा, शक्ति और सत्ता में अटल विश्वास भाव चाहते हैं । कवि के अनुसार तैरने के लिए स्वयं ही हाथ-पैर मारने पड़ते हैं, तभी कोई तैराक बन पाता है, परीक्षा में सफलता के लिए आशीर्वाद तो लिया जा सकता है, पर परीक्षा स्वयं देनी पड़ती है। इसी प्रकार ईश्वर से निडरता का, शक्ति का और आस्था का वरदान तो लिया जाता है पर जीवन संग्राम में लड़ना तो हमें स्वयं ही करना है। चुनौतियों के बीच रास्ता बनाना हमें स्वयं आना चाहिए । यही इस कविता का संदेश है।



विशेष :

  • आत्मत्राण का अर्थ : स्वयं अपनी रक्षा करना। 

  • मूल रचना - बंगला भाषा में 

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा हिंदी में अनूदित। 

  • कविता में कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि कभी भी किसी विपत्ति में उनकी आंतरिक शक्ति तथा ईश्वर में विश्वास न हिलें। 

  • प्रत्येक मनुष्य को आपदाओं का सामना स्वयं ही करना पड़ता है, अतः उसके लिए उच्च मनोबल आवश्यक है और उसी को पाने के लिए कवि प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं। 

  • कवि प्रभु से बार-बार यही विनती करते हैं कि वे हर मुसीबत में उन्हें निर्भय रखें। किसी भी दुःख में वह ईश्वर पर संशय न करें। 


कविता का भावार्थ 

1. विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं 

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    मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं। 


भावार्थ : कवि प्रभु से कहते हैं कि हे प्रभु! मैं आपसे यह प्रार्थना नहीं करता कि आप मुझे संकटों से बचाओ। मैं केवल इतनी प्रार्थना करता हूँ कि आप दयावान हैं, मुझ पर अपनी करुणा बनाएँ रखें ताकि मैं किसी भी संकट में भयभीत न होऊँ । सब संकटों को सहर्ष झेल जाऊँ। यदि मेरा हृदय दुख और कष्ट से पीड़ित हो, तो चाहे आप मुझे सांत्वना के शब्द मत कहना। मैं अपने दुखों को स्वयं सहन कर लूँगा परंतु हे करुणामय प्रभु ! इतनी कृपा करना, मुझे उन दुखों को सहन करने की शक्ति अवश्य देना, उन पर नियंत्रण करने की ताकत जरूर देना । हे प्रभु! यदि मुसीबत में मुझे कोई सहायता करने वाला न मिले तो कोई बात नहीं, मेरी प्रार्थना है कि मेरा अपना बल और पराक्रम डाँवाडोल न हो। मुसीबत में घबरा न जाऊँ। मेरा अपना बल ही मेरे काम आ जाए। यदि लाभ मुझे हर बार धोखा देता रहे और मुझे हानि ही हानि उठानी पड़े, तो भी मैं मन में अपना सर्वनाश न मान बैठूँ, मैं निराशा से न भर जाऊँ। मैं नहीं चाहता कि तुम प्रतिदिन हर संकट में मेरी रक्षा करो। मेरा बचाव करो, यह निवेदन नहीं है।


शिल्प-सौंदर्य-

1. कवि परमात्मा से ऐसी शक्ति चाहते हैं जिससे वह विपत्तियों से भयभीत न हों और उनका सहर्ष मुकाबला   

     कर सकें।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. संस्कृत के शब्दों का प्रयोग ईश्वर की प्रार्थना के कारण किया गया है।

4. भाषा अत्यंत विनयपूर्ण है। अनुवाद होते हुए भी इसमें मौलिक कविता का स्वाद है ।

5. आत्मकथन और संबोधन शैली के कारण यह काव्यांश मनोरम बन पड़ा है।

6. कवि का आस्थावादी व्यक्तित्व प्रकट हुआ है।

7. मुक्त छंद की रचना है ।

8. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।


2. बस इतना होवे (करुणामय)

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    तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।




भावार्थ : कवि प्रभु से निवेदन करते हुए कहते हैं  कि हे प्रभु! बस मेरा निवेदन यह है कि तुम मुझे हर संकट से उबरने की अविकल शक्ति दो। मैं स्वस्थ मन से संकट से पार उतर सकूँ। यदि मेरे दुख में आप मुझे तसल्ली नहीं देते तो न दें! मैं मानता | हूँ कि इससे मेरे जीवन का दुख भार कम न होगा, मैं उस दुख भार को सहन कर लूँगा परंतु आपसे विनयपूर्ण प्रार्थना यह है कि आप मुझे इस दुख को सहन करने की शक्ति दो। मैं दुख की इस घड़ी में भयभीत न हो जाऊँ, इतनी शक्ति अवश्य दें। सुख के क्षणों में सिर झुकाकर हर क्षण आपकी छवि को देखूँ। हर सुख को आपकी कृपा मानूँ। जब मैं दुख की रात से घिर जाऊँ तब भी है करुणामय ईश्वर! मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं आप पर किसी प्रकार का संदेह न करूँ। मेरे मन में आपके प्रति भक्ति भाव बना रहे।


शिल्प-सौंदर्य-

1. कवि परमात्मा से प्रत्येक स्थिति में समस्त कठिनाइयों को सहज रूप में स्वीकार कर उनका मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. संस्कृत के शब्दों का प्रयोग ईश्वर की प्रार्थना के कारण किया गया है।

4. भाषा अत्यंत विनयपूर्ण है। अनुवाद होते हुए भी इसमें मौलिक कविता का स्वाद है। 5. आत्मकथन और संबोधन शैली के कारण यह काव्यांश मनोरम बन पड़ा है।

6. कवि का आस्थावादी व्यक्तित्व प्रकट हुआ है।

7. मुक्त छंद की रचना है।

8. (i) अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

    (ii) 'छिन छिन' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ।

    (ii) 'दुख-रात्रि' में रूपक अलंकार है ।




Thursday, 12 October 2023

जितनी चादर, उतना पैर - कहानी

जितनी चादर, उतना पैर कहानी 

अत्यंत गरीब परिवार का एक बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी में सफर कर रहा था। घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियाँ हो रखी थीं। आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी और वह टिफिन में से रोटियाँ निकालकर खाने लगा। उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था। वह रोटी का एक टुकड़ा लता और उसे टिफिन के अंदर कुछ ऐसे डालता, मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियाँ थीं उसकी इस हरकत को आस- पास के दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे। वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता। सभी यह सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्या कर रहा है? आखिरकार, एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने युवक से पूछ ही लिया कि भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं,  फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो, मानो उसमें सब्जी हो?

तब उस युवक ने जवाब दिया, "भैया, इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मैं अपने मन में यह सोचकर खा रहा हूँ कि इसमें बहुत सारा अचार है।"

फिर उस व्यक्ति ने पूछा, "खाली ढक्कन में अचार सोचकर सूखी रोटी को खा रहे हो, तो क्या तुम्हें अचार का स्वाद आ रहा है?"

"हाँ बिलकुल आ रहा है, मैं रोटी के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है।" युवक ने जवाब दिया।

उसके इस बात को आस-पास के यात्रियों ने भी सुना और उन्हीं में एक व्यक्ति बोला- “जब सोचना ही था, तो तुम अचार की जगह पर मटर पनीर सोचते, शाही पनीर सोचते... तुम्हें इनका स्वाद मिल जाता तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने अचार सोचा, तो अचार का स्वाद आया। यदि और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद आता सोचना ही था तो भला छोटा क्यों सोचा, तुम्हें तो बड़ा सोचना चाहिए था।"

बेरोजगार युवक ने उस यात्री से कहा- "भाईसाहब! मैं बहुत ही गरीब परिवार से हूँ। मेरे घर पर बहुत बार ऐसा होता है कि रोटी के साथ सब्जी नहीं बनती है। तब में अचार से ही रोटी खाकर संतुष्ट हो जाता हूँ। यदि मैं आज अचार की बात न सोचकर किसी ऐसी सब्जी की सोचता, जिसे मैंने कभी चखकर ही नहीं देखा, तो उसका स्वाद कैसे आता ? मैं उसी स्वाद की कल्पना कर सकता हूँ, जिसे मैंने चखा हो। यदि मैं यह सब सोचता तो घर पर मुझे सचमुच में भी अचार खाकर खुशी नहीं मिलती। मेरा तो एक सिद्धांत है जितनी चादर, उतना पैर" यह सुनकर सभी यात्री चुप हो गए।

Wednesday, 4 October 2023

गीत-अगीत (कविता) भावार्थ

गीत-अगीत (कविता)

रामधारी सिंह 'दिनकर'


1. गाकर गीत विरह—------------------------------------ कौन सुंदर है। 


भावार्थ : रामधारी सिंह दिनकर ने प्रस्तुत पंक्तियों में प्राकृतिक वस्तुओं का मानवीकरण किया है। प्राकृतिक सौंदर्य के अतिरिक्त जीव-जंतुओं के ममत्व और प्रेमभाव का अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि नदी अपनी कल-कल की ध्वनि से अपनी विरह का बखान कर रही हैं। वह तीव्र गति से बहते हुए अपने मन की बात बताना चाहती है। अपने किनारे पड़े पत्थरों को अपनी विरह की कहानी सुनाना चाहती है। ( नदी का बहता पानी किनारों से जब टकराता है तो एक गूँज उत्पन्न करता है।) नदी के किनारे खड़ा गुलाब शांत एवं मौन है। वह बोल नहीं पाता, मगर मन में यह विचार करता रहता है कि विधाता ने यदि उसे भी वाणी दी होती, अगर वह भी बोल पाता तो अपने मन की बात बता देता। अपने पतझड़ की पीड़ा सुनाकर वह भी अपना मन हलका कर लेता। अब तो वह बोल नहीं पा रहा और अपने मन की बात मन में ही रखकर उदास है। एक मौन है (गुलाब) और एक मुखर है। (नदी) गीत-अगीत में से कौन सुंदर है।


 शिल्प-सौंदर्य :

1. प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव वर्णन किया गया है। 

2. भाषा सरल, सरस एवं प्रभावशाली है। तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है। 

3. भाषा शैली उदाहरणात्मक, भावात्मक एवं चित्रात्मक है। 

4. खड़ी बोली का प्रयोग है। 

5. अनुप्रास तथा मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है। 


2. बैठा शुक उस डाल ………………………………………कौन सुंदर है ?


 भावार्थ : प्रस्तुत पंक्तियों में 'दिनकर' जी ने शुक के मुखर एवं शुकी के 'मौन' का वर्णन करते हुए कहते हैं कि शुक उस डाली पर बैठा है जिसकी छाया उसके घोंसले को मिल रही है। उसके अंडों को धूप न लगे, इसलिए ही शुक उस डाली पर है।  उसी घोंसले में शुकी अपने पंख फुलाकर अपने अंडों को से रही है। सूर्य की बसंती किरणें जब पत्तों से छनकर आती हैं और शुक के अंगों को छूती हैं, तो वह गा उठता है। शुक मुख से बोलकर ऊँचे स्वर में अपने मन की बात कह लेता है। उधर शुकी मन-ही-मन शुक के समान बोल पाने की इच्छा व्यक्त करती है परंतु उसके मन में उठने वाले गीत प्रेम और वात्सल्य में डूबकर रह जाते हैं। वह अपने बच्चों के स्नेह में डूबी-डूबी उन गीतों को अंदर-ही-अंदर अनुभव करती है। शुक का स्वर वन में चारों ओर गूँज रहा है, किंतु शुकी अपने पंखों को अंडों पर फुलाए हुए मग्न है। दोनों ही सुंदर हैं। शुक का स्नेह मुखर है  और शुकी का मौन । एक का स्वर गीत कहलाता है, दूसरे का मौन अगीत कहलाता है। कवि जानना चाहते हैं कि इन दोनों में से कौन श्रेष्ठ या सुंदर है।


शिल्प सौंदर्य :

1. कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव वर्णन किया है। 

2. खड़ी बोली का प्रयोग है। 

3. भाषा में लयात्मकता एवं गीतात्मकता है। 

4. तत्सम शब्द का रूप स्पष्ट दिखाई देता है। 

5. 'सनेह-सनकर' में 'स' वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।


3. दो प्रेमी है यहाँ…………………………………कौन सुंदर है ?


भावार्थ - कवि कहता है कि दो प्रेमियों के प्रेम का अंतर देखो। एक प्रेमी साँझ होते ही आल्हा-गीत गाने लगता है। जैसे ही उसके मुख से आल्हा का पहला स्वर फूटता है, वैसे ही उसकी राधा घर से वहाँ खिंची चली आती है। वह नीम की छाया में छिपकर उसका मधुर गीत सुनती है। गीत पर मुग्ध होकर वह सोचती है कि हे विधाता ! मैं इस मधुर गीत की पंक्ति ही क्यों न बन गई? काश! मैं इसके मधुर गीत में खो जाती। देखो, प्रेमी गाता है और उसके गान को सुनकर उसकी प्रेमिका का हृदय नाच उठता है। एक का प्रेम प्रकट है तो दूसरों का मौन। एक गाया जाने के कारण गीत है तो दूसरा मौन होने के कारण 'अगीत' है। बताइए, इन दोनों में कौन अधिक सुंदर है?


शिल्प-सौंदर्य-

1. गीत व अगीत के बीच ममत्व, मानवीय प्रेम और प्रेमभाव का सजीव चित्रण किया गया है।

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. तत्सम प्रधान शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

4. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है।

5. भाषा सरल, सरस व प्रवाहमयी है।

6. भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

7. चित्रात्मक होने के कारण वर्णन सजीव व रोचक बन पड़ा है।

8. ‘चोरी-चोरी’, ‘गा-गाकर' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ।




Sunday, 17 September 2023

राजकवि 'भारवि' - कहानी

राजकवि 'भारवि'

संस्कृत साहित्य में ' भारवि' का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। वे संस्कृत के श्रेष्ठ कवि थे। इन्होंने केवल एक रचना से ही जितना यश अर्जित किया, उतना सैकड़ों रचनाओं द्वारा भी नहीं किया जा सकता।
भारवि अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। इनके पिता भी बहुत बड़े विद्वान थे। इनका परिवार बहुत निर्धन था। भारवि अपनी युवावस्था से ही विद्वानों में आदर पाने लगे थे। वे कोई भी रचना लिखते, उनके पिता उसमें कमियाँ निकाल देते। पूरे नगर में भारवि के कवित्व का डंका बज गया था। जब भी कोई व्यक्ति भारवि के पिता से भारवि की प्रशंसा करता, तभी वे उसे डाँटकर कह देते,  "अभी वह अबोध है। उसके जैसी कविताएँ तो ग्वाले भी लिख सकते हैं।"
अपने पिता के इस व्यवहार से भारवि परेशान थे। उन्होंने सोचा, 'मेरे पिता मेरी प्रसिद्धि से द्वेष करते हैं। उन्हें मेरी उन्नति से ईर्ष्या होने लगी है। किसी भी पिता को ऐसा नहीं करना चाहिए। संसार का कोई भी पिता अपने पुत्र की उन्नति से ईर्ष्या नहीं करता। यदि उन्होंने अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं किया तो एक दिन मैं उनका वध कर दूँगा ।'
समय बीतता गया । भारवि के पिता ने उनकी कविताओं में कमियाँ निकालना बंद नहीं किया। सबके सामने वे भारवि की कविता में दोष निकाल देते थे। अब भारवि न रहा गया। एक दिन उन्होंने अपने पिता का वध करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। चाँदनी रात का समय था । भारवि नंगी तलवार लेकर अपने पिता के कक्ष की ओर चल पड़े। भारवि के पिता और माँ बातें कर रहे थे। भारवि ने सोचा, इन्हेंसो जाने दूँ। इसके बाद ही कार्य का निपटारा करूँगा।
भारवि की माँ ने कहा, "आप भारवि की कविताओं में इतनी कमियाँ क्यों निकालते हैं?" भारवि के पिता बोले, “मैं जानता हूँ, मेरा भारवि एक दिन श्रेष्ठ कवि बनेगा। जब लोग आकर उसकी प्रशंसा करते हैं तो मेरी प्रसन्नता की सीमा नहीं रहती । कभी-कभी तो अधिक प्रसन्नता के कारण मेरा गला भर आता है। मैं यह सोचकर उसकी कमियाँ निकालता हूँ कि कहीं उसे अभिमान हो गया तो वह श्रेष्ठ कवि नहीं बन सकेगा, इसलिए मैं उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करता हूँ।"

यह सुनकर भारवि काँप उठे। उन्हें अपनी गलती पर पश्चाताप हो रहा था। उन्होंने आकर अपने पिता से क्षमा माँगी और दंड की माँग की। उनके पिता ने कहा, "इसके लिए तुम्हें छह माह तक जंगल में रहकर तपस्या करनी होगी ।"
भारवि ने अपनी पत्नी से प्रायश्चित्त के विषय में बताया। उसने कहा, "आपके जाने के बाद छह माह तक घर का खर्च कैसे चलेगा?" भारवि ने आधा श्लोक लिखकर दिया और कहा,  “इसे राजा को सौ स्वर्ण मुद्राओं के बदले बेच देना। इससे कम में मत बेचना। छह माह बाद लौटकर मैं राजा के पास जाकर इसे पूरा कर दूँगा।”

भारवि की पत्नी ने वह आधा श्लोक राजा को सौ स्वर्ण मुद्राओं में बेच दिया। राजा को उसने बता दिया कि छह माह बाद मेरे पति आकर इसे पूर्ण कर देंगे। राजा ने वह श्लोक अपने शयन कक्ष में लगा दिया।
एक दिन राजा शिकार पर गया। वहाँ से लौटने में उसे कई दिन लग गए। दोपहर के समय जब राजा ने अपने शयन-कक्ष में प्रवेश किया तो उसने देखा कि रानी किसी युवक के साथ सोई हुई थी। राजा ने उन दोनों की हत्या करने के लिए म्यान से तलवार निकाल ली। उसी समय उसकी दृष्टि दीवार पर टँगे हुए उस श्लोक पर पड़ गई। उस पंक्ति का अर्थ था,  'बिना सोचे-विचारे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक विपत्तियों का मुख्य कारण है।'

उसे पढ़कर राजा क्षण-भर के लिए रुक गया। उसने रानी को जगाया। रानी के साथ सोया हुआ युवक कोई और नहीं, बल्कि राजा का पुत्र था। उसे देखकर राजा के हाथ से तलवार गिर गई। वह काँप रहा था। राजा मन-ही-मन सोच रहा था,  'यदि उसने दोनों को मार दिया होता तो जीवन-भर प्रायश्चित्त न कर पाता।' छह माह बाद भारवि ने राजा के पास पहुँचकर श्लोक को पूरा कर दिया।
श्लोक की दूसरी पंक्ति का अर्थ था, 'विचार करके कार्य करने वाले व्यक्ति को संपत्तियाँ व सफलताएँ स्वयं मिल जाती हैं।' राजा ने भारवि को अपना राजकवि बना लिया।

प्रत्येक कार्य सोच-विचारकर करना चाहिए।

Friday, 11 August 2023

तोप (कविता) व्याख्या

 तोप  (कविता)


  1. कंपनी बाग के मुहाने पर

धर रखी गई है यह 1857 की तोप 

इसकी होती है बड़ी सम्हाल, 

विरासत में मिले कंपनी बाग की तरह 

साल में चमकाई जाती है दो बार।

सुबह-शाम कंपनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी 

उन्हें बताती है यह तोप 

कि मैं बड़ी जबर 

उड़ा दिए थे मैंने 

अच्छे-अच्छे सूरमाओं के धज्जे 

अपने ज़माने में। 


व्याख्या :

प्रस्तुत काव्यांश में कंपनी बाग में सजाकर रखी गई एक तोप का वर्णन है, जिसने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक भारतीयों वीरों को शहीद किया था। 

कानपुर के कंपनी बाग के मुख्य द्वार पर 1857 की एक तोप निशानी के तौर पर रखी गई है। जिस तरह कंपनी बाग हमें विरासत में मिला है उसी तरह से यह तोप भी विरासत में ही मिली है। पुरखों द्वारा मिली इस धरोहर को साल में दो बार चमकाया जाता है। कंपनी बाग में सुबह-शाम घूमने को आने वाले पर्यटकों को अपना परिचय देते हुए मानों तोप कह रही हो कि कभी में बड़ी शक्तिशाली थी। मैंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जबरदस्त कार्य किया था। मैंने अच्छे-अच्छे शूरवीरों के चिथड़े उड़ा दिए थे। यह तोप भारतीय क्रांतिकारियों की क्रांति को दबाने के काम आई थी। इस प्रकार की तोपों के बल पर अंग्रेजों ने भारत की आज़ादी के पहले आंदोलन को कुचला था। 


शिल्प सौंदर्य :


  1. 1857 के स्वत्रंत्रता संग्राम में काम आनेवाली तोप का वर्णन किया गया है। 

  2.  खड़ी बोली का सुंदर प्रयोग किया गया है। 

  3. उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है।

  4. तोप का मानवीकरण किया गया है। वह स्वयं अपना परिचय देती है। 

  5.  चित्रात्मक शैली का प्रयोग है।

  6. कविता छंद मुक्त शैली में लिखी गई है।

  7. भाषा सहज, सरल व प्रभावशाली है। 

  8. अच्छे-अच्छे में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है। 


अब तो बहरहाल

छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग हो

         2. तो उसके ऊपर बैठकर

चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप 

कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं

खास कर गौरैयें

वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप

एक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद । 


व्याख्या : प्रस्तुत काव्यांश में कवि कहते है कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में तोप ने बड़ी क्रूरता से स्वतंत्रता सैनानियों का अंत किया था। आज वही शक्तिशाली तोप कंपनी बाग के मुहाने पर एक प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गई है। उसकी निरर्थकता की ओर संकेत किया गया है। ईस्ट इंडिया कंपनी के युग में यह तोप कितनी महत्त्वपूर्ण थी इसने कितने ही सूरमाओं को इसने मौत की नींद सुला दिया था परंतु आज वह तोप छोटे-छोटे बच्चों की घुड़सवारी का साधन बनकर रह गई है या चिड़ियों के गपशप करने की जगह बन गई है।  कवि कहते है कि आज तोप का भय नहीं रहा क्योंकि अब वह पूरी तरह निस्तेज हो चुकी है। जो कभी बड़े-बड़े वीर योद्धाओं के पसीने छुड़ा देती थी अब मात्र सजावट की वस्तु बनकर रह गई है। कवि ने इन प्रतीकों के माध्यम से सत्ता के बदलते स्वरूप पर व्यंग्य किया है कि समय के आगे किसी की नहीं चलती चाहे कोई कितना ही बडा शक्तिशाली क्रूर शासक ही क्यों न हो।एक-न-एक दिन उसका अंत सुनिश्चित है और कमज़ोर-से-कमज़ोर व्यक्ति भी उसका उपहास उड़ाता है। 


शिल्प-सौंदर्य-


1. कवि ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का स्मरण किया है तथा हथियारों पर दृढ़ संकल्प की विजय दिलाई है। 

2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

3. तोप का मानवीकरण किया गया है। वह स्वयं अपना परिचय देती है।

4. उर्दू शब्दों का अधिक प्रयोग किया गया है।

5. भाषा सरल, सहज व भावानुकूल है।

6. मुक्तछंद व सहज अभिव्यक्ति है।

7. भाषा में प्रवाहमयता व लयात्मकता विद्यमान है।

8 . चित्रात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

9. बच्चों की घुड़सवारी, चिड़ियों की गपशप और गौरैयों के भीतर घुसने के बिंब सजीव बन पड़े हैं।


Thursday, 6 July 2023

पद - रैदास सार

पद - रैदास 
सार 
प्रस्तुत प्रथम पद में संत कवि रैदास ने विभिन्न उदाहरणों द्वारा अपने आराध्य से स्वयं के अटूट संबंध को व्यक्त किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्हें राम नाम की रट लग गई है, जो छूट नहीं सकती । परमात्मा और स्वयं के बीच इस अटूट संबंध को कवि ने चंदन-पानी, बादल-मोर, चाँद-चकोर, दीपक बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा तथा स्वामी दास के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । कवि ने परमात्मा के साथ अपना दास्य भाव प्रकट करते हुए अपनी भक्ति की गहराई और प्रभु के प्रति अपनी भावनाओं को सहज और प्रभावशाली रूप से व्यक्त किया है । 

द्वितीय पद में कवि ने परमात्मा की अपार कृपा का वर्णन किया है। ईश्वर की उदारता, दया, कृपा और उनकी समान दृष्टि का चित्रण करते हुए संत रैदास ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार की कृपा तुम्हारे सिवा और कौन कर सकता है। जिसे संसार अछूत मानता है, तुम उसी पर कृपा कर उसे उच्च बना देते हो। कवि रैदास ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सघना तथा सैन के उदाहरणों द्वारा प्रभु के समदर्शी स्वभाव का अनूठा चित्रण करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रभु की उदारता और उनकी दया-दृष्टि ने इन्हें महान बना दिया है अर्थात ईश्वर की कृपा से सब कुछ संभव है।

Tuesday, 4 July 2023

कहानी - अनाथ

कहानी - अनाथ

वह अनाथ बालक भीख माँगता हुआ एक गाँव आ पहुँचा। आमने-सामने दो विशाल | कोठियों, बाड़ों को देखकर उसके पैर अपने आप ही उस और बढ़े। उसमें से किसी एक में पेटभर खाना मिलने की कल्पना से उसके मुँह में पानी भर आया। पहला बाड़ा किसी विशाल मंदिर जैसा दिखाई दे रहा था। दरवाज़े पर एक मुस्तैद पहरेदार ।

खड़ा था। लड़के ने उससे कहा, "मैं मालिक से मिलना चाहता हूँ।'

पहरेदार गुर्राया, "मालिक पूजा-पाठ कर रहे हैं।"

"पूजा खत्म कब होगी ?"
 "थोड़ी देर के बाद। " 

बालक को थोड़ी-सी देर भी भूख के कारण युगों जैसी लग रही थी। फिर भी वह बड़े धैर्य के साथ बाड़े के दरवाज़े पर खड़ा रहा। बहुत देर बाद वह मालिक के दर्शन कर पाया। मालिक के कानों में कनौती का मोती कितना सुंदर था। बालक मगन होकर कनौती देखता रहा।

मालिक ने कहा, "अरे भाई! यह सब ईश्वर की कृपा है। बोलो, क्या काम है?"

"महाराज, मैं दो दिनों से भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने के लिए- "

"तुम ईश्वर पर विश्वास करते हो न ?"

"हाँ........"

" फिर इस तरह भीख माँगते हुए क्यों दर-दर घूम रहे हो? अरे पागल! उस परमात्मा की लीला अनूठी है। चिड़ियों के बच्चों को वह सिर्फ चोंच ही नहीं देता, वह उसके लिए दाना भी बना देता है। तुम्हारे पेट का भी वैसा ही इंतज़ाम उसने जरूर कहीं-न-कहीं किया होगा। ईश्वर पर भरोसा कर थोड़ा सब करो। "

मालिक जप करने के लिए निकल गया।

लड़का निराश होकर बाड़े से बाहर आ गया। वह ऐसा दिख रहा था, जैसे कोई लाश उठकर चलने लगी हो ।

सामने ही दूसरा बाड़ा उन्मत्त हाथी की तरह खड़ा था। इस बाड़े का बुर्ज किसी हाथी द्वारा अपनी सूँड़ से ऊपर उछाले पानी की फुहार के जैसा दिख रहा था। वहाँ कई लोग ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोल रहे थे। उसे सुनकर क्रुद्ध समुंदर की याद आती।

वह बालक डरा-सहमा सा बाड़े की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। दरवाजे पर एक गोल-मटोल
पहरेदार खड़ा था। पहरेदार झल्ला उठा, "ऐ, कहाँ जा रहे हो? क्या चोरी का इरादा है ?"

गिड़गिड़ाते हुए बालक ने कहा, "मालिक से मिलना चाहता हूँ।" 
"मालिक पंडितों के साथ बहस में उलझे हुए हैं। "

"फिर कब मिल पाएँगे ?"

"थोड़ी देर बाद।"

लड़के को एक पल भी युग की तरह लग रहा था। लेकिन पेट से बढ़ कर मुहताज क्या हो सकता है? वह चुपचाप उस बाड़े के दरवाज़े में प्रतीक्षा करता रहा। थोड़ी ही देर में बहस खत्म हुई। कितने ही पंडित बगल में पोथियों को दबाए बाड़े से निकल पड़े।

लड़के ने मालिक के दर्शन किए। मालिक ने प्रश्न किया, "क्या काम है?"

" महाराज दो दिनों से भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने के लिए- "
 "ईश्वर पर तुम भरोसा करते हो ?"

इसके पहले "हाँ" कहा था, परंतु कोई उपयोग न हुआ। अब यही उचित होगा कि "ना" कहा जाए। ऐसा विचार कर उसने जवाब दे डाला, "नहीं"। अपनी ऊँची कलाबत्तू और उसमें सितारे से सजाई बैठक से उतर कर मालिक आगे बढ़ा। बालक को थपथपाते हुए उसने कहा, "शाबाश! इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा ज्ञान शायद ही मैंने कहीं देखा है !"

"मुझे कुछ खाने के लिए" बीच में ही लड़का बोल उठा। “खाने के लिए? अरे पागल ! तुम जानते हो कि दुनिया में ईश्वर नहीं है। फिर भला तुम्हें खाने को कौन देगा? उसे खुद ही हासिल करना होगा। दो बातें ध्यान रखो। 
धरती विशाल है और कोशिश ही आदमी का ईश्वर है। तुम कहीं भी अपना पेट भर सकते हो।"

निराश होकर बालक बाड़े से बाहर निकल आया। अब उसमें गाँव के दूसरे घरों की और झाँकने तक का साहस नहीं था। किसी शैतान की तरह वह चुपचाप चलने लगा। गिद्ध मरे हुए खरगोश पर अपनी नुकीली चोंच से जैसे बार-बार प्रहार करता रहता है, वैसे भूख पेट की आंतों को कुरेद रही थी।

बालक किसी तरह गाँव से दूर आ गया। उसके पेट में भूख अब दावानल की तरह जल उठी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस आग को कैसे बुझाया जाए।

अचानक उसने पेड़ के तले बैठी एक बुढ़िया को पत्तलों में फैले सूखे रोटी के टुकड़ों को
चबाते देखा। उसकी आँखें उन टुकड़ों पर गड़ गईं। लेकिन वह पैर न बढ़ा सका।

ऐसे ही उन सूखे टुकड़ों को चबाते उस बुढ़िया ने नज़र दौड़ाई। वह बालक उसे दिखाई दिया। उसकी आँखों में दिख रही भूख को बुढ़िया जान गई। उसने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। कलेजा थामकर वह आगे बढ़ा। उसका हाथ पकड़ कर बुढ़िया ने उसे अपने पास बिठा लिया। उस पत्तल पर पड़ी सूखी रोटी का एक कौर उठाकर उसने उसके मुँह में डाला। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन बोल न पाई। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आए। उसमें से एक बूँद बालक के गाल पर गिरी।

बालक को लगा जैसे उसके पेट का दावानल बुझ गया। उसकी सारी छटपटाहट शांत हो गई, उसे जैसे जगत माता मिल गई। दो-चार कौर निगलकर बालक ने पूछा, "दादी माँ ! क्या इस दुनिया मैं ईश्वर है ?" 

विस्मित ढंग से हाथ मटकाते हुए उसने जवाब दिया, "कौन जाने। मैं तो एक पागल बुढ़िया हूँ बेटे।"