गीत-अगीत (कविता)
रामधारी सिंह 'दिनकर'
1. गाकर गीत विरह—------------------------------------ कौन सुंदर है।
भावार्थ : रामधारी सिंह दिनकर ने प्रस्तुत पंक्तियों में प्राकृतिक वस्तुओं का मानवीकरण किया है। प्राकृतिक सौंदर्य के अतिरिक्त जीव-जंतुओं के ममत्व और प्रेमभाव का अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि नदी अपनी कल-कल की ध्वनि से अपनी विरह का बखान कर रही हैं। वह तीव्र गति से बहते हुए अपने मन की बात बताना चाहती है। अपने किनारे पड़े पत्थरों को अपनी विरह की कहानी सुनाना चाहती है। ( नदी का बहता पानी किनारों से जब टकराता है तो एक गूँज उत्पन्न करता है।) नदी के किनारे खड़ा गुलाब शांत एवं मौन है। वह बोल नहीं पाता, मगर मन में यह विचार करता रहता है कि विधाता ने यदि उसे भी वाणी दी होती, अगर वह भी बोल पाता तो अपने मन की बात बता देता। अपने पतझड़ की पीड़ा सुनाकर वह भी अपना मन हलका कर लेता। अब तो वह बोल नहीं पा रहा और अपने मन की बात मन में ही रखकर उदास है। एक मौन है (गुलाब) और एक मुखर है। (नदी) गीत-अगीत में से कौन सुंदर है।
शिल्प-सौंदर्य :
1. प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव वर्णन किया गया है।
2. भाषा सरल, सरस एवं प्रभावशाली है। तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है।
3. भाषा शैली उदाहरणात्मक, भावात्मक एवं चित्रात्मक है।
4. खड़ी बोली का प्रयोग है।
5. अनुप्रास तथा मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है।
2. बैठा शुक उस डाल ………………………………………कौन सुंदर है ?
भावार्थ : प्रस्तुत पंक्तियों में 'दिनकर' जी ने शुक के मुखर एवं शुकी के 'मौन' का वर्णन करते हुए कहते हैं कि शुक उस डाली पर बैठा है जिसकी छाया उसके घोंसले को मिल रही है। उसके अंडों को धूप न लगे, इसलिए ही शुक उस डाली पर है। उसी घोंसले में शुकी अपने पंख फुलाकर अपने अंडों को से रही है। सूर्य की बसंती किरणें जब पत्तों से छनकर आती हैं और शुक के अंगों को छूती हैं, तो वह गा उठता है। शुक मुख से बोलकर ऊँचे स्वर में अपने मन की बात कह लेता है। उधर शुकी मन-ही-मन शुक के समान बोल पाने की इच्छा व्यक्त करती है परंतु उसके मन में उठने वाले गीत प्रेम और वात्सल्य में डूबकर रह जाते हैं। वह अपने बच्चों के स्नेह में डूबी-डूबी उन गीतों को अंदर-ही-अंदर अनुभव करती है। शुक का स्वर वन में चारों ओर गूँज रहा है, किंतु शुकी अपने पंखों को अंडों पर फुलाए हुए मग्न है। दोनों ही सुंदर हैं। शुक का स्नेह मुखर है और शुकी का मौन । एक का स्वर गीत कहलाता है, दूसरे का मौन अगीत कहलाता है। कवि जानना चाहते हैं कि इन दोनों में से कौन श्रेष्ठ या सुंदर है।
शिल्प सौंदर्य :
1. कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव वर्णन किया है।
2. खड़ी बोली का प्रयोग है।
3. भाषा में लयात्मकता एवं गीतात्मकता है।
4. तत्सम शब्द का रूप स्पष्ट दिखाई देता है।
5. 'सनेह-सनकर' में 'स' वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
3. दो प्रेमी है यहाँ…………………………………कौन सुंदर है ?
भावार्थ - कवि कहता है कि दो प्रेमियों के प्रेम का अंतर देखो। एक प्रेमी साँझ होते ही आल्हा-गीत गाने लगता है। जैसे ही उसके मुख से आल्हा का पहला स्वर फूटता है, वैसे ही उसकी राधा घर से वहाँ खिंची चली आती है। वह नीम की छाया में छिपकर उसका मधुर गीत सुनती है। गीत पर मुग्ध होकर वह सोचती है कि हे विधाता ! मैं इस मधुर गीत की पंक्ति ही क्यों न बन गई? काश! मैं इसके मधुर गीत में खो जाती। देखो, प्रेमी गाता है और उसके गान को सुनकर उसकी प्रेमिका का हृदय नाच उठता है। एक का प्रेम प्रकट है तो दूसरों का मौन। एक गाया जाने के कारण गीत है तो दूसरा मौन होने के कारण 'अगीत' है। बताइए, इन दोनों में कौन अधिक सुंदर है?
शिल्प-सौंदर्य-
1. गीत व अगीत के बीच ममत्व, मानवीय प्रेम और प्रेमभाव का सजीव चित्रण किया गया है।
2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
3. तत्सम प्रधान शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
4. भाषा में लयात्मकता व गीतात्मकता है।
5. भाषा सरल, सरस व प्रवाहमयी है।
6. भावात्मक व उदाहरणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
7. चित्रात्मक होने के कारण वर्णन सजीव व रोचक बन पड़ा है।
8. ‘चोरी-चोरी’, ‘गा-गाकर' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ।
No comments:
Post a Comment
If you have any doubt let me know.