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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Wednesday, 26 April 2023

पाठ खेल-दिवस प्रश्न उत्तर

  पाठ

                                                          खेल-दिवस 

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

मौखिक -

(क) अभिषेक के मौसा जी ने उपहार में उसे क्या दिया ?

उत्तर- अभिषेक के मौसा जी ने उपहार में उसे 'आई-फोन' दिया।


(ख) सार्थक किस पर खेल खेलता था ?

उत्तर- सार्थक कंप्यूटर पर खेल खेलता था। 


(ग) अभिषेक के रोने का क्या कारण था ?

उत्तर- अभिषेक के रोने का कारण था कि वह इस वर्ष विद्यालय में होने वाली प्रतियोगिता के लिए किसी भी खेल में नहीं चुना गया। 


(घ) सभी बच्चे उदास क्यों थे ?

उत्तर- किसी भी खेल प्रतियोगिता में न चुने जाने पर सभी बच्चे उदास थे।


लिखित-

कुछ शब्दों में 

(क) सार्थक ने अभिषेक से क्या कहा ?

उत्तर- सार्थक ने अभिषेक से कहा कि तुम्हें तो पिछले वर्ष सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार मिला था और तुम तो इस बार भी जीतोगे। 


(ख) अभिषेक के डर का क्या कारण था ?

उत्तर- अभिषेक के डर का कारण यह था कि वह अब खेल के मैदान में खेलने का अभ्यास नहीं कर रहा था। 


(ग) अभिषेक को रोते देखकर अध्यापिका जी ने क्या किया ?

उत्तर- अभिषेक को रोते देखकर अध्यापिका जो ने उसके रोने और हारने का कारण पूछा तथा उसे मैदान में खेले जाने वाले खेलों का महत्त्व समझाया।


(घ) स्वास्थ्य और प्रेरणा प्राप्त करने के लिए क्या आवश्यक है ?

उत्तर- स्वास्थ्य एवं प्रेरणा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन खेलना आवश्यक है। इससे हमें अच्छा स्वास्थ्य, खेल भावना, परस्पर सहयोग, सहनशीलता, उत्साह और प्रतिस्पर्धा संबंधी सीख मिलती है।


(ङ) खेल का नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने कौन-सी तस्वीर उभरती है ?

उत्तर- खेल का नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने मैदान में पसीना बहाते और जी-जान लगाकर अपने प्रतिद्वंदी को पछाड़ते खिलाड़ियों की तस्वीर उभरती है। 


ज़्यादा शब्दों में- 

(क) अध्यापिका सुमन ने चुनाव के लिए किन-किन खेलों को शामिल किया ?

उत्तर- अध्यापिका सुमन ने चुनाव के लिए दो सौ मीटर की दौड़, लंबीकूद, ऊँची कूद, रस्सी कूद, बाधा दौड़ और गोला फेंक आदि खेलों को शामिल किया।


(ख) आजकल के बच्चे खेल के लिए किन-किन उपकरणों का प्रयोग करते हैं ?

उत्तर- आजकल के बच्चे खेलने के लिए इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स का प्रयोग करते हैं; जैसे- वीडियो गेम, प्लेस्टेशन, कंप्यूटर और मोबाइल आदि।


(ग) मैदान में खेलों के माध्यम से हम क्या-क्या सीखते हैं ?

उत्तर- मैदान में खेलों के माध्यम से हम खेल-भावना, पारस्परिक सहयोग, सहनशीलता, उत्साह तथा प्रतिस्पर्धा को सीखते हैं। खेल हमें तन-मन से स्वस्थ रखते हैं तथा मोटापा, तनाव, अकेलापन आदि से बचाते हैं। 


(घ) इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर खेलने से क्या हानियाँ  हैं ?

उत्तर- इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स पर खेलने से सिर दर्द, तनाव, सुस्ती, अकेलापन, मोटापा तथा कम उम्र में आँखों पर चश्मा लग जाना आदि हानियाँ हैं। कुल मिलाकर इनसे हमारा स्वास्थ्य पूर्णतया दुष्प्रभावित होता है। 


(ङ) बच्चों ने अध्यापिका से क्या कहा ?

उत्तर- बच्चों ने अध्यापिका से कहा कि अब हम टी०वी०, मोबाइल और प्लेस्टेशन पर न खेलकर मैदान में ही पसीना बहाएँगे और स्वास्थ्य एवं खुशियाँ पाएँगे। अगले साल आयोजित होने वाली प्रतियोगिता में अवश्य ही प्रथम आएँगे।



Sunday, 9 April 2023

class 12 विष्णु खरे

विष्णु खरे

(क) एक कम

1. 1947 के बाद से
इतने लोगों को इतने तरीकों से आत्मनिर्भर 
मालामाल और गतिशील होते देखा है
    कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है
    पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए मेरे सामने एक ईमानदार आदमी औरत या बच्चा खड़ा है
   तो जान लेता हूँ
   मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है 
   मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कंगाल या कोढ़ी 
  या मैं भला-चंगा हूँ और कामचोर और
  एक मामूली धोखेबाज़ 
  लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी या गुस्से पर आश्रित
  तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी 
  मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से
  मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं
  मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम
  कम से कम एक आदमी से तो निश्चित रह सकते हो। 
1. यह काव्यांश किस कविता से अवतरित है ?
  (क) एक कम  
  (ख) सत्य
  (ग) 1947 के बाद
  (घ) लोग
उत्तर: (क) एक कम  
2. 1947 के बाद कवि ने लोगों को क्या होते देखा ?
(क) आत्मनिर्भर
(ख) मालामाल
(ग) गतिशील
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (घ) उपर्युक्त सभी
13. पच्चीस पैसे के लिए हाथ फैलाने वाले व्यक्ति के बारे में कवि क्या जान लेता है ?
(क) वह ईमानदार है। 
(ख) वह बेईमानी है। 
(ग) वह भिखारी है।
(घ) वह कामचोर है
उत्तर : (क) वह ईमानदार है। 
4. हाथ फैलानेवाला को कैसा मानता है ?
(क) लाचार
(ख) कंगाल
(ग) कोढ़ी
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (घ) उपर्युक्त सभी
5. भिखारी सामने वाले का क्या नहीं है ? (ख) प्रतिद्वंद्वी
(क) विरोधी
(ख) प्रतिद्वंद्वी
(ग) हिस्सेदार
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर : (घ) उपर्युक्त सभी



(ख) सत्य 

1. हम कह नहीं सकते
   न  तो हममें कोई स्फुरण हुआ और न ही कोई ज्वर
   किंतु शेष सारे जीवन हम सोचते रह जाते हैं 
   कैसे जानें कि सत्य का वह प्रतिबिंब हममें समाया या नहीं
   हमारी आत्मा में जो कभी-कभी दमक उठता है
   क्या वह उसी की छुअन है
   जैसे
   विदुर कहना चाहते तो वहीं बता सकते थे 
   सोचा होगा माथे के साथ अपना मुकुट नीचा किए
   युधिष्ठिर ने 
   खांडवप्रस्थ से इंद्रप्रस्थ लौटते हुए।
1. यह काव्याश किस कविता से अवतरित है ?
(क) सत्य
(ख) बनारस
(ग) युधिष्ठिर
(घ) एक कम
उत्तर: (क) सत्य
2. इस कविता के रचयिता कौन है ?
(क) विष्णु खरे 
(ख) प्रीति खरे
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) रघुवीर सहाय
उत्तर: (क) विष्णु खरे 
3. सत्य की क्या अनुभूति हुई ?
(क) वह आया
(ख) कँपकँपी  हुई
(ग) ज्वर हुआ
(घ) कुछ नहीं
उत्तर: (घ) कुछ नहीं
4. 'कभी-कभी' में किस अलंकार का प्रयोग है ?
(क) दृष्टांत 
(ख) पुनरुक्ति
(ग) अनुप्रास
(घ) यमक
उत्तर: (ख) पुनरुक्ति
5. इस काव्यांश की भाषा क्या है ?
(क) खड़ी बोली
(ख) ब्रज 
(ग) अवधी
(घ) भोजपुरी
उत्तर:  (क) खड़ी बोली

2. जैसे शमी वृक्ष के तने से टिककर
     न पहचानने में पहचानते हुए विदुर ने धर्मराज को 
     निर्निमेष देखा था अंतिम बार
    और उनमें से उनका आलोक धीरे-धीरे आगे बढ़कर
    मिल गया था युधिष्ठिर में 
    सिर झुकाए निराश लौटते हैं हम
    कि सत्य अंत तक हमसे कुछ नहीं बोला
   हाँ हमने उसके आकार से निकलता वह प्रकाश-पुंज देखा था
   हम तक आता हुआ
  वह हममें विलीन हुआ या हमसे होता हुआ आगे बढ़ गया।
1. यह काव्यांश किस कविता से अवतरित है ?
   (क) सत्य 
   (ख) तोड़ो
   (ग) वसंत आया
   (घ) शमी वृक्ष
उत्तर:   (क) सत्य 
2. शमी वृक्ष के तने से कौन टिका था ?
  (क) युधिष्ठिर 
  (ख) विदुर
   (ग) अर्जुन
   (घ) भीम
उत्तर :   (ख) विदुर
3. आलोक किसमें मिल गया ?
    (क) युधिष्ठिर में 
    (ख) विदुर में
    (ग) वृक्ष में
    (घ) तने में
उत्तर:  (क) युधिष्ठिर में 
4. हम किस अवस्था में लौटते हैं ?
    (क) निराशावस्था में
    (ख) सिर झुकाए
    (ग) (क)- (ख) दोनों
    (घ) सामान्य
उत्तर:   (ग) (क)- (ख) दोनों
5. 'धीरे-धीरे' में कौन-सा अलंकार है ?
(क) पुनरुक्ति प्रकाश 
(ख) यमक 
(ग) श्लेष
(घ) उपमा
उत्तर: (क) पुनरुक्ति प्रकाश 




Saturday, 8 April 2023

साखी (कबीर) class 10


 साखी   (कबीर) 


पाठ का भावार्थ


   प्रस्तुत साखियाँ कबीरदास जी द्वारा रचित हैं । इन साखियों में कबीर ने विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है। कबीर फक्कड़, मस्तमौला और क्रांतिदर्शी कवि थे। उन्होंने अपनी पैनी नज़र और वाणी से बाह्य आडंबर पर तीखी चोट की है। अपने अनुभवजन्य ज्ञान को 'साक्षी' में प्रत्यक्ष करते हुए कबीर जीवन के परमोपयोगी और आवश्यक तथ्यों का ज्ञान देते हैं।


 • पहले दोहे में संयमित और मधुर वाणी के प्रयोग की आवश्यकता पर बल देना  ही कवि का उद्देश्य है।इस दोहे में उन्होंने बताया है कि कड़वी वाणी से दूसरों को दुःख होता हैं। अतः दूसरों को सुख पहुँचाने वाली व अपने मन को भी शीतलता पहुँचाने वाली मीठी वाणी बोलनी चाहिए। 


 • दूसरे दोहे में मृग और उसकी नाभि में स्थित कस्तूरी का उदाहरण देते हुए यह बताया गया है कि नाभि में कस्तूरी होने पर भी बाहर उसकी खुशबू से प्रभावित होकर उसे चारों ओर ढूँढ़ता है, उसी प्रकार प्रत्येक मन में राम का वास है, उसके लिए इधर-उधर भागना व्यर्थ है। ईश्वर तो हमारे अंतःकरण में ही निवास करते हैं। 


• तीसरे दोहे में अहंकार को ईश्वर की भक्ति व उसकी प्राप्ति में बाधक बताया गया है। ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश प्राप्त होते ही अहंकार व मोह का अंधकार समाप्त हो जाता है।


• चौथे दोहे में कहा गया है कि खाने और सोने को जीवन का सबसे बड़ा सुख मानकर सारा संसार खुश है। वह इनके सुखों में इवा हुआ है जबकि मोहमाया की नींद त्याग कर ज्ञान प्राप्त होने पर कबीर देखते हैं कि मरणशील मनुष्य इस क्षणभंगुर संसार में राम-विमुख होकर राम को भूल गया है। मनुष्य जीवन की गरिमा को नहीं समझते हैं इसलिए मनुष्य के अनमोल जीवन को नष्ट होते देखकर कबीर दुखी हो रहे हैं। 


• पाँचवें दोहे में कहा गया है कि विरह पीड़ा विष से भी घातक है। राम से प्रेम करनेवाला उसके विरह में जीवित नहीं बचता है यदि बच भी जाता है तो पागल हो जाता है। 


• छठे दोहे में कहा गया है कि अपने दोषों को बतानेवाले, देखनेवाले को आदर सहित अपने पास रखना चाहिए। इनकी आलोचना एक सच्चे हितचितक की भाँति हमारे स्वभाव के सभी दोषों व बुराइयों को बिना साबुन तथा पानी के ही दूर कर हमारे मन को निर्मल कर हमारा भला करती है।

• सातवें दोहे में बताया गया है कि जिसे ईश्वर प्रेम की लगन लग जाती है वही सच्चा पंडित कहलाता है। शास्त्र व वेद पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता।


• आठवें दोहे में भगवद्ज्ञान से युक्त होकर कवि ने दूसरों को भी भगवद्भक्ति में रंग जाने के लिए प्रेरित किया है। भगवान की प्राप्ति होने पर भक्त व संत सब ओर प्रेम-ही-प्रेम की खुशबू फैलते हैं। 






Sunday, 18 December 2022

निम्नलिखित गद्यांशों उदाहरण देखिए, समझिए और उत्तर दीजिए -
1 सही समय पर सही चुनाव न करने वाला व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बुरी तरह असफल होता है। जीवन का सफल कलाकार वह है, जो अपने हर काम में सावधानीपूर्वक चुनाव करता है । चुनाव में सावधारी न बरतने वाला और बिना सोचे-समझे चुनाव कर लेने वाला व्यक्ति लाख प्रयत्न करने पर भी अपने जीवन को सफल और उचित मोड़ नहीं दे पाता। जो व्यक्ति अपने खाने-पीने, खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने और मित्रों के साथ मनोरंजन के कार्यक्रम का चुनाव करते समय सावधानी नहीं बरतता, उसकी दशा उस पेटू जैसी हो जाती है, जो अनाप-शनाप जो भी सामने आता है, खाए जाता है और अपना स्वास्थ्य चौपट कर बैठता है। होना यह चाहिए कि हम यह सोच-समझकर तय करें कि किस समय सोना है, किस समय उठना है। हमें क्या, कितना और कब खाना है तथा कब, क्या किस तरह पहनना है। हमें किन लोगों को मित्र बनाना है और किनसे थोड़ी दूरी बनाए रखना है। 
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर छाँटिए-
1. गद्यांश के लिए उचित शीर्षक चुनिए-
 ( क ) सफलता का रहस्य ( ग ) सफलता का चुनाव ( ख ) सावधान ( घ ) अभ्यास
2. कैसे लोगों को सफलता प्राप्त नहीं होती ? 
( क ) बेचैन ( ख ) नासमझ ( ग ) खाने - पीने वाले (घ) सावधान 
3. ठीक चुनाव न करने वाले व्यक्ति की तुलना किससे की गई है ? 
 पेटू ( क ) रादू ( ख ) भोंदू ( ग )  पेटू (घ ) मोटू 
4. सफलता किस व्यक्ति के कदम चूमती है ? 
( क ) असावधानी बरतने वाले ( ग ) व्यवधान करने वाले ( ख ) समाधान न करने वाले ( घ ) सावधानी बरतने वाले 
6. ' चौपट ' का समानार्थी शब्द है : 
( क ) चार कोने वाला ( ख ) आबाद ( ग ) बरबाद (घ) पिचकना 
7. ' प्रत्येक ' का संधि - विच्छेद छाँटिए : 
(क) प्र + त्येक  ( ख ) प्रति + ऐक  ( ग ) प्र + एक (घ ) प्रति +एक 
उत्तर : 1. ( क ) 2. ( ख ) 3. ( ग ) 4. ( घ )6  (ग) 7  (घ )

  2 शिक्षा का वास्तविक अर्थ और प्रयोजन व्यक्ति को व्यावहारिक बनाना होता है कि शिक्षित होने के नाम पर अहम और गर्व का हाथी उसके मन - मस्तिष्क पर बाँध  देना । हमारे देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जो शिक्षा नीति और पद्धति चली आ रही है, वह लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी है । इसने एक उत्पादक मशीन का काम किया है, इस बात पर एकदम ध्यान नहीं दिया है कि इस देश को अपनी आवश्यकताएँ और सीमाएँ क्या है ? इस देश के निवासियों को किस प्रकार की व्यावहारिक शिक्षा को आवश्यकता है ? बस सुशिक्षितों, साक्षरों की एक लंबी पंक्ति इस देश में खड़ी कर दी है , जो किसी दफ्तर में क्लर्क बनने का सपना देख सकते हैं । 
उपर्युक्त गद्यांश  को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चुनिए -
1. गद्यांश के लिए उचित शीर्षक चुनिए : 
( क ) देश  ( ख ) शिक्षा की सीमा ( ग ) शिक्षा का उद्देश्य ( घ ) शिक्षा का राज
2. शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है ? 
( क ) क्लर्क बनाना ( ख ) नौकरी दिलाना ( ग ) स्वतंत्रता दिलाना  ( घ ) व्यावहारिक बनाना
3. हमारी देश की शिक्षा नीति कितनी पुरानी है ? 
( क ) सौ साल ( ख ) डेढ़ सौ साल  ( ग ) डेढ़ साल  ( घ ) पचास साल
4. वर्तमान शिक्षा पद्धति के रहते व्यक्ति क्या सपना देख सकता है ? 
( क ) अमीर बनने का ( ख ) शिक्षक बनने का ( ग ) व्यापारी बनने का ( घ ) क्लर्क बनने का 
5. ' अहम ' का अर्थ है : ( ख ) मुख्य  ( ग ) मैं ( क ) अहंकार ( घ ) मेरा 
6. ' साक्षर ' का विलोम चुनिए : (
 क ) शिक्षित ( ख ) साकार ( ग ) निरक्षर ( घ ) अशिक्षित
7. ' पद्धति ' किस प्रकार का शब्द है ? 
( क ) जातिवाचक संज्ञा ( ग ) क्रियाविशेषण  ( ख ) गुणवाचक विशेषण ( घ ) भाववाचक संज्ञा 
 उत्तर : 1. ( ग ) 2. ( घ ) 3. ( ख ) 4. ( घ ) 5. ( क ) 6. ( ग ) 7. ( घ ) 

3 डॉ ० कलाम दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे । वे भारत को विकसित देश बनाने का सपना देखते थे । उनका मानना था कि भारतवासियों को व्यापक दृष्टि से सोचना चाहिए । हमें सपने देखने चाहिए । सपनों को विचारों में बदलना चाहिए । विचारों को कार्यवाही के माध्यम से हकीकत में बदलना चाहिए । डॉ ० कलाम तीसरे ऐसे वैज्ञानिक थे , जिन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान ' भारत - रत्न ' दिया गया था । उन्हें ' पद्मभूषण ' तथा ' पद्मविभूषण ' से भी सम्मानित किया गया । भारत को उनपर गर्व है । इतनी उपलब्धियाँ प्राप्त करने तथा इतना मान - सम्मान मिलने के बावजूद डॉ ० कलाम को अहंकार छू तक नहीं पाया । वे सहज प्रवृत्ति के एक भावुक व्यक्ति थे । उन्हें कविताएँ लिखना , वीणा बजाना तथा बच्चों के साथ रहना बेहद पसंद था । वे सादा जीवन उच्च विचार ' में विश्वास रखते थे । कलाम साहब का व्यक्तित्व प्रेरणादायक है । उनका जीवन तपस्या से भरा था । उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय दिए गए भाषण में संत कबीरदास जी के इस दोहे का उल्लेख किया था- “ काल करै सो आज कर , आज करै सो अब । " 
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चुनिए : 
1. डॉ ० कलाम ने भारत को क्या बनाने का सपना देखा था ? 
( क ) अल्प - विकसित देश ( ग ) निर्मित देश ( ख ) विकसित देश ( घ ) विकासशील देश 
2. डॉ ० कलाम किस प्रवृत्ति के व्यक्ति थे ?
 ( क ) असहज ( ख ) दयालु ( ग ) भावुक ( घ ) क्रूर
3. अब तक कितने वैज्ञानिकों को ' भारत - रत्न ' से सम्मानित किया गया है ?
 ( क ) चार ( ख ) पाँच ( ग ) दो  ( घ ) तीन
4. भारत का सर्वोच्च सम्मान कौन - सा है ? 
( क ) पद्मभूषण ( ख ) पद्मविभूषण ( ग ) भारत रत्न ( घ ) भारत भूषण
5. ' सम्मान ' का उचित संधि - विच्छेद है :  
( क ) स+मान ( ख ) सम+ मान  ( ग ) सम +मान ( घ ) सं मान
6. ' काल करै सो आज कर , आज करै सो अब ' किसका दोहा है ? 
( क ) रहीम ( ख ) तुलसी ( ग ) बिहारी  ( घ ) कबीर
7. गद्यांश के लिए उचित शीर्षक चुनिए : 
( क ) मेरा सपना ( ख ) हमारा देश ( ग ) डॉ ० कलाम ( घ ) सर्वोच्च सम्मान
उत्तर : 1. ( ख ) 2 ( ग ) 3. ( घ ) 4. ( ग ) 5. ( ख )    6. ( घ ) 7. ( घ )

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर चुनिए : 
1 बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर को कौन नहीं जानता ? उन्हें बचपन से ही कविताएँ पढ़ने व लिखने का चाव था । एक दिन उन्होंने अपने बड़े भाई से पूछा , " भइया कविता क्या होती है ? " भाई ने कहा , " कविता रस से भरी होती है और इसका रस लोगों को आनंद से भर देता है । " बालक रवींद्र ने सोचा , कविता लिखने के लिए फूलों के रस से बढ़कर और कौन - सा रस हो सकता है । अगले दिन उन्होंने ढेर सारे फूल तोड़े और लगे उन्हें पीसने , पर रस तो निकला ही नहीं । बालक रवींद्र रुआँसे हो गए । शाम को भाई ने उनसे पूछा , " कविता लिखी क्या ? " तभी उनकी दृष्टि फूलों पर पड़ी , तो उन्होंने पूछा “ ये क्या कर रहे थे ? " रवींद्र बोले , " फूलों का रस निकाल रहा था , ताकि कविता लिख सकूँ । " यह सुनकर भाई रवींद्रनाथ के भोलेपन पर खिलखिलाकर हँस पड़े । तब उन्होंने रवींद्र को कविता लिखने का गुर समझाया । 
उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चुनिए : 
( क ) गद्यांश के लिए उचित शीर्षक चुनिए : 
( i ) कविता का रस ( ii ) फूलों की कविता ( iii ) बगीचा ( iv ) कविताएँ 
( ख )रवींद्रनाथ टैगोर कौन थे ?   
( iii ) संस्थापक ( iv ) अध्यापक ( i ) वैज्ञानिक ( ii ) लेखक
( ग ) बचपन से रवींद्रनाथ को किसका शौक था ? 
( i ) खेलने का ( iii ) कविता लिखने व पढ़ने का 
( ii ) पढ़ने का ( iv ) शैतानी करने का  
( घ ) फूलों के रस से बालक रवींद्रनाथ क्या करना चाहता था ? 
( 1 ) इत्र बनाना ( ii ) रंग बनाना ( iii ) तेल बनाना ( iv ) कविता लिखना

2 विज्ञान ने मनुष्य को अनेक सुख - सुविधाएँ प्रदान किए हैं , परंतु साथ - ही - साथ अनेक अभिशाप भी दिए हैं । विज्ञान के बल पर मनुष्य ने धरती , आकाश , अंतरिक्ष , पर्वत , सर्दी , गरमी आदि पर काबू पा लिया है । मनुष्य ने सुख - सुविधा की अनेक वस्तुओं के आविष्कार किए , परंतु औद्योगिक कचरे से नदियों , समुद्र , तालाबों का पानी प्रदूषित कर दिया । पेड़ - पौधे जिनसे वायु , फल , सब्जी , लकड़ी , दवाइयाँ आदि प्राप्त होते हैं , उन्हें भी अंधाधुंध काट डाला । पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया । यातायात के साधन तो बनाए , परंतु उनसे फैलने वाले विषैले धुएँ पर ध्यान नहीं दिया । इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि मौसम में अचानक बदलाव आने लगा है । समुद्र का आकार बढ़ने लगा है । हमारे चारों ओर प्रदूषण ही प्रदूषण है - वायु प्रदूषण , जल प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण , मिट्टी प्रदूषण आदि । प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि है । जनसंख्या बढ़ने से रहने की जगह , रोटी , व्यवसाय आदि भी अधिक चाहिए , इसलिए वनों का कटना तथा कारखानों का बढ़ना जारी है । 
गद्यांश के लिए उचित शीर्षक चुनिए : 
( i ) प्रदूषण ( ii ) विज्ञान का ज्ञान ( iii ) जनसंख्या  iv ) आविष्कार
ख ) प्रदूषण कितने प्रकार के होते हैं ?
 ( i ) दो ( ii ) तीन ( iii ) चार  ( iv ) इनमें से कोई नहीं
किसके कारण नदियों , समुद्रों आदि का जल प्रदूषित हो रहा है ?
 ( i ) सब्जियाँ ( ii ) दवाइयाँ ( iii ) मिट्टी ( iv ) औद्योगिक कचरा
 ( घ ) प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण क्या है ? 
 ( ii ) वन ( i ) विज्ञान ( iii ) जनसंख्या () उद्योग 
ङ ) अत्यधिक शब्द का संधि-विच्छेद है -
 ( iii ) अति + अधिक ( iv ) अति +धिक () अति +यधिक () अती +अधिक 
( च ) ' विपैला ' का पर्यायवाची शब्द है : 
( iii ) मटमैला ( iv ) प्रदूषित ( i ) गंदा  ( ii ) जहरीला 

Thursday, 11 August 2022

प्रेरक प्रसंग हेलेन केलर Helen Kelar


अपनी धुन के पक्के, लगनशील व साहसी मनुष्य अपनी शारीरिक विकलांगता को अपना रास्ता बाधित नहीं करने देते। वे अपने दृढ़ निश्चय से अपनी कमज़ोरियों पर विजय प्राप्त करते हैं और विश्व के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। 

जब हम किसी बात को लेकर बेहद परेशान होते हैं , तो हमारा मन उस परेशानी में इतना अधिक डूब जाता है कि हमें अन्य कोई रास्ता नज़र ही नहीं आता। पर जो ऐसी विषम परिस्थिति में भी अपना संबल बनाए रखता है और असंभव को संभव कर दिखाता है, वही अन्य लोगों के लिए आदर्श बन जाता है। मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति, मज़बूत इरादे व आत्मविश्वास उसकी शारीरिक अपंगता को भी परास्त करने में सक्षम हैं। हेलेन केलर एक ऐसी ही महिला थीं, जिन्होंने अपनी शारीरिक बाधाओं को पार कर सफलता की अनूठी मिसाल कायम की। 
जब हम किसी बात को लेकर बेहद परेशान होते हैं, तो हमारा मन उस परेशानी में इतना अधिक डूब जाता है कि हमें अन्य कोई रास्ता नज़र ही नहीं आता। पर जो ऐसी विषम परिस्थिति में भी अपना संबल बनाए रखता है और असंभव को संभव कर दिखाता है, वही अन्य लोगों के लिए आदर्श बन जाता है। मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति, मज़बूत इरादे व आत्मविश्वास उसकी शारीरिक अपंगता को भी परास्त करने में सक्षम हैं। हेलेन केलर एक ऐसी ही महिला थीं, जिन्होंने अपनी शारीरिक बाधाओं को पार कर सफलता की अनूठी मिसाल कायम की।
27 जून, 1880 को अमेरिका में तस्कंबिया नामक छोटे से कस्बे में एक सुंदर बच्ची का जन्म हुआ। उसकी माता का नाम कैथरीन एडम्स केलर और पिता का नाम कैप्टन आर्थर था। पिता एक साप्ताहिक अखबार के संपादक थे। 
अपने जन्म के समय हेलेन केलर एक स्वस्थ बच्ची थीं, लेकिन जब वे उन्नीस माह की थीं, तो एक बार उन्हें बहुत तेज़ बुखार हुआ। बुखार होने के कुछ ही दिनों के भीतर हेलेन की माँ ने महसूस किया कि उनकी बेटी खाने की घंटी बजने या उसके चेहरे के आगे हाथ हिलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। बुखार ने बच्ची को दृष्टिहीन तथा बधिर बना दिया था। बेटी की यह स्थिति माता-पिता से देखी नहीं जाती थी। हेलेन के बचपन के ये सबसे कठिन दिन थे। उसकी स्थिति में सुधार की आशा दिनोंदिन क्षीण हो रही थी। ऐसे में हेलेन की माँ उसकी पहली गुरु बनीं। उन्होंने उसे कई छोटे-बड़े काम करने सिखाए। 
एक दिन हेलेन की माँ ने समाचार पत्र में बोस्टन की परकिन्स संस्था के बारे में पढ़ा । हेलेन के माता-पिता वहाँ गए और उन्होंने वहाँ की संरक्षिका से घर आकर हेलेन को पढ़ाने का अनुरोध किया। वे तैयार हो गईं। एनी सुलिवन एक ऐसी गुरु थीं, जिन्होंने प्रेम, धैर्य व लगन का परिचय देते हुए न केवल हेलेन को प्रशिक्षित किया, अपितु उसकी अंधकारमय जिंदगी में उमंग व उत्साह का संचार किया।
उन्होंने कई-कई घंटों की मेहनत के बाद हेलेन को वर्णमाला याद करवाई। अपनी असाधारण प्रतिभा के कारण वे छह महीनों में 625 शब्दों से परिचित हो गईं। हेलेन ने संकल्प शक्ति व कठिन अभ्यास द्वारा लैटिन, फ्रेंच और जर्मन भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। आठ वर्षों के घोर परिश्रम से उन्होंने स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 
सुलिवन की सहायता से हेलेन ने महात्मा गांधी, रवींद्र नाथ टैगोर, कार्ल मार्क्स, टॉलस्टॉय आदि अनेक महान दार्शनिकों व साहित्यकारों के बारे में पढ़ा। हेलेन केलर ने ब्रेल लिपि में कई पुस्तकों का अनुवाद किया और मौलिक ग्रंथ भी लिखे। हेलेन को घुड़सवारी का भी बहुत शौक था। 
एक बार हेलेन केलर ने एक चाय पार्टी का आयोजन किया। उन्होंने वहाँ उपस्थित लोगों को विकलांग मनुष्यों की मदद करने के बारे में समझाया। उनके समझाते ही कुछ ही देर में हज़ारों डॉलर एकत्र हो गए। 
हेलेन केलर परिस्थितियों से हार न मानने वाली महिला थीं। एक बार उन्होंने कह था,  “ज़िंदगी के पहले उन्नीस महीनों में मैंने जिन विस्तृत हरे-भरे खेतों, चमकद आकाश, पेड़-पौधों और फूलों की झलक देखी थी, उस पर मेरा अंधापन कभी पूरी तरह कूची नहीं फेर सका। यदि हमने एक बार दिन को देखा है, तो फिर चाहे जैसे भी दिन आएँ, दिन तो हमारा ही है।"
हेलेन केलर ने छह बार विश्व भ्रमण करके करोड़ों रुपयों की धनराशि एकत्र व विकलांगों के लिए अनेक संस्थानों का निर्माण किया।वे अनेक महान व्यक्तियों से मिलीं । वे रवींद्रनाथ टैगोर तथा पं ० जवाहर लाल नेहरू से बहुत प्रभावित हुईं। 
हेलेन एक स्वावलंबी महिला थीं। उन्हें अपने लगभग सभी कार्य स्वयं ही करना पसंद था। हिम्मत और हौसले की अद्भुत मिसाल थीं- हेलेन केलर। एक बार उन्होंने कहा था, " विश्वास ही वह शक्ति है, जिसकी बदौलत ध्वस्त हुआ संसार भी सुख की रोशनी में आबाद हो सकता है।"

शब्दार्थ:
1. विषम -   कठिन   
2. इच्छाशक्ति- किसी काम को मन के अनुकूल करने की शक्ति
3. परास्त-   करना हराना, 
4. दृष्टिहीन- जो देख नहीं सकता 
5. क्षीण -  कमज़ोर 
6. भ्रमण-  घूमना  
7. बदौलत- के कारण
8. संबल- सहारा, 
9. अपंगता- विकलांगता
10. अनूठी- अद्भुत 
11. बधिर-    जो सुन नहीं सकता
12. अनुरोध- आग्रह, निवेदन 
13. स्वावलंबी- आत्मनिर्भर 
14. ध्वस्त- बरबाद, नष्ट

* निम्न प्रश्नों के सही विकल्प चुनिए-
क. हेलन की पहली गुरु कौन थीं ?
      i.सोलविन                             ii. रविंद्रनाथ टैगोर                      iii.  उनकी माँ 
ख. हेलन केलर ने किस लिपि में अनुवाद किया ?
      i.रोमन लिपि                       ii. ब्रेल लिपि                                iii. देवनागरी लिपि  
ग. हेलेन केलर की माँ ने समाचार पत्र में किस संस्था के बारे में पढ़ा ?
      i. बाल गृह                            ii. सुधार गृह                              iii. परिकिन्स संस्था 
घ.  हेलेन केलर ने कितनी बार विश्व भ्रमण किया ?
      i. चार बार                           ii. छह बार                                   iii. तीन बार 
ङ.  हेलेन केलर को किसका शौक था ?
    i. पर्यटन का                        ii. घुड़सवारी का                          iii. भाषण देने का





बरसात की आती हवा kavita 'श्री हरिवंश राय बच्चन' /सप्रसंग व्याख्या

  बरसात की आती हवा

1.       बरसात की आती हवा 

           वर्षा धुले आकाश से, 

           या चंद्रमा के पास से, 

           या बादलों की साँस से, 

            मंद-मुसकाती हवा, 

            बरसात की आती हवा। 


 शब्दार्थ :वर्षा = बरसात । आकाश = आसमान । मुसकाती= हँसते हुए। 

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित 'बरसात की आती हवा' नामक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता 'श्री हरिवंश राय बच्चन' हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बरसात के बाद में बहने वाली हवा का बड़ी सुंदरता से वर्णन किया है। 

व्याख्या / भावार्थ- इन पंक्तियों में कवि को बरसात होने के बाद आने वाली हवा का अहसास हो रहा है । वह अनुमान लगाते हैं कि यह हवा कहाँ-कहाँ से होकर ज़मीन  पर आती है। कवि कहते हैं कि यह वर्षा से धुले हुए आकाश से या चंद्रमा के पास से आती प्रतीत होती है। ऐसा लगता है जैसे यह हवा बादलों की साँस ही है। यह बरसाती हवा मधुरता लिए मस्त होकर बहने वाली हवा है। 


2. यह खेलती है ढाल से

   ऊँचे शिखर के भाल से, 

आकाश से पाताल से, 

झकझोर लहराती हवा, 

बरसात की आती हवा।  

शब्दार्थ: भाल = मस्तक । ढाल = ढलान / उतार । शिखर-पहाड़ । पाताल = ज़मीन के नीचे।  झकझोर- ज़ोर-ज़ोर। 

व्याख्या / भावार्थ- इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि बरसात की हवा ऊँच-ऊँचे पर्वतों के ढलान से और उनके मस्तक रूपी शिखरों से खेलती है। यह बरसात की हवा आकाश से पाताल तक सबको ज़ोर-ज़ोर से  हिलाकर लहराती हुई खेलती हुई आती है। 


3.   यह खेलती तरुमाल से, 

     यह खेलती हर डाल से, 

     हर एक लता के जाल से, 

     अठखेलती-इठलाती हवा, 

     बरसात की आती हवा। 

शब्दार्थ : तरुमाल = पेड़ों की कतार । डाल = पेड़ की डाली । लता = बेल । जाल = घनी । अठखेलती = खुशियों के साथ । इठलाती = इतराती । 

व्याख्या / भावार्थ : इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि बरसात की हवा पेड़ों की कतार में उसकी हर डाल के साथ खेलती है। यह घनी कोमल बेलों के साथ खुश होकर इतराती हुई खेलती हुई आती है। 

 

4. यह शून्य से होकर प्रकट, 

     नव हर्ष से आगे झपट, 

     हर अंग से जाती लिपट, 

    आनंद सरसाती हवा 

    बरसात की आती हवा। 

 शब्दार्थ: शून्य = आकाश । प्रकट = उत्पन्न् । नव = नया । हर्ष = खुशी , प्रसन्न । झपट = 

   बढ़ना । अंग = शरीर , मनुष्य। आनन्द = खुशी । सरसाती = फैलाती । 

 व्याख्या / भावार्थ - कवि कहते हैं कि बरसात की हवा खुले आकाश से मानो शून्य से प्रकट    

             होकर नयी खुशी के साथ आगे की ओर बहती है और सबसे लोगों के शरीरों से 

              लिपटी हुई खुशी के साथ बहती चली आती है। 



Wednesday, 10 August 2022

सप्रसंग व्याख्या KAVITA यह धरती कितना देती है कवि- सुमित्रानंदन पंत

  


'यह धरती कितना देती है' कविता की सप्रसंग व्याख्या। 


1. मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे,

    सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,

    रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी 

    और फूल फलकर, मैं मोटा सेठ बनूँगा। 

    पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा, 

    बंध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला !

    मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,

    ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था !

प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियों के रचियता 'श्री सुमित्रानंदन पंत' जी हैं। इन पंक्तियाँ के माध्यम से कवि यह बताना चाहते हैं कि अज्ञानता व लोभवश बचपन में बोए पैसों से एक भी अंकुर न फूटने पर  उन्हें यह पता चल गया कि यह धरती स्वार्थी नहीं, परमार्थी है। वह परमार्थ की सुनहली फसलें उगती है। 

व्याख्या: पन्त जी कहते हैं कि मैंने बचपन में घरवालों से छिपाकर धरती में कुछ पैसे इस आशा के साथ दबा दिए थे कि इन पैसों से सुंदर तथा प्यारे-प्यारे पेड़ उगेंगे। जिन पर चमकीले तथा चाँदी के समान सुंदर रुपयों की फसलें उगेंगी और जब हवा का  झोंका आएगा तब ये रुपये पेड़ पर खनकेंगे। उन रुपयों को तोड़कर मैं इकठ्ठा करूँगा और थोड़े ही दिनों में मैं मोटा सेठ बन जाऊँगा। पर दुर्भाग्यवश उस बंजर ज़मीन पर पैसों का एक भी अंकुर नहीं निकला। कवि कहते हैं कि मैं अज्ञानी था, नासमझ था। मैंने अपनी नासमझी के कारण ही धरती में गलत बीज बोये थे।ऐसे बीजों से पेड़ उगने की आशा करना मूर्खता थी।  मैंने उन बीजों को अपनी ममता और प्रेम से बोया पर उसे सींचा अपने लोभ से था। 


2. अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे !

     मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की 

     गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर 

     बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे । 

     भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिए हों !

      मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को,

      और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन!

      किन्तु, एक दिन जब मैं संध्या को आँगन में 

      टहल रहा था, तब सहसा, मैंने देखा, 

      उसे, हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से । 


व्याख्या : कवि कहते हैं कि पैसों के बीज बोने की घटना को बीते पचास वर्ष हो चुके हैं। उसके जीवन की अर्धशती लहराती हुई निकल गयी है।  तब से न जाने कितनी बार  ऋतुएँ आई और देखते देखते बीत गयी। कवि कहते हैं कि उसके जीवन में पुनः एक बार वर्षा ऋतु का आगमन हुआ, जब काजल की तरह काले-काले बादल हृदय में गहरी लालसा लेकर पृथ्वी पर बरस पड़े थे, तब कवि ने उत्सुकतावश अपने घर के  आँगन के कोने की गीली मिटटी की परत को उँगली से सहलाकर कुछ सेम के बीजों को मिटटी के नीचे दबा दिया था। कवि कहते हैं कि उन सेम के बीजों को बोना उन्हें ऐसा ही लगा जैसे मानों उन्होंने धरती के आँचल में मणि और माणिक्य के दानों को बो दिए हों। कवि कहते हैं कि उन बीजों को बोकर मैं भूल गया था क्योंकि यह घटना ऐसी नहीं थी कि जिसे मैं मन में रखता या याद रखता। लेकिन एक दिन जब में शाम के समय अपने आँगन में टहल रहा था, तब अचानक मेरे नज़र उस पर पड़ी और मैं ख़ुशी से झूम उठा।  


3.  देखा आँगन के कोने में कई नवागत 

     छोटी-छोटी छाता ताने खड़े हुए हैं। 

     छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की,

     या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी-

     जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे 

     पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे- 

     डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चों से !


व्याख्या-  कवि कहते हैं कि मैंने आँगन के कोने में जहाँ सेम के बीज बोये थे, उसमें सेम का अंकुर देखा। कवि उन आनंद की कोई सीमा नहीं रही। कवि ने देखा कि आँगन में अनेक नए-नए पौधे छोटे-छोटे छातों को तानकर खड़े हो गए हैं। यहाँ कवि पत्तों को छाते की तरह मान रहे हैं। कवि को लगता है कि जैसे वे अंकुरित पौधे अंडा तोड़कर निकले हुए पक्षियों के बच्चे हों, जो छोटे- छोटे पंखों को फैलाकर उड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आशय यह है कि सेम के छोटे-छोटे पौधे जीवन की नई उड़ान भरने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे हैं।  



4. तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे 

    अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ, 

    हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे ! 

    बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा, 

    और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का 

    हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को, 

     मैं अवाक् रह गया- वंश कैसे बढ़ता है !

    झुंड-झुंड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी। 

    आह!  इतनी फलियाँ टूटी, जाड़ो भर खाईं, 

    कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ ! 


व्याख्या: कवि कहते हैं कि इन अंकुरित बीजों से निकल रहे पौधों की पलटन को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे सब एक साथ आगे बढ़ रही हैं। एक साथ फैली हुई बेलों ने अब झाड़ी का रूप ले लिया है। कवि उन्हें देखकर हर्षित मन से कहते हैं कि अनगिनत पत्तों की हरी-भरी बेल देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने आँगन में शामियाने टाँग दिए हैं। कवि ने उन बेलों को आगे बढ़ता देखकर उनके लिए अपने आँगन में बाँस की छोटी-सी छत बना दी। जिसका सहारा लेकर अनेक अंकुर उस पर फूटने लगे, आगे बढ़ने लगे। कवि इस प्रकार इनकी वंश वृद्धि को देखकर काफी हैरान हो जाते हैं।  सेम की लताएँ फूलों और तारों के समान बहुत ही सुंदर लग रही हैं। कवि बहुत प्रसन्न होते हुए कहते हैं कि इन सेम की बेलों पर इतनी फलियाँ लगी कि कवि ने पूरी सर्दियाँ उन फलियों को खाया। कवि कहते हैं कि सेम में इतनी अधिक फलियाँ निकली कि सुबह-शाम, पास-पड़ोस के लोग भी उन्हें खाते-खाते उब गए थे।


5.  यह धरती कितना देती है ! धरती माता 

     कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को ! 

     नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को, 

     बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बो कर ! 

     कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को ! 

     नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को, 

     बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बो कर ! 

     रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ। 

     इसमें सच्ची समता के दाने बोने है;

     इसमें जन की क्षमता का दाने बोने है, 

     इसमें मानव-ममता के दाने बोने है;

     जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें 

     मानवता की, जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ 

     हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे। 


व्याख्या: धरती माता की उदारता पर वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह धरती कितनी दानी है। यह अपने प्यारे पुत्रों को कितना स्नेह प्रदान करती है। अपने पुत्रों को कितना देती है। कवि अपनी लोभ प्रवृति और पैसा बोने वाली घटना को स्मरण कर उसकी  निंदा करते हुए कहते हैं कि बचपन में अज्ञानतावश जब उन्होंने गलत बीज मिट्टी में बो दिए थे, तब वे इस मिट्टी का, इस धरती का महत्त्व नहीं समझ पाए थे। वे अनजान थे, नहीं जानते थे कि धरती में कौन से बीज बोने चाहिए। कवि ने समय बीतने के साथ यह बात अच्छी तरह जान ली थी कि यह धरती तो रत्न उत्पन्न करती है इसमें लालच को नहीं बोया जाता। अगर इसमें हमें मानवता की सुनहरी फसलें उगानी है तो हमें सद्भावना, सहयोग, परिश्रम और प्रेम के बीज बोने होंगे। प्रकृति का नियम है जैसा बोयेंगे वैसा ही पाएँगे। 

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