साखी (कबीर) पाठ का भावार्थ प्रस्तुत साखियाँ कबीरदास जी द्वारा रचित हैं । इन साखियों में कबीर ने विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है। कबीर फक्कड़, मस्तमौला और क्रांतिदर्शी कवि थे। उन्होंने अपनी पैनी नज़र और वाणी से बाह्य आडंबर पर तीखी चोट की है। अपने अनुभवजन्य ज्ञान को 'साक्षी' में प्रत्यक्ष करते हुए कबीर जीवन के परमोपयोगी और आवश्यक तथ्यों का ज्ञान देते हैं। • पहले दोहे में संयमित और मधुर वाणी के प्रयोग की आवश्यकता पर बल देना ही कवि का उद्देश्य है।इस दोहे में उन्होंने बताया है कि कड़वी वाणी से दूसरों को दुःख होता हैं। अतः दूसरों को सुख पहुँचाने वाली व अपने मन को भी शीतलता पहुँचाने वाली मीठी वाणी बोलनी चाहिए। • दूसरे दोहे में मृग और उसकी नाभि में स्थित कस्तूरी का उदाहरण देते हुए यह बताया गया है कि नाभि में कस्तूरी होने पर भी बाहर उसकी खुशबू से प्रभावित होकर उसे चारों ओर ढूँढ़ता है, उसी प्रकार प्रत्येक मन में राम का वास है, उसके लिए इधर-उधर भागना व्यर्थ है। ईश्वर तो हमारे अंतःकरण में ही निवास करते हैं। • तीसरे दोहे में अहंकार को ईश्वर की भक्ति व उसकी प्राप्ति में बाधक बताया गया है। ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश प्राप्त होते ही अहंकार व मोह का अंधकार समाप्त हो जाता है। • चौथे दोहे में कहा गया है कि खाने और सोने को जीवन का सबसे बड़ा सुख मानकर सारा संसार खुश है। वह इनके सुखों में इवा हुआ है जबकि मोहमाया की नींद त्याग कर ज्ञान प्राप्त होने पर कबीर देखते हैं कि मरणशील मनुष्य इस क्षणभंगुर संसार में राम-विमुख होकर राम को भूल गया है। मनुष्य जीवन की गरिमा को नहीं समझते हैं इसलिए मनुष्य के अनमोल जीवन को नष्ट होते देखकर कबीर दुखी हो रहे हैं। • पाँचवें दोहे में कहा गया है कि विरह पीड़ा विष से भी घातक है। राम से प्रेम करनेवाला उसके विरह में जीवित नहीं बचता है यदि बच भी जाता है तो पागल हो जाता है। • छठे दोहे में कहा गया है कि अपने दोषों को बतानेवाले, देखनेवाले को आदर सहित अपने पास रखना चाहिए। इनकी आलोचना एक सच्चे हितचितक की भाँति हमारे स्वभाव के सभी दोषों व बुराइयों को बिना साबुन तथा पानी के ही दूर कर हमारे मन को निर्मल कर हमारा भला करती है। • सातवें दोहे में बताया गया है कि जिसे ईश्वर प्रेम की लगन लग जाती है वही सच्चा पंडित कहलाता है। शास्त्र व वेद पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता। • आठवें दोहे में भगवद्ज्ञान से युक्त होकर कवि ने दूसरों को भी भगवद्भक्ति में रंग जाने के लिए प्रेरित किया है। भगवान की प्राप्ति होने पर भक्त व संत सब ओर प्रेम-ही-प्रेम की खुशबू फैलते हैं। |
रहीम के दोहे
रहीम के दोहे अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर- कवि रहीम के अनुसार प्...
Saturday, 8 April 2023
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