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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Thursday, 29 June 2023

तोते की कहानी

तोते की कहानी

एक राजा था। उसके यहाँ था एक तोता। लेकिन वह ताता बहुत मुख था। खूब उछलता था । फुदकता था, उड़ता था; लेकिन यह नहीं जानता था कि तहजीव किसे कहते हैं। राजा बोला, "यह तोता किसी काम का नहीं। इससे फ़ायदा तो कुछ नहीं, लेकिन नुकसान ज़रूर है। बाग के फल खा जाता है, जिससे राजामंडी में फलों का टोटा पड़ जाता है।" उसने मंत्री को बुलाया। मंत्री आया। राजा ने हुक्म दिया, "इस तोते को पढ़ाओ, जिससे इसे तहजीब आए।"
तोते को शिक्षा देने का काम राजा के भानजे को मिला।

पंडितों की बैठक हुई। उन्होंने सोचा - "तोते के अनपढ़ रहने का कारण क्या है?" बहुत विचार हुआ। नतीजा निकला कि तोता अपना घोंसला साधारण घास-फूँस से बनाता है। ऐसे आवास में विद्या नहीं आती। इसलिए सबसे पहले तो यह जरूरी है कि इसके लिए कोई बढ़िया-सा पिंजरा बना दिया जाए।

राज पंडितों को भारी दक्षिणा मिली और वे खुश होकर अपने-अपने घर गए। सुनार बुलाया गया। वह सोने का पिंजरा तैयार करने में जुट गया। पिंजरा ऐसा सुंदर बना कि उसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग टूट पड़े। देखने वाले कहने लगे, "इस तोते का भी क्या "नसीब है।"

सुनार को थैलियाँ भर-भर कर इनाम मिला।

पंडितजी तोते को विद्या पढ़ाने बैठे। बोले, "यह काम थोथी पोथियों का नहीं है। " राजा के भानजे ने सुना। उसने उसी समय पोथी लिखने वालों को बुलवाया। पोथियों की नकल होने लगी। नकलों और नकलों की नकलों के ढेर लग गए। जिसने भी देखा, उसने यही कहा, "शाबाश! इतनी विद्या को धरने की जगह भी नहीं रहेंगी।

नकलनवीसों को, लद्दू बैलों पर लाद लाद कर इनाम दिए गए। वे अपने-अपने घर की और दौड़ पड़े। उनकी दुनिया में तंगी का नाम भी बाकी न रहा। जवाहरात जड़े सोने के पिंजरे की देख-भाल में राजा का भानजा बहुत व्यस्त रहने लगा। मरम्मत के काम भी लगे ही रहते। फिर झाड़-पोंछ और पालिश की धूम भी मची ही रहती थी। जो भी देखता, यही कहता, "उन्नति हो रही है।"

इन कामों पर अनेक लोग लगाए गए और उनके कामों की देख-रेख करने पर और भी
बहुत से लोग लगे। सब के सब हर महीने मोटे-मोटे वेतन ले-लेकर बड़े-बड़े संदूक भरने लगे।

वे और उनके चचेरे, ममेरे, मौसेरे भाई-बंधु बहुत प्रसन्न हुए। जिंदगी में बहार आ गई और मौज करने लगे।

दुनिया में और तो सब चीजों की कमी है, लेकिन निंदकों की कोई कमी नहीं है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। वे बोले, "पिंजरे की तो उन्नति हो रही है, पर तोते की खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं है।"

बात राजा के कानों में पड़ी। उसने भानजे को बुलाया और कहा, "क्यों भानजे राजा, यह
कैसी बात सुनाई पड़ रही है ?"

भानजे ने कहा, "महाराज, अगर सच-सच बात सुनना चाहते हैं, तो सुनारी का बुलाइए, पंडितों को बुलाइए, नकलनवीसों को बुलाइए, मरम्मत करने वालों को बुलाइए और मरम्मत की। देखभाल करने वालों को बुलाइए। निंदकों को हलवे मोड़े में हिस्सा नहीं मिलता, इसीलिए ऐसी ओछी बातें करते हैं।" जवाब सुनकर राजा ने पूरे मामले को भली-भाँति समझ लिया। भानजे के गले में तत्काल सोने के हार पहनाए गए।

राजा का मन हुआ कि एक बार चलकर अपनी आँखों से यह देख लें कि शिक्षा कैसे धूम- धड़ाके से और कैसी तेज़ी के साथ चल रही है। सो, एक दिन वह मुसाहिबों, मुँहलगों, मित्रों और मंत्रियों के साथ शिक्षा - शाला में जा धमका।

उसके पहुँचते ही ड्योढ़ी के पास शंख या दोन पंडित | गले फाड़-फाड़ कर और चुटिया फड़का फड़का कर मंत्र-पाठ करने लगे। मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नकलनवीस, देख-भाल करने वाले और उन सभी के ममेरे, फुफेरे, चचेरे, मौसेरे भाई

जय-जयकार करने लगे। भानजा बोला, "महाराज, देख रहे हैं न?"

महाराज ने कहा, “आश्चर्य! शब्द तो बहुत पढ़ाए जा रहे हैं।"

भानजा बोला, " शब्द ही क्यों, इसके पीछे अर्थ भी कोई कम नहीं।'

राजा प्रसन्न होकर लौट पड़ा। इयौढ़ी को पार करके हाथी पर सवार होने वाला था कि पास के झुरमुट में छिपा बैठा निंदक बोल उठा, "महाराज! आपने तोते को देखा भी है?" राजा चौका। बोला, "अरे हाँ यह तो मैं बिलकुल भूल ही गया था। तोते को तो देखा ही नहीं। "

लौटकर पंडित से बोला, "मुझे यह देखना है कि तोते को तुम पढ़ाते किस ढंग से हो ? 

पढ़ाने का ढंग उसे दिखाया गया। देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। राजा ने सोचा : अब तोते को देखने की जरूरत ही क्या है? उसे देखे बिना भी काम चल सकता है। राजा ने इतना तो अच्छी तरह समझ लिया कि बंदोबस्त में कहीं कोई कमी नहीं है। पिंजरे में दाना-पानी तो नहीं था, थी सिर्फ़ शिक्षा। यानी ढेर की ढेर पोथियों के ढेर के ढेर पन्ने फाड़-फाड़कर कलम की नोक से तोते के मुँह में घुसेड़े जाते थे। खाना तो बंद हो ही गया था, चीखने चिल्लाने के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई थी। तोते का मुँह ठसाठस भरकर बिलकुल बंद हो गया था। देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते।

अब दुबारा जब राजा हाथी पर चढ़ने लगा तो उसने कान उमेठू सरदार को ताकीद कर दी " निंदक के कान अच्छी तरह उमेठ देना। "" तोता दिन पर दिन अधमरा होता गया। देखभाल करने वालों ने समझा कि प्रगति काफ़ी आशाजनक हो रही है। फिर भी पक्षी स्वभाव के एक स्वाभाविक दोष से तोते का पिंड अब भी छूट नहीं पाया था। सुबह होते ही वह उजाले की ओर टुकुर-टुकुर निहारने लगता था और बहुत ही

'भद्दे ढंग' से अपने डैने फड़फड़ाने लगता था। इतना ही नहीं, किसी-किसी दिन तो ऐसा भी देखा गया कि वह अपनी रोगी चोंचों से पिंजरे की सलाखें काटने में जुटा हुआ है।

कोतवाल गरजा, "यह कैसी बेअदबी है। "

फ़ौरन सुनार हाज़िर हुआ। आग, भाथी और हथौड़ा लेकर। वह धमाधम लोहा-पिटाई हुई कि कुछ न पूछिए। लोहे की सांकल तैयार की गई और तोते के देने भी काट दिए गए।

राजा के संबंधियों ने हाँडी जैसे मुँह लटका कर और सिर हिलाकर कहा, "इस राज्य के पक्षी । सिर्फ बेवकूफ़ ही नहीं, नमक हराम भी है।" और तब, पंडितों ने एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में बरछा ले-लेकर वह कांड रचाया, जिसे शिक्षा कहते हैं।

राजा के संबंधियों ने हाँडी जैसे मुँह लटका कर और सिर हिलाकर कहा, "इस राज्य के पक्षी । सिर्फ बेवकूफ़ ही नहीं, नमक हराम भी है।" 

और तब, पंडितों ने एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में बरछा ले-लेकर वह कांड रचाया, जिसे शिक्षा कहते हैं।

लुहार की लुहसार बेहद फैल गई, लुहारिन के अंगों पर सोने के गहने शोधने लगे और

कोतवाल की चतुराई देखकर राजा ने उसे सिरोपा भेंट किया।

तोता मर गया। कब मरा, इसका निश्चय कोई भी नहीं कर सकता। कम्बख्त निंदक ने अफ़वाह फैलाई "तोता मर गया। " राजा ने भानजे को बुलवाया और कहा, "भानजे, यह कैसी बात सुनी जा रही हैं?" 

भानजे ने कहा, "महाराज, तोते की शिक्षा पूरी हो गई है।" 

राजा ने पूछा, "अब भी वह उछलता फुदकता है?"

भानजा बोला, "अजी, राम कहिए।"

'अब भी उड़ता है?" "ना, कतई नहीं।"

'अब भी गाता है?"

"नहीं तो।"

"दाना न मिलने पर अब भी चिल्लाता है?"

"अ हं: "

राजा ने कहा, "एक बार तोते को लाओ तो सही, देखें जरा।"

तोता लाया गया। साथ में कोतवाल आया, प्यादे आए, घुड़सवार आए। 

राजा ने तोते को चुटकी से दबाया। तोते ने न 'हाँ' की, न 'हूँ' की। हाँ, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते ज़रूर  खड़खड़ाने लगे।


Wednesday, 28 June 2023

CLASS 10 IMPORTANT POINTS पद - मीरा

पद - मीरा ( मुख्य बिंदु )

हरि स्मरण करते हुए हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती करना :

  मीरा अपने साथ सामान्य जन की पीड़ा को हरने के लिए श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं। इससे कवयित्री की परोपकार की भावना प्रकट होती है। कवयित्री द्वारा द्रौपदी की लाज बचाने का उदाहरण, प्रह्लाद को बचाने के लिए नरसिंह रूप धारण करने का तथा डूबते हुए हाथी को मगरमच्छ से बचाने का उदाहरण दिया है। इन्हीं के आधार पर मीरा अपनी पीड़ा को हरने की प्रार्थना करती हैं। 

भाव भक्ति को जागीर कहना :

 किसी भी सच्चे भक्त के लिए सबसे बड़ी जागीर है-उसका भगवान भगवान को पाने सबसे श्रेष्ठ साधन भक्ति है। मीरा श्रीकृष्ण की भाव पूर्ण भक्ति करती हैं। भाव-भक्ति के माध्यम से वे अपने श्रीकृष्ण को पा सकती थीं। इसलिए उनके लिए भाव भक्ति जागीर के समान थी। भाव-भक्ति हेतु अपने आराध्य के दर्शन करना, उनके गुणों का स्मरण करना तथा मन में धारणा करना अत्यंत आवश्यक है।
 भगवान का नरहरि रूप :

 हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी राजा था। वह स्वयं को ईश्वर मानता था। वह प्रजा से भी स्वयं को ईश्वर मानने के लिए कहता था, परंतु उसका पुत्र प्रहलाद उसे ईश्वर नहीं मानता था। इस कारण हिरण्यकश्यप ने उस पर अत्याचार किए व उसे मार डालने के बहुत प्रयत्न किए, परंतु वह विष्णु भक्त प्रभु कृपा से बच जाता था। हिरण्यकश्यप को वरदान मिला हुआ था कि उसे न कोई पशु मार पाएगा, न मनुष्य। इसलिए भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आया नर और आधे सिंह का रूप धारण किया। वही रूप नरसिंह कहलाया।

अपने आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन पाने के लिए मीरा के उपाय :

1. वे बार-बार श्रीकृष्ण का दर्शन करना चाहती है। वे श्रीकृष्ण की दासी बनने को तैयार हैं। 
2. वे बाग लगाना चाहती हैं।
3. वे वृंदावन की कुंज गलियों में गोविंद लीला का गुणगान करना चाहती हैं। 
4. कुसुंबी साड़ी पहनकर आधी रात को यमुना तट पर जाकर एकांत में श्रीकृष्ण से मिलने को तैयार हैं।
5. वे ऊँचे-ऊंचे महलों का निर्माण करवाकर उनमें खिड़कियाँ बनवाना चाहती हैं। 

मीरा की भक्ति भावना :

मीरा श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका हैं। ये श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम, पति व संरक्षक मानती हैं और स्वयं को उनकी दासी बताती हैं। आराध्य रूप में ये श्रीकृष्ण की चाकर बनने को भी तैयार हैं। वे प्रभु दर्शन, नाम स्मरण व भाव भक्ति पाने हेतु कुछ भी करने को तैयार हैं। उन्हें कृष्ण का मोहक रूप पसंद है-पीले वस्त्र, वैजयंती माला तथा मोर पंख से युक्त मुकुट वाला रूप। यह भक्ति तो शृंगार रस प्रधान है। मीरा की भक्ति का दूसरा रूप शांत रस प्रधान है। इसमें वे प्रभु से अपनी पीड़ा दूर करने के लिए कहती हैं। कृष्ण का यह रूप रक्षक का रूप है। वे कृष्ण को हो अपना सर्वस्व मानती है।

मीराबाई की भाषा-शैली :

मीराबाई ने अपने पदों में ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती आदि भाषाओं का प्रयोग किया गया है। भाषा अत्यंत सहज सुबोध है। शब्द चयन भावानुकूल है। भाषा में कोमलता, मधुरता और सरसता के गुण विद्यमान हैं।" अपनी प्रेम की पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने अत्यंत भावानुकूल शब्दावली का प्रयोग किया है। भक्तिभा के कारण शांत रस प्रमुख है तथा प्रसाद गुण की भावाभिव्यक्ति हुई है। मीराबाई श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका हैं। वे अप आराध्य देव से अपनी पीड़ा का हरण करने की विनती कर रही हैं। इसमें कृष्ण के प्रति श्रद्धा, भक्ति और विश्वास भाव की अभिव्यंजना हुई है। मीराबाई की भाषा में अनेक अलंकारों ; जैसे- अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, उदाहरण अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।

'द्रौपदी की लाज राखी आप बढायो चीर' कथन का भाव :

 महाभारत की घटना के अनुसार जब भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण दुशासन के द्वारा किया जा रहा था, तब उसने अपने आराध्य कृष्ण को याद किया।  श्रीकृष्ण तुरंत वहाँ अवतरित होकर द्रौपदी के वस्त्रों को बढ़ाते गए। ज्यों-ज्यों दुशासन उसकी साड़ी को खींचता गया, त्यों-त्यों कृष्ण उसके शरीर पर वस्त्र बढ़ाकर उसके मान की रक्षा करते रहे। कृष्ण ने सदैव अपने भक्तों की रक्षा की है और इसी आधार पर मीरा उनसे प्रार्थना कर रही हैं कि वे उनकी भी रक्षा करें। मीरा को कृष्ण के लोकरक्षक रूप पर पूरा विश्वास है। मीरा के अधिकांश पदों में कृष्ण के प्रति प्रेम भाव, माधुर्य भाव झलकता है, किंतु साथ ही मीरा ने समय-समय पर उन्हें उनके कर्तव्य भी याद दिलाएँ हैं। कृष्ण केवल मनमोहक, मुरलीधर के रूप में ही नहीं बल्कि गिरिधर, गोप-वल्लभ, लोकरक्षक रूप में भी लोगों के हृदय में विराजमान रहते हैं।

अपना-अपना काम

अपना-अपना काम 

बहुत समय पहले की बात है, ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर बसा एक छोटा-सा नगर था - अभयपुरी। एक दिन वहाँ के राजा के मन में नौका विहार करने का विचार आया। राजा अपने साथ अपने एक विश्वासपात्र मंत्री को भी नौका विहार के लिए लेकर चले। एक बड़ी-सी सजी-धजी नौका पर सवार हो वे निकले। नौका पर कुल चार लोग थे - राजा, उनके मंत्री और दो नाविक। दोनों नाविक नाव को खेते जा रहे थे। सभी को बहुत आनंद आ रहा था।

नौका नदी में आगे बढ़ती जा रही थी। शीतल हवा मंद-मंद बह रही थी। राजा तथा मंत्री आँखें मूँदकर शीतल हवा का मज़ा ले रहे थे।

नाविकों ने सोचा कि राजा और मंत्री सो रहे हैं। उन्हें सोया जानकर दोनों नाविक आपस में बातें करने लगे। एक नाविक ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए दूसर नाविक से कहा, "देखो, ईश्वर का कैसा न्याय है! हमारी तरह ये मंत्री जी भी तो राजा के सेवक ही हैं लेकिन हम दोनों धूप में पसीना बहा रहे हैं और ये आराम से लेटे हुए हैं। लेकिन हमारे राजा को हमारी परवाह कहाँ?"

दूसरे ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई। राजा आँखें बंद किए हुए थे लेकिन वे सोए नहीं थे। उन्होंने नाविकों की बातें सुनीं लेकिन बिना कुछ बोले चुपचाप लेटे रहे। कुछ देर बाद राजा ने आँखें खोलीं।

थोड़ी ही दूरी पर एक टापू दिखाई दिया। राजा ने नाव को टापू के किनारे लगाने का आदेश दिया। राजा नाव से उतरकर टापू के किनारे-किनारे टहलने लगे। थके हुए नाविक भी खा-पीकर इधर-उधर लेट गए। कुछ ही दूरी पर एक झोंपड़ी दिखाई दे रही थी। अचानक राजा को वहाँ से कुछ आवाजें आती सुनाई पड़ी। राजा ने तुरंत एक नाविक को बुलाकर कहा, "जरा जाकर पता लगाओ कि ये आवाजें किसकी है?"

राजा की आज्ञा पाकर नाविक तुरंत उस ओर भागा जहाँ से आवाजें आ रही थीं। कुछ देर बाद वह लौटकर आया और राजा से बोला, "महाराज! वहाँ कुतिया के छोटे-छोटे

पिल्ले रो रहे हैं।" "कितने पिल्ले हैं, नाविक?" राजा ने पूछा।

नाविक चुप रहा क्योंकि उसने उनकी गिनती तो की नहीं थी। वह उलटे पाँव भागा। दौड़ते हाँफ़ते वापस आकर बोला, “महाराज! पाँच पिल्ले हैं।"

 राजा ने फिर पूछा, "उनमें से कितने नर हैं और कितने मादा?"

नाविक चकराया क्योंकि उसने तो इस बारे में सोचा ही नहीं था। वह फिर दौड़ता हुआ झोंपड़ी की ओर गया और आकर हाँफ़ते-हाँफते बोला, “महाराज! पिल्लों में दो नर और तीन मादा हैं।"

राजा ने फिर पूछा, “नाविक! पिल्ले किस रंग के हैं? काले, सफ़ेद या भूरे रंग के?"

नाविक मुसीबत में पड़ गया। उसने तो इसका ध्यान ही नहीं रखा था। अब राजा ने पूछा
हैं तब उत्तर तो देना ही होगा, यह सोचकर वह चौथी बार भागता हुआ झोंपड़ी की ओर गया और लौटकर बोला, “महाराज! दो पिल्ले काले रंग के हैं और तीन भूरे रंग के।" 

राजा ने इसके बाद नाविक से और कुछ नहीं पूछा। वे नाविक की हालत देखकर मन-ही-मन मुसकरा रहे थे। अब उन्होंने अपने मंत्री को अपने पास बुलाया और कहा, "वहाँ झोंपड़ी के पास से कुछ आवाज़ें आ रही हैं, ज़रा जाकर इस बारे में पता तो लगाइए।"

राजा की आज्ञा पाकर मंत्री जी झोंपड़ी की तरफ चल दिए। वे थोड़ी ही देर बाद लौट आए और बोले, "महाराज! झोंपड़ी के पीछे कुतिया के पिल्ले आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, ये उन्हीं की आवाज़ हैं। "

"कितने पिल्ले हैं?" राजा ने पूछा।

" पाँच?" मंत्री ने झट उत्तर दिया। 

"उनमें से कितने नर हैं और कितने मादा?" राजा ने पूछा।

"दो नर और तीन मादा, महाराज! " मंत्री ने कहा।

राजा ने फिर पूछा, "पिल्ले किस रंग के हैं?"

"महाराज! दो काले रंग के हैं और तीन भूरे रंग के, लेकिन उनकी माँ का रंग काला है । झोंपड़ी में एक मछुआरे का परिवार रहता है, ये उसी की पालतू कुतिया के पिल्ले हैं। " मंत्री ने उत्तर दिया ।

मंत्री से सभी प्रश्नों के सही उत्तर सुनने के बाद राजा ने नाविक की ओर देखकर कहा, “मेरे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तुम चार बार झोंपड़ी तक गए? तुम्हें कितना परिश्रम करना पड़ा ? और देखो, मंत्री जी ने एक ही बार जाकर सारी जानकारी प्राप्त कर ली। अब समझे कि मनुष्य होते हुए भी सब के सब एक समान नहीं होते - कोई शारीरिक परिश्रम कर सकता है और कोई मानसिक । सबकी बुद्धि एक समान नहीं होती इसलिए कोई मंत्री बनता है और कोई नाविक। हर किसी के कार्य का अपना-अपना महत्त्व है। जिस तरह तुम मंत्री का कार्य नहीं कर सकते उसी तरह मंत्री जी भी तुम्हारी तरह परिश्रम नहीं कर सकते। इसमें न्याय-अन्याय की कोई बात नहीं है। "

नाविकों को राजा की सारी बात समझ में आ गई। वे समझ गए कि सभी मनुष्यों के काम महत्त्वपूर्ण हैं।

Tuesday, 27 June 2023

अभ्यास का फल

अभ्यास का फल 

बात उन दिनों की है जब लोग अपने बच्चों को विद्या प्राप्त करने के लिए गुरु के आश्रम में भेजा करते थे। बालक वरदराज जब पाँच वर्ष का हुआ तो उसके पिता ने भी उसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए एक आश्रम में भेजा।

आश्रम में गुरु जी ने अन्य बालकों के समान ही वरदराज को भी पढ़ाना प्रारंभ किया। वरदराज आश्रम में रह तो रहा था लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। गुरु जी ने उसे तरह-तरह से पढ़ाना और समझाना चाहा लेकिन उसे कुछ भी समझ न आता था। गुरु जी जो कुछ पढ़ाते, उसे वह याद ही नहीं रख पाता था। उसकी ऐसी स्थिति देखकर आश्रमवासी बच्चे उसे मंदबुद्धि कहकर चिढ़ाने लगे। इसी प्रकार पाँच वर्ष बीत गए। धीरे-धीरे उसके सहपाठी उससे आगे बढ़ते गए पर वरदराज वहीं का वहीं! वह कुछ भी विशेष न सीख सका था। उसके साथ जो बालक पढ़ने आए थे, वे तो आगे बढ़ आए, भी उसे पीछे छोड़ आगे निकल गए। 

एक दिन गुरु जी भी हार मान गए। निराश होकर उन्होंने वरदराज से कहा, "बेटा मैं समझता हूँ कि पढ़ना-लिखना तुम्हारे वश की बात नहीं है। जितना प्रयत्न मुझे करना था, उतना मैंने किया। पर, मुझे लगता है कि विद्याधन तुम्हारे भाग्य में नहीं वरदराज ! है। इससे अच्छा तो यही है कि तुम अपने घर जाओ और वहाँ का काम-काज देखो।"

वरदराज असमंजस में पड़ गया। गुरु जी के मना करने के कारण उसे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा। उसे यह चिंता भी सताने लगी कि घर लौटने पर उसके पिता अशा सोचेंगे। गाँव के लोग भी उसे 'मूर्ख महामूर्ख' कहकर दुत्कारेंगे। वरदराज करता भी तो क्या ! उसने अपना सामान समेटा, गुरु जी के चरण छुए और भारी मन से वहाँ से विदा हुआ। वह उदास होकर अनमने भाव से चला जा रहा था। घर वापस जाने का उसका जरा भी मन नहीं था पर कोई और ठिकाना भी तो नहीं था। कहा जाए, क्या करे, उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।

वह सवेरे चला था और अब दोपहर हो आई थी। रास्ते में खाने के लिए गुरु जी ने उसे थोड़ा सत्तू दिया था। उसे भूख-प्यास भी लग आई थी। चलते-चलते उसे एक कुआँ दिखाई दिया। वह पानी पीने के लिए कुएँ पर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि पानी खींचने की रस्सी की रगड़ से कुएँ की जगत पर निशान पड़ गए हैं और मिट्टी के घड़ों को रखने से ज़मीन पर गड्ढे पड़ गए हैं। यह दृश्य वरदराज के मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध गया। उसने विचार किया कि जब रस्सी की बार-बार रगड़ खाने से कठोर पत्थर पर निशान पड़ सकते हैं तो क्या लगातार परिश्रम करने से मैं विद्वान नहीं बन सकता!

बस! फिर क्या था वरदराज के मन में आशा की किरण जगी। वह बुदबुदाने लगा. 'मैं भी लगातार परिश्रम करूँगा। अपने पाठों को मन लगाकर बार-बार पढ़ेगा और उन्हें याद करूँगा। फिर देखता हूँ कि मुझे विद्या कैसे नहीं आती!"

वरदराज ने कुएँ पर हाथ-मुँह धोया और गहरी साँस लेकर आगे की ओर बढ़ा। अब वह सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त था। इतना कि उसे भूख-प्यास की भी चिंता नहीं. रही थी। वह तेज़ कदमों से चल रहा था। अब वह दूसरी ही तरह का वरदराज लग रहा था। वह घर की ओर नहीं बल्कि आश्रम की ओर लौट चला था।

सूर्यास्त होने को था। गुरु जी आश्रम की वाटिका में टहल रहे थे। तभी उन्होंने वरदराज को आते हुए देखा। उन्हें लगा कि शायद आश्रम में कुछ छूट गया हो जिसे लेने वह लौटा है।

वरदराज ने गुरु जी के पास पहुँचकर उनके चरण स्पर्श किए। गुरु जी ने प्यार से पूछा, 'क्या बात है बेटा! क्या तुम्हारा कुछ सामान छूट गया जिसे लेने तुम्हें लौटना पड़ा?"" पूरी वरदराज नम्रतापूर्वक बोला, “हाँ गुरु जी ! मेरी विद्या यहीं छूट गई है जिसे इस बार मैं अवश्य लेकर जाऊँगा। अब मेरी आँखें खुल गई हैं। मैंने निश्चय किया है कि मैं लगन और परिश्रम से पढूँगा। अब कभी आपको निराश होने का अवसर नहीं दूँगा।” गुरु जी का दिल पसीज गया। उन्होंने वरदराज को गौर से देखा। उसकी आँखों में चमक थी। गुरु जी ने इतना भर ही कहा, “तुम जो कुछ कह रहे हो, यदि उसे कर दिखाओगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। "

वरदराज ने पढ़ाई प्रारंभ की। अब तो उसकी भूख और नींद, पता नहीं कहाँ गुम हो गई थी! वह देर रात तक पढ़ता और प्रातः सबसे पहले उठ जाता। वह अपना एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाता।

उसने दिन-रात एक कर दिए। इसका प्रभाव यह हुआ कि पहले पाठ याद करना उसे पहाड़ पर चढ़ने के समान कठिन लगता था, अब वही सरल लगने लगा था। गुरु जी और अन्य बालक वरदराज में आए इस परिवर्तन को देख आश्चर्यचकित रह गए। अब वरदराज की गिनती प्रतिभावान छात्रों में होने लगी। यह उसकी लगन और कठोर परिश्रम का ही चमत्कार था।

 यही वरदराज आगे चलकर संस्कृत के महान विद्वान बने। संस्कृत के सबसे बड़े विद्वान पाणिनी के बाद वरदराज का ही नाम आता है।

संगति का असर


संगति का असर

एक बहुत ही शरारती बालक था, परंतु माँ का कहा कभी न टालता था। उसका पूरा दिन इधर-उधर शरारतें करने में, लोगों को परेशान करने में ही बीतता था। कभी पिता जी के जूते छिपा देता तो वे ढूंढ-ढूँढ़कर परेशान हो जाते तो कभी वह दो गायों की पूँछ रस्सी से आपस में बाँध देता। वे दोनों बेचारी बेजुबान रंभा-रंभा कर परेशान हो जाती।

वह बालक असल में शरारती बच्चों की टोली के साथ खेलता था। बस वहीं से हर दिन नई शरारत कर उसे आजमाने लगता। उसकी शिकायतें आने लगी तो परिवार के लोग भी परेशान हो उठे परंतु बालक समझकर उसे कोई दंड भी नहीं देते थे।

एक दिन बालक की माँ ने उसे बुलाया और कहा, "बेटा, यह चाकू ले जाओ और आँवले के पेड़ की थोड़ी छाल निकाल लाओ। दवा बनानी है।" बालक का मन तो अपने दोस्तों के साथ खेलने का था. परंतु माँ का कहा वह कभी न टालता था। इसलिए चुपचाप चाकू लेकर चल दिया। बड़ी मुश्किल से ढूँढ़ने पर उसे एक जगह आँवले का पेड़ दिखाई दिया। उसने चाकू से पेड़ की थोड़ी छाल निकाली और वापस अपने घर की तरफ चल दिया। उसने देखा रास्ते में एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर कुछ संत बैठे हैं। वह थक गया था. इसलिए कुछ देर आराम करने के लिए वह भी वहीं बैठ गया।

एक संत ने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पूछा, "बेटा तुम यह चाकू लेकर कहाँ गए थे।" बालक ने उत्तर दिया, "मेरी माँ ने दवा बनाने के लिए आँवले के पेड़ की छाल मँगाई थी। मैं वही छाल लेने गया था।" संत ने मुस्कराते हुए कहा, "बेटा, तुम्हे पता है, हम मनुष्यों की तरह अन्य प्राणियों की तरह पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। चाकू लगने पर उन्हें भी दर्द का अनुभव होता है।

इसीलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जब पेड़ की छाल भी लें तो पहले उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँगे कि किसी का कष्ट दूर करने के लिए आपको कष्ट पहुँचा रहे हैं। तुम्हें यह तो पता ही है कि पेड़-पौधे हमें जीवन देते हैं। इसीलिए उनकी पूजा की जाती है।"

संत के मधुर वचनों का बालक के कोमल मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा वह ऑवले की छाल लेकर घर लौट आया। उसने छाल माँ को दी और अंदर बैठकर चाकू से अपने पैर की छाल निकालने लगा। पैर से खून निकलने लगा बालक दर्द से तड़प उठा। माँ अंदर आई और पूछा, "यह क्या कर रहे हो?" बालक ने आँखों में आँसू भरकर कहा, "माँ मैं जानने का प्रयास कर रहा था, कि आँवले के पेड़ को कितना दर्द हुआ होगा, जब मैंने उसकी छाल निकाली।”

माँ ने बालक को गले से लगा लिया। माँ समझ गई थी कि अवश्य ही उनके बच्चे को अब सही संगति मिल गई है। इसके बाद वह बालक अकसर उन संतों के उपदेश सुनने जाने लगा। उसकी दूसरों को परेशान करने वाली सब शरारतें बंद हो गई। यही बालक आगे चलकर प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव रखने वाले संत नामदेव बने।




बीरबल की स्वर्ग से वापसी

बीरबल की स्वर्ग से वापसी

बीरबल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक थे। वे बीरबल को बहुत चाहते थे और सदा अपने साथ रखते थे। अकबर गुणी तथा प्रतिभाशाली व्यक्तियों का बहुत सम्मान किया करते थे। बीरबल अपनी सूझ-बूझ व दूरदर्शिता के कारण उनके प्रिय थे।

अकबर का बीरबल के प्रति विशेष अनुराग देख अन्य दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे। बीरबल से ईर्ष्या करने वालों में जुम्मन नाम का एक नाई भी था, जो प्रतिदिन अकबर की दाढ़ी बनाया करता था। वह बीरबल को नीचा दिखाने के लिए रोज़ नए हथकंडे अपनाता था, परंतु उसे कभी सफलता नहीं मिलती थी। अकबर की दाढ़ी बनाते समय भी वह अकसर अकबर को बीरबल के विरुद्ध भड़काया करता था। एक दिन जुम्मन नाई ने बीरबल को अपने रास्ते से हटाने का षड्यंत्र रचा। अकबर की दाढ़ी बनाते

समय उसने अकबर से कहा, "जहाँपनाह, आपके पुरखों को जन्नत गए बहुत समय हो गया, परंतु उनकी खैरियत को कोई भी खबर आपको नहीं मिली।" अकबर ने कहा, "तेरा दिमाग तो ठीक है !

जन्नत से भी भला कोई खबर आती है?" नाई बोला, "जहाँपनाह, आपके पास बीरबल जैसा समझदार मंत्री है। अगर आप उसे हुक्म दें तो वह जन्नत से आपके पुरखों की खैरियत लाने का कोई-न-कोई उपाय अवश्य ढूँढ़ निकालेंगे।"

शाहंशाह के मन में जुम्मन नाई की बात अटक गई। उन्होंने बीरबल को जन्नत में भेजने का फ़ैसला कर लिया। तभी बीरबल वहाँ पहुँचे। उन्हें देख अकबर बोले, "क्यों बीरबल, क्या तुम जन्नत जाकर हमारे पुरखों का समाचार ला सकते हो?"

अकबर की बात सुनकर बीरबल हैरान रह गए। उन्होंने मंद-मंद मुसकराते हुए जुम्मन को देखा। वे समझ गए कि यह सब इसी का षड्यंत्र है। बीरबर ने कुछ देर सोचा, फिर बोले, "मैं जन्नत से आपके पुरखों का समाचार लाने के लिए तैयार हूँ, परंतु इसके लिए मुझे कुछ मोहलत तथा धन को आवश्यकता है।

अकबर ने पूछा, "तुम्हें कितना धन तथा कितनी मोहलत चाहिए?" बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह, दस दिन की मोहलत तथा दस हजार अशर्फियाँ चाहिए।"

अकबर ने बीरबल को दस हज़ार सोने की अशर्फियाँ दिला दी। बीरबल अपने घर चला गया। उसने अपने घर में राजगीरों को बुलाया। दिन में वह अपनी हवेली की मरम्मत करवाता तथा रात में घर के पीछे बगीचे में ले जाकर उनसे सुरंग खुदवाता। दस दिन में उसने अपनी हवेली में से एक सुरंग निकलवा ली जो घर से कब्रिस्तान तक खोदी गई थी।

दस दिन बाद बीरबल अकबर के पास गए और बोले, "मैं जन्नत जाने के लिए तैयार हूँ।" बीरबल ने अपनी कब वहाँ खुदवाई, जहाँ उसने सुरंग बनवाई थी। बीरबल को जिंदा दफ़न होते, देखने के लिए बहुत से लोग आए। अकबर स्वयं वहाँ बीरबल को देखने के लिए पहुँचे।

बीरबल के कब्र में लेटने के बाद ऊपर से मिट्टी डाल दी गई। जुम्मन अपने षड्यंत्र के सफल होने पर फूला नहीं समा रहा था। लोग सोच रहे थे कि बीरबल ने बेवजह मौत को गले लगा लिया। भला जन्नत से भी कोई वापस आ सकता है!

बीरबल कब्र के नीचे खुदी सुरंग से होकर अपनी हवेली में पहुँच गए। वे घर में आराम से रहने लगे। कुछ दिन बीत जाने के बाद अकबर को बीरबल की याद आने लगी। कई बार अकबर बीरबल को याद करके बेचैन हो जाते थे। इसी तरह एक माह बीत गया।

एक दिन अकबर बीरबल की याद में खोए हुए थे और जुम्मन उनकी दाढ़ी बना रहा था। तभी बादशाह की नज़र सामने से आते हुए बीरबल पर पड़ी। वे उन्हें देखकर चौंक गए। बीरबल की दाढ़ी तथा बाल बढ़े हुए थे।

अकबर और बीरबल बड़े ही उत्साह से गले मिले। अकबर ने पूछा, "कहो बीरबल, क्या मेरे पुरखे जन्नत में ठीक हैं?"

बीरबल बोला, "जहाँपनाह आपके पुरखे जन्नत में बहुत खुश हैं। जब उन्हें पता चला कि मुझे आपने भेजा है तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने मेरा बड़ा सत्कार किया। मेरा तो वहाँ बड़ा मन लग गया था, परंतु मुझे खास वजह से वापस आना पड़ा। वैसे तो आपके पुरखे आराम से हैं, तकलीफ़ है।"

बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह, आपके पुरखे इसलिए दुखी हैं, क्योंकि वहाँ कोई नाई नहीं है। उनकी अकबर ने पूछा, “क्या तकलीफ़ है उन्हें?" दाढ़ी और बाल बहुत लंबे हो गए हैं। देखिए, एक माह में मेरी दशा भी नाई के बिना कैसी हो गई है!" अकबर ने कहा, "नाई की कमी हम जुम्मन को भेजकर पूरी कर देते हैं।"

यह सुनकर जुम्मन काँप उठा। उसने बीरबल के लिए बुरा सोचा था। अब उसका बुरा होने वाला था। अगले दिन अकबर ने जुम्मन को दफ़नाने का हुक्म दे दिया। जुम्मन विरोध भी न कर सका। अपनी सूझ-बूझ से बीरबल ने न केवल अपने ऊपर आई विपत्ति को टाला, बल्कि एक षड्यंत्रकारी का भी अंत कर दिया। 

Monday, 26 June 2023

साखी -कबीर बहुविकल्पीय प्रश्न-उत्तर class 10

साखी -कबीर 
बहुविकल्पीय प्रश्न-उत्तर 

.                  ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोइ। 
                  अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।

1. कवि ने मनुष्य को कैसी वाणी बोलने की प्रेरणा दी है?
(क) जो हमें प्रसन्नता दे 
(ख) जो खुशियाँ लाए
(ग) जो स्वयं को भुला दे
(घ) जो मधुर हो
उत्तर- (घ) जो मधुर हो

2. मीठी वाणी का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(क) दूसरों को दुख देती है। 
(ख) दूसरों का अहं समाप्त होता है। 
(ग) सुख देनेवाली होती है। 
(घ) लाभ पहुँचानेवाली होती है। 
उत्तर- (ग) सुख देनेवाली होती है। 

3. मन का आपा खोने का आशय है- 
(क) अपनत्व खोना
(ख) स्वयं डूब जाना
(ग)  मन का अहंकार खोना
(घ) लीन होना
उत्तर - (ग) अहंकार खोना

5. इस दोहे की भाषा है- 
(क) सधुक्कड़ी
(ख)  ब्रज 
(ग) अवधी
(घ) राजस्थानी
उत्तर- (क) सधुक्कड़ी

6. प्रस्तुत साखियाँ किसके द्वारा रचित हैं -
(क) रहीम 
(ख) मीराबाई 
(ग) कबीर 
(घ) तुलसीदास 
उत्तर- (ग) कबीर 

7. साखी से मेल खाते वाक्यों के लिए उचित विकल्प चुनिए-
(क) सदैव मीठी वाणी बोलनी चाहिए। 
(ख) मीठी वाणी से अहंकार समाप्त होता है। 
(ग) तन जल जाता है। 
(घ) कभी मीठी वाणी नहीं बोलनी चाहिए।  
(i)  (क) और (ख)                            (ii) केवल (क) 
(iii)  केवल (ग)                                (iv) (क) और (घ)
उत्तर- (i)  (क) और (ख)   
                 
8. हम औरों को कैसे सुख दे सकते हैं ?
(क)छोटे-बड़े काम करके 
(ख) समय पर सहारा न देकर 
(ग) प्रेम पूर्ण व्यवहार करके 
(घ) रुपयों और पैसों से मदद करके 
उत्तर- (ग) प्रेम पूर्ण व्यवहार करके 

9. दोहे से यह संदेश मिलता है -
(क)हमें अपने तन को शीतल रखना चाहिए। 
(ख) अहंकार रूपी वाणी बोलनी चाहिए।  
(ग) सबको सुख देना चाहिए। 
(घ) मीठी वाणी का प्रयोग करना चाहिए। 
उत्तर- (घ) मीठी वाणी का प्रयोग करना चाहिए। 

10.  निम्नलिखित कथन (A) और कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्पों में से एक सही विकल्प चुनकर लिखिए-
कथन (A): मधुर वाणी अहंकार को समाप्त करती है। 
कारण (R): अहंकार समाप्त होने पर मन शांत व सुख की अनुभूति होती है।

(i) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों गलत हैं।
(ii) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
(iii) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है। 
(iv) कथन (A) सही है किंतु कारण (R) उसकी गलत व्याख्या करता है।
उत्तर- (iii) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है। 



                    कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि। 
                    ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं।।

1. मृग वन-वन क्या खोजता फिरता है?
(क) कस्तूरी 
(ख) सुगंध
(ग) ईश्वर 
(घ) प्रेम 
उत्तर- (क) कस्तूरी

2. कस्तूरी कहाँ बसती है?
(क) जंगल में
(ख) मनुष्य की नाभि में
(ग) मानव के मन में
(घ) मृग की नाभि में 
उत्तर- (घ) मृग की नाभि में 

3. मृग कस्तूरी को वन में क्यों ढूँढ़ता फिरता है?
(क) वह उसकी सुगंध से उन्मत्त हो जाता है। 
(ख) उसे यह अहसास नहीं होता कि कस्तूरी उसी की नाभि में है।  (घ) उपर्युक्त सभी।
(ग) यह सोचता है कि कस्तूरी वन में ही मिलेगी। 
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी।

4. मृग किसका प्रतीक है? 
(क) अज्ञानी जीव का
(ख) आध्यात्मिक जीव का 
(ग) भक्त का
(घ) भ्रष्ट व्यक्ति का
उत्तर- (क) अज्ञानी जीव का

5. 'कुंडलि/पटि पटि' का अर्थ है-
(क) कान के कुंडल / कम होना 
(ख) कुंडली मारना छोटा होना (घ) रुद्राक्ष छोटा-सा
(ग) नाभि/घट-घट में
(घ) रुद्राक्ष छोटा-सा
उत्तर- (ग) नाभि/घट-घट में

6. हमारी स्थिति किसके समान हैं ?
(क) जंगल में भटकते हुए हिरण के समान 
(ख) खोई हुई खुशबू के समान 
(ग) सब पर कृपा करने वाले प्रभु के समान 
(घ) सब तरफ बसे हुए ईश्वर के समान 
उत्तर- (क) जंगल में भटकते हुए हिरण के समान 

7. उचित विकल्प का चुनाव कीजिए-
(क) घटि-घटि पुनरुक्तिप्रकाश 
(ख) घटि-घटि अनुप्रास अलंकार
(ग) घटि-घटि यमक अलंकार 
(घ) घटि-घटि रूपक अलंकार 
उत्तर- (क) घटि-घटि पुनरुक्तिप्रकाश 

8. दोहे का संदेश है कि -
(क) प्रत्येक जड़-चेतन में ईश्वर को महसूस करना चाहिए। 
(ख) धार्मिक स्थलों पर ईश्वर को खोजना चाहिए। 
(ग) ईश्वर की खोज जंगल में करनी चाहिए। 
(घ) ईश्वर को अपने अंदर नहीं ढूँढ़ना चाहिए। 
उत्तर- (क) प्रत्येक जड़-चेतन में ईश्वर को महसूस करना चाहिए। 

9. निम्नलिखित कथन (A) और कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए  विकल्पों में से एक सही विकल्प चुनकर लिखिए-

कथन (A): मनुष्य घट-घट में वास करने वाले ईश्वर से अनभिज्ञ है।
कारण (R): मनुष्य विषय-वासनाओं से लिप्त अपने समीप ईश्वर को देख नहीं पाता। 

(i) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों गलत हैं।
(ii) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
(iii) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है।
(  कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी गलत व्याख्या करता है।
उत्तर- (iii) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है।

                जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहिं। 
                सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि।।

1. दोहे में 'मैं' शब्द का आशय है- 
(क) कबीर
(ख) अहंकार
(ग) मोह-माया
(घ) अज्ञान
उत्तर- (ख) अहंकार

2. 'सब अंधियारा मिटि गया' का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है? 
(क) घना अँधेरा
(ख) विषय-वासना रूपी अंधकार
(ग) मोह-माया रूपी अंधकार
(घ) अज्ञान रूपी अंधकार
उत्तर- (घ) अज्ञान रूपी अंधकार

3. 'दीपक देख्या माहि' का आशय है-
(क) आनंद भीतर देख लिया। 
(ख) परमात्मा मन में ही देख लिया। 
(ग) सुख मन में ही मिल गया। 
(घ) सांसारिक भोग अपने हाथ में ही है। 
उत्तर- (ख) परमात्मा मन में ही देख लिया। 

4. कवि ने किस अंधकार के मिटने की बात की है?
(क) रात के अंधेरे की 
(ख) अज्ञान के अंधेरे की
(ग) दीये के बुझने से पैदा होने वाले अंधेरे की
(घ) पुत्र पैदा न होने से उत्पन्न अंधेरे की
उत्तर- (ग) दीये के बुझने से पैदा होने वाले अंधेरे की

5. इस दोहे का आशय है- 
(क) प्रभु-प्रेम के लिए साधना
(ख) प्रभु प्रेम के लिए अहंकार-त्याग आवश्यक 
(ग) प्रभु-प्रेम के लिए अहंकार आवश्यक है। 
(घ) प्रभु-प्रेम के लिए हरि का भजन आवश्यक
उत्तर- (ख) प्रभु प्रेम के लिए अहंकार-त्याग आवश्यक 


                       सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै। 
                      दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै।।

1. संसार की किस विशेषता का उल्लेख किया गया है?
(क) अधिकतर लोग साधु-संतों के उपदेशों पर ध्यान नहीं देते। 
(ख) अधिकतर लोग ईश्वर को पाने का प्रयास नहीं करते। 
(ग) अधिकतर लोग किसी की परवाह नहीं करते। 
(घ) अधिकतर लोग भौतिक सुखों में जीवनयापन करके सुख का अनुभव करते हैं। 
उत्तर- (घ) अधिकतर लोग भौतिक सुखों में जीवनयापन करके सुख का अनुभव करते हैं। 

2. कबीर के अनुसार 'जागा हुआ' कौन है ?
(क) जो ईश्वर का नाम ले। 
(ख) जो ईश्वर से मिलकर एक हो जाए। 
(ग) जो ईश्वर का वियोग अनुभव करे। 
(घ) जो सांसारिक सुख पाए। 
उत्तर- (ग) जो ईश्वर का वियोग अनुभव करे। 

3. सारा संसार कबीर की दृष्टि में सुखी क्यों है?
(क) क्योंकि वे सब ज्ञानी है। 
(ख) क्योंकि वे चिंता रहित हैं। 
(ग) क्योंकि वे अज्ञान के कारण भोग-विलास में लिप्त हैं।  
(घ) क्योंकि वे अंधेरे में डूबे हुए हैं। 
उत्तर- (ग) क्योंकि वे अज्ञान के कारण भोग-विलास में लिप्त हैं। 

4. कबीर क्यों जागते और रोते हैं?
(क) कबीर को नींद नहीं आती। 
(ख) कबीर सबको सुखी देखकर रोते हैं।
(ग) कबीर को समाज की चिंता है।
(घ) कबीर को वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो गया। 
उत्तर- (घ) कबीर को वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो गया।

5. कबीर में और संसार में क्या अंतर है?
(क) जागने और सोने का 
(ख) दुखी और खुश रहने का
(ग) ज्ञानी और अज्ञानी का
(घ) असुविधा और सुविधा का
उत्तर- (ख) दुखी और खुश रहने का

         
                                बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ ।
                                राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ ।। 

1. आत्मा किस प्रकार की व्याकुलता का अनुभव कर रही है?
(क) जैसी किसी के विरह में होती है।
(ख) जैसी किसी साँप द्वारा काटे जाने पर होती है।
(ग) जैसी पागल हो जाने पर होती है
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर- (क) जैसी किसी के विरह में होती है।

2. 'मंत्र न लागे कोइ' का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है? 
(क) साँप के काट लेने पर मंत्रों से उपचार नहीं किया जा सकता। 
(ख) ऐसा कोई मंत्र नहीं है जो कि विरह की पीड़ा को कम कर सके। 
(ग) ईश्वर-वियोगी की पीड़ा का कोई उपचार नहीं है। 
(घ) इनमें से कोई नहीं। 
उत्तर- (ख) ऐसा कोई मंत्र नहीं है जो कि विरह की पीड़ा को कम कर सके। 

3. राम वियोगी की दशा कैसी होती है?
(क) बेचैन रहता है। 
(ख) व्याकुलता को अनुभव करता है।
(ग) उन्मत्त हो जाता है।
(घ) उपरोक्त सभी 
उत्तर- (घ) उपरोक्त सभी 

4. 'बिरह भुवंगम तन बसे' शीर्षक दोहे का मुख्य विषय क्या है?
(क) प्रिय के विरह के कारण प्रेमिका की बेचैनी 
(ख) ईश्वर के विरह के कारण आत्मा की बेचैनी 
(ग) प्रेमिका के विरह के कारण प्रिय की बेचैनी 
(घ) सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य की बेचैनी
उत्तर- (ख) ईश्वर के विरह के कारण आत्मा की बेचैनी 

5. 'बोरा' शब्द का तात्पर्य है-
(क) अहंकारी 
(ख) शांत 
(ग) उन्न्मत 
(घ) मूर्ख 
उत्तर- (ग) उन्न्मत 


                   निंदक नेड़ा रखिये, आँगणि कुटी बँधाइ। 
                   बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ।।

1. कबीर ने कैसे व्यक्ति को समीप रखने की बात कही है?
(क) आलोचक को 
(ख) प्रशंसक को
(ग) प्रेमी को
(घ) संबंधी को
उत्तर- (क) आलोचक को 

2. निंदक को कवि ने कहाँ रखने का परामर्श दिया है ?
(क) घर में
(ख) दिल में
(ग) आँगन में
(घ) अपने से दूर
उत्तर- (ग) आँगन में

3. निंदक की तुलना किससे की गई है?
(क) साबुन के झाग से
(ख) मिट्टी से
(ग) पानी से
(घ) साबुन और पानी से
उत्तर- (घ) साबुन और पानी से

4. निंदक का अर्थ है-
(क) बुराई करने वाला 
(ख) प्रशंसा करने वाला
(ग) अभिमान करने वाला
(घ) क्रोध करने वाला
उत्तर- (क) बुराई करने वाला 

5. निम्नलिखित कथ्यों को ध्यानपूर्वक पढ़ें --
(क)  निंदक को सदैव समीप रखना चाहिए। 
(ख) वह हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।
(ग) वह हमारी परेशानी बढ़ा देता है।
(घ) निंदक को सदैव दूर रखना चाहिए।

6. उचित विकल्प का चुनाव करें -
(i) केवल 1 सही है।
(ii) विकल्प 1 और 2 सही हैं।
(iii) केवल 3 सही है। 
(iv) सारे विकल्प गलत हैं।
उत्तर- (ii) विकल्प क और ख सही हैं।

7. निम्नलिखित कथन (A) और कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्पों में से एक सही विकल्प चुनकर लिखिए।

कथन (A): निंदक को अपने आंगन में ही कुटिया बनाकर देनी चाहिए।
कारण (A): निंदक हमारे मन को मैला बना देता है।

(क) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों सही हैं।
(ख) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
(ग) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है।
(घ) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी गलत व्याख्या करता है। 
उत्तर- (ख) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
 
8. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या सुझाव दिया है ?
(क) निंदक को प्रणाम करने को कहा है। 
(ख) निंदक से दूर रहने को कहा है। 
(ग) निंदक को पास रखने को कहा है। 
(घ) निंदा के पास रहने को कहा है। 
उत्तर- (ग) निंदक को पास रखने को कहा है।



            पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई।
             एकै आशिर पीव का, पढ़े सो पंडित होय।।

1.  पंडित होने का अर्थ है-
(क) पूजा पाठ में कुशल हो जाना
(ख) साधना में पारंगत हो जाना
(ग) पुस्तकों का ज्ञान हो जाना 
(घ) वास्तविक ज्ञानी होना
उत्तर- (घ) वास्तविक ज्ञानी होना

2. सच्चे अर्थों में ज्ञानी किसे कहा जा सकता है ?
(क) जिसे शास्त्रों का ज्ञान हो गया हो 
(ख)  जो सबको शिक्षा देने में समर्थ हो
(ग) जिसके हृदय में सभी के प्रति प्रेम हो
(घ) जिसे प्रेम शब्द लिखना आ गया हो
उत्तर- (ग) जिसके हृदय में सभी के प्रति प्रेम हो
 
3. इस पद्यांश में किसका महत्व बताया गया है?
(क) शास्त्र पढ़ने का
(ख)  प्रेम भाव जगाने का
(ग) अपने को सबसे श्रेष्ठ साबित करने का
(घ) ज्ञानी बनने का
उत्तर- (ख)  प्रेम भाव जगाने का
 
4. यह दोहा किस पाठ से लिया गया है और कवि का नाम है-
(क) रहीम के दोहे - संत रहीम 
(ख)  कबीर के दोहे-संत कबीर
(ग) कबीर की साखियाँ- कबीर दास
(घ) साखी - कबीर
उत्तर- (घ) साखी - कबीर

5. प्रस्तुत दोहे का संदेश है कि हमें-
(क) शास्त्र नहीं पढ़ने चाहिए। 
(ख)  केवल शास्त्र पढ़ने चाहिए । 
(ग) प्रेम का अक्षर पढ़ना चाहिए । 
(घ) सबके प्रति प्रेम की भावना रखनी चाहिए । 
उत्तर- (घ) सबके प्रति प्रेम की भावना रखनी चाहिए । 

6. एक अक्षर प्रेम का पढ़ लेने का अर्थ है- 
(क) प्रेम शब्द को लिखना सीख जाना। 
(ख) किसी एक से प्रेम करना। 
(ग) प्रेम शब्द को पढ़ना सीख जाना। 
(घ) सब के प्रति प्रेम का भाव हृदय में जगाना। 
उत्तर- (घ) सब के प्रति प्रेम का भाव हृदय में जगाना। 

7. संत कबीर ने किसे ज्ञानी कहा है ?
(क) जिसे संसार का सारा ज्ञान प्राप्त हो जाता है। 
(ख) जो बहुत से शास्त्र पढ़ लेता है। 
(ग) जो बिल्कुल शास्त्र नहीं पढ़ना जानता है। 
(घ) जो सभी के समान रूप से प्रेम करता है।
उत्तर- (क) जिसे संसार का सारा ज्ञान प्राप्त हो जाता है। 

8. पंडित कौन नहीं बन पाता ?
(क) जो शास्त्र पढ़ता है।  
(ख) जो सभी से प्रेम करता है। 
(ग) जिसके मन में प्रेम का भाव नहीं होता है। 
(घ) जिसके मन में अहंकार का भाव नहीं होता है। 
उत्तर- (ग) जिसके मन में प्रेम का भाव नहीं होता है। 

9. निम्नलिखित कथन (A) और कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए विकल्पों में से एक सही विकल्प चुनकर लिखिए-

कथन: केवल किताबें पढ़ने वाला ही विद्वान होता है।
कारण: ईश्वर प्रेम ही एक सत्य है, इसे जानने वाला ही वास्तविक ज्ञानी है।

(i) कथन (A) गलत तथा कारण (R) सही हैं।
(ii) कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
(iii) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है।
(iv) कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी गलत व्याख्या करता है।
उत्तर- (i) कथन (A) गलत तथा कारण (R) सही हैं।

10. ईश्वर ज्ञान कैसे संभव है ?
(क) तीर्थ यात्रा पर जाने से 
(ख)अहंकार के नष्ट हो जाने से 
(ग) पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करने से 
(घ) भक्ति भाव पूर्ण भजन करने से 
उत्तर- (ख)अहंकार के नष्ट हो जाने से 

11. कवि ने सच्चा ज्ञानी किसे माना है ?
(क) जो सबके प्रति प्रेमभाव रखता है। 
(ख) जो बहुत अधिक शिक्षित होता है। 
(ग) जो बिल्कुल भी बिल्कुल भी अशिक्षित होता है। 
(घ) जो धार्मिक नियमों का पालन करता है। 
उत्तर- (क) जो सबके प्रति प्रेमभाव रखता है। 

12. उचित मिलान कीजिए -
(क) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' - पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 
(ख) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' - अनुप्रास अलंकार 
(ग) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' - यमक अलंकार 
(घ) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' - रूपक अलंकार 
उत्तर- (क) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' - पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 8

                   हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि । 
                  अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि ।।

1. यहाँ पर किसका प्रतीक है?
(क) निवास स्थान का
(ख) विपत्तियों का
(ग) विषय-वासनाओं का
(घ) संसार
उत्तर- (ग) विषय-वासनाओं का

2. 'मुराड़ा' शब्द का क्या अर्थ है? 
(क) जलता हुआ घर 
(ख) जलता हुआ अहंकार 
(ग) जलती हुई लकड़ी
(घ) जलता हुआ संसार
उत्तर- (ग) जलती हुई लकड़ी

3. कवि का घर जलाने से क्या आशय है?
(क) धन-दौलत को जलाना 
(ख) परमात्मा के मार्ग को प्रकाशित करना 
(ग) हमेशा त्याग के लिए तत्पर रहना
(घ) लोभ, माया, मोह, घृणा को जलाना
उत्तर- (घ) लोभ, माया, मोह, घृणा को जलाना

4. कबीर किस पथ के पथिक हैं? 
(क) आनंद-पथ के
(ख) प्रभु-प्राप्ति के
(ग) सुख-समृद्धि के
(घ) उन्नति-पथ के
उत्तर- (ख) प्रभु-प्राप्ति के

5. कवि ने अपना घर क्यों जला दिया?
(क) प्रभु को पाने के लिए 
(ख) सांसारिकता नष्ट करने के लिए 
(ग) मुक्ति पाने के लिए
(घ) वैरागी होने के लिए
उत्तर- (क) प्रभु को पाने के लिए