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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Monday, 26 June 2023

कहानी - सच्चा धन

कहानी - सच्चा धन

एक बार गुरुनानक जी एक गाँव में गए। उनके पास गाँव का सबसे धनी व्यक्ति आया। उसे अपने धन का बहुत घमंड था। उसने गुरुनानक जी से कहा, "मेरे पास बहुत धन है। मैं अपना सारा धन आपके चरणों में भेंट करना चाहता हूँ। आप आदेश दें, मैं इसे तुरंत आपको सौंप दूंगा।" गुरुनानक जो उस धनी व्यक्ति को बातें सुनकर मुसकरा दिए। उन्होंने कहा, "मैंने हज़ारों धनी व्यक्तियों को देखा है, परंतु तुम्हारे जैसा निर्धन मैंने कभी नहीं देखा। न जाने तुम्हारे पास कैसा धन है?"

गुरुनानक जी के वचन सुनकर वह व्यक्ति घबरा गया। उसने कहा, "आपने शायद मेरे साधारण वस्त्र देखकर मुझे निर्धन समझ लिया है। यह सारा गाँव मेरे धन और मेरी शक्ति से परिचित है। आप मुझे कोई भी काम बताएँ, मैं उसे तुरंत कर दूँगा।"

गुरुनानक जी उसकी अहंकार भरी बातें सुनते रहे। फिर बोले, "चलो एक छोटा सा काम कर दो। जब तुम इसे कर लोगे तब मैं बड़ा काम बताऊँगा।" इतना कहकर उन्होंने उस धनी व्यक्ति को एक सूई दी और कहा, "यह सूई ले जाओ। जब हम दोनों मर जाएँगे, तब तुम इसे लौटा देना।"

गुरुनानक जी की बात सुनकर धनी व्यक्ति हैरान रह गया। वह उन्हें प्रणाम करके घर आ गया। उसने अपने विद्वान मित्र को बुलाकर पूछा, "मैं मरने के बाद गुरुनानक जी को यह सूई कैसे वापस करूँगा? तुम कोई उपाय बताओ।"

मित्र ने कहा, “यह असंभव है। मरने के बाद इस संसार की कोई भी वस्तु हम अपने साथ नहीं ले जा सकते। मरने के बाद यह शरीर भी यहीं रह जाता है। गुरुनानक जी तुम्हें कुछ सिखाना चाहते हैं। तुम उन्हीं के पास जाओ।"

मित्र के कहने पर धनी व्यक्ति गुरुनानक जी के पास आया। वह उनके चरणों में गिर पड़ा। उसने विनयपूर्वक कहा, "गुरु जी! आप अपनी सूई वापस ले लीजिए। मरने के बाद मैं इसे आपको नहीं लौटा सकता। मृत्यु के बाद इस संसार की कोई भी वस्तु हमारे साथ नहीं जा सकती।

गुरुनानक जी ने कहा, "तुमने कहा था, तुम्हारे पास बहुत धन है। तुम उससे कुछ भी कर सकते हो।" धनी व्यक्ति ने दुखी होते हुए गुरुनानक जी के चरण पकड़ लिए और अपने अज्ञान की माफ़ी माँगने लगा। गुरुनानक जी ने उसे समझाते हुए कहा, "पुत्र! सबसे बड़ा धन है दूसरों का भला करना। सदा सत्य के मार्ग पर चलना। ईमानदारी से कार्य करना। अहंकार से दूर रहना। मृत्यु के बाद यही सच्चा धन हमारे साथ जाता है। अच्छे कर्मों से संसार का भी भला होता है और अपना भी।"  गुरुनानक जी के वचन सुनकर धनी व्यक्ति की आँखें खुल गई। उसे सच्चे धन का ज्ञान हो गया था।

सबसे खड़ा और सच्चा धन है दूसरों का भला करना।

कहानी- सबका भला अपना भला

सबका भला अपना भला

बहुत पुरानी बात है। एक नगर में एक व्यापारी रहता था। वह बहुत परिश्रमी था। उसने जीवन भर परिश्रम करके खूब धन कमाया था। इसके साथ-साथ वह बहुत दयालु भी था। जरूरतमंदों, गरीबों की मदद करने के लिए वह सदैव तैयार रहता था। उसकी स्त्री भी परोपकारी स्वभाव की थी। गरीबों को खाना खिलाना। उन्हें वस्त्रादि देना उसके दैनिक कार्यों में शामिल था।

इतने सब पुण्य कर्मों के बाद भी उनकी कोई संतान नहीं थी। इस बात का दुख दोनों को था। इससे भी अधिक दुख उन्हें इस बात का था कि उनके बाद कहीं उनकी धन-संपत्ति कहीं गलत हाथों में न पड़ जाए। कोई उसका दुरुपयोग न करें। इसलिए बहुत सोच-विचार कर उन्होंने निर्णय लिया कि वे किसी ऐसे युवक को गोद लेंगे जो उनकी तरह ही दूसरों का भला सोचने वाला हो, परंतु ऐसे युवक को खोजा कैसे जाए।

उनकी धन-संपत्ति के लालच में हर कोई स्वयं को परोपकारी ही सिद्ध करने का प्रयास करता। आखिर उन्होंने इसका एक उपाय निकाला उन दोनों ने भिखारियों के जैसा वेश बनाया और मुख्य राजमार्ग की तरफ़ चल दिए। वहाँ जाकर उन्होंने एक बहुत बड़े पत्थर को कोशिश करके सड़क के बीच में रख दिया। वे स्वयं सड़क के किनारे बैठकर भिक्षा माँगने लगे। अब वे देखने लगे कि सड़क पर आते-जाते लोग पत्थर को देखकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।

जो भी सड़क से गुजरता कोई बचकर निकल जाता तो किसी को पत्थर से ठोकर लग जाती जिसे ठोकर लगती वह बड़बड़ाता हुआ निकलता, "न जाने किसने यह इतना बड़ा पत्थर सड़क पर रख दिया।" परंतु कोई भी उसे हटाने का प्रयास न करता। व्यापारी और उसकी स्त्री यह सब देख रहे थे। अब उन्हें निराशा होने लगी थी। लगता है, कोई भी इस पत्थर को नहीं हटाएगा।

शाम होने लगी थी। तभी उन्होंने देखा एक मज़दूर सा दिखाई देने वाला युवक सड़क पर आया। वह अपनी धुन में चला जा रहा था कि उसने सड़क पर पड़े पत्थर को देखा। वह बोला, "अरे, इतना भारी पत्थर सड़क पर किसने रखा होगा! अब तो अँधेरा हो चला है, इससे किसी को भी चोट लग सकती है। मुझे इस यहाँ से हटाना चाहिए।" इतना कहकर वह दिनभर का थका-थकाया अब उस पत्थर को धकेलकर सड़क के किनारे ले जाने की कोशिश करने लगा। आखिरकार वह सफल हो गया।

अन्न अब वह निश्चित होकर आगे बढ़ा कि पत्थर से किसी को कोई चोट नहीं लगेगी। तभी भिखारी और भिखारिन बने व्यापारी और उसकी स्त्री भिक्षा के लिए उसे पुकारने लगे। “बेटा, आज सुबह का एक दाना भी भेट में नहीं गया। बड़ी कृपा होगी अगर भूखों को भोजन मिल जाए तो।" से

लड़के का दिल पसीज गया। वह बोला, “मेरे पास तो भोजन नहीं है। देने के लिए और कुछ भी नहीं है। बस आज की यह मज़दूरी है, जिससे मैं अपने लिए भोजन खरीदने वाला था। यदि इससे आप दोनों के लिए भोजन की व्यवस्था हो सके तो मुझे सचमुच प्रसन्नता होगी।" इतना कहकर उस लड़के ने अपनी उस दिन की मज़दूरी उनके कटोरे में डाल दी।

लड़के का इतना करना था कि उन दोनों की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने तुरंत खड़े होकर उसे गले से लगा लिया और बोले, "हमें हमारा उत्तराधिकारी मिल गया।" लड़का उन्हें आश्चर्य से देखने लगा तो व्यापारी ने उसे अपनी संतानहीनता से लेकर सड़क में पत्थर रखने तक की पूरी कहानी सुना दी। वे उसे लेकर घर लौट आए और अब चिंतामुक्त होकर दान-पुण्य करते हुए जीवन व्यतीत करने लगे।

दूसरों का भला करने वाले का ईश्वर स्वयं भला करता है।


कहानी- धोबी की सजा

कहानी- धोबी की सजा

अद्भुत नगर में राजा अनोखे सिंह राज करते थे। उनके नाम की तरह ही उनके सब काम भी सदैव अनोखे ही होते थे। उन्होंने अपने राज्य की सीमा के चारों ओर बहुत गहरी खाई खुदवा दी थी। इस कारण उनका राज्य बाहरी आक्रमणों से पूरी तरह सुरक्षित हो गया था। हर सुबह लकड़ी का एक बड़ा, मज़बूत और चौड़ा तख्ता राज्य से खाई के आर-पार लगा दिया जाता था जिससे बाहर आने-जाने का काम सरलता से हो जाता था। 

शाम होते ही उस तख्ते को उठा लिया जाता था। इससे राज्य की स्वतंत्रता और सुरक्षा बनी रहती थी। एक बार रानी का सोने का हीरों से जड़ा हार चोरी हो गया। बहुत तलाशने पर भी जब हार दासियों को न मिला तो रानी ने राजा से इस विषय में चर्चा की। राजा को आश्चय हुआ। उन्होंने मुख्यमंत्री को यह मामला सौंपते हुए जल्दी से जल्दी चोर को पकड़ने का आदेश दिया। मुख्यमंत्री बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने उसी समय से महल में आने-जाने वाले सब लोगों पर नज़र रखनी शुरु कर दी। राजपरिवार के कपड़े धोने वाले धोबी पर मुख्यमंत्री को कुछ संदेह हुआ। 

मुख्यमंत्री स्वयं कुछ सैनिकों को साथ ले धोबी के घर तलाशी लेने गए तो तलाशी में रानी का हार मिल गया। मुख्यमंत्री ने धोबी को महाराज के सामने पेश किया और उसका अपराध बता दिया। महाराज ने वह हार रानी को दे दिया और धोबी को क्षमा कर दिया। महाराज के इस अनोखे निर्णय पर सभी को आश्चर्य हुआ। 

रानी भी नाराज़ होते हुए बोली. "उसने मेरा हार चुराने का साहस किया और आपने उसे ऐसे ही बिना कोई दंड दिए ही छोड़ दिया। "महाराज ने उत्तर दिया, "प्रिय रानी, क्षमा राजा का धर्म है। हर किसी को सुधरने का कम से कम एक अवसर अवश्य मिलना चाहिए।" मुख्यमंत्री ने भी शिकायत की, "महाराज, अपराधी को इस तरह बिना दंड दिए छोड़ना उचित नहीं।" महाराज ने उन्हें भी वही कहकर शांत कर दिया, जो रानी को कहा था।
उधर धोबी महल से निकलकर मन-ही-मन मुसकराते हुए सोचने लगा कि यह तो बड़ा अच्छा राजा है। इसने मुझे कोई सजा ही नहीं दी। इस बार नगरसेठ के यहाँ चोरी करूँगा। इस बार मैं सावधानी से चोरी करूँगा और पकड़ा नहीं जाऊँगा। उसने कुछ समय बाद नगरसेठ के यहाँ चोरी की, परंतु वह पकड़ा गया। नगरसेठ ने रात में उसे अपनी तिजोरी खोलते हुए पकड़ा और उसी समय शोर मचा दिया। गाँव वाले इकट्ठे हो गए। सबसे मिलकर उसे इतना मारा कि उसके दोनों हाथ बेकार हो गए।

अगले दिन उसे दरबार में पेश किया गया। राजा ने कहा, "इसे सुधरने का अवसर मिला था, पर इसने अपनी गलती से कोई सबक नहीं लिया। इसे इसका दंड मिल गया है, अब यह कोई काम करने लायक नहीं रहा। इसे जीवन-भर भीख माँगकर गुजारा करना पड़ेगा, परंतु जिन लोगों ने इसकी यह हालत की है, उनके लिए दंड है कि वे इसके परिवार का लालन-पालन करेंगे।" कुछ देर दरबार में शांति रही और फिर राजा के इस अनोखे निर्णय पर सब ओर जय-जयकार होने लगी।

भीम (महाभारत - भाग 7 )

भीम (महाभारत - भाग 7 )


पाँचों पांडव तथा धृतराष्ट्र के सौ पुत्र, जो कौरव कहलाते थे, हस्तिनापुर में साथ-साथ रहने लगे। . खेलकूद, हँसी-मजाक सब में वे साथ ही रहते थे। शरीरबल में पांडु का पुत्र भीम सबसे बढ़कर था। खेलों में वह दुर्योधन और उसके भाइयों को खूब तंग किया करता। यद्यपि भीम मन में किसी से वर नहीं रखता था और बचपन के जोश के कारण ही ऐसा करता था, फिर भी दुर्योधन तथा उसके भाइयों के मन में भीम के प्रति द्वेषभाव बढ़ने लगा। इधर सभी बालक उचित समय आने पर कृपाचार्य से अस्त्र-विद्या के साथ-साथ अन्य विद्याएँ भी सीखने लगे। विद्या सीखने में भी पांडव कौरवों से आगे ही रहते थे। इससे कौरव और खीझने लगे। दुर्योधन पांडवों को हर प्रकार से नीचा दिखाने का प्रयत्न करता रहता था। भीम से तो उसकी ज़रा भी नहीं पटती थी। एक बार सब कौरवों ने आपस में सलाह करके यह निश्चय किया कि भीम को गंगा में डुबोकर मार डाला जाए और उसके मरने पर युधिष्ठिर- अर्जुन आदि को कैद करके बंदी बना लिया जाए। दुर्योधन ने सोचा कि ऐसा करने से सारे राज्य पर उनका अधिकार हो जाएगा।

एक दिन दुर्योधन ने धूमधाम से जल-क्रीडा का प्रबंध किया और पाँचों पांडवों को उसके लिए । न्यौता दिया। बड़ी देर तक खेलने और तैरने के बाद सबने भोजन किया और अपने-अपने डेरों में जाकर सो गए। दुर्योधन ने छल से भीम के भोजन में विष मिला दिया था। सब लोग खूब खेले-तैरे थे, सो थक-थकाकर सो गए। भीम को विष के कारण गहरा नशा हो गया। वह डेरे पर भी न पहुँच पाया और नशे में चूर होकर गंगा-किनारे रेत में ही गिर गया। उसी हालत में दुर्योधन ने लताओं से उसके हाथ-पैर बाँधकर उसे गंगा में बहा दिया। लताओं से जकड़ा हुआ भीम का शरीर गंगा की धारा में बहता हुआ दूर निकल गया।

इधर दुर्योधन मन-ही-मन यह सोचकर खुश हो रहा था कि भीम का तो काम ही तमाम हो गया होगा। जब युधिष्ठिर आदि जागे और भीम को न पाया, तो चारों भाइयों ने मिलकर सारा जंगल तथा गंगा का वह किनारा, जहाँ जल-क्रीड़ा की थी, छान डाला। पर भीम का कहीं पता न चला। अंत में निराश होकर दुखी हृदय से वे अपने महल को लौट आए। इतने में ही क्या देखते हैं कि भीम झूमता-झामता चला आ रहा है। पांडवों और कुंती के आनंद का ठिकाना न रहा! युधिष्ठिर, कुंती आदि ने भीम को गले से लगा लिया। पर यह सब हाल देखकर कुंती को बड़ी चिंता हुई। उसने विदुर को बुला भेजा और अकेले में उनसे बोली- “दुष्ट दुर्योधन ज़रूर कोई-न-कोई चाल चल रहा है। राज्य के लोभ में वह भीम को मार डालना चाहता है। मुझे इसकी चिंता हो रही है।"

राजनीति- कुशल विदुर कुंती को समझाते हुए बोले- “तुम्हारा कहना सही है, परंतु कुशल इसी में है कि इस बात को अपने तक ही रखो। प्रकट रूप से दुर्योधन की निंदा कदापि न करना, नहीं तो इससे उसका द्वेष और बढ़ेगा।"

इस घटना से भीम बहुत उत्तेजित हो गया था। उसे समझाते हुए युधिष्ठिर ने कहा- “भाई  भीम, अभी समय नहीं आया है। तुम्हें अपने आपको सँभालना होगा। इस समय तो हम पाँचों भाइयों को यही करना है कि किसी प्रकार एक-दूसरे की रक्षा करते हुए बचे रहें।"

भीम के वापस आ जाने पर दुर्योधन को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसका हृदय और जलने लगा।

Sunday, 25 June 2023

कालिदास की खोज

कालिदास की खोज

बहुत पुरानी बात है। उज्जैन पर राजा भोज राज करते थे। उनके राज्य में अनेक विद्वान तथा कलाकार थे। संस्कृत के महाकवि कालिदास भी उन्हीं अद्वितीय विद्वानों में से एक थे। कालिदास राजा भोज के प्रिय भी थे।

एक दिन कालिदास और राजा भोज महल के बाग में भ्रमण कर रहे थे। उसी समय कुछ गधे महल के सामने से निकले। गधों को देखकर राजा भोज ने कहा, "कालिदास, तुम्हारे प्रियजन जा रहे हैं।" कालिदास ने तुरंत जवाब देते हुए कहा, "महाराज, पहले गधे मुझे प्रिय नहीं लगते थे, परंतु मैं जब से आपकी सेवा में आया हूँ तभी से ये मेरे प्रियजन हो गए हैं।"

कालिदास की बात पर राजा भोज को अपना अपमान महसूस हुआ। उन्होंने कालिदास को राज्य छोड़कर चले जाने के लिए कहा। कालिदास राज्य छोड़कर चले गए। वे एक निर्धन ब्राह्मण के यहाँ रहने लगे। कालिदास ने अपना असली परिचय ब्राह्मण को नहीं दिया।

ब्राह्मण अत्यंत निर्धन तथा अकेला था। संसार में उसका कोई नहीं था। कालिदास ने उसकी आर्थिक सहायता करनी चाही, परंतु वह ब्राह्मण अतिथि को भगवान के समान समझता था। उसने सहायता लेने से इनकार कर दिया।

कालिदास के राज्य छोड़कर चले जाने से राजा भोज को पश्चात्ताप हुआ। वे कालिदास को वापस बुलाना चाहते थे। उन्होंने कालिदास की बहुत तलाश करवाई, पर कालिदास का कहीं पता न चला। राजा भोज ने कालिदास को वापस बुलाने का एक उपाय सोचा। उन्होंने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा श्लोक सुनाता हैं, जो राजा भोज ने कभी न सुना हो तो राजा उस व्यक्ति को एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देंगे।

राजा ने यह घोषणा इसलिए करवाई थी. क्योंकि कालिदास के अतिरिक्त ऐसा श्लोक कोई भी नहीं सुना सकता था। कालिदास ने राजा की यह घोषणा सुनी तो उनके मन में यह विचार आया –यदि एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ मैं इस निर्धन ब्राह्मण को दिला देता हूँ तो इसकी निर्धनता दूर हो जाएगी। कालिदास ने एक श्लोक लिखकर ब्राह्मण की दिया और कहा, "तुम यह श्लोक राजा भोज को जाकर सुना देना। वे तुम्हें एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देंगे।

ब्राह्मण बोला, "नहीं-नहीं, मैं यह नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे बिलकुल ज्ञान नहीं है। यदि मैं पकड़ा गया तो मुझे दंड मिलेगा।" कालिदास ने ब्राह्मण को समझाते हुए कहा, "तुम यह मत बताना कि यह श्लोक तुमने नहीं लिखा हैं। तुम मेरे संबंध में भी किसी से कुछ न कहना।"

ब्राह्मण ने कालिदास की बात मान ली। वह श्लोक सुनाने के लिए तैयार हो गया। उसने कालिदास के श्लोक को अच्छी तरह से याद कर लिया।

ब्राह्मण श्लोक सुनाने के लिए राजा भोज के दरबार में उपस्थित हुआ। वहाँ श्लोक सुनाने के लिए अनेक लोग आए हुए थे। एक-एक करके लोग राजा को अपना श्लोक सुनाते जा रहे थे, परंतु राजा को किसी का भी श्लोक नया नहीं लगा। सभी के श्लोकों की बातें पुरानी थीं।

ब्राह्मण राजा के पास गया और बोला "मैंने एक नए शो की रचना की है, जिसे मैं आपको
सुनाना चाहता हूँ।" राजा भोज ने ब्राह्मण को गौर से ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "अच्छा सुनाओ। तुम्हारा श्लोक भी सुन लेते हैं।

ब्राह्मण ने श्लोक सुनाया। श्लोक का अर्थ था, 'तुम्हारे पिता ने मेरे पिता से दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ ऋणस्वरूप ली थी। अब परंपरानुसार पिता के ऋण को चुकाना आपका कर्तव्य है।' श्लोक सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? अगर मे यह कहते हैं कि यह श्लोक नया है, तो पुरस्कार देना पड़ता है। अगर यह कहते हैं कि इसकी बात सुनी-सुनाई है तो ऋण चुकाना पड़ता है। राजा ने आदेश दिया, "इस ब्राह्मण को हाथी के पाँव के नीचे कुचलवा दो।"

यह सुनते ही पुरस्कार की प्रतीक्षा में खड़े ब्राह्मण के होश उड़ गए। वह बोला, “महाराज, मेरा क्या अपराध है?"

राजा ने कहा, "यह श्लोक तुम्हारा नहीं हो सकता।"

प्राणदंड से भयभीत ब्राह्मण ने सारी बात सच-सच बता दी। राजा समझ गए कि ब्राह्मण के घर रहने वाला व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता, बल्कि कालिदास ही हो सकते हैं। राजा भोज ब्राह्मण के साथ उसके घर गए और सम्मान सहित कालिदास को ले आए। राजा ने एक हज़ार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार ब्राह्मण को दे दिया। इससे उस ब्राह्मण की निर्धनता दूर हो गई।

कहानी - छल का फल

कहानी -छल का फल

बहुत पुरानी बात है। किसी नगर के बाहर कुटिया में एक साधु रहता था। वह दिन में एक बार हो भिक्षा माँगने जाता था। शाम को भी उसी से काम चला लेता था। साधु स्वभाव से अत्यंत सरल और सहनशील था। शहर के बच्चे भी उससे प्रेम करते थे। जब साधु भिक्षा माँगने के लिए आता तब बच्चों की भीड़ भी उसके साथ चलती थी। कुछ दिनों के बाद वह भक्ति गीत गा-गाकर भीख माँगने लगा। उसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह स्वभाव से दुष्ट और कुटिल थी। उस साधु को सदा बुरा-भला कहती और कभी-कभी तो उसे गालियाँ भी देती। फिर भी साधु नियमित रूप से उसके द्वार पर भिक्षा माँगने आता था। कभी वह बुढ़िया साधु को कूड़ा दे देती, तो कभी सब्जी या फलों के छिलके । साधु ने उस पर कभी क्रोध नहीं किया। 

बुढ़िया कहती, "यह बड़ा दुष्ट और जिद्दी साधु है।" एक दिन बुढ़िया ने सोचा, 'यह साधु प्रतिदिन आकर मुझे दुखी करता है। हठपूर्वक मुझे रोज़ परेशान करता है। इसे विष खिलाकर मार देना चाहिए।' ऐसा सोचकर उसने देशी घी के दो बड़े-बड़े लड्डू बनाए, उनमें खूब सारा विष मिला दिया। दूसरे दिन जब साधु बुढ़िया के द्वार पर भिक्षा माँगने आया तो बुढ़िया ने उसे वे दोनों लड्डू दे दिए। साधु को बुढ़िया के इस व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ! साधु ने वे लड्डू अपनी झोली में डाल लिए। भोजन करने के बाद साधु का पेट भर गया। 'लड्डू बाद में खा लूँगा'- यह सोचकर साधु ने लड्डू रख दिए। रात के समय नगर के द्वार बंद हो जाया करते थे। होने पर ही नगर में प्रवेश किया जा सकता था। सुबह रात के समय दो युवक उस साधु के पास आकर बोले, "महाराज, हमें नगर में जाना था। रास्ते में देर हो गई। नगर के द्वार बंद हो चुके हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो हम रात भर यहाँ रुक जाएँ। सुबह होने पर अपने घर चले जाएँगे।" साधु ने प्रेमपूर्वक दोनों युवकों को सोने के लिए स्थान दे दिया। एक युवक बोला. "महाराज, हमें बड़ी भूख लगी है। यदि खाने के लिए कुछ मिल जाए तो हम पर बड़ा उपकार होगा।"

साधु बोला, "बच्चो, उपकार मेरा नहीं, बल्कि उस माता का होगा, जिसने मुझे ये दो लड्डू दिए हैं। वह भली स्त्री मुझे सदैव गालियाँ व कूड़ा देती थी। आज बड़ी प्रसन्न थी। अतः मुझे ये दो बड़े-बड़े लड्डू दिए हैं। तुम दोनों एक-एक लड्डू खा लो।" दोनों युवक एक-एक लड्डू खाकर सो गए। सुबह होने पर साधु ने उन्हें जगाया, परंतु वे दोनों तो मर चुके थे। साधु ने नगर के द्वारपाल को सूचित किया। द्वारपाल ने राजा को इसकी सूचना दी। राजा ने आकर साधु से दोनों युवकों की मौत के विषय में पूछताछ की। साधु ने निर्भीकतापूर्वक सारी घटना विस्तार से बता दी।

विष के बने लड्डू देने वाली बुढ़िया को बुलाया गया। राजा ने सारी घटना बुढ़िया को बताई। जब बुढ़िया ने दोनों शव देखे तो वह कटे हुए वृक्ष की भाँति धड़ाम से गिरकर अचेत हो गई। होश आने पर वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। ये दोनों युवक उसी बुढ़िया के बेटे थे। बुढ़िया ने रोते हुए बताया कि वे लड्डू तो उसने साधु को मारने के लिए बनाए थे। बुढ़िया ने राजा से अपने अपराध के लिए मृत्यु दंड की माँग की। राजा बोला, "तुम्हारे लिए उचित दंड का निर्णय स्वयं साधु महाराज करेंगे ।" साधु कहा, “हे माई! तूने जो छल किया था, उसका फल तुझे मिल चुका है। मेरी ओर से तू मुक्त है।" बुढ़िया अपनी भूल के लिए जीवन-भर तड़पती रही। 


Saturday, 24 June 2023

कहानी -गौतम का तप

गौतम का तप 

बहुत समय पहले सूखा पड़ने से भारत के एक भू-भाग में भयंकर अकाल पड़ा। नदी, नाले, कुएँ तालाब और झरने आदि सभी सूख गए। जल के अभाव में मनुष्य, पशु और पक्षी तड़प रहे थे। उसी भू-भाग में गौतम ऋषि का भी निवास स्थान था। उन पर वरुण देवता की विशेष कृपा थी। उनके सरोवर में साफ़ पानी था। जब चारों ओर जल का अभाव हो गया तो वहाँ दूर-दूर से पक्षी जल पीने के लिए आने लगे। लोगों को ईश्वर के इस चमत्कार का पता लगा तो वे गौतम ऋषि के पास आकर विनम्रता से बोले, "हम सब पानी के बिना बहुत व्याकुल हो रहे हैं। आपकी अनुमति हो तो हम इस सरोवर का जल पीकर अपनी प्यास बुझा लें।" महर्षि गौतम ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, सरोवर आप सबका है। यदि ईश्वर की कृपा न होती तो आप सबके दर्शनों का सौभाग्य कैसे प्राप्त होता । "

बस फिर क्या था! आश्रम के आस-पास लोग आकर बस गए। कुछ ही दिनों में वह निर्जन स्थान नगर दिखाई देने लगा। उस सरोवर के जल से सबको नया जीवन मिल गया। सब मुक्त कंठ से गौतम ऋषि की प्रशंसा करने लगे। कुछ लोगों के मन में गौतम ऋषि के प्रति ईर्ष्या की भावना जाग उठी। वे किसी-न-किसी प्रकार उन्हें नीचा दिखाना चाहते थे। उन्होंने अपनी योजना के अनुसार एक दुबली-पतली गाय लाकर गौतम ऋषि की वाटिका में छोड़ दी। गौतम ऋषि उस समय वाटिका में पौधों को सींच रहे थे। उन्होंने गाय को वाटिका से बाहर करना चाहा, परंतु उनके हाथ लगाते ही वह गाय गिर गई और थोड़ी ही देर में निष्प्राण हो गई।

गौतम ऋषि यह देखकर स्तब्ध रह गए। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि उनसे इतना बड़ा पाप कैसे हो गया? उसी समय गौतम ऋषि के आस-पास आवाजें गूंजने लगी, 'गौतम हत्यारा है'। गौतम ऋषि ने मुड़कर देखा तो लोगों की अपार भीड़ खड़ी थी। अब चारों ओर प्रशंसा के बजाय उनकी निंदा होने लगी। दुखी होकर वे अपनी पत्नी अहिल्या के साथ किसी अन्य वन में चले गए और वहाँ एक कुटिया में रहकर तप करने लगे।

अहिल्या दिन-रात अपने पति की सेवा करने लगी। दुर्भाग्य ने वहाँ भी उनका साथ नहीं छोड़ा। उनके द्वारा हुई गोहत्या के विषय में सुनकर कुछ ऋषि-मुनि वहाँ आए। उन्होंने गौतम ऋषि को समझाते हुए कहा,“ तप से गोहत्या का पाप दूर नहीं होगा। इस पाप से मुक्त होने के लिए गंगा स्नान कीजिए।"

गौतम ऋषि गंगा में स्नान कैसे करें? वहाँ गंगा नहीं थी। वे गंगा को प्रकट करने के लिए भगवान शंकर की पूजा करने लगे। उनके तप, त्याग और आराधना से भगवान शंकर शीघ्र ही प्रसन्न हो गए। उन्होंने गौतम ऋषि को दर्शन दिए तथा आशीर्वाद देते हुए बोले, "मुनिवर, मैं आपकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। आप मुझसे मनचाहा वरदान माँग सकते हैं।" 

गौतम ऋषि ने उन्हें सादर प्रणाम करते हुए कहा, "मुझे गोहत्या का पाप लगा है। मैं गंगा में स्नान कर पाप मुक्त होना चाहता हूँ। आप यहाँ तक गंगा की धारा को लाने की कृपा करें।' " भगवान शंकर ने मुसकराते हुए कहा. "महर्षि, आपसे कोई गोहत्या का पाप नहीं हुआ है। ईर्ष्यावश कुछ लोगों ने आपसे छल किया है। आप कोई और वर माँग सकते हैं।' 
गौतम ऋषि ने प्रसन्नतापूर्वक निवेदन किया, "मेरे लिए तो यह छल भी एक वरदान सिद्ध हुआ है। इसी छल के कारण मैंने तप किया और आपके दर्शन हुए। यहाँ तक गंगा के आने से और भी कई लोगों का कल्याण होगा।" गौतम ऋषि का उत्तर सुनकर भगवान शंकर गद्गद कंठ से बोले, "लोक कल्याण के लिए माँगा हुआ वरदान अवश्य मिलेगा। यहाँ गंगा अवश्य प्रकट होगी ।"

भगवान शंकर के इतना कहते ही वहाँ गंगा प्रकट हो गई और हाथ जोड़कर बोली, "कहिए, क्या आज्ञा है भगवन?"

यह सुनकर भगवान शंकर ने गंगा को जलधारा के रूप में प्रवाहित होने का आदेश दिया। गंगा ने सिर झुकाकर अभिवादन किया तथा जलधारा के रूप में फूट पड़ी। उसमें हर-हर का संगीत सुनाई देने लगा। गंगा के प्रकट होने से दूर-दूर तक अकाल समाप्त हो गया। धरती की प्यास बुझ गई। पशु-पक्षी, मनुष्य सब तृप्त हो गए। इस स्थान पर प्रकटित गंगा का नाम गोदावरी रखा गया। गोदावरी नदी आज भी कल-कल स्वर में बहते हुए गौतम ऋषि के तप और त्याग का स्मरण कराती है।