कालिदास की खोज
बहुत पुरानी बात है। उज्जैन पर राजा भोज राज करते थे। उनके राज्य में अनेक विद्वान तथा कलाकार थे। संस्कृत के महाकवि कालिदास भी उन्हीं अद्वितीय विद्वानों में से एक थे। कालिदास राजा भोज के प्रिय भी थे।
एक दिन कालिदास और राजा भोज महल के बाग में भ्रमण कर रहे थे। उसी समय कुछ गधे महल के सामने से निकले। गधों को देखकर राजा भोज ने कहा, "कालिदास, तुम्हारे प्रियजन जा रहे हैं।" कालिदास ने तुरंत जवाब देते हुए कहा, "महाराज, पहले गधे मुझे प्रिय नहीं लगते थे, परंतु मैं जब से आपकी सेवा में आया हूँ तभी से ये मेरे प्रियजन हो गए हैं।"
कालिदास की बात पर राजा भोज को अपना अपमान महसूस हुआ। उन्होंने कालिदास को राज्य छोड़कर चले जाने के लिए कहा। कालिदास राज्य छोड़कर चले गए। वे एक निर्धन ब्राह्मण के यहाँ रहने लगे। कालिदास ने अपना असली परिचय ब्राह्मण को नहीं दिया।
ब्राह्मण अत्यंत निर्धन तथा अकेला था। संसार में उसका कोई नहीं था। कालिदास ने उसकी आर्थिक सहायता करनी चाही, परंतु वह ब्राह्मण अतिथि को भगवान के समान समझता था। उसने सहायता लेने से इनकार कर दिया।
कालिदास के राज्य छोड़कर चले जाने से राजा भोज को पश्चात्ताप हुआ। वे कालिदास को वापस बुलाना चाहते थे। उन्होंने कालिदास की बहुत तलाश करवाई, पर कालिदास का कहीं पता न चला। राजा भोज ने कालिदास को वापस बुलाने का एक उपाय सोचा। उन्होंने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा श्लोक सुनाता हैं, जो राजा भोज ने कभी न सुना हो तो राजा उस व्यक्ति को एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देंगे।
राजा ने यह घोषणा इसलिए करवाई थी. क्योंकि कालिदास के अतिरिक्त ऐसा श्लोक कोई भी नहीं सुना सकता था। कालिदास ने राजा की यह घोषणा सुनी तो उनके मन में यह विचार आया –यदि एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ मैं इस निर्धन ब्राह्मण को दिला देता हूँ तो इसकी निर्धनता दूर हो जाएगी। कालिदास ने एक श्लोक लिखकर ब्राह्मण की दिया और कहा, "तुम यह श्लोक राजा भोज को जाकर सुना देना। वे तुम्हें एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देंगे।
ब्राह्मण बोला, "नहीं-नहीं, मैं यह नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे बिलकुल ज्ञान नहीं है। यदि मैं पकड़ा गया तो मुझे दंड मिलेगा।" कालिदास ने ब्राह्मण को समझाते हुए कहा, "तुम यह मत बताना कि यह श्लोक तुमने नहीं लिखा हैं। तुम मेरे संबंध में भी किसी से कुछ न कहना।"
ब्राह्मण ने कालिदास की बात मान ली। वह श्लोक सुनाने के लिए तैयार हो गया। उसने कालिदास के श्लोक को अच्छी तरह से याद कर लिया।
ब्राह्मण श्लोक सुनाने के लिए राजा भोज के दरबार में उपस्थित हुआ। वहाँ श्लोक सुनाने के लिए अनेक लोग आए हुए थे। एक-एक करके लोग राजा को अपना श्लोक सुनाते जा रहे थे, परंतु राजा को किसी का भी श्लोक नया नहीं लगा। सभी के श्लोकों की बातें पुरानी थीं।
ब्राह्मण राजा के पास गया और बोला "मैंने एक नए शो की रचना की है, जिसे मैं आपको
सुनाना चाहता हूँ।" राजा भोज ने ब्राह्मण को गौर से ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "अच्छा सुनाओ। तुम्हारा श्लोक भी सुन लेते हैं।
ब्राह्मण ने श्लोक सुनाया। श्लोक का अर्थ था, 'तुम्हारे पिता ने मेरे पिता से दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ ऋणस्वरूप ली थी। अब परंपरानुसार पिता के ऋण को चुकाना आपका कर्तव्य है।' श्लोक सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? अगर मे यह कहते हैं कि यह श्लोक नया है, तो पुरस्कार देना पड़ता है। अगर यह कहते हैं कि इसकी बात सुनी-सुनाई है तो ऋण चुकाना पड़ता है। राजा ने आदेश दिया, "इस ब्राह्मण को हाथी के पाँव के नीचे कुचलवा दो।"
यह सुनते ही पुरस्कार की प्रतीक्षा में खड़े ब्राह्मण के होश उड़ गए। वह बोला, “महाराज, मेरा क्या अपराध है?"
राजा ने कहा, "यह श्लोक तुम्हारा नहीं हो सकता।"
प्राणदंड से भयभीत ब्राह्मण ने सारी बात सच-सच बता दी। राजा समझ गए कि ब्राह्मण के घर रहने वाला व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता, बल्कि कालिदास ही हो सकते हैं। राजा भोज ब्राह्मण के साथ उसके घर गए और सम्मान सहित कालिदास को ले आए। राजा ने एक हज़ार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार ब्राह्मण को दे दिया। इससे उस ब्राह्मण की निर्धनता दूर हो गई।
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