अर्जुन और भीम का अभिमान : प्रेरक प्रसंग
यह कहानी महाभारत काल की है। महाराज पांडु की दो रानियाँ थीं-कुंती और माद्री कुंती के तीन पुत्र थे- युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। माद्री के दो पुत्र थे-नकुल और सहदेव। इस प्रकार पांडु के पाँच पुत्र थे। कुंती के तीनों पुत्रों में मध्यम होने के कारण भीम को 'मझला' कहा जाता था। एक बार अर्जुन व भीम को अपनी-अपनी शक्ति पर अभिमान हो गया। वे दोनों श्रीकृष्ण के सामने अपनी-अपनी प्रशंसा करने लगे। श्रीकृष्ण ने कहा, "मैं देखना चाहता हूँ तुम दोनों में से कौन अधिक दूर तक दौड़कर आता हैं।" इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पूर्व दिशा में तथा भीम को पश्चिम दिशा में दौड़ने का आदेश-दिया। दोनों प्रतिकूल दिशाओं में दौड़ते रहो दौड़ते-दौड़ते शाम हो गई और वे दोनों थककर चूर हो गए। बुरी तरह थकने के बाद अर्जुन एक स्थान पर रुक गया। वहाँ उसने एक विचित्र संन्यासी देखा। उसका शरीर बहुत अधिक बलिष्ट लग रहा था। उसकी कमर में एक अद्भुत खड्ग लटक रहा था, वह घास खा रहा था।
उसे देखकर अर्जुन ने प्रणाम किया तथा पूछा, "भगवन, आप घास क्यों खा रहे हैं?"
संन्यासी बोला, "मैं अहिंसक हूँ, इसलिए घास खा रहा हूँ।" अर्जुन ने कहा, "यदि आप अहिंसक हैं तो कमर में यह खड्ग क्यों बाँधा हुआ है?"
संन्यासी बोला, “इस खड्ग से मैं चार व्यक्तियों का वध करना चाहता हूँ-नारद, प्रह्लाद, द्रौपदी और अर्जुन।"
अर्जुन ने पूछा, "आप इन्हें क्यों मारना चाहते हैं?"
संन्यासी ने कहा, "मैं नारद को इसलिए मारना चाहता हूँ, क्योंकि वह हर समय नारायण-नारायण कहकर उन्हें पुकारता रहता है। नारद के कारण मेरे भगवान सो ही नहीं पाते। उसने मेरे भगवान की निद्रा भंग कर रखी है। प्रह्लाद को इसलिए मारना चाहता हूँ, क्योंकि उसके कारण मेरे भगवान को कुम्हार के आवें में जलना पड़ा। पहाड़ से गिरना पड़ा। इतना ही नहीं, आधा नर व आधा पशु (नरसिंह ) बनकर गरम खंभे से प्रकट होना पड़ा। मैं द्रौपदी को भी नहीं छोडूंगा, क्योंकि उसने मेरे भगवान को उस समय पुकारा जब वे भोजन कर रहे थे। मेरे भूखे प्रभु तुरंत उसके पास गए। प्रभु ने जाते ही उससे भोजन माँगा तो उस पांचाली ने श्रीकृष्ण भगवान को अपना जूठा साग खिलाया। केवल दुर्वासा के शाप से बचने के लिए मेरे प्रभु को उसने इतना अधिक सताया। अर्जुन भी मेरा शत्रु है। उसने मेरे प्रभु को अपना रथवान बना डाला। उसके कारण मेरे प्रभु सारथि बने। अर्जुन ने मेरे भगवान का अपमान किया है, अतः मैं उसका भी वध करूँगा।"
अर्जुन ने कहा, "क्या आप गांडीव और दिव्यास्त्र धारण करने वाले श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन को मार सकते हैं?" संन्यासी ने जोर से हँसते हुए कहा, "अर्जुन के गांडीव और दिव्यास्त्रों को मेरा यह खड्ग समाप्त कर देगा। यह साधारण खड्ग नहीं है। यह तपोबल से प्राप्त किया हुआ खड्ग है। इसका यह प्रभाव है कि शत्रु की सारी शक्तियाँ इसी में आ जाती हैं।" उस संन्यासी की बात सुनकर अर्जुन डर गया और जल्दी से उसे प्रणाम करके वहाँ से लौट आया।
दूसरी ओर भीम भी दौड़ता हुआ जा रहा था। दौड़ते-दौड़ते उसने देखा रास्ते में एक बूढ़ा बंदर लेटा हुआ है। उस बंदर को पूँछ रास्ते में इस प्रकार फैली हुई थी कि बिना उसे लाँघे रास्ता पार नहीं किया जा सकता था। भीम ने उस बंदर से कहा, "अपनी पूँछ हटा लो, मुझे आगे जाना है।" बंदर बोला, "है बलशाली पुरुष! में बहुत अधिक कमजोर और बूढ़ा है। कृपा करके तुम ही मेरी पूंछ उठाकर किनारे रख दो।" भीम जोर से हँसा और बंदर के बुढ़ापे का उपहास करते हुए अपने एक हाथ से पूँछ उठाने लगा। भौम से पूँछ न उठी। उसने दोनों हाथों से जोर लगाया, फिर भी पूँछ न हिली। भीम ने अपनी सारी शक्ति लगा दी, लेकिन वह पूँछ को टस से मस भी न कर सका। यह देखकर भीम हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, "हे भगवन! मुझसे भूल हुई। मैं आपको सामान्य वानर समझ बैठा था। कृपा करके मुझे अपना परिचय दीजिए। "
वानर ने मुसकराकर अपना वास्तविक रूप धारण किया। वानर का वास्तविक रूप देखकर भीम ने उन्हें दंडवत प्रणाम करके कहा, "हे पवनपुत्र हनुमान! मैं अब कभी अपनी शक्ति का अभिमान नहीं करूंगा।" इतना कहकर भीम भी लौट आया।
भीम और अर्जुन को हताश लौटा देख श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा, "तुम दोनों उदास क्यों हो?" उन दोनों ने अपने साथ घटी घटनाएँ विस्तार से बताई। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, " अभिमान व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। यह व्यक्ति का महान शत्रु है। इससे सदैव बचकर रहना चाहिए।"
अभिमान प्रबल शत्रु की भाँति प्रहार करके व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।
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