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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Tuesday, 4 July 2023

कहानी - भाग्य का चक्र

भाग्य का चक्र

एक नगर में चार ब्राह्मण मित्र रहते थे। चारों ही निर्धन और दरिद्र थे। एक दिन चारों ने धनोपार्जन के लिए कहीं बाहर जाने का निश्चय किया। वे अपना घर, नगर, बंधु-बांधव सब छोड़कर विदेश यात्रा के लिए निकल पड़े। चलते-चलते वे अवंती पहुँचे। शिप्रा नदी में स्नानकर । उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में भगवान की आराधना की। वे मंदिर से बाहर निकले ही थे कि उनका सामना भैरवानंद महायोगी से हो गया। वे योगीराज के साथ उनके मठ पर जा पहुँचे। 
भैरवानंद के पूछने पर उन्होंने अपनी यात्रा का प्रयोजन उन्हें बताया और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगे, "योगीराज, आप ही हमें धनोपार्जन का कोई उपाय बताइए।" भैरवानंद ने अनेक कार्यों को सिद्ध करने वाली चार सिद्धि वर्तिकाएँ बनाई और चारों ब्राह्मणों को एक-एक वर्तिका देते हुए कहा, "आप लोग हिमालय की ओर जाइए। जहाँ भी कोई वर्तिका गिरे, उस स्थान पर खुदाई करने पर निश्चित ही आपको धन प्राप्त होगा। उस धन को लेकर लौट आइएगा।"

चारों ब्राह्मण वर्तिका लेकर हिमालय की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचने पर एक ब्राह्मण के हाथ से वर्तिका गिर पड़ी, उसने उस स्थान पर खुदाई की तो वहाँ ताँबे की खान मिली। उसने अपने साथियों से कहा, "मित्रों! इच्छानुसार तांबा लेकर अब यहाँ से वापिस चलते हैं।" उसके साथी | बोले, "तुम तो मूर्ख हो। इस ताँबे से क्या हमारी दरिद्रता मिट जाएगी? हम तो आगे जाएँगे।" पहला ब्राह्मण अपनी इच्छानुसार ताँबा लेकर लौट गया। शेष तीनों आगे चल दिए।

कुछ दूर आगे जाने पर एक और ब्राह्मण की वर्तिका गिर गई। उसने उस स्थान की खुदाई की तो वहाँ चाँदी की खान निकली। वह अपने साथियों से बोला, “मित्रों! यथेच्छ चाँदी लेकर वापिस लौट चलते हैं।" उसके दोनों साथी बोले, "क्या बात करते हो। आगे अवश्य सोने की खान मिलेगी। हम तो आगे जाएँगे।" दूसरा ब्राह्मण चाँदी लेकर वापिस चला गया। अब दोनों ब्राह्मण आगे बढ़े।

वे कुछ दूर ही गए थे कि उनमें से एक के हाथ की वर्तिका गिर पड़ी। उसने उस स्थान को खोदा तो वहाँ सोने की खान मिली। वह अपने साथी से बोला, "मित्र! अब आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। सोने से हमारी सारी दरिद्रता मिट जाएगी।" उसका साथी कहने लगा, “तुम समझते क्यों नहीं हो ? पहले ताँबे की, फिर चाँदी की और फिर सोने की खान मिली है। अब आगे अवश्य ही रत्नों की खान होगी। चलो आगे चलते हैं। "

तीसरा ब्राह्मण बोला, "नहीं तुम जाओ, मैं यहीं रहकर तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा । " चौथा ब्राह्मण अकेला ही आगे चल पड़ा। कुछ दूर जाने पर ही उसे भयंकर गरमी सताने लगी और प्यास भी लगने लगी। परेशान होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसे रक्त से लथपथ एक व्यक्ति दिखाई दिया जिसके सिर पर एक चक्र घूम रहा था। ब्राह्मण दौड़ कर उसके पास पहुँचा और उत्सुकता से पूछने लगा, “आप कौन हैं? इस प्रकार इस दशा में क्यों बैठे हैं? क्या यहाँ आस-पास जल मिलेगा ? मुझे बहुत प्यास लगी है।'

ब्राह्मण की बात समाप्त होते ही चक्र उस व्यक्ति के सिर से उतर कर ब्राह्मण के सिर पर घूमने लगा। ब्राह्मण ने घबराकर पूछा, "यह क्या हुआ ? मेरे सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी हैं।"" वह व्यक्ति बोला, "मेरे सिर पर भी यह चक्र इसी प्रकार आया था। आपकी ही तरह जब कोई दूसरा व्यक्ति यहाँ आकर इसी प्रकार प्रश्न करेगा जैसे आपने मुझसे किए थे, तभी यह चक्र आपके सिर से उतर कर उसके सिर पर घूमने लगेगा।"

ब्राह्मण ने चिंतित स्वर में पूछा, "आप यहाँ कितने दिनों से हैं ? " वह व्यक्ति बोला, “ठीक-ठीक समय तो मैं नहीं बता सकता। पर इतना कह सकता हूँ कि दरिद्रता दूर करने के लिए सिद्धि वर्तिका के साथ मैं इसी मार्ग से जा रहा था। यहाँ मैंने इस विषय में पूछा ही था कि यह चक्र मेरे सिर पर आकर घूमने लगा। वैसे तो कोई इधर आता ही नहीं और यदि कोई आ भी जाए तो उसकी यही दशा होती है। कुबेर ने ही धन की चोरी हो जाने के भय से इधर आने वाले व्यक्तियों के लिए चक्र का भय दिखाया है। अच्छा, अब मुझे जाने की अनुमति दीजिए।"

यह कहकर वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। उधर तीसरा ब्राह्मण काफ़ी समय तक अपने चौथे साथी की प्रतीक्षा करता रहा। जब वह नहीं लौटा तो वह उसे खोजने आगे बढ़ा। उसी स्थान पर पहुँच कर उसने अपने मित्र को उस दयनीय दशा में देखा तो बड़ा दुखी हुआ। चौथा ब्राह्मण अपने मित्र को देखकर बोला, "मित्र, देखो यह सब भाग्य का चक्र है।" यह सुनकर मित्र ने कहा, 'मैंने आपको कितना कहा था कि चलो सोना लेकर वापिस चलते हैं। किंतु आपने मेरी एक नहीं सुनी। विद्वान और कुलीन होने पर भी आप बुद्धिहीन हैं। किसी ने ठीक कहा है कि विद्या की अपेक्षा बुद्धि बड़ी होती है। चौथा ब्राहमण बोला, "नहीं मित्र, यह सब भाग्य का चक्र है। भाग्य प्रतिकूल हो तो बुद्धिमान व्यक्ति भी कष्ट उठाते हैं, सुरक्षित वस्तु भी नष्ट हो जाती है।' तीसरा ब्राह्मण अपने मित्र की बात सुनकर उसे भाग्य के भरोसे छोड़ घर वापिस लौट गया।


CLASS 10 डायरी का एक पन्ना -सीताराम सेकसरिया

डायरी का एक पन्ना

-सीताराम सेकसरिया


पाठ का भावार्थ

प्रस्तुत पाठ के लेखक सीताराम सेकसरिया आज़ादी की कामना करने वाले स्वतंत्रताप्रिय लोगों में से एक थे वे गुलामी के दिनों में दिन-प्रतिदिन जो भी देखते सुनते और महसूस करते थे, अपनी निजी डायरी में दर्ज कर लेते थे यह क्रम कई वर्षों तक चला। इस पाउ में उनका डायरी का 26 जनवरी 1931 तक का लेखाजोखा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और स्वयं लेखक सहित कलकत्ता (कोलकाता) वासियों ने देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस किस जोश-खरोश से मनाया, अंग्रेज़ प्रशासकों ने इसे उनका अपराध मानते हुए उन पर और विशेषकर महिला कार्यकर्ताओं पर कैसे-कैसे जुल्म ढाए,  इस पाठ में वर्णित है। यह पाठ हमारे क्रांतिकारियों की कुर्बानियों की याद तो दिलाता ही है, साथ ही यह भी उजागर करता कि एक संगठित समाज दृढ़संकल्प हो तो ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके।

राष्ट्रीय ध्वज का फहराना 

पिछले साल इसी दिन सारे भारत में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस बार यह दिवस फिर से मनाया जा रहा था। सबको बता दिया गया था कि प्रत्येक कार्य हमें स्वयं ही करना है। इसके प्रचार हेतु लगभग 2000 रुपये खर्च हुआ। बड़े बाजार के सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया था। कई मकान तो ऐसे सजाए गए थे मानो आजादी मिल गई हो। झंडे और साज-सज्जा को देखकर सब लोग उत्साहित थे। पुलिस गश्त लगा रही थी। ट्रैफिक पुलिस को भी इसी काम में लगाया गया था। घुड़सवार पुलिस भी थी।

पुलिस का घेराव

बड़े-बड़े पार्कों व सार्वजनिक स्थलों को पुलिस सुबह ही घेर लिया था। उन्हें अधिकारियों का आदेश था कि लोग एकत्रित न होने थाएँ मोनुमेंट के नीचे शाम को सभा होती थी। उसे तो सुबह छह बजे ही पुलिस ने घेर लिया था। फिर भी कई जगह सुबह झंडा फहराया गया। श्रद्धानंद पार्क में विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तारा सुंदरी पार्क में बड़ा बाज़ार कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से पुलिस की ऐसी मार-पीट हुई कि लोगों के सिर फट गए। गुजराती सेविका संघ की लड़कियों ने जुलूस निकाला तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मारवाड़ी विद्यालय में भी अंडोत्सव मनाया गया।

जुलूस रोकने का प्रयास

सुभाष बाबू के पूरे जुलूस का भार पूर्णोदास पर था। 2-3 बजे के करीब पूर्णोदास व उनके साथियों को पकड़ लिया गया। स्त्रियों की टोलियाँ भी निर्धारित समय पर पहुंचने की कोशिश कर रही थीं। तीन बजे तक हजारों की भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। लोग भी टोलियाँ बनाकर मैदानों में घूम रहे थे। पुलिस कमिश्नर ने नोटिस निकाला कि अमुक धारा के तहत सभा नहीं हो सकती इसमें भाग तेनेवाले को दोषी समझा जाएगा। उधर कॉसिल ने खुली चुनौती दी कि चार बजकर चौबीस मिनट पर झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

सुभाष बाबू के नेतृत्व में संघर्ष

सुभाष बाबू 4 बजकर 10 मिनट पर जुलूस लेकर आए। भीड़ की अधिकता के कारण पुलिस जुलूस रोक न सकी। पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। बहुत आदमी घायल हो गए। सुभाष बाबू पर भी लाठियाँ बरसाई। चे बड़े जोर से वंदेमातरम बोल रहे थे। वे आगे बढ़ने के लिए कह रहे थे। उन्हें पकड़ लिया गया और गाड़ी में बिठाकर लाल बाजार लोकजप में बंद कर दिया गया।

स्त्रियों द्वारा सहयोग दिया जाना

कुछ ही देर बाद स्त्रियों ने भी जुलूस निकाला। पुलिस बीच-बीच में उन पर लाठियाँ बरसाने लगती। अनेक लोग घायल हो गए। धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस टूट गया। 50-60 स्त्रियाँ वहीं बैठ गईं। पुलिस ने उन्हें पकड़कर लाल बाज़ार भेज दिया। कुल मिलाकर 105 स्त्रियाँ पकड़ी गईं जिन्हें रात को नौ बजे छोड़ा गया।

घायलों का कांग्रेस कार्यालय जाना

आठ बजे कांग्रेस कार्यालय से फोन आया कि वहाँ अनेक घायल पहुँचे हुए हैं। लेखक जानकी देवी के साथ वहाँ पहुँचा। डॉक्टर दासगुप्ता उनकी देखरेख के साथ-साथ उनके फ़ोटो उतरवा रहे थे।

महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन

यह अपने आप में महत्त्वपूर्ण व अपूर्व प्रदर्शन था। कोलकाता के नाम पर यह कलंक था कि यहाँ स्वतंत्रता आंदोलन का काम नहीं हो पा रहा। आज यह कलंक धुल गया। लोगों को आशा बँधी कि यहाँ भी काम हो सकता है।



Sunday, 2 July 2023

साया

साया  

नन्हे-नन्हे दुधमुँहे बच्चे! अकेली रुग्ण पत्नी। नाते-रिश्ते का ऐसा कोई नहीं जो ज़रूरत पर काम आ सके। पति सुदूर अफ्रीका में, अस्पताल में बीमार! महीनों तक कोई पत्र नहीं।

हर रोज वे रंग-बिरंगे टिकटों वाले पत्र की राह देखते, परंतु डाकिया भूल से भी इधर झाँकता न था।

हाँ, बहुत लंबे अर्से बाद एक पत्र, एक दिन मिला। बड़ा अजीब-सा था वह। बड़ा करुण। बड़ा दर्द भरा। नैरोबी के किसी अस्पताल से लिखा था। रंगभेद के कारण पहले यूरोपियन लोगों के अस्पताल में जगह नहीं मिली, इस अनावश्यक विलंब के कारण रोग काबू से बाहर हो गया है। डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी है, किंतु उसमें भी अब सार लगता नहीं। चंद दिनों की मेहमानदारी है। उसके बाद तुम लोगों का क्या होगा, कुछ सूझता नहीं।

पास होते तो.... भरोसा रखना.... भगवान सबका रखवाला है.

जिसने पैदा किया है, वह परवरिश भी करेगा....।

पत्नी पत्र पढ़ती, रोती। अबोध बच्चे रुलाई भरी आँखों से माँ मुँह ताकते । ताइए का

फिर चिट्ठी पर चिट्ठियाँ डालीं उन्होंने, फिर तार, तब कहीं केन्या की मोहर लगा एक विदेशी लिफ़ाफ़ा मिला। लिखा था, परमात्मा का ही चमत्कार है, हालत सुधर रही है। एक नया जनम मिला है.... । थोड़े दिनों बाद फिर पत्र आया। पहले की ही तरह किसी से बोलकर लिखवाया हुआ.... हालत पहले से अ चिंता की अब कोई बात नहीं।

पहले की तरह कुछ रुपए भी पहुँच गए इस बार।

बच्चों के मुरझाए मुखड़े खिल उठे। रुग्ण पत्नी का स्वास्थ्य तनिक सुधार की ओर बढ़ा। चिट्ठियाँ नियमि रहीं। रुपए भी पहुँचते रहे। 

उसमें लिखा था, हाथ के ऑपरेशन के बाद अब वह पत्र नहीं लिख पाता, इसलिए किसी से लिखवा लेता है। एक नया टाइपराइटर खरीद लिया है उसने अपने कारोबार का भी कुछ विस्तार कर रहा है, धीरे-धीरे । कुछ नई ज़मीन खरीदने का भी इरादा है-शहर के पास एक 'फार्म हाउस' की योजना है.... | 

घर के बारे में, पत्नी के बारे में, बच्चों की पढ़ाई के बारे में कितने ही प्रश्न थे। बड़ी उत्साहजनक बातें थीं... विस्तार से। इतना अच्छा पत्र पहले कभी भी न आया था। सबको स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता हुई। डूबती नाव फिर पार लग रही थी, धीरे-धीरे ।

लगभग तीन बरस बीत गए। घर की ओर से पत्र पर पत्र जाते रहे कि अब उसे थोड़ा-सा समय निकालकर कभी घर भी आना चाहिए।

बच्चे बहुत याद करते हैं। उसे देखने भर को तरसते हैं। जो-जो हिदायतें चिट्ठी में लिखी रहती हैं उनका अक्षरशः पालन करते हैं। माँ को किसी किस्म का कष्ट नहीं देते। कहना मानते हैं। पढ़ने में बहुत मेहनत करते हैं। अज्जू कहता है कि बड़ा होकर वह भी पापा की तरह अफ्रीका जाएगा। इंजीनियर बनेगा। पापा के साथ खूब काम करेगा। अब वह पूरे बारह साल का हो गया है। छठी कक्षा में अव्वल आया है, मास्टर जी कहते हैं कि उसे वज़ीफ़ा मिलेगा। तनु अब अट्ठारह पार कर रही है। उसका भी ब्याह करना है। कहीं कोई अच्छा-सा लड़का अपनी जात-बिरादरी का मिले तो चल सकता है....।

चिट्ठी के जवाब में बहुत-सी बातें थीं। लिखा था कि इस समय तो नहीं, हाँ अगले साल तनु के ब्याह पर अवश्य पहुँचेगा। योग्य वर तो वहाँ भी मिल सकते हैं, पर विदेश में, अफ्रीका जैसे देश में लड़की को ब्याहने के पक्ष में वह नहीं है । दहेज की चिंता न करना। कहीं वर की खोज करना ।

वर की तलाश में भटकने की अधिक आवश्यकता न हुई आसानी से खाता- -पीता घर मिल गया। शायद इतना अच्छा घराना न मिलता, लेकिन इस भ्रम से कि कन्या का बाप अफ्रीका में सोना बटोर रहा है, सब सहज हो गया।

शादी की तिथि निश्चित हो गई। नैरोबी से पत्र आया कि वह समय से पहुँच रहा है। गहने, कपड़े सब बनाकर वह साथ लाएगा। लेकिन शादी के समय वह चाहकर भी पहुँच नहीं पाया। विवशताओं से भरा लंबा पत्र आया कि इस बीच जो नया कारोबार शुरू किया है, उसमें मजदूरों की हड़ताल चल रही है। ऐसे संकट के समय यह सब छोड़कर वह कैसे आ सकता है। हाँ, गहने कपड़े और रुपए भिजवा दिए हैं। वर-वधू के चित्र उसे अवश्य भेजें, वह प्रतीक्षा करेगा। खैर, ब्याह हो गया धूमधाम के साथ विवाह के सारे चित्र भी भेज दिए।

अज्जू ने इस वर्ष कई ईनाम जीते। हाई स्कूल की परीक्षा में जिले में सर्वप्रथम रहा। खेलों में भी पहला। बहुत से सर्टीफ़िकेट मिले, वज़ीफ़ा मिला। ईनाम में मिली सारी वस्तुओं को फोटो वे पापा को भेजना न भूले।

बदले में कीमती कैमरा आया। गर्म सूट का कपड़ा आया। सुंदर घड़ी आई और मर्मस्पर्शी लंबा पत्र आया । लिखा था कि वह बच्चों की उम्मीद पर ही जी रहा है। पत्नी का स्वास्थ्य अच्छा रहना चाहिए। बच्चे इसी तरह नाम रोशन करते रहें। उनके सहारे वह जिंदगी की डोर कुछ और लंबी खींच लेगा...। यह सारा कारोबार उन्हीं के लिए तो है।

पर, अनेक वादे करने पर भी घर आना संभव न हो पाता। हर बार कुछ न कुछ अड़चनें आ जातीं और उसका आना स्थगित हो जाता।

समय पंख बाँधकर उड़ता रहा, अबाध गति से ।

बच्चों ने लिखा कि यदि उसका घर आ पाना कठिन हो रहा है तो वे ही सब अफ्रीका आने की सोच रहे हैं। कुछ वर्ष वहीं बिता लेंगे।

उत्तर में केवल इतना ही था कि काम बहुत बढ़ गया है। नैरोबी, मोंबासा के अलावा अन्य स्थानों पर भी उसे नियमित रूप से जाना पड़ता है। यहाँ विश्वास के आदमी मिलते नहीं, इसलिए उसे स्वयं ही खटना पड़ता है। यहाँ की आबोहवा, बच्चों की पढ़ाई, अनेक प्रश्न थे। अज्जू जब तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता तब तक कुछ नहीं हो सकता। समय निकालकर कभी वह स्वयं घर आने का प्रयास करेगा। बच्चों की बहुत याद आती है। घर की बहुत याद आती है। लेकिन, विवशता के लिए क्या किया जाए?

अंत में एक दिन वह भी आ पहुँचा जब अज्जू ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। कहीं अच्छी नौकरी की तलाश शुरू, पर पिता के अब भी घर आने की संभावना न दिखी तो उसने लिखा-"अम्मा बीमार रहती है। एक बार, अंतिम बार हुई, देखना जी भर चाहती है।

प्रत्युत्तर में विस्तृत पत्र मिला। इलाज के लिए रुपए भी परंतु इस बार अज्जू ने ही जाने का कार्यक्रम बना लिया अकस्मात् पहुँचकर पापा को चौकाने की पूरी-पूरी योजना
टिकट खरीद लिया। 

पासपोर्ट वीजा भी देखते-देखते बन गया। और एक दिन दिल्ली से वह विमान से रवाना भी हो गया।

उसके मन में एक गहरी उत्कंठा थी कि उसे देखकर कितने चकित होंगे। उन्होंने कल्पना भी न की होगी कि एकाएक वह इतनी दूर एक दूसरे देश में इतनी आसानी से आ जाएगा। उनकी निगाहों में तो अभी वह उतना ही छोटा होगा, जब वह निक्कर पहनकर आँगन में गुल्ली-डंडा खेलता था।

नैरोबी के हवाई अड्डे पर उतरकर वह सीधा उस पते पर गया, जो पत्र में दिया हुआ था। परंतु वहाँ ताला लगा था। हो, उसके पिता -की पुरानी धुंधली नेमप्लेट अवश्य लगी थी। 

आसपास पूछताछ की तो पता चला कि एक वृद्ध भारतीय अप्रवासी अवश्य वहाँ रहते
हैं। रात को देर से दफ़्तर से घर लौटते हैं। किसी से मिलते-जुलते नहीं। निपट अकेले हैं। वह बाहर बरामदे में रखी बेंच पर प्रतीक्षा करता रहा। रात को एक बूढ़ा व्यक्ति ताला खोलने लगा तो देखा एक युवक सामने बैठा ऊँघ रहा था। 

उसका नाम-धाम पूछा तो उसे अपनी बाँहों में भर लिया। बड़े उत्साह से स्वागत किया। भोजन के बाद वे उसे अपने कमरे में ले गए। दीवार की ओर उन्होंने इंगित किया- एक नन्हा बच्चा माँ की गोद में लुढ़का किलक रहा है।

"यह किसका चित्र है?"

युवक ने गौर से देखा। कुछ झेंपते हुए कहा, "मेरा"। वृद्ध इस बार कुछ ज़ोर-ज़ोर से खिलखिलाए, "मेरे बच्चे ! तुम इतने बड़े हो गए हो। सच! इतने साल बीत गए। जैसे कल की बात है।" उन्होंने उसके चेहरे की ओर देखा, "तुम शायद नहीं जानते, तुम्हारे पिता का मैं कितना जिगरी दोस्त हूँ। कितने लंबे समय तक हम साथ-साथ रहे, दो दोस्तों की तरह नहीं, सगे भाइयों की तरह। उसी ने मुझे हिंदुस्तान से यहाँ बुलाया था। बड़ी लगन से सारा काम सिखाया ।"

साथ-साथ साझे में हमने यह कारोबार शुरू किया। नैरोबी की आज यह बहुत अच्छी फ़र्म है। यह सब उसकी ही बदौलत है...। कहते-कहते वे ठिठक गए।

उसका हाथ अपने हाथों में थामते हुए वे बोले, "तुम्हारी माँ कैसी है?"
"अच्छी है.....?"

"भाई बहन.....।"

"सब ठीक हैं।"

"कहीं कोई कठिनाई तो नहीं?"

"न, सब ठीक है।"

"बस, यही मैं चाहता था। यही ।" हौले से उन्होंने उसका हाथ सहलाया। देर तक तक शून्य में पलकें टिकाए सोचते रहे। कुछ क्षणों का मौन भंग कर खोए-खोए से बोले, "देखो बेटे, तिनकों के सहारे तो हर कोई जी लेता है। लेकिन कभी-कभी हम तिनकों के साए मात्र के आसरे, भँवर से निकलकर, किनारे पर आ लगते हैं। हमारा जीवन कुछ ऐसे ही तंतुओं के सहारे टिका रहता है। 
यदि वे टूट जाएँ, छिन्न-भिन्न होकर, बिखर जाएँ तो पल भर में पानी के बुलबुलों की तरह सब समाप्त हो जाता है।"

".... जरा सोचो बेटे!" वे खाँसे, "तुम्हारे पिता की मृत्यु आज से पंद्रह-बीस साल पहले हो जाती, तो क्या होता? भले ही वे एक अच्छी रकम तुम्हारे नाम छोड़ जाते।” उन्होंने युवक के असमंजस में डूबे, गंभीर चेहरे की ओर देखा, " हमार रेत में गिरे पानी की तरह विलीन हो जाते और तुम अनाथ हो जाते। तुम्हारी माँ घुट-घुट कर कब की मर चुकी होती। तुम इतने हौसले से पढ़ नहीं पाते। जहाँ तुम आज हो, वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। निराशा की, हताशा की तथा असुरक्षा की इतनी गहरी खाई में होते कि वहाँ से अँधेरे के अलावा कुछ भी न दीखता तुमको....।" 

उन्होंने अपने सूखे होंठों को जीभ की नोंक से भिगोया, “हम दुर्बल होते हुए, असहाय, अकेले होते हुए कितने-कितने बीहड़ वनों को पार कर जाते हैं सहारे की एक अदृश्य डोर के सहारे....।" 

उनका गला भर आया, “तुम्हारे पिता तो तब ही गुजर गए थे बेटे। अपने साझे कारोबार से, उनके हिस्से के पैसे तुम्हें नियमित रूप से भेजता रहा। कितने वर्षों से मैं इसी दिन के इंतजार में था.... अब तुम बड़े हो गए हो। अपने इस कारोबार में मेरा हाथ बटाओ। तुम सरसब्ज हो गए. , मेरा वचन पूरा हो गया जो मैंने उसे मरते समय दिया था ....।" उनका गला भर आया। वे दीवार पर टंगे एक धुंधले से चित्र को न जाने क्या-क्या सोचते हुए देखते रहे।

                                                                                                                       -हिमांशु जोशी


Friday, 30 June 2023

कहानी- सच्ची ईद

सच्ची ईद 

रमज़ान का महीना शुरू होने वाला था। लोग रोज़े रखने की बातें करने लगे थे। दस वर्ष का नन्हा असलम भी रोज़े रखने की हठ करने लगा। अम्मी ने समझाया, "बेटा, अभी तुम बहुत छोटे हो। रोज़े में दिन भर कुछ भी नहीं खाया जाता। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? जब तुम बड़े हो जाओगे तब रोजे रख लेना।"

इतना समझाने पर भी असलम नहीं माना। उसने अपने दोस्तों से सुन रखा था कि जो रमज़ान के महीने में रोजे रखता है, उसे ईद पर नए-नए कपड़े पहनने को मिलते हैं। ईद और नए कपड़ों का ध्यान आते ही असलम का मन प्रसन्नता से भर जाता था। उसने मन- ही-मन ठान लिया था कि इस बार वह रोज़े रखेगा और ईद पर नए कपड़े अवश्य लेगा।

असलम ने तो अपने लिए नए कपड़े पसंद भी कर लिए थे। रहीम चाचा की दुकान पर टँगा कुर्ता-पायजामा उसे बहुत पसंद था। पाठशाला से लौटते समय उनकी दुकान के सामने असलम के कदम स्वयं ही थम जाते। 

देर तक वह उन कपड़ों को निहारता रहता था। वह सोचने लगता कि ईद वाले दिन यह कुर्ता-पायजामा और सिर पर टोपी पहनकर वह कितना अच्छा लगेगा। शायद अपने सारे दोस्तों से अच्छा!

असलम की अम्मी दिन भर चिकन के कपड़ों पर कढ़ाई किया करती थीं। इस काम से जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते उसी से किसी तरह रूखी-सूखी रोटी और असलम की पढ़ाई चल रही थी।

आखिरकार, रमज़ान का महीना शुरू हुआ। हठी असलम ने रोज़े रखने शुरू कर दिए थे। वह सुबह चार बजे अपनी अम्मी के साथ उठ जाता। कुछ थोड़ा -बहुत अम्मा बन देतीं, चुपचाप खा लेता। फिर दिन भर वह कुछ भी नहीं खाता, पानी तक नहीं पीता इसी बीच वह पाठशाला भी जाता। यह देखकर उसकी अम्मी को चिंता होने लगती। वे असलम को समझातीं कि बच्चों के लिए पानी और थोड़ा-बहुत खाने की छूट होती है, पर वह नहीं मानता। बड़ों की भाँति शाम को अपनी अम्मी के साथ ही रोज़ा खोलता। असलम ने अपनी अम्मी को बता दिया था कि वह इस बार ईद पर नए कपड़े ज़रूर  लेगा। उसकी अम्मी भी चाहती थीं कि उनका बेटा ईद पर नए कपड़े पहने, पर कहाँ से आएँ नए कपड़े? कैसे खरीदेंगे? उनकी हालत ऐसी नहीं थी।

एक दिन अम्मी के साथ बाजार जाते समय असलम ने रहीम चाचा की दुकान पर टँगा कुर्ता-पायजामा अम्मी को दिखलाया और ईद पर वही लेने की हठ कर बैठा। अम्मी ने झिझकते हुए रहीम चाचा से कपड़ों का दाम पूछा। दो सौ रुपए सुनकर उनका कलेजा धक से रह गया। वे चुपचाप असलम को लेकर घर वापस लौट आईं । रास्ते भर असलम उन कपड़ों की तारीफ़ करता रहा।

असलम की इच्छा और उन कपड़ों के प्रति उसका मोह देखकर असलम की अम्मी सोच में पड़ गईं। वे अपने बेटे का दिल तोड़ना नहीं चाहती थीं, पर दो सौ रुपए के कपड़े खरीदना उनके वश में नहीं था। फिर भी, उन्होंने निश्चय किया कि वे असलम को ईद पर वही कुर्ता-पायजामा जरूर लाकर देंगी।

असलम की अम्मी ने अब और अधिक काम करना शुरू कर दिया। वे सुबह जल्दी उठकर कढ़ाई का काम शुरू कर देतीं। दिन भर और फिर देर रात तक कढ़ाई करती रहतीं। एक तो रोज़ा, ऊपर से दोगुनी मेहनत, इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ने लगा। पर, उन्हें तो ईद से पहले नए कपड़े खरीदने के लिए रुपए इकट्ठे करने की धुन सवार थी।

आज असलम बहुत प्रसन्न था। ईद आने में केवल एक दिन शेष रह गया था और उसके हाथ में पूरे दो सौ रुपए थे। उसकी अम्मी ने दिन-रात एक करके, पूरे दो सौ रुपए इकट्ठे कर लिए थे। अम्मी की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी इसलिए उन्होंने रुपए देकर असलम को रहीम चाचा की दुकान से वही कपड़े लेने भेज दिया।

रुपए लेकर असलम रहीम चाचा की दुकान की ओर तेज़ी से बढ़ा चला जा रहा था। उसके मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे। वह तरह तरह की कल्पनाओं में खोया हुआ था। वह सोचता जा रहा था कि कल सुबह वह नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाएगा। अपने दोस्तों से ईद मिलन करेगा। उसके इतने अच्छे कपड़े देखकर सभी दोस्त दंग रह जाएँगे। इतने अच्छे कपड़े तो और किसी दोस्त के नहीं होंगे।

अचानक असलम की चाल धीमी हो गई। वह कुछ उदास-सा हो गया और सोच में डूब गया। उसके सामने पाठशाला में घटी घटना घूम गई। कल पाठशाला में मोहन कितना रो रहा था। उसे मास्टर जी ने साफ़ कह दिया था कि अगर दो दिन के अंदर उसने शुल्क जमा नहीं किया तो उसका नाम पाठशाला से काट दिया जाएगा। 

मोहन असलम की ही कक्षा में पढ़ता था। उसके पिता मज़दूरी करके किसी प्रकार मोहन को पढ़ाते और घर का खर्च चलाते थे। पिछले दो महीने से वे बहुत बीमार चल रहे थे जिससे काम पर नहीं जा पाते थे। घर में दवा के लिए भी पैसे नहीं थे। दो महीने से मोहन ने पाठशाला का शुल्क जमा नहीं किया था और अब तो खाने के लिए भी घर में कुछ नहीं बचा था।

असलम सोचने लगा कि कितनी मेहनत से रात-दिन एक करके उसकी अम्मी ने इकट्ठे किए हैं और वह इन्हें एक दिन की खुशी के लिए खर्च कर देगा। यदि वह ये रुपए मोहन को दे दे तो उसकी बहुत-सी कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। ईद पर नए कपड़े नहीं पहने तो क्या फ़र्क पड़ेगा। एक साल और पुराने कपड़ों में ईद मना लेगा। हाँ, मोहन को यदि इस समय सहायता न मिली तो उसकी दुनिया ही बदल जाएगी। 

यह सब सोचकर असलम तेज़ी से मोहन के घर की ओर चल पड़ा। मोहन रुआँसा-सा चारपाई के पास बैठा था। उसके चेहरे पर उदासी छाई थी। उसके पिता चारपाई पर लेटे हुए थे। असलम को देखकर मोहन की आँखें भर आई।

असलम ने मोहन को ढाँढ़स बँधाया और उसे रुपए देते हुए कहा, “मेरे भाई, इन रुपयों से अपने पिता का इलाज करवाओ और पाठशाला जाकर शुल्क जमा करा आओ।" असलम के पास इतने रुपए देखकर मोहन अवाक् रह गया। 

असलम ने उसे समझाते हुए कहा, "मोहन, ये रुपए बहुत ही मेहनत के हैं। मेरी अम्मी ने मुझे नए कपड़े खरीदने के लिए दिए थे। लेकिन कपड़ों का क्या, नए हों या पुराने, झकाझक होने चाहिए।  इन रुपयों का इससे अच्छा कोई दूसरा उपयोग नहीं हो सकता।"

मोहन के मना करने पर असलम ने जबरदस्ती रुपए उसकी जेब में ठूँस दिए। मोहन अपने आपको रोक नहीं सका और असलम से लिपटकर रोने लगा। उसे ऐसा लग रहा जैसे असलम के रूप में भगवान स्वयं उसकी मदद के लिए आए हों।"

असलम जब वापस अपने घर पहुँचा तो अम्मी उसे खाली हाथ आया देखकर हैरान रह गईं। असलम ने जब पूरी बात उन्हें बताई तो उनकी आँखें छलछला आईं। उन्होंने असलम को अपने सीने से लगा लिया। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्हें अपने इस नन्हे, लेकिन विचारों से बहुत बड़े बेटे पर नाज़ हो रहा था। 

अम्मी के मुँह से निकला, “मेरे लाल, तुम एक नेक बच्चे हो! आज तुमने सच्ची ईद मनाई है।"



प्रेम में परमेश्वर

प्रेम में परमेश्वर 

गाँव में मूरत नाम का एक बनिया रहता था। सड़क पर उसकी छोटी-सी दुकान थी। वहाँ कि रहते उसे बहुत समय हो चुका था, इसलिए वहाँ के सब निवासियों को वह भली-भाँति जानता था। वह बड़ा सदाचारी, सत्य-वक्ता, व्यावहारिक और सुशील था, जो बात कहता, उसे जरूर पूरा करता था। कभी धेले भर भी कम न तोलता और न ही घी-तेल मिलाकर बेचता । चीज अच्छी न होती, तो ग्राहक साफ़-साफ़ कह देता, धोखा न देता था।

बढ़ती उम्र के साथ में वह भगवत् भजन का प्रेमी हो गया था। उसके और चालक तो पहले ही मर चुके थे, अंत में तीन साल का बालक छोड़कर उसकी स्त्री भी परलोक सिधार गई। पहले तो मूरत ने सोचा, इसे ननिहाल भेज दूँ, पर फिर उसे बालक से प्रेम हो गया। वह स्वयं उसका पालन करने लगा। , उसके जीवन का आधार अब यही बालक था। इसी के लिए वह रात-दिन काम किया करता था. लेकिन शायद संतान का सुख उसके भाग्य में लिखा ही न था । बीस वर्ष की अवस्था में यह बालक भी यमलोक को सिधार गया। अब मूरत के शोक की कोई सीमा न थी । उसका विश्वास हिल गया। सदैव परमात्मा की निंदा कर वह कहा करता था कि परमेश्वर बड़ा निर्दयी और अन्यायी है। मारना बूढ़े को चाहिए था. मार डाला युवक को। यहाँ तक कि उसने मंदिर जाना भी छोड़ दिया। 

एक दिन उसका पुराना मित्र, जो आठ वर्ष से तीर्थयात्रा पर गया हुआ था, उससे मिलने आया। मूरत बोला- "मित्र देखो! सर्वनाश हो गया। अब मेरा जीना व्यर्थ है। मैं नित्य परमात्मा से यही विनती करता हूँ कि वह मुझे जल्दी इस संसार से उठा ले, मैं अब किस आशा पर जीऊँ?"

मित्र  "मूरत! ऐसा मत कहो। परमेश्वर की इच्छा को हम नहीं जान सकते। वह जो करता है ठीक करता है। पुत्र का मर जाना और तुम्हारा जीते रहना विधाता के वश में है और इसमें क्या कर सकता है। तुम्हारे शोक का मूल कारण यह है कि तुम अपने सुख मानते हो। पराए सुख से सुखी नहीं होते।"

मूरत" तो मैं क्या करू?"

मित्र "परमात्मा का निष्काम भक्ति करने अंतःकरण शुद्ध होता है। जब सब काम
परमेश्वर को अर्पण करके जीवन व्यतीत करोगे तो तुम्हें परमानंद प्राप्त होगा।"

मूरत "चित्त स्थिर करने का कोई उपाय तो बतलाओ । मित्र- "गीता, भक्तमालादि ग्रंथों का श्रवण पठन-मनन किया करो। ये ग्रंथ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों फलों को देने वाले हैं। इनको पढ़ना आरंभ कर दो. चित्त को बड़ी शांति मिलेगी।"

सूरत ने ग्रंथों को पढ़ना आरंभ किया। थोड़े ही दिनों में इन पुस्तकों से उसे इतना प्रेम हो गया कि रात को बारह-बारह बजे तक गीता पढ़ता और उसके उपदेशों पर विचार करता रहता था। पहले वह सोते समय छोटे पुत्र को स्मरण करके रोया करता था, पर अब सब भूल गया। सदा परमात्मा में लीन रहकर आनंदपूर्वक अपना जीवन बिताने लगा। पहले इधर-उधर बैठकर हँसी-ठट्ठा भी कर लिया करता था, पर अब वह समय व्यर्थ न खोता था। वह या तो दुकान का काम करता था या रामायण पढ़ता था। तात्पर्य यह कि उसका जीवन सुधर गया।

एक दिन पुस्तक पढ़ते पढ़ते मूरत के मन में विचार आया कि जब ईश्वर सब प्राणियों पर दया करते हैं. तो क्या मुझे सभी पर दया नहीं करनी चाहिए? तत्पश्चात् सुदामा और शबरी की कथा पढ़कर उसके मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि क्या उसे भी भगवान के दर्शन हो सकते हैं? यह विचारते विचारते उसकी आँख लग गई। बाहर से किसी ने पुकारा- "मूरता मूरत! देख, याद रख, में कल तुझे दर्शन दूँगा।"

यह सुनकर वह दुकान से बाहर निकल आया वह कौन था? वह चकित होकर सोचने लगा, वह स्वप्न है अथवा जागृति कुछ पता न चला। वह दुकान के भीतर जाकर सो गया।

दूसरे दिन प्रात:काल उठा और पूजा-पाठ करके भोजन बनाकर मूरत अपने काम-धंधे में लग गया, परंतु उसे रात वाली बात नहीं भूली थी।

रात्रि को बर्फ गिरने के कारण सड़क पर बर्फ़ के ढेर लग गए थे। मूरत अपनी धुन में बैठा था। इतने में बर्फ हटाने के लिए कोई कुली आया। मूरत ने समझा कृष्ण भगवान आए हैं। आँखें खोलकर देखा कि लालू बर्फ हटाने आया है। हँसकर कहने लगा- "तो तुम हो लालू और मैंने समझा कृष्ण भगवान, वाह री बुद्धि!" लालू बर्फ हटाने लगा। बूढ़ा आदमी था। शीत के कारण बर्फ न हटा सका। थककर बैठ गया और शीत के मारे काँपने लगा। मूरत ने सोचा कि लालू को ठंड लग रही है, इसे आग तपा । मूरत-"लालू भैया! यहाँ आओ तुम्हें ठंड सता रही है। हाथ सेंक लो।" लालू दुकान पर आकर धन्यवाद करके हाथ संकने लगा।

सूरत- "भाई, कोई चिंता मत करो। बर्फ में हटा देता हूँ। तुम बूढ़े हो, ऐसा न हो कि ठंड खा जाओ।" लालू-"तुम क्या किसी की बाट देख रहे थे?" मूरत- "क्या कहूँ, कहते हुए लज्जा आती है। रात मैंने एक ऐसा स्वप्न देखा, जिसे भूल नहीं सकता।

भक्तमाला पढ़ते-पढ़ते मेरी आँख लग गई। बाहर से किसी ने पुकारा-'मूरत।' मैं उठकर बैठ गया। फिर शब्द सुनाई पड़ा, मूरत! मैं तुम्हें दर्शन दूँगा!' बाहर जाकर देखता हूँ तो वहाँ कोई नहीं था। मैं भक्तमाला में सुदामा और शबरी के चरित्र पढ़कर यह जान चुका हूँ कि भगवान ने प्रेमवश किस प्रकार साधारण जीवों को दर्शन दिए हैं। वही अभ्यास बना हुआ है। मैं बैठा कृष्ण भगवान की राह देख रहा था कि तुम आ गए।" लालू- "जब तुम्हें भगवान से प्रेम हैं, तो अवश्य दर्शन होगे। तुमने आग न दी होती, तो मैं मर ही गया था।"

मूरत–‘“वाह भाई लालू! यह क्या बात हुई? इस दुकान को अपना घर समझो। मैं सदैव
तुम्हारी सेवा करने को तैयार हूँ।" 
लालू धन्यवाद करके चल दिया। उसके पीछे दो सिपाही आए। उनके पीछे एक किसान आया। फिर एक रोटी वाला आया। सब अपनी राह चले गए। फिर एक स्त्री आई। वह फटे-पुराने वस्त्र पहनी हुई थी। उसकी गोद में एक बालक था। दोनों शीत के मारे काँप रहे थे।

मूरत - "माई! बाहर ठंड में क्यों खड़ी हो? बालक को जाड़ा लग रहा है, भीतर आकर कपड़ा ओढ़ लो।" स्त्री भीतर आई। मूरत ने उसे चूल्हे के पास बिठाया और बालक को मिठाई दी।

मूरत- "माई. तुम कौन हो?"

स्त्री- "मैं एक सिपाही की स्त्री हूँ। आठ महीने से न जाने कर्मचारियों ने मेरे पति को कहाँ भेज दिया है. कुछ पता नहीं लगता।

गर्भवती होने पर मैं एक जगह रसोई का काम करती थी। ज्योंही यह बालक उत्पन्न हुआ तो उन्होंने इस भय से कि दो जीवों को अन्त देना निकाल दिया। मैं तीन महीने से मारी-मारी फिर रही हूँ। कोई टहलनी नहीं रखता। जो कुछ पास था, सब बेचकर खा गई। इधर साहूकारिन के पास जा रही हूँ। शायद नौकरी पर रख लें।" 

मूरत - "तुम्हारे पास कोई ऊनी वस्त्र नहीं है?" 

स्त्री" वस्त्र कहाँ से हो, पैसा ही तो पास नहीं।"

सूरत- "यह लो लोई, इसे ओड़ लो।

स्त्री " भगवान तुम्हारा भला करे। तुमने बड़ी दया की। बालक शीत के मारे मरा जाता था।" 

मूरत- "मैंने कुछ नहीं किया। श्रीकृष्ण भगवान की इच्छा ही ऐसी है।'

फिर मूरत ने स्त्री को रात वाला स्वप्न सुनाया। स्त्री- "ईश्वर का दर्शन होना कोई असंभव तो नहीं है। " स्त्री के चले जाने पर सेब बेचनेवाली आई। उसके सिर पर सेबों की टोकरी थी और पीठ पर अनाज की गठरी टोकरी जमीन पर रखकर खंभे का सहारा ले वह विश्राम करने लगी कि एक बालक टोकरी में से एक सेब उठाकर भागा। सेववाली ने दौड़कर उसे पकड़ लिया और सिर के बाल खींचकर मारने लगी। बालक बोला- "मैंने सेब नहीं उठाया।" मूरत ने उठकर बालक को छुड़ा दिया।

मूरत- "माई, क्षमा कर, बालक है।"

सेबवाली—“यह बालक बड़ा उत्पाती है। मैं इसे दंड दिए बिना कभी न छोडूंगी।'

मूरत- "माई, यह क्या कहती हो ! बदला और दंड देना तो मनुष्यों का स्वभाव है, परमात्मा का नहीं, वह दयालु है। यदि इस बालक को एक सेब चुराने का कठिन दंड मिलना उचित है, तो हमें हमारे अनंत पापों का क्या दंड मिलना चाहिए?"

सेबवाली- 'यह सत्य है, परंतु ऐसे बरताव से बालक बिगड़ जाते हैं।"

मूरत - "कदापि नहीं बिगड़ते नहीं, अपितु सुधरते हैं।"

सेबवाली टोकरा उठाकर चलने लगी कि उसी बालक ने आकर विनती की "माई, यह टोकरा तुम्हारे घर तक मैं पहुँचा आता हूँ।'

रात्रि होने पर मूरत भोजन करने के बाद गीता का पाठ कर रहा था कि उसकी आँख झपको और उसने यह दृश्य देखा- 
"मूरत! मूरत!"

मूरत "कौन हो?".

"मैं- लालू।" इतना कहकर लालू हँसता हुआ चला गया।

फिर आवाज़ आयी - " मैं हूँ।" मूरत देखता है कि दिन वाली स्त्री लोई ओढ़े बालक को गोद में लिए सम्मुख आकर खड़ी हुई, हँसी और लुप्त हो गई। फिर शब्द सुनाई दिया- "मैं हूँ।" देखा कि सेब बेचनेवाली और बालक हँसते-हँसते सामने आए और अंतर्ध्यान हो गए।
 
मूरत उठकर बैठ गया। उसे विश्वास हो गया कि कृष्ण भगवान के दर्शन हो गए, क्योंकि प्राणीमात्र पर दया करना ही परमात्मा का दर्शन करना है।

                                                                                  - लियो टॉलस्टॉय(अनुवाद - प्रेमचंद)

Thursday, 29 June 2023

Important Points साखी - कबीर मुख्य बिंदु Class 10

साखी - कबीर  मुख्य बिंदु 

मीठी वाणी का महत्त्व :

मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी बोलने से मन का अहंकार समाप्त हो जाता है तथा मन प्रसन्न होता है और मन प्रसन्न रहने से तन भी शीतल रहता है। मीठी वाणी सुननेवालों को सुख तथा प्रसन्नता की अनुभूति कराती है इसलिए सदा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली व अपने को भी शीतलता प्रदान करने वाली मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। 


संसार में सुखी व्यक्ति और दुखी व्यक्ति :

संसार में सुखी वही व्यक्ति है, जिसने घट-घट और कण-कण में बसने वाले ईश्वर से प्रीति कर ली है, उसके तत्व ज्ञान को जान और मान लिया है। दुखी मनुष्य वह है, जो दिन में खाकर और रात में सोकर हीरे जैसे अनमोल जीवन को व्यर्थ गँवाकर भौतिक सुखों की चकाचौंध में खोया हुआ है। यहाँ जो व्यक्ति संसार के विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर में मन को लगाए हुए है, वह 'जागना' (जागरूकता) का प्रतीक है और जो व्यक्ति विषय-विकारों में लिप्त है, भौतिक दृष्टि से उसकी आँखें बेशक खुली हुई हैं, पर वास्तव में वह सोया हुआ है, अर्थात 'सोना' (उदासीनता) का प्रतीक है।


कबीर का निंदक को अपने निकट रहने रखने का परामर्श :

संत कबीर ने हमें अपने दोहों के माध्यम से करणीय तथा अकरणीय की सीख दी है। उनका एक दोहा, हमें अपने स्वभाव को निर्मल करने का एक विचित्र उपाय बता रहा है। उसके अनुसार, हमें निंदक व्यक्ति को सदा अपने पास रखना चाहिए। जब-जब वह हमारी कमियाँ, हमारी बुराइयाँ हमारे सामने रखेगा, तब-तब हमें उन्हें दूर करने का या अपनी बुराइयों को अच्छाइयों में रूपांतरित करने का अवसर मिलेगा और इस प्रकार स्वतः हमारा स्वभाव निर्मल हो जाएगा। इस प्रकार, निंदा करने वाले व्यक्ति का साथ स्वभाव को निर्मल बनाने का एक सरल उपाय है।

 कबीर के अनुसार सच्चा ज्ञानी :

 केवल शास्त्र पढ़ने को कबीर ज्ञान नहीं मानते। शास्त्र विद्या कभी-कभी व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। यह अहंकार हमारे अंदर अनेक विकारों को जन्म देता है। एक बार अंहकार मन में आ जाए तो सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है जबकि एक प्रेम का भाव मन में पैदा होने से अन्य सभी विकार मिट जाते हैं और व्यक्ति सच्चा ज्ञानी बन जाता है। इस प्रकार कबीर सच्चा ज्ञानी उसे मानते हैं जिसके हृदय में प्रत्येक जड़-चेतन के लिए, संपूर्ण सृष्टि के लिए भरपूर प्रेम है। जिसके हृदय में किसी अन्य विकार के लिए कोई स्थान नहीं है वही सच्चा ज्ञानी है।

 मृग के उदाहरण द्वारा  कबीर ने संदेश :

 मृग की नाभि में एक विशेष प्रकार की सुगंध समाई होती है। यह उस सुगंध से आकर्षित होता है और उस सुगंध की तलाश में इधर-उधर भटकता है। जीवन भर भटकाव के बावजूद भी वह समझ नहीं पाता कि यह सुगंध कहाँ से आ रही है क्योंकि वास्तव में उसका स्रोत कहीं बाहर नहीं उसी के शरीर में होता है। यही स्थिति हम सभी की है जो ईश्वर को पाना चाहते हैं किंतु उसकी तलाश, तीर्थ स्थानों और कर्मकांडों में करते हैं और उन्हीं में उलझकर जीवन गंवा देते हैं। यदि हमें एहसास हो जाए कि ईश्वर कण-कण में है, हमारे रोम-रोम में भी उसी का वास है, तो हमें उसके लिए भटकना नहीं होगा। हमें सर्वत्र, हर रूप में ईश्वर के दर्शन हो पाएँगे।

कबीर के अनुसार ईश्वर को न देख सकने के कारण :

संसार में दो तरह के लोग हैं। एक वे जो सांसारिक भोग विलास में लिप्त रहकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने में ही विश्वास रखते हैं। दूसरे वे जिन्हें ईश्वर से बिछड़ने का एहसास है और ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। कबीर ने लोगों को दो श्रेणियों में बाँटा है-सुखी और दुखी। कबीर खुद को दुखी लोगों की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि वे भौतिक सुख साधनों में सुख नहीं ढूंढ पाते। उन्हें तो ईश्वर के विरह से पीड़ा होती है और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानते हैं और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर बढ़ना चाहते हैं।

कबीर के अनुसार निंदक के साथ व्यवहार :

 जो व्यक्ति सबकी निंदा करता रहे, सब में बुराई ढूँढता रहे, वह निंदक कहलाता है। सामान्यतः ऐसे लोगों सब दूर रहना चाहते हैं। कोई उन्हें पसंद नहीं करता। किंतु कबीर का मानना है कि निंदक व्यक्ति का साथ हमारे स्वभाव को निर्मल बना सकता है। जितना हम निंदक के पास रहेंगे, उतना ही हमें अपनी कमियों को जानने का अवसर मिलता रहेगा और हम उन्हें दूर कर पाएँगे। अतः हमें निंदक को अपने से दूर नहीं बल्कि अपने करीब रखना चाहिए। वह किसी शुभचितक की तरह हमारी सहायता करता है, भले अप्रत्यक्ष रूप से ही।

कबीर के दोहों का प्रतिपाद्य :

कबीर, संत संप्रदाय के श्रेष्ठ कवियों में से एक है। उन्होंने अनुभवजन्य ज्ञान को दोहों में पिरोकर जीवंत बना दिया है। कबीर ने अपने जीवन में खूब भ्रमण किया, जिसके कारण उनकी भाषा में अनेक भाषाओं के शब्द शामिल हो गए हैं। जन-जन की भाषा को उन्होंने अपनाया और अपने स्वभाव को निर्मल बनाने का, ईश्वर प्राप्ति का, अहंकार रहित जीवन जीने का मार्ग सुझाया है। कबीर ने सदैव बाहरी आडंबर का विरोध करके मानव सेवा रूपी सच्ची भक्ति का ही समर्थन किया है।

ईश्वर भक्ति से कबीर का अहंकार दूर होना : 

कबीर ने अपने जीवन में प्राप्त अनुभव के आधार पर, जो ज्ञान प्राप्त किया, उसे अपने दोहों के माध्यम से हम तक पहुँचाया। उसी अनुभव के आधार पर, उन्होंने सदा धर्म के नाम पर किए जाने वाले कर्मकांडों का विरोध किया तथा सच्चे मन से की जाने वाली भक्ति और जनसेवा को ही सच्चा धर्म बताया। उनके अनुसार विकारों से मुक्त होना ही सच्चे भक्तों की पहचान है। जैसे जैसे हम भक्ति में लीन होते जाते हैं, हमारा अहंकार दूर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो स्पष्ट है कि हम भक्ति के उचित मार्ग पर नहीं चल रहे हैं।
संत कबीर ने अहंकार से मुक्त होकर प्रेम भाव की उत्पत्ति को ही सच्चे ज्ञान की परिभाषा माना है। कबीर का हृदय अहंकार शून्य था तथा प्रेम से भरपूर था। यही उनके ईश्वर भक्त होने की पहचान है।


अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर अँधियारा  मिट जाना :

प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में, रोम-रोम में ईश्वर का, परम आनंद का वास होता है। किंतु भौतिक संसार में लिप्त होकर हम इस अनुभूति से दूर होते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारे हृदय में ज्ञान का दीपक बुझ जाता है और अज्ञान का अंधकार छाया रहता है। यदि हम ज्ञान के मार्ग पर चल पड़े और सच्चे हृदय से भक्ति करें तो धीरे-धीरे अहंकार, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि विकारों से मुक्त होते जाते हैं और प्रेम का भाव हमारे हृदय में विस्तार लेने लगता है। ज्ञान रूपी दीपक जब हृदय में प्रज्ज्वलित हो जाता है तब अज्ञान का अंधकार मिट जाता है। प्रत्येक जड़-चेतन के प्रति समान रूप से प्रेम पैदा हो जाता है। वास्तव में संपूर्ण संसार एक समान पाँच तत्वों से मिलकर बना है, किसी में कोई भेद नहीं है। यह भेद हमें तभी तक दृष्टिगत होता है, जब तक हम अज्ञान में होते हैं। ज्ञान का दीपक जल जाने पर हर ओर केवल उस, एक ही तत्व, परमसत्ता, ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं।

कबीर की साखियाँ / दोहे आज भी प्रासंगिक हैं :

कबीर की साखियाँ / दोहे हमेशा की तरह आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि साखियों में कहीं भी पुस्तकीय ज्ञान नहीं है। कबीर ने जगह-जगह घूमकर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया था तथा उनके अनुभव का क्षेत्र बड़ा विस्तृत था। इसलिए अनुभव के आधार पर होने के कारण ये साखियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगी।

 साखी के आधार पर कबीर द्वारा बताए गए जीवनमूल्य:
 
 कबीर की प्रत्येक साखी मानव जीवन को जीवन-मूल्यों से प्रेरित करती है। उनमें से एक, जैसे वाणी की मधुरता का महत्त्व कबीर प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक मानते हैं। वाणी की मधुरता से सोच-समझ कर बोली गई वाणी से तथा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली वाणी से मनुष्य संसार में किसी को भी अपना प्रिय बना सकता है।


शिविराज की महानता

शिविराज की महानता

महर्षि विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे। उनके राजपाट छोड़ जाने पर उनके पुत्र अष्टक ने राजपद ग्रहण किया। अष्टक एक उदार प्रजापालक, पराक्रमी और यशस्वी राजा थे। अष्टक ने अश्वमेध यज्ञ किया जिससे उनका यश और भी बढ़ गया। इस महान यज्ञ में भाग लेने प्रतर्दन "और शिविराज जैसे प्रतापी राजा भी आए अतिथियों का ऐसा आदर-सत्कार किया गया। जैसा कभी न हुआ था। सभी ने राजा की सराहना की। राजा ने हृदय खोलकर दान दिया और यज्ञ वसुमना सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

यज्ञ संपन्न हो जाने के पश्चात राजा अष्टक के मन में कहीं घूम आने का विचार आया। उन्होंने अपना रथ तैयार करवाया और वे भ्रमण के लिए निकल पड़े। प्रतर्दन, वसुमना और शिविराज भी उनके साथ थे। हिमालय की ओर जाते समय रास्ते में उन्हें देवर्षि नारद दिखाई दिए। रथ रोककर सबने उन्हें । प्रणाम किया और साथ चलने का आग्रह किया। नारद जी को लगा कि राजा उनसे कुछ ज्ञान चर्चा करना चाहते है, इसीलिए उन्हें साथ चलने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। नारद जी भी प्रतापी और महान राजाओं के संग का सुख उठाना चाहते थे, अतः वे रथ पर बैठ गए।

कुछ दूर पहुँचकर राजा अष्टक ने कहा, “देवर्षि यदि आज्ञा हो तो कुछ पूछें।" "अवश्य पूछिए राजन", नारद ने हँसकर कहा।

" आप क्या जानना चाहते हैं?"

तभी प्रतर्दन बोल पड़े, “केवल ये ही नहीं, हम सभी जानना चाहते हैं देवर्षि! इतना तो स्पष्ट है कि अपना-अपना धर्म निभाने के कारण हमें स्वर्ग में स्थान अवश्य मिलेगा किंतु हम यह जानना चाहते हैं कि पुण्य क्षीण होने पर हम चारों में से सबसे पहले किसे स्वर्ग से उतरना पड़ेगा ?'

कुछ क्षण सोचकर नारद जी बोले, "राजा अष्टक को ही सबसे पहले स्वर्ग लोक से उतरना पड़ेगा।" राजा अष्टक चौंक पड़े। “ऐसा क्यों भगवन ?' 'राजन, तुम्हें याद है कि एक बार मैं और तुम इसी प्रकार रथ पर बैठे कहीं जा रहे थे। मार्ग में एक साथ हजारों की संख्या में गायों को चरती देखकर मैंने आपसे पूछा था कि ये किसकी गायें हैं। आपने कहा था कि ये मेरी दान की हुई गायें हैं।' "

राजा अष्टक ने सोचकर कहा, "हाँ, याद है। किंतु मैंने सत्य ही तो कहा था।" नारद जी और बोले, "आपने कहा तो सत्य ही था राजन पर इसी कारण आपका मुसकराए
पुण्य क्षीण हो जाता है। आत्म प्रशंसा करने तथा अपने किए हुए दान का बखान करने से कार्य का मूल्य आधा रह जाता है। इसी कारण आपको स्वर्ग से सबसे पहले उतरना पड़ेगा। "

तभी वसुमना उत्सुक होकर पूछने लगे, "अच्छा, हम तीनों में से कौन नारद जी बोले, "आपमें से राजा प्रतर्दन को पहले स्वर्ग से उतरना होगा। "इसका कारण देवर्षि ? " प्रतर्दन ने पूछा।

"कारण बताता हूँ राजन। आपको भी याद होगा। एक दिन में आपका अतिथि था। आप मुझे रथ में बैठाकर नदी की ओर ले जा रहे थे। अचानक रास्ते में एक ब्राह्मण ने आकर आपसे एक अश्व देने की याचना की। आपने रथ के दाहिनी ओर का घोड़ा खोलकर ब्राह्मण को दे दिया। अभी हम थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि फिर एक ब्राह्मण मिला। उसने भी आपसे घोड़े की याचना की। आपने उसे अपने रथ का बायाँ घोड़ा दान दे दिया। कुछ ही दूर बाद फिर एक याचक मिला। उसको । भी अश्व की ही आवश्यकता थी। राजन, आपने उसे कहा कि लौटने पर घोड़ा दे देंगे किंतु उसे भी तुरंत ही अश्व चाहिए था सो आपने अपने रथ के बाऍ धुरे का बोझ सँभालने वाला घोड़ा भी दान I कर दिया। "

नारद जी की बातें सुनकर सब राजा प्रतर्दन की ओर प्रशंसाभरी दृष्टि से देखने लगे। नारद जी ने आगे कहना शुरू किया, "उस दिन पता नहीं क्या हो रहा था, जो भी आता बस घोड़े के लिए ही याचना करता। अभी हम दस गज ही आगे बढ़े होंगे कि फिर एक ब्राह्मण रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसने भी आपसे तुरंत एक घोड़ा देने की प्रार्थना की। आपने रथ से उतरकर दाहिने धुरे का थोड़ा भी खोलकर दे दिया और रथ को स्वयं अपने कंधे पर सँभाल लिया।"

तीनों राजा एक साथ "धन्य-धन्य" कर उठे। नारद जी बोले, "इसमें संदेह नहीं राजा प्रतर्दन कि आप महान दानी हैं, किंतु अंतिम घोड़े का दान करते समय आपने कहा था कि मैं मरते समय तक किसी याचक को 'ना' नहीं कहूँगा किंतु ब्राह्मणों का यह आचरण उचित नहीं। यही कहना आपका दोष था। आप दान तो करते हैं, पर जिसे दान देते हैं उसकी निंदा भी करते हैं। यह सदाचार । के विरुद्ध है। इसी कारण आपका पुण्य शीघ्र ही क्षीण होगा।" राजा प्रतर्दन उदास हो गए।

इस बार राजा शिवि ने वही प्रश्न मुनि से पूछा। नारद जी ने तुरंत उत्तर दिया, "निस्संदेह राजा वसुमना को ही पहले लौटना होगा।" इससे पहले कि राजा इसका कारण पूछते नारद जी स्वयं ही बताने लगे, "राजन, आपके पास एक अद्भुत पुष्परथ था, बिलकुल कुबेर के पुष्पक विमान जैसा-दिव्य और सर्वगामी। मैंने जब वह रथ आपके पास पहली बार देखा तो देखते ही मैं मुग्ध हो गया। मैंने रथ की बड़ी प्रशंसा की तो

आपने कहा कि रथ तो आपका ही है देवर्षि।"

एक क्षण रुककर नारद जी ने फिर कहना प्रारंभ किया, "उसके कुछ दिन बाद मैं फिर आपसे मिला। मैंने उस बार भी रथ की बड़ी प्रशंसा की और आपने भी वही शब्द दोहरा दिए। तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ। आपने कहा 'रथ तो आपका ही है। ' किंतु एक बार भी आप मुझे रथ देने के लिए उद्यत न दिखाई दिए। ऐसा आचरण नीति विरुद्ध है और सत्यनिष्ठ पुरुषों के लिए उचित नहीं है। जो केवल मुँह देखी बात करते हैं और उसे पूरी नहीं करते, वे मात्र छल करते हैं। हे राजन, आपके इसी व्यवहार के कारण आपका पुण्य जल्दी क्षीण होगा।" राजा वसुमना का सिर झुक गया। वे खिन्न हो उठे।

थोड़ी देर बाद ही राजा अष्टक ने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछ लिया, "अच्छा मुनिवर, यदि आप और शिविराज साथ-साथ स्वर्ग में हों तो पहले किसे वहाँ से उतरना पड़ेगा ?" "निश्चित रूप से मुझे ही, " नारद जी ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा “राजा शिवि
मुझसे कहीं अधिक लंबे समय के लिए स्वर्ग के अधिकारी हैं।"

यह सुनकर सभी चकित रह गए। "यह क्या कह रहे हैं आप देवर्षि ? राजा शिवि ने ऐसा क्या
किया है?" तीनों राजाओं ने उत्सुक होकर पूछा।

नारद जी बोले, "बताता हूँ, सुनो। एक बार एक ब्राह्मण राजा शिवि के पास आया और कहने लगा कि राजन में भूखा हूँ। मुझे भोजन चाहिए। राजा तुरंत तत्पर हो उठे और बोले, "आज्ञा दीजिए ब्राह्मण देवता। जो खाने की इच्छा हो बताइए। " ब्राह्मण ने एक अत्यंत कठोर इच्छा राजा पर थोप दी।

ब्राह्मण बोला "अपने ज्येष्ठ पुत्र की चिता की अग्नि पर जो भोजन तैयार करवाओगे, वही भोजन ग्रहण करूंगा।" ब्राह्मण की बात सुनकर ये शिविराज तनिक भी विचलित नहीं हुए और बोले, "जैसी आपकी । इच्छा।"

"ब्राह्मण की बात सुनकर सभा में सभी चकित थे। महामंत्री, सेनापति, सभी सभासदों ने। इनसे अनुरोध किया कि ब्राह्मण की इच्छा का पालन करना अत्यंत भयानक है। हो सकता है कि वह व्यक्ति कोई राक्षस हो पर शिविराज तो अपने वचन पर अटल थे। बोले, "अतिथि पर संदेह 1 करना पाप है। इनकी इच्छा पूरी की जाए।" किंतु राजपुत्र का वध करने को कोई तैयार नहीं था। यह कर्तव्य भी राजा शिवि ने स्वयं पूरा किया। इन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र का बलिदान कर उसकी चिता की आग पर भोजन बनवाया।"

तीनों राजाओं ने दाँतों तले उँगली दबा ली। नारद जी ने आगे कहना शुरू किया, "भोजन तैयार । हो गया तो राजा स्वयं थाल परोसकर ब्राह्मण के पास पहुंचे और हाथ जोड़कर बोले कि विप्रवर भोजन तैयार है. ग्रहण कीजिए। आपको भूख लगी होगी। ब्राह्मण भी राजा को इस प्रकार विनयपूर्वक प्रार्थना करते देख अवाक रह गया। वह बोला, "राजन, अब तो न जाने क्यों मुझे भूख नहीं रही, यह भोजन तुम स्वयं खा लो। यह मेरी आज्ञा है।" राजा शिवि फिर भी तनिक विचलित न हुए और 'जो आज्ञा' कहकर भोजन करने बैठ गए। जैसे ही इन्होंने भोजन करने के लिए हाथ बढ़ाया, ब्राह्मण ने इनका हाथ पकड़ लिया और बोला, "हे राजन, तुम धन्य हो। तुमने क्रोध पर विजय पा ली है। तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है।" यह कहकर ब्राह्मण तुरंत अंतर्धान हो गए। और सामने इनका ज्येष्ठ पुत्र खड़ा मुसकरा रहा था। सभी लोग यह दृश्य देखकर चकित थे।"

राजा प्रतर्दन, वसुमना और अष्टक "धन्य है, धन्य है" कह उठे । नारद जी बोले, "जानते हैं राजन, इनके सभासदों द्वारा इनके कार्य के भयंकर परिणाम की आशंका प्रकट करने पर इन्होंने क्या उत्तर दिया? ये बोले, "मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया है। किसी भूखे को माँगने पर भी भोजन न देना तो मेरे लिए असंभव है। यह अनाचार है। मैं महापुरुषों का अनुगामी हूँ। उनके बताए उत्तम मार्ग पर ही चलना चाहता हूँ। इसी में सबका हित है।" ऐसे महान राजा के सामने, आप ही कहिए, मेरी क्या औकात है। ये शिविराज हर प्रकार से सर्वथा निर्दोष हैं। चंद्रमा के शीतल प्रकाश की भांति इनका निर्मल यश सभी जगह फैल रहा है।" 

सभी की जिज्ञासा शांत हो गई थी। रथ तीव्र गति से बढ़ रहा था और सामने हिमालय का शुभ पावन सौंदर्य आँचल फैलाए उनके स्वागत को तैयार खड़ा था।