HINDI BLOG : April 2021

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Tuesday, 27 April 2021

KAHANI ....Sbse Bda Dhram, Dusron Ke Dukh Me Bhagidar Bno /सबसे बड़ा धर्म, दूसरों के दुःख में भागीदार बनो


सबसे बड़ा धर्म 
 एक राजा था, उसके चार बेटे थे। एक दिन राजा ने अपने चारों बेटों को बुलाकर कहा, "जाओ, और किसी धर्मात्मा को खोज कर मेरे पास ले लाओ। याद रहे तुम में से जो भी इस संसार के सबसे बड़े धर्मात्मा को खोज कर लाएगा, उसे मैं यह राज सिंहासन दे दूँगा। उसी को इस गद्दी पर बैठा दूँगा।" 
 चारों लड़के अपने पिता की बात सुनकर अलग-अलग दिशा में धर्मात्मा की खोज करने के लिए वहाँ से निकल पड़े। 
 कुछ दिन बाद सबसे बड़ा बेटा लौटा। वह अपने साथ एक सेठ को लाया था। उसने राजा से कहा, "यह बहुत बड़े सेठ हैं। यह दान-पुण्य के कार्य करते हैं, इन्होंने कई मंदिर, तालाब व प्याऊ बनवाए हैं, यह हमेशा साधु-संतों को भोजन करवाने के साथ उनके रहने की व्यवस्था भी करवाते हैं।"
राजा ने उस धनाढ्य सेठ का खूब सेवा-सत्कार किया। उसके बाद वह धनाढ्य सेठ वहाँ से अपने घर चले गए। 
इसके कुछ दिनों के पश्चात राजा का दूसरा बेटा भी अपने साथ एक दुबले-पतले ब्राह्मण को लेकर आया। राजा के सामने उस ब्राह्मण को उपस्थित कर वह राजा से बोला, " ये बहुत बड़े धर्म के ज्ञाता हैं, इन्होंने हमेशा अपने जीवन सत्य वचन ही कहें हैं और व्रत करते हैं।"
राजा ने उस ब्राह्मण का भी खूब सेवा और सत्कार किया। फिर उन्हें भी बहुत-सी दक्षिणा देकर वहाँ से विदा किया। 
फिर कुछ दिनों बाद राजा का तीसरा पुत्र एक तपस्वी को अपने साथ लेकर राजा के पास आया।  
राजमहल पहुँचकर तपस्वी ने वहीं पर अपना आसन जमा लिया और फिर ध्यानमग्न होने के लिए अपनी आँखों को बंद कर लिया। 
 बेटे ने राजा से कहा,"यह साधु महाराज बड़े ही तपस्वी हैं। एक बार ही समय भोजन करते हैं। भोजन में भी ये घास कहते हैं, गर्मी में अग्नि तापते हैं और ठंड में ठंडे जल में खड़े रहते हैं।"
राजा ने उनकी भी बड़ी आव-भगत की । कुछ समय बाद वे भी वहाँ से अपने आश्रम को चले गए।
कुछ समय पश्चात चौथा पुत्र राजमहल वापस लौटा तो अपने साथ फ़टे-पुराने कपड़े पहने एक अनपढ़-देहाती को लाया। 
उसने राजा से कहा,  "पिता जी! जब मैंने इनको देखा उस समय ये घायल पशुओं के साथ थे और उनके जख्मों को साफ़ कर रहे थे।पिता जी! पर मैं इनको बिलकुल भी नहीं जानता। यह धर्मात्मा या परोपकारी हैं भी या नहीं, यह तो आप स्वयं ही पता लगा लीजिए।"
राजा ने बड़ी विनम्रता से उनसे पूछा, "क्या आप कोई धर्म या कर्म के काम भी करते हैं?"
वह व्यक्ति राजा से बोला, "मैं बिलकुलअनपढ़ हूँ। धर्म-कर्म की बातों का ज्ञान नहीं यह सब क्या है, मैं नहीं जानता। इस बारे ने मुझे कुछ पता भी नहीं। मैं तो यदि किसी बीमार को देखता हूँ तो मैं उसकी सेवा कर देता हूँ। यदि कोई मुझसे अन्न माँगता है तो उसे अन्न दान कर देता हूँ। "
राजा ने उनकी बात सुनकर कहा, "इस पूरे संसार में सबसे बड़ा धर्मात्मा और परोपकारी वहीं इंसान हैं जो हमेशा दूसरों  की सेवा और दूसरों की भलाई करने में ही अपना जीवन बीतता है। मेरी दृष्टि में ये मनुष्य ही सबसे बड़े परोपकारी महात्मा और धर्मात्मा हैं। मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है कि वह बिना किसी इच्छा व स्वार्थ के असहायों की सेवा करे। दान और धर्म करने के लिए मन की भावना भी पवित्र ही होनी चाहिए।"

दूसरों के दुःख में भागीदार बनो 

एक बहुत ही दुबला-पतला कमज़ोर व सुंदर-सा लड़का स्कूल से बाहर निकल कर खाना खाने के लिए अपने घर जा रहा था। घर जाते हुए उसने रास्ते में देखा कि दो लड़के आपस में लड़ रहे हैं। उन दोनों में से एक बहुत ही बलवान व शक्तिशाली था और दूसरा बिल्कुल कमजोर। जो बलवान लड़का था वह कमज़ोर लड़के को बहुत मार रहा था। उस बलशाली लड़के के एक हाथ में लकड़ी भी थी। 

वह लड़का तुरंत उस बलशाली लड़के के पास पहुँचा।  उसके भारी-भरकम शरीर को देखकर उस लड़के का साहस उसे रोकने का बिल्कुल भी नहीं हुआ। पर पल रुक कर, फिर कुछ सोचकर उसने उस लड़के से पूछा, "क्यों दोस्त, तुम इसको कितना मारना चाहते हो ? 
किसी दूसरे लड़के को बीच लड़ाई में पड़ते देख उस शक्तिशाली लड़के को और ज़्यादा गुस्सा आने लगा। उसने उस लड़के को गुस्से से देखा और कहा, "तुम हमारी लड़ाई में क्यों पड़ रहे हो ?"
वह लड़का बोला, "मुझे इससे मतलब है।"
बलशाली लड़का बोला, "तुम मेरा क्या कर लोगे ?"
वह लड़का बोला, "दोस्त! मैंने तुम से अधिक शक्तिशाली और बलवान आज तक नहीं देखा। लेकिन मैं इतना शक्तिशाली भी नहीं हूँ कि इस कमज़ोर लड़के को बचाने के लिए तुम से लड़ जाऊँ लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूँ कि तुम इसे मार रहे हो तो मैं भी तुम्हारे साथ इसे मारूँ। 
"तुम कहना क्या चाहते हो ?" उस बलशाली लड़के ने उससे कहा। 
वह बलशाली लड़का उसकी इस बात का अर्थ समझ नहीं पाया। तब उस लड़के ने कहा कि "तुम लकड़ी से से जितना उसे मरना चाहते हो, उसके आधे तुम मेरी पीठ पर मार लेना।" उस लड़के ने अपनी बात समझाते हुए कहा।  
वह बलशाली लड़ना उसे बड़ी हैरानी से देखने लगा। थोड़ी देर तक उसे देखते रहने के बाद उस शक्तिशाली लड़के ने लकड़ी अपने हाथ से नीचे फेंक दी और मन बहुत पछतावा करते हुए वहाँ से अपने रास्ते चला गया। मार खाने  वाले लड़के की मुसीबत अब टल गई थी। 
यह अनजान लड़का पूरे जीवन ऐसी तरह अपनी सूझबूझ से काम करता रहा और जीवन में आगे चल कर प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवि लार्ड बायरन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

Sunday, 25 April 2021

नैतिक शिक्षा देती कहानी : पिता की तीन सीख ,महानता

पिता की तीन सीख 
एक बार उस राजा ने अपने मन मे विचार किया  कि क्यों न मैं अपने पुत्रों को कोई ऐसी सीख दूँ जिससे समय आने पर वे अपना राज्य भार आसानी से संभाल सकें। 
मन में यही  विचार करके राजा ने अपने तीनों पुत्रों को एक साथ दरबार में बुलाया और उनसे कहा, “पुत्रों, हमारे राज्य सभी फलों के वृक्ष हैं परंतु नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है। 
तुम तीनों से मैं यही चाहता हूँ कि तुम साल के हर चार महीने के अंतर पर इस वृक्ष की खोज में जाओ और उस वृक्ष का पता लगाओ कि वो वृक्ष दिखता कैसा है ?”
 राजा की आज्ञा सुनकर  तीनों पुत्र बारी-बारी से नाशपाती के वृक्ष की तलाश में निकल पड़ें और कुछ समय पश्चात वापस लौट भी आये। 
जब सभी पुत्र लौट आए तब राजा ने पुनः उन तीनों को दरबार में बुलाया। राजा ने उन तीनों से उस नाशपाती के वृक्ष के बारे में बताने को कहा।
सबसे पहले बड़ा पुत्र बोला, “ पिताजी!   वह वृक्ष तो बिलकुल टेढ़ा था और सूख भी चुका था।”
“ नहीं -नहीं ऐसा बिलकुल नहीं था बल्कि वह एकदम हरा –भरा था, परंतु उसमें कुछ तो कमी थी क्योंकि उस पर एक भी फल नहीं था।" दूसरे पुत्र ने बड़े भाई को बीच में ही रोकते हुए कहा।
अब राजा पुत्र ने कहा, “भैया, मुझे लगता है, शायद आप दोनों ही कोई और ही पेड़ देख कर आ गए हो।  मैंने तो सचमुच ही नाशपाती का पेड़ देखा था, वो पेड़ तो बहुत ही सुंदर और पूरा फलों से लदा हुआ था।”
 तीनों  पुत्र अपनी-अपनी बात पर अडिग रहे और फिर आपस में ही बहस करने लगे। 
अपने पुत्रों को आपस में इस प्रकार उलझता और बहस करते देखकर राजा अपने पुत्रों के पास आकर पुत्रों से कहने लगे, “सुनो पुत्रों, तुम तीनों को वृक्ष को लेकर आपस में बहस नहीं करनी चाहिए, असल में तुम तीनों ही एक ही वृक्ष की बात कर रहे हो और उसका सही वर्णन कर रहे हो। 
राजा ने उन तीनों से कहा कि, "तुम तीनों सही कह रहे हो। मैंने तुम्हें अलग-अलग ऋतु में वृक्ष ढूँढ़ने भेजा था और तुम तीनों ने जो कुछ देखा वह सब उस मौसम के अनुसार था। 
दरसअल मैं यह चाहता हूँ पुत्रों कि इस अनुभव के आधार पर तुम तीन बातों को गाँठ बाँध लो । 
सबसे पहली- अगर किसी चीज़ के बारे में बिलकुल सही और पूरी जानकारी चाहिए तो तुम्हें लंबे समय तक उसे देखना और परखना चाहिए।  
भले ही वह कोई चीज़, व्यक्ति या कोई वस्तु ही क्यों न हो। कभी भी जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। निर्णय लेने से पहले उस चीज़ या व्यक्ति से संबंधित हर पहलू पर गौर करना चाहिए।  
दूसरी बात - सारे  मौसम एक-से नहीं होते।अगर मौसम एक से नहीं रहते तो समय भी सदा एक सा नहीं रहता। जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा-भरा या फलों से भरा होता है ठीक उसी प्रकार कई तरह की परिस्थितियाँ भी मनुष्य के जीवन में आती-जाती रहती हैं।
 इसलिए अगर कभी तुम जिंदगी में किसी बुरे समय से गुजर रहे हों, तब अपने अंदर  हिम्मत और धैर्य को सदा बनाए रखना, यह बात सदा याद रखना कि हमेशा समय एक-सा नहीं रहता। समय ज़रूर बदलता है।
और सबसे ज़रूरी है यह तीसरी बात कि हमेशा अपनी बात को ही सही मान कर उस पर अड़े मत रहना । अपने दिमाग का प्रयोग करना, सोचना और दूसरों के विचारों को जांनने की भी कोशिश करना। 
पुत्रों, यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है, तुम चाह कर भी सारा ज्ञान अकेले अर्जित नहीं कर सकते।अतः कभी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो तो किसी ज्ञानी व्यक्ति से सलाह लेने में कभी संकोच मत करना । किसी भी तरह की दुविधा होने पर दूसरों की राय अवश्य लें अपनी बात पर अडिग न रहें। 

महानता 
एक बार एक गुरु और एक शिष्य तीर्थ यात्रा पर निकले। उन्हें चलते हुए उन्हें शाम हो गई। रात होता देख वे एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक गए। जब गुरु की नींद पूरी हो गई तो वे अपने दैनिक कार्यों से निपटने के बाद अपनी पूजा-पाठ शुरु करने लगे। 
पूजा-पाठ करते हुए उन्होंने देखा कि एक साँप उनके शिष्य की ओर बढ़ रहा था। परन्तु उस समय शिष्य बहुत गहरी नींद ने सोया हुआ था। गुरु पशु-पक्षियों की बोली जानते थे। गुरु ने उस साँप से प्रश्न किया कि "सोये हुए शिष्य के पास जाने का क्या कारण है ?"
कारण बताते हुए साँप बोला, "भगवन! मुझे बदला लेना है आपके शिष्य से। पिछले जन्म में उसने मेरी हत्या की थी और मेरी अकाल मृत्यु हुई जिस कारण मुझे साँप की योनि में जन्म लेना पड़ा। इसलिए मैं आपके शिष्य को डस कर अपना बदला लेना चाहता हूँ।"
उसकी बात सुनकर गुरु जी ने उससे कहा, सुनो! मेरे शिष्य को काट लेने से तुम्हें मुक्ति नहीं मिलेगी क्योंकि मेरा शिष्य तो बहुत ही होनहार और सदाचारी है। वह बहुत ही अच्छा साधक भी है।"
गुरू जी ने उस साँप को बहुत समझाने का प्रयास किया परंतु वह साँप अपने निश्चय पर अडिग रहा। उसके इस प्रकार अपने फैसले से हटता न देख गुरु जी ने उसके सामने एक प्रस्ताव रखा। 
गुरु जी ने साँप से कहा, "सुनो भाई! अभी मेरे शिष्य की साधना पूरी नहीं हुए है। उसे अपनी साधना पूरी करनी है और इस क्षेत्र में आगे भी बहुत कुछ करना है। परन्तु मेरी साधना पूरी हो गई है और मुझे अब जीवन में और कुछ नहीं करना है। अब मेरा जीवन भी ज़्यादा नहीं बचा है। अगर मेरा नाश हो भी गया तो उससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा इसलिए हे सर्प महाराज! मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे डस लें मेरे शिष्य के स्थान पर। मैं  इसके लिए पूरी ख़ुशी से तैयार हूँ।"
गुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर उस साँप का हृदय परिवर्तन हो गया और उसने उस शिष्य को डँसने का विचार त्याग दिया और उस परोपकारी गुरु को प्रणाम करके वहाँ से दूर चला गया।गुरु की महानता और परोपकारी स्वभाव से साँप ने भी प्रतिशोध की भावना को त्याग दिया।

Saturday, 24 April 2021

CLASS 6,7,8 MCQ VARN VICHAR...वर्ण विचार

वर्ण-विचार 
बहुविकल्पीय  प्रश्न

1. भाषा की सबसे छोटी इकाई-----------कहलाती है। 
(i) पद
(ii) वाक्य
(iii) शब्द
(iv) वर्ण
उत्तर-(iv) वर्ण

2. इनमें से कौन-सा स्वर नहीं है-
(i) अ
(ii) ओ
(iii) ऊ
(iv) ज
उत्तर-(iv) ज

3. इनमें से कौन-सा व्यंजन नहीं है-
(i) ज
(ii) च
(iii) ट
(iv) ए
उत्तर-(iv) ए

4. ‘स्वर’ वर्गों के----------- भेद होते हैं। 
(i) तीन
(ii) चार
(iii) छह
(iv) सात
उत्तर-(i) तीन

5. जिन स्वरों को उच्चारित करने में एक मात्रा से ज़्यादा का समय लगे, वे हैं- 
(i) स्वर
(ii) व्यंजन
(iii) मात्रा
(iv) प्लुत स्वर
उत्तर-(iv) प्लुत स्वर

6. मुख के अंदर जिह्वा जब अलग-अलग स्थानों को स्पर्श करती हुई जिन व्यंजनों का उच्चारण करती है, वे ------हैं। 
(i) संयुक्त व्यंजन
(ii) स्पर्श व्यंजन
(iii) ऊष्म व्यंजन
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ii) स्पर्श व्यंजन

7. जब दो या दो से अधिक स्वर रहित व्यंजन आपस में मिलकर एक न्य व्यंजन बनाए ,तब वे कहलाते हैं- 
(i) स्वर
(ii) व्यंजन
(iii) संयुक्ताक्षर
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(iii) संयुक्ताक्षर

8. विसर्ग का चिह्न है-
(i) (‘)
(ii) (ँ)
(iii) (:)
(iv) (,)
उत्तर-(iii) (:)

9. स्वरों को उच्चारित किया जाता है-
(i) स्वर की सहायता से 
(ii) व्यंजन की सहायता से 
(iii) मात्रा की सहायता से 
(iv) किसी की सहायता से 
उत्तर-(iv) किसी की सहायता से 

10..भाषा के ध्वनि समूह कहलाते हैं-
(i) शब्द
(ii) स्वर
(iii) वर्ण
(iv) व्यंजन
उत्तर-(iii) वर्ण

11. वर्णमाला का अभिप्राय है-
(i) वर्गों की माला
(ii) वर्ण-विचार
(iii) वर्णों के समूह को
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(iii) वर्णों के समूह को

12.  हमें किसी व्यंजन को उच्चारित करते समय सहायता लेनी पड़ती है- 
(i) व्यंजन
(ii) वर्णमाला की
(iii) स्वर की
(iv) किसी की नहीं
उत्तर-(iii) स्वर की

13 .अनुस्वार का चिह्न है-
(i) (ँ)
(ii) ( ं)
(iii) (,)
(iv) (:)
उत्तर-(ii) ( ं)

14. (ँ) चिह्न है-
(i) अनुस्वार का 
(ii) मात्रा का
(iii) विसर्ग का
(iv) अनुनासिक का
उत्तर-(iv) अनुनासिक का

15. दीर्घ स्वरों की कुल संख्या है-
(i) चार
(ii) पाँच
(iii) सात
(iv) ग्यारह
उत्तर- (iii) सात

16. स्वरों को उच्चारण के आधार पर --------भेदों में बाँटा गया है।  
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) सात
उत्तर-(ii) तीन

17. एक से अधिक व्यंजनों को जोड़ा जाता है, तब वे कहलाते हैं- 
(i) व्यंजन
(ii) संयुक्ताक्षर
(iii) स्वर
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ii) संयुक्ताक्षर

18. ध्वनि का लिखित रूप है- 
(i) आवाज
(ii) स्वर
(iii) लय
(iv) वर्ण
उत्तर-(iv) वर्ण

19 .स्वर वर्णों की संख्या है- 
(i) 11
(ii) 10
(iii) 8
(iv) 5
उत्तर- (i) 11

20. निम्नलिखित में दीर्घ स्वर नहीं है-
(i) ई
(ii) अ
(iii) आ
(iv) ऊ
 उत्तर-(ii) अ

21.स्पर्श व्यंजनों की संख्या है-
(i) बीस
(ii) पंद्रह
(iii) पच्चीस
(iv) बीस
उत्तर- (iii) पच्चीस

22.संयुक्त वर्ण नहीं है-
(i) क्ष
(ii) त्र
(iii) ज्ञ
(iv) अ
उत्तर-(iv) अ

23. अयोगवाह की संख्या कितनी है?
(i) दो 
(ii) तीन 
(iii) चार 
(iv) ग्यारह 
उत्तर- (i) दो 

24. श, ष, स, ह---------- व्यंजन हैं। 
(i) अंतःस्थ 
(ii) संयुक्त 
(iii) आगत 
(iv) ऊष्म 
उत्तर- (iv) ऊष्म 

25.ह्रस्व स्वर की संख्या है -
(i) दो 
(ii) तीन 
(iii) चार 
(iv) सात 
उत्तर- (iii) चार 

26. कंठ, तालु, ओष्ठ, मूर्धा से उच्चारित काव्य-सूत्र कहलाता है -
(i) सर्पफन 
(ii) कंताओमू 
(iii) मूर्धन्य 
(iv) कांताओमू 
उत्तर-(ii) कंताओमू 

27.प,भ व्यंजनों का उच्चारित स्थान कौन-सा है ?
(i) ओष्ठ 
(ii) मूर्धा  
(iii) तालु 
(iv) कंठ 
उत्तर- (i) ओष्ठ 

28. जब शब्दों को वर्णों से अलग किया जाए तो वह प्रक्रिया -----------कहलाती है। 
(i) वर्ण-विचार 
(ii) वर्ण-संयोग 
(iii) संधि-विच्छेद 
(iv) वर्ण-विच्छेद 
उत्तर- (iv)वर्ण-विच्छेद 

29. आगत व्यंजनों की संख्या है -
(i) दो 
(ii) तीन 
(iii) चार 
(iv) छः 
उत्तर-(ii) तीन 

30. 'ऑ ' किस विदेशी भाषा से संबंधित है ?
(i) हिंदी 
(ii) उर्दू 
(iii) अंग्रेज़ी 
(iv) फ़ारसी 
उत्तर- (iii) अंग्रेज़ी 

31. एक ही व्यंजन के स्वररहित व स्वरयुक्त जोड़े को ----------- हैं। 
(i) विदेशी वर्ण 
(ii) संयुक्त व्यंजन 
(iii) उत्क्षिप्त वर्ण 
(iv) द्वित्व व्यंजन 
उत्तर- (iv) द्वित्व व्यंजन 

32. वर्णमाला क्या है ?
(i) वर्णों का क्रमबद्ध व व्यवस्थित समूह 
(ii) वर्णों का समूह 
(iii) स्वर और व्यंजनों का समूह 
(iv) वर्णों का संकलन 
उत्तर-(i) वर्णों का क्रमबद्ध व व्यवस्थित समूह 

33. हिंदी वर्णमाला में संयुक्त व्यंजनों सहित कुल कितने वर्ण हैं ?
(i) 42 
(ii) 48 
(iii) 52 
(iv) 56 
उत्तर- (iii) 52 

34. विसर्ग का उच्चारण किसके समान होता है ?
(i) 'ह'  के 
(ii) 'श'  के 
(iii) 'स'  के 
(iv) 'ष'  के 
उत्तर- (i) 'ह'  के 

35. मूर्धा को सरल शब्दों में मुँह की--------- कहा जाता है। 
(i) प्लुप्त 
(ii) घर 
(iii) छत 
(iv) तालु 
उत्तर- (ii) छत 

36. स्वर को अंग्रेज़ी के S अक्षर के समान बनाया जाता था। 
(i) ह्रस्व 
(ii) दीर्घ 
(iii) प्लुत 
(iv) ऊष्म 

उत्तर- (iii) प्लुत 

37. उत्क्षिप्त वर्ण कौन-से हैं ?
(i) ड और ढ 
(ii) ड़ और ढ 
(iii) ङ और ढ़ 
(iv) ड़ और ढ़ 

उत्तर-(iv) ड़ और ढ़ 

38. अंतःस्थ व्यंजन हैं-
(i) त , थ, द, ध, न 
(ii) प, फ, ब, भ, म 
(iii) य, र, ल, व 
(iv) श, ष, स, ह
 उत्तर- (iii)य, र, ल, व

39.द्वित्व व्यंजन से बना शब्द नहीं है -
(i) पक्का 
(ii) सज्जा 
(iii) प्यार 
(iv) अम्मा 
उत्तर- (iii) प्यार 

40. संयुक्ताक्षर से बना शब्द है-
(i) बुद्धि 
(ii) विश्राम 
(iii) विशेष 
(iv) लज्जा 
उत्तर-(i) बुद्धि 

41.उष्म व्यंजन का उदाहरण नहीं है -
(i) विशेष 
(ii) शोषण 
(iii) संश्लेषण 
(iv) साड़ी 
उत्तर-(iv) साड़ी 

42.संयुक्त व्यंजन नहीं है -
(i) व्यक्ति
(ii) विश्राम 
(iii) आशीष  
(iv) बिल्ली 
उत्तर- (i) व्यक्ति

43.पॉँचों वर्गों को याद करने के लिए सूत्र है -
(i) बारहखड़ी 
(ii) संयुक्ताक्षर 
(iii) कंताओमू 
(iv) कचटतप 
उत्तर- (iv) कचटतप 

MCQ Dukh ka Adhikar /दुःख का अधिकार CLASS 9.....


दुःख का अधिकार

बहुविकल्पीय  प्रश्न  

1. भगवाना अपना तथा अपने परिवार का निर्वाह किस प्रकार करता था ?
  (i) सब्जी-तरकारी बेचकर
  (ii) परचून की दुकान से
  (iii) मज़दूरी करके
  (iv)  फेरी लगाकर कपड़ा बेचकर

उत्तर-(i) सब्जी तरकारी बेचकर

Thursday, 22 April 2021

साखी...भावार्थ ...SAKHI ......CLASS 10 NCERT SOLUTIONS

कबीर ......कवि-परिचय:

-कबीर का जन्म 1398 ई में काशी में हुआ था । 
-इन्होंने अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष मगहर में बिताए तथा 1518 ई में वहीं पर उनका निधन हो गया । -कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुणधारा की ज्ञानमार्गी सर्वश्रेष्ठ कवि थे ।
 -इनके गुरु रामानंद थे । 
-कबीर क्रांतिदर्शी कवि थे, इसलिए इन्होंने शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव ज्ञान को अधिक महत्त्व दिया ।
 -इनकी भाषा 'पंचमेल खिचड़ी' थी तथा इनकी भाषा को 'सधुककड़ी' भी कहा जाता है। 
-इन्होंने धार्मिक बाह्याडंबरों पर तीखा प्रहार करते हुए निराकार, निर्विकार, अरूप एकेश्वरवाद पर बल दिया। 
रचनाएँ - 'साखी', 'सबद' और  'रमैनी। 

साखियों की व्याख्या 

1.   ऐसी बाँणी --------------- सुख होइ।।

भावार्थ : प्रस्तुत साखी में  कबीर दास मीठी वाणी का महत्त्व बताते हुए कहते हैं कि 
-जब तक व्यक्ति के मन में 'मैं-मेरा' अर्थात अहंकार का भाव विद्यमान रहता है, तब तक वह द्वेष, अहंकार और घृणा की वाणी बोलता है। 
- किंतु मन में ईश्वर भक्ति का भाव आने पर प्रेम, स्नेह और करुणा की वाणी फूटती है जिससे बोलनेवाला और सुननेवाला दोनों ही सुख- शांति प्राप्त करते हैं। 
-कवि के कहने का अर्थ है कि हमें अपने अहंकार को समाप्त करके मधुर एवं विनम्र वचन  का प्रयोग करना चाहिए। 
- हमें अपने घमंड को भूलकर लोगों के प्रति प्रेम का व्यवहार करना चाहिए। 
-यदि हम दूसरों से अच्छे से बात करते हैं तो दूसरों को तो प्रसन्नता होती है, साथ-ही-साथ संतोष व सुख हमारे हृदय को भी पहुँचता है। 
-वाणी या बोली की मधुरता  सभी को आनंद प्रदान करती है। 

 शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
(i) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है।
(ii) भाषा सरल,सुबोध किंतु अर्थपूर्ण है। 
 (iii) मीठी वाणी का महत्त्व दर्शाया गया है।
 (iv) दोहा छंद का प्रयोग हुआ है।
 (v) उपदेशात्मक शैली अपनाई गई है।
 (vi) 'बाँणी बोलिये' में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है। 
 

2.    कस्तूरी कुंड़लि------------------ नाँहि।।

भावार्थ :प्रस्तुत साखी में  कबीर दास जी मृग अर्थात हिरण का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 
-जिस प्रकार मृग अपनी नाभि में कस्तूरी अर्थात सुगंधित पदार्थ के उपस्थित होने के बावजूद खुशबू आने पर उसे सारे वन में मूर्खों की भाँति ढूँढ़ता रहता है।   
-ठीक उसी प्रकार हम मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण ईश्वर को मंदिर-मस्जिदों में ढूँढ़ते  फिरते हैं, जबकि वह प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में, हृदय में वास करते हैं।
- ईश्वर को इधर-उधर ढूँढ़ना व्यर्थ है, वह हमारे भीतर ही मौजूद हैं। 
-कबीर दास जी ईश्वर का महत्त्व समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य के घट यानी शरीर में ही परमात्मा का वास है अर्थात शक्ति का स्रोत हमारी भीतर ही मौजूद है, पर हमें इसका ज्ञान नहीं है। 
-हम उसे बाहर कर्मकांड आदि में ढूँढ़ते हैं।-
-अपने भीतर ईश्वर को ढूँढ़ने का यत्न भी नहीं करते। यही भ्रम है, यही हमारी भूल है।
 -मृग जैसी दशा हमारी भी है। ईश्वर हमारे अंदर ही विद्यमान हैं, लेकिन हमें इसका बोध ही नहीं और हम मृग की भाँति दर-दर भटकते हैं। 
 
शिल्प-सौंदर्य /विशेष :    
(i) ढोंग और आडंबर पर करारी चोट है।
(ii) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है।
(iii) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध  एवं सटीक है। 
(iv) दोहा छंद का प्रयोग हुआ है। 
(v) उपदेशात्मक शैली अपनाई गई है।
(vi) ''कस्तूरी कुंड़लि और 'दुनिया देखै' में अनुप्रास अलंकार तथा 'घटि-घटि' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
 


3.     जब मैं था तब----------------------- देख्या माँहि।।

भावार्थ : कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मैं -अर्थात अहंकार का था मन में था तब तक ईश्वर का वास वहाँ नहीं था। 
-केवल मन में अज्ञान रूपी अंधकार ही समाया हुआ था। जब ज्ञान रूपी दीपक में स्वयं के स्वरूप को पहचाना तब मन में छाया अंधकार दूर हो गया। 
- मन निर्मल हो ईश्वर से अभिन्नता  का अनुभव करने लगा। 
-कबीर जी के कहने का तात्पर्य यह है कि जब उनमें अहंकार और घमंड था तब उन्हें ईश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हुई, 
-किंतु जब से ईश्वर पर विश्वास यानी ईश्वर का वास उनके हृदय में हुआ है, तब से अहंकार का पूर्ण विनाश हो गया है।
-अतः जब उन्हें ज्ञान रूपी दीपक प्राप्त हुआ, तब से अज्ञानता का अंधकार मिट गया तथा उन्हें सच्चे सुख की प्राप्ति हुई। 

 शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
 (i) 'सधुक्कडी'  भाषा का प्रयोग है। 
 (ii) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है।
(iii) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।  
(iv) 'दीपक देख्या' में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है। 



4.    सुखिया सब ----------------------------------रोवै।।

भावार्थ:प्रस्तुत साखी में स्वार्थी और परमार्थी की दशा के अंतर को दर्शाते हुए कबीर जी कहते हैं 
-कि सांसारिक भोगों में लगे लोग अपने अलावा किसी की चिंता नहीं करते। 
वह तो केवल खाते हैं और निश्चिंत होकर सोते हैं और सुखपूर्वक अपना जीवन बिताते हैं।
 दुखी तो कबीरदास जैसे चिंतक होते हैं, जो केवल अपने ही नहीं बल्कि समाज कल्याण की चिंता करते हैं। 
वे केवल  प्रभु के वियोग में व्याकुल रहते हैं और जब जागते हैं तो संसार की दशा देखकर रोते  हैं 
अर्थात औरों के सुख और भलाई के विषय में ही सोचते रहते हैं। 
कबीर दास जी सांसारिक विषयों में लिप्त लोगों पर व्यंग्य  करते हुए कहते हैं कि उन्हें विषयों से फुर्सत कहाँ ?
 वे हरि विरह को क्या जाने ? उन्हें अपने इष्ट के लिए कोई तड़प नहीं। 
सत्य है कि इस प्राप्ति के लिए कष्ट उठाना पड़ता है। 
कवि संस्कार को विषय-वासनाओं में लीन और ईश्वर भक्ति से हीन  देखकर दुख का अनुभव कर रहे हैं। 
कबीर उन्हें अज्ञानी मनाते हैं जो केवल सांसारिक सुखों में लिप्त होकर चैन की नींद सोते हैं। 

शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
 (i) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है। 
(ii) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है। 
(iii) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।  
(iv) 'सुखिया सब' और 'दुखिया दास' में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
 

5.     बिरह ------------------ बौरा होइ।।

भावार्थ :  कबीर दास जी प्रभु जी योगी की मनोदशा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि
- जब किसी को भी वियोग दंश सताता है, तब उसकी वैसी ही दशा होती है जैसे साँप के काट लेने पर होती है। 
उस दशा में कोई मंत्र अर्थात उपाय असर नहीं करता है।  
परमात्मा के वियोग में व्यक्ति जीवित ही नहीं रह पाता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी दशा पागलों जैसी होती है अर्थात वह सामान्य जीवन नहीं जी पाता।
 कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर के विरह की व्यथा बड़ी मार्मिक होती है, जिसमें जीवित रहना बहुत कठिन है।  कवि के अनुसार विरह-व्यथा विष से भी अधिक मारक है, दारुण है। 
इस व्यथा का वर्णन शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह केवल अनुभूति का विषय है।
यहाँ सर्प और विष का उदाहरण देते हुए राम वियोगी जी की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। 
कबीर के अनुसार विरह सर्प की भाँति है।  
इस विरह रूपी सर्प का विष जब तन में व्याप्त हो जाता है तब कोई भी मंत्र (झाड़-फूँक) इस विष से इंसान को नहीं बचा सकता है। 
राम का वियोगी विरह-व्यथा से जीता नहीं, अगर जीता है तो बावला हो जाता है, पागल हो जाता है।
 
शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
 (i) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है। 
(ii) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है।
(iii) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।  


6.     निंदक नेड़ा ----------------------- करै सुभाइ।।

भावार्थ :  प्रस्तुत साखी में कबीर दास जी ने निंदक की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि 
-निंदा करने वाले को सदा अपने आँगन में कुटिया बनाकर रखना चाहिए अर्थात अपने निकट रखना चाहिए क्योंकि वही हमारे दोषों को उजागर करता है। 
वह हमारी आचरणगत त्रुटियों को अपने स्वभाव एवं व्यवहार से दूर करने के लिए प्रेरित करता है।  
इस प्रकार बिना की साबुन और पानी के हमारे चित्त में बसी बुराइयाँ धुल  जाती हैं अर्थात हमारा स्वभाव निर्मल और शुद्ध हो जाता है। 
कबीरदास जी कहते हैं कि उपेक्षा न करके उसे आदर सहित अपने आँगन में कुटी बनाकर अपने निकट स्थान देना चाहिए। 
उसके व्यंग्य बाणों से विचलित नहीं होना चाहिए।
उससे लाभ यह होगा कि उसके द्वारा दिखाए गए दोषों को हम खोजकर समाप्त कर सकेंगे जिससे हमारा हृदय निर्मल होगा। 
ठीक उसी प्रकार जैसे वस्त्र को साफ करने के लिए साबुन और पानी की आवश्यकता होती है वैसे ही इनकी समालोचना हमारे स्वभाव की निर्मलता के लिए साबुन और पानी का कार्य करेगी। 

शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
(i) सर्प और विष का उदाहरण विरह-पीड़ा के लिए बहुत सटीक है।
(ii) साखी अनेकार्थ शब्दों का प्रयोग है। 
(iii) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है। 
(iv) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है।
(v) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।   



7.      पोथी पढ़ि ------------------- पंडित होइ।।

भावार्थ : कबीर दास जी का प्रेम का महत्त्व बताते हुए कह रहे हैं कि 
-चाहे कोई भी व्यक्ति कितनी भी बड़ी-बड़ी ज्ञान से भरी पुस्तकें पढ़ ले, किंतु वह ज्ञानी नहीं हो सकता है।  
यदि वह पूर्ण लग्न से ईश्वर प्रेम का एक अक्षर भी पढ़ ले तो वह अपने लक्ष्य अर्थात सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर लेगा अर्थात सच्ची लग्न से किया जाने वाला एकमात्र साधन है, जिससे हम सभी का दिल भी जीत सकते हैं व सभी चुनौतियों का सामना भी कर सकते हैं। 
कबीर प्रेम मार्ग की श्रेष्ठता पर बल देते हुए कहते हैं कि शास्त्र पढ़-पढ़कर सारा संसार नष्ट होता जा रहा है।
 युग बीतते चले जा रहे हैं लेकिन कौन सच्चे अर्थों में पंडित या विद्वान बन पाया ? 
किसने वह अलौकिक आनंद प्राप्त किया, जो प्रेम से मिलता है। 
कबीर की दृष्टि से जिसने राम के दो अक्षरों को जान लिया है, वही विद्वान है, पंडित है।
 प्रेम ह्रदय का भाव है, पढ़ना मस्तिष्क का। पढ़ाई साधक भी हो सकती है और बाधक भी है। 
 
शिल्प-सौंदर्य /विशेष :  
(i) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है। 
(ii) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है।
(iii) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।  
(iv) दोहा छंद  प्रयोग हुआ है। 
(v) 'पोथी पढ़ि-पढ़ि' में अनुप्रास अलंकार है और 'पढ़ि-पढ़ि' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है। 


8.     हम घर -----------------------हमारे साथि।।

भावार्थ : प्रस्तुत साखी में कबीरदास जी समाज कल्याण की भावना रखते हुए कह रहे हैं कि 

-हमने पहले ज्ञान की जलती लकड़ी की मशाल से अपने अंदर की बुराइयों के घर में आग लगा दी। 
अब उस ज्ञान की जलती लकड़ी को हमने अपने हाथों में उठा लिया है और अब उससे हम समाज की बुराइयों को जलाने का प्रयास करेंगे। 
जो भी हमारे साथ चलेगा, इस ब्रह्म-ज्ञान को प्राप्त करने में साथ ही बनेगा, उसे भी मोह- माया, सांसारिक बंधन, अहंकार रूपी बुराइयों का अपना घर जलाना होगा। 
कबीर कहते हैं कि मैंने मोह-माया के केंद्र इस संसार को जला दिया है। 
ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले को इस घर (सांसारिक बंधन, माया, मोह) को भस्म करना पड़ता है।  
जैसे कि ज्ञान प्राप्ति के लिए भक्ति-मार्ग पर चलने के लिए काम, क्रोध, मोह आदि विषयों का त्याग करना होगा क्योंकि यही ज्ञान प्राप्ति में बाधक तत्व हैं।  
अतः जो भी इस ब्रह्म-ज्ञान की ओर चलने के लिए मेरा साथी बनेगा, उसे भी अपना घर जलाना होगा। 


शिल्प-सौंदर्य /विशेष :    
(i) 'लिया मुराड़ा हाथि' मुहावरे का प्रयोग हुआ है। 
(ii) साखी अनेकार्थ शब्दों का प्रयोग है। 
(iii) 'सधुक्कडी' भाषा का प्रयोग है। 
(iv) भाषा भावानुकूल, सहज, सुबोध एवं सटीक है।
(v) उपदेशात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।   

Tuesday, 20 April 2021

Idioms in Hindi/ मुहावरे अर्थ सहित CLASS 10 ..BDE BHAI SAHAB .......MUHAVRE /बड़े भाई साहब.......

 मुहावरे व लोकोक्तियाँ अर्थ सहित 

1.अंधे के हाथ बटेर लगना - अयोग्य व्यक्ति को भाग्य से अच्छी वस्तु मिल जाना। 

वाक्य: मोहन न तो योग्य व्यक्ति है और न ही उसने कभी इस अच्छी नौकरी की आशा नहीं थी, किंतु उसे यह नौकरी मिल गई। वास्तव में अंधे के हाथ बटेर लगे गई।

2.आँखें फोड़ना - पढ़ने का खूब काम करना। 

वाक्य : उसने परीक्षा की तैयारी में दिन-रात अपनी आँखें फोड़ीं, फिर भी अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर सका। 

3. आटे-दाल का भाव मालूम होना- कठिनाई का पता चलना। 

वाक्य: तुम अभी तक मौज-मस्ती करते रहे, किंतु अब परीक्षा की तैयारी करते हुए तुम्हें आटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा। 

4. आड़े हाथों लेना- सबक सिखाना। 

वाक्य: रवि अपने-आप को बहुत कुछ समझता है लेकिन आज में उसे आड़े हाथों लूँगा। 

5. ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा-- महत्वहीन व्यक्ति। 

वाक्य: तुम मुझे ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा मत समझना। मैं भी कभी तुम्हारे काम आ सकता हूँ। 

6. खून जलाना -कठिन परिश्रम करना। 

वाक्य: आपने इस काम में अपना खून भी जलाया, लेकिन उसका कोई फल नहीं मिला।

7. गाड़ी कमाई -अत्यधिक परिश्रम से प्राप्त धन। 

वाक्य:  मोहन ने जो अपनी गाढ़ी कमाई जमा कर रखी थी, लुटेरों ने उसे लूट लिया। 

 8. गिरह बाँधना - अच्छी तरह समझना। 

वाक्य: शीला ने अपने माता-पिता की बातों को गिरह बाँध लिया है। 

9. घाव पर नमक छिड़कना - दुखी को और अधिक दुखी करना। 

 वाक्य: हमें दूसरों का दुख दूर करना चाहिए न कि उसके घावों पर नमक छिड़कना चाहिए। 

10. चक्कर आ जाना - बेहोशी की स्थिति जैसा होना। 

 वाक्य: अत्यधिक परिश्रम करते-करते मोहन को चक्कर आ गए। 

11.  चुल्लू भर पानी देने वाला - कठिन समय में साथ देने वाल। 

वाक्य: इतना घमंड मत करो। रावण जैसे दंभी सम्राट के अंत में उसे कोई चुल्लू भर पानी देने वाला नहीं था। 

12.  छोटा मुँह बड़ी बात - हैसियत से बढ़-चढ़कर बोलना।  

वाक्य: बड़ों को चुनौती देना तुम्हारे लिए छोटा मुँह बड़ी बात होगी। 

13. जमीन पर पाँव नहीं पड़ना - बहुत इतराना,अत्यधिक घमंड करना। 

वाक्य: कक्षा में प्रथम आने पर तुम्हारे पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे। 

14. जी-तोड़ मेहनत करना - अत्यधिक परिश्रम करना। 

वाक्य: तुमने जी-तोड़ मेहनत की थी इसलिए तुम इस प्रतियोगिता में सफल हुए हो। 

15. जिगर के टुकड़े-टुकड़े होना -अत्यधिक दुख होना। 

वाक्य: मोहन की व्यंग्य भरी बातें सुनकर मीरा के जिगर के टुकड़े टुकड़े हो गए। 

16. टूट पड़ना- (क) बहुत गुस्सा करना  (ख) भारी संख्या में आ पहुँचना। 

वाक्य : (क) जब मैं खेल कर शाम को देरी से पहुँचा, तो पिताजी मुझ पर टूट पड़े। 

            (ख) किसान आंदोलन में भाग लेने के लिए भारी भीड़ टूट पड़ी। 

17. तलवार खींच लेना -लड़ने के लिए तैयार हो जाना। 

 वाक्य : वीर शिवाजी ने दुश्मन को सामने देखकर अपनी तलवार खींच ली। 

18. दबे पाँव आना- चुपके से आना। 

वाक्य : मोहन काफी देर बाद घर लौटा।  पिताजी के गुस्से से डरकर वह घर में दबे पाँव  आया। 

19. दाँतों तले पसीना आना -बहुत परिश्रम करना। 

वाक्य : भारत की टीम से मैच जीतने में ऑस्ट्रेलियाई टीम के दाँतों तले पसीना आ गया।  

20. दिमाग चक्कर खा जाना - समझ में न आना, परेशान हो जान। 

वाक्य : विद्यालय में इतने सारे विषय पढ़कर मेरा दिमाग चक्कर खा गया। 

21. दिमाग हो जाना- घमंड आ जाना। 

वाक्य : कक्षा में प्रथम आने पर सोहन का बहुत दिमाग हो गया है। 

22. नजर बचाना- बचते-बचते  फिरना। 

वाक्य : मकान का किराया समय पर न देने के कारण किराएदार मकान मालिक से नजर  बचाए हुए हैं। 

23. नामोनिशान मिट जाना - समूल नष्ट हो जाना। 

 वाक्य : जापान में सुनामी लहरों के आने से कई शहरों का नामोनिशान मिट गया। 

24. निराशा के बादल छँटना - उदासी दूर होना। 

वाक्य : खोए हुए बच्चे को पाकर माता-पिता के मन पर छाए निराशा के बादल छँट गए।  

25. नींद उड़ जाना - बेचैनी बढ़ जाना। 

वाक्य : परीक्षा के निकट आते ही छात्रों की नींद उड़ जाती है। 

26. पापड़ बेलना- बहुत कष्ट झेलना। 

वाक्य : रमेश को नौकरी पाने के लिए कई पापड़ बेलने पड़े। 

27. प्राण सूखना - बहुत डर जाना। 

वाक्य : भाई साहब को देखकर मेरे प्राण सूख गए। 

28 . बूते से बाहर - सामर्थ्य न होना। 

वाक्य : यह काम मेरे बूते के बाहर है, इसलिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। 

29. बे-सिर-पैर की बातें करना - व्यर्थ की बातें करना। 

वाक्य : सुरेश से ज़्यादा बात मत किया करो। वह तो बे-सिर-पैर की बातें करता रहता है। 

30. मुँह चुराना : शर्मिंदा होना। 

वाक्य : ऐसा काम क्यों करते हो, जिसके कारण तुम्हें मुँह चुराना पड़े। 

31. लगती बात कहना - चुभती हुई बात कहना। 

वाक्य : सास ने अपनी बहू को ऐसी लगती बात कही कि वह रोने लगी। 

32. लोहे के चने चबाना -बहुत मुश्किल काम करना। 

वाक्य : भारत को आस्ट्रेलिया से मैच जीतने में लोहे के चने चबाने पड़े। 

33. सिर फिर जाना-  पगला जाना दिमाग, खराब हो जाना। 

वाक्य : तुम्हारा सिर फिर गया है, क्या जो बेकार की बातें कर रहे हो। 

34.  सूक्ति बाण चलाना- व्यंग्यपूर्ण बातें करना। 

वाक्य : आजकल बहुएँ सास  पर सूक्ति-बाण चलाती हैं। 

35. हाथ डालना - सम्मिलित होना। 

वाक्य : इस मामले में मैंने भी हार डाला था, इसलिए मुझे भी धन्यवाद देना चाहिए। 

36. हाथ-पाँव  फूल जाना- बहुत घबरा जाना। 

वाक्य : पुलिस को देखकर तुम्हारे हाथ-पाँव क्यों फूल गए?

Saturday, 17 April 2021

स्वदेश प्रेम....भावार्थ .(KAVITA) कवि 'माखनलाल चतुर्वेदी'


 कविता
सेवा में -----------------------पाएँगे हम। 
                                                                            
कविता का भावार्थ-  

'स्वदेश प्रेम' कविता के माध्यम से कवि 'माखनलाल 'चतुर्वेदी' भारत की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि इस मातृभूमि की सेवा में  हमें पूरे तन-मन से करनी  चाहिए क्योंकि इस धरती की सेवा करते हुए, इसे विकास के मार्ग पर ले जाते हुए इसे स्वर्ग के समान अर्थात उसके भाई का स्थान प्रदान करेंगे।
 कवि कहते हैं कि इसी धरती पर हमने जन्म लिया। इसी धरती ने हमारा पालन किया है। 
 इस धरती का उपकार हम पर इतना ज़्यादा  है कि हम उसे भूल भी नहीं पाएँगे। 
इस धरती ने  इतने उपकार किए हैं कि हम कौन-कौन से उसके उपकार गिनाएँ? 
इस धरती के उपकारों का ऋण उतारने का  हम पूरा प्रयत्न करेंगे पर शायद ही हम इस  ऋण को उतार पाएँ।
 कवि  लोगों में  देश प्रेम की भावना जगाते हुए कहते हैं कि तेरे लिए ही हम जिएँगे और तेरे लिए ही अपने प्राणों का बलिदान कर देंगे। 
हे भारत! तेरी ही सेवा में हम अपना सारा जीवन बिताएँगे क्योंकि तू ही हमारा स्वर्ग है, तू ही हमारा मित्र और  हमारा घर है। इस विश्व में भारत जैसी पवित्र भूमि कही नहीं है। यह धरती स्वर्ग के समान पवित्र है।  
इसी  पवित्र धरती से ही हमारा प्रेम का नाता है,जो चाह कर भी छूट नहीं सकता। इसलिए इसी धरती को हम स्वर्ग के समान सुंदर बनाएँगे। 
कवि कहते हैं कि जो इस धरती पर जन्म लेकर भी अभी तक  भ्रम और अहंकार से भरे हुए हैं और अपने कर्तव्य से दूर हैं। 
उन प्यारे फूलों में अर्थात उन लोगों में  देश प्रेम की भावना हम भरेंगे। 

हम  उन शत्रुओं  का घमंड तोड़ेंगे जिनके अंदर अहंकार भरा हुआ है जो भारत की छवि को खराब  करने का  प्रयास करते हैं। 
भारत की  संस्कृति को ठेस पहुँचाने का प्रयास करते हैं। कवि  ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं अब हमें तुम ही पूर्ण व  पवित्र बल प्रदान करो जिससे हम अपने शत्रुओं का अहंकार तोड़ सके। 
अपने देश को विकास के मार्ग पर  ले जाने और देश में एकता में बनाए रखने के लिए हमे आपके शेयर की आवश्यकता है।  
आप के सहारे के बिना हम इस धरती के लिए कुछ भी नहीं कर पाएँगे। 
कवि इस कविता के माध्यम से देशप्रेम और सेवाभाव की भावना देशवासियों के सामने प्रकट कर रहे हैं और सभी देशवासियों से यही उम्मीद करते हैं  कि सभी देशवासी अपनी  संस्कृति व धरती का सम्मान करें।
 भारत की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है। हमें अपने देश पर गर्व होना चाहिए।


कविता से संबंधित प्रश्न-उत्तर :

1.कवि देश के लिए क्या करना चाहते हैं ?

उत्तर- कवि  देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि वह अपना तन-मन सभी कुछ अपने देश पर कुर्बान कर दें क्योंकि इस देश ने ही उनका पालन पोषण किया है। यह मातृभूमि हमें जान से भी प्यारी है।  हमें भारत देश ने ही उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाया है। 


2. कवि 'बेहोश पड़े हैं' जो पंक्ति के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर- 'बेहोश पड़े हैं' पंक्ति से कवि का तात्पर्य है कि जो लोग अभी तक देश के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे या देश के विकास में अपना सहयोग नहीं दे रहे हैं,उन्हें जाग जाना चाहिए। साथ ही यह पंक्ति उन लोगों की ओर भी संकेत कर रही है जो देश में अराजकता फैलाते हैं। कवि कहते हैं कि उन्हें अब होश में आ जाना चाहिए क्योंकि भारतवासी एक हैं और भारत की एकता और अखंडता को कोई भी तोड़ नहीं सकता। 

3. इस कविता का मुख्य संदेश क्या है ?

उत्तर- 'स्वदेश प्रेम' कविता से हमें यह संदेश मिलता है कि भारतवासी होने के नाते हमें अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए और जरूरत पड़ने पर अपने देश के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर देनी चाहिए। 

4.कवि  ईश्वर से क्या माँग रहे हैं ?

उत्तर- कवि ईश्वर से कहते हैं कि हे ईश्वर हमें ऐसा पवित्र बल दो, शक्ति दो जिसके बल से हम अपने देश के रक्षा कर सकें। हम उस शक्ति के सहारे अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकें।  बिना आपके सहारे के हम अपने देश के लिए कुछ नहीं कर पाएँगे। हे ईश्वर! हमें इतना बल दो कि हम तेरी सेवा में इस मातृभूमि की सेवा में अपना पूरा जीवन बिता दें। 

5.'स्वदेश प्रेम' कविता का मुख्य स्वर क्या है ?

उत्तर- 'स्वदेश प्रेम' कविता का मुख्य स्वर सेवाभाव व देश-प्रेम, देशभक्ति है। कवि चाहते हैं कि हम अपना सर्वस्व अपने देश के लिए अर्पित कर दें और भारत माता के चरणों में अपना जीवन व्यतीत करें। 

6.हम भारत माता के ऋण से कभी मुक्त क्यों नहीं हो पाएँगे ?

उत्तर- कवि कहते हैं कि हम भारत माता के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे  क्योंकि इसी धरती पर हम ने जन्म दिया है और एक माँ की भाँति इसने हमारा पालन-पोषण किया है। जैसे एक पुत्र अपनी माँ के ऋण से मुक्त नहीं हो पाता उसी प्रकार हम भारत माता की संतान हैं और कभी इसके ऋण को उतार नहीं पाएँगे। हम यही पले बढ़े हैं इसी धरती पर हम पले-बढ़े, इसी ने हमारा संरक्षण किया है। इसलिए हम चाह कर भी इसके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे।