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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Thursday, 13 May 2021

पद की गरिमा, मनोबल रूपी शक्ति - लघु कथा

Top Best Famous Moral Stories In Hindi  

पद की गरिमा
रामपुर रियासत के राजा रणधीर सिंह प्रजा वत्सल और कला प्रेमी थे। 
एक दिन रूप बदलने में माहिर एक बहरूपिया महादेवी का रूप धारण कर राजा से मिलने उनके दरबार में आया। 
 इस रूप में उसे देख कर कोई भी यह नहीं कह ही सकता था कि वह बहरूपिया है महादेवी। राजा भी उसे पहचान न सके। उसे इस तरह अपनी कला में माहिर देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। 
राजा ने उससे कहा कि तुम अपनी कला में बहुत निपुण हो परंतु तुम्हारी कला का सिक्का मैं तब मानूँगा जा तुम वेश धरो और मैं तुम्हें पहचान न पाऊँ। 
राजा ने बहरूपिए से फिर कहा, "यदि तुम साधु वेश धारण करो और किसी द्वारा पहचान में न आओ तो मैं तुम्हारी कला का लोहा मानूँगा। 
राजा की यह बात सुनते ही वह बहरूपिया वहाँ से चला गया। वह बहुत दिनों तक किसी को नजर नहीं आया। 
कुछ दिनों बाद दरबार में एक साधु को लेकर चर्चा चली। दरबारी कहने लगे कि नगर में एक साधु आए हैं और वे एक सेठ के यहाँ उनकी बगिया में रुके हुए हैं। 
वह बड़े प्रतापी हैं और किसी से भेंट में एक धेला भी नहीं लेते हैं। 
साधु की महिमा सुनकर राजा भी साधु के दर्शन के लिए सेठ के बगीचे में पहुँचे। 
राजा ने साधु के दर्शन किए और उन्हें उपहार और कीमती गहने भेंट करने चाहे लेकिन साधु ने उन्हें ठुकरा दिया।
घटना के अगले दिन वही बहरूपिया राजा के दरबार में पहुँचा और राजा को साधु वेश धरने की चुनौती की याद दिलाते हुए बताया कि वह साधु बनकर सेठ की बगिया में ठहरा था। 
बहरूपिए की बात सुनकर राजा अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने उस बहरूपिए बहुरूपिया को इनाम में ढेर सारे राशि दी । 
फिर राजा ने बहुरूपिए से प्रश्न किया। 
राजा ने बहुरूपिए से कहा, "कि तुम्हें अनेक रत्न व आभूषण दिए गए थे, जब तुम साधु वेश धारण करके बैठे थे परंतु तुमने वे सब लेने से क्यों मना कर दिया था ?
 इस पर बहुरूपिया ने कहा, "कि हे महाराज! उस समय मैं साधु वेश में था, इसलिए भेंट लेना उस पद की गरिमा के विरुद्ध था और मैं उस पद की गरिमा को भ्रष्ट नहीं कर सकता था।"


मनोबल रूपी शक्ति 

एक राजा था। उसने एक हाथी पाल रखा था। उसे उस हाथी से बहुत प्रेम था। वह हाथी केवल राजा का ही नहीं बल्कि प्रजा का भी प्रिय था। इसका कारण यह था कि उसमें बहुत सारे गुण थे। वह हाथी बहुत ही बुद्धिमान एवं स्वामी भक्त था। उसने अपने जीवन में कई युद्धों में यश प्राप्त किया था। 

उसने राजा के साथ मिलकर बहुत से युद्धों में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और राजा को विजयी बनाया था। पर अब समय के साथ उम्र बढ़ने से हाथी बूढ़ा होने लगा था। उसका शरीर अबजर्जर होने के साथ ही शिथिल पड़ता जा रहा था।  जिस कारण अब वह युद्ध करने और युद्ध में ले जाने लायक वह नहीं बचा था। 

एक दिन हाथी टहलता हुआ तालाब पर पानी पीने के लिए पहुँचा। उस तालाब में पानी बहुत कम था इसलिए हाथी पानी पीने के लिए तालाब के बीच में पहुँच गया। पानी कम होने की वजह से उस तालाब में कीचड़ भी बहुत ज्यादा था। 

हाथी उसकी कीचड़ रूपी दलदल में फँस गया। वह अपने जर्जर होते शरीर को कीचड़ से निकालने में समर्थ नहीं था। वह इतना परेशान हो गया कि अब वह घबराने लगा और उसने से ज़ोर से चिंघाड़ना शुरू कर दिया ताकि कोई उसकी मदद करने के लिए वहाँ आ जाए। हाथी के चिंघाड़ने की आवाज़ सुनकर सारे महावत उसकी मदद करने के लिए उसकी ओर दौड़े। 

हाथी की ऐसी स्थिति देखकर सभी महावत सोच में पड़ गए कि हाथी को किस प्रकार कीचड़ से बाहर निकाला जाए ?आखिरकार उन्होंने एक फैसला किया कि   बड़े नुकीले भाल से उसके शरीर में चुभाए जाए, जिसकी चुभन से वह अपनी शक्ति को एकत्रित करें और कीचड़ से बाहर निकल आए परंतु उन भालों के चुभने से उसके शरीर में और ज्यादा पीड़ा होने लगी और उसकी आँखों से आँसू छलकने लगे।

हाथी के दलदल में फँसने का समाचार जब राजमहल में राजा के कानों तक पहुँची   तब राजा भी तालाब पर पहुँच गए। हाथी को ऐसी स्थिति में देखकर राजा की आँखें भर आई। थोड़ी देर तक सोचने के बाद राजा ने कहा कि हमारे पुराने बूढ़े महावत को बुलाया जाए। 

बूढ़ा महावत वहाँ आया और उसने आकर राजा को एक उपाय बताया कि हाथी को केवल एक ही तरीके से बाहर निकाला जा सकता है। यदि आप युद्ध का नगाड़ा बजाओ, बैंड बाजे लाओ और सभी सैनिकों को यहाँ पंक्ति में उसके सामने खड़ा कर दो। राजा ने बूढ़े महावत की बात सुनकर वहाँ खड़े अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि सैनिकों को शस्त्र के साथ यहाँ बुलाया जाए और युद्ध का नगाड़ा बजाया जाए। 

कुछ ही समय में सारी तैयारियाँ हो गईं। सभी सैनिक व राजा तालाब के किनारे इकट्ठे हो गए। जैसे ही सैनिकों ने नगाड़े बजाना शुरू किया वैसे ही हाथी ने उन सैनिकों की ओर देखा। सैनिकों की लंबी कतारें वहाँ खड़ी देखकर उसके शरीर में एकदम से जान आ गई और वह एक छलांग में ही दलदल से बाहर निकल आया। 

सैनिकों और नगाड़े की आवाज़ ने हाथी को उसके बूढ़े और कमज़ोर होने तथा कीचड़ में फँसे होने की याद भुला दी। नगाड़े की ध्वनि ने उसके सोए हुए मनोबल को जगा दिया था। कभी ऐसा न हुआ था कि युद्ध के बाजे बजे हों और वह उन्हें सुनकर वहीं रुका रह गया हो। 

मनुष्य के अंदर मनोबल से बढ़ कर कोई शक्ति नहीं है।

MCQ /पद - रैदास ....बहुविकल्पीय प्रश्न ...Class 9


पद - रैदास 

बहु विकल्पीय प्रश्न 

1.कवि और उनके इष्ट देव के बीच किस तरह का संबंध  है ?

 (i) गुरु और शिष्य की तरह                 

 (ii) पानी और चंदन की तरह 

 (iii) दूध और पानी की तरह               

 (iv) पिता और पुत्र  की तरह

उत्तर- (ii) पानी और चंदन की तरह 

Wednesday, 12 May 2021

भूलने की बीमारी - लघुकथा



Top Best Famous Moral Stories In Hindi  
रीमा आजकल कुछ ज्यादा ही परेशान रहते थी। कारण था उसकी सासू माँ, जो एक हफ्ता पहले तो बिल्कुल भली चंगी थीं, अचानक से सब कुछ भूलने लगी थीं। 
एक  दिन नहा के आईं तो दोबारा नहाने जा रही थी।
खाना खाकर भूल जाती और फिर सबको बोलती कि मुझे अभी तक खाना नहीं दिया। 
सविता को घर के सभी कामों के साथ उनको अकेले संभालना मुश्किल हो रहा था तो पतिदेव से बोली कि माँ के लिए कोई केयरटेकर रख लो, जो उनके आसपास ही रहे।  

कविता को किसी ने मीरा के बारे में बताया कि उसको काम की जरूरत है।
 मीरा अगले दिन से ही काम पर आने लगी। उसकी दस साल की बेटी थी दिव्या जो उसके साथ ही आती थी क्योंकि कोविड की वजह से स्कूल बंद थे तो उसको घर पर अकेले नहीं छोड़ सकती थी। 

 मीरा ने आते ही सासू माँ को अच्छे से संभाल लिया। 
दिव्या अपनी माँ  को काम करते चुपचाप देखते रहती।
 शाम को काम के बाद जब दोनों माँ- बेटी अपनी खोली में वापस गईं तो दिव्या ने मीरा से पूछा, "मम्मी आंटी के घर में जो दादी अम्मा है उनको क्या हुआ है ? 
वह देखने में तो बीमार नहीं लगतीं। 
माँ बोली, "मीरा  उनको भूलने की बीमारी हो गई है जिसमें इंसान देखने में तो बिल्कुल ठीक लगता है लेकिन दिमागी तौर पर बातें भूलने लग जाता है। "

आगे से दिव्या बोली, "माँ क्या भगवान जी को भी भूलने की बीमारी है?" 

"मीरा,  क्यों बिटिया ऐसा क्यों बोल रही हो ?" 
दिव्या, "वह इसलिए माँ. भगवान जी ने हमें इस धरती पर भेज तो दिया लेकिन हमें घर तो देना भूल ही गए और कभी-कभी तो रोटी देना भी भूल ही जाते हैं!" 

सदा धैर्य से काम लें, कुसंस्कारों का त्याग -लघु कथाएँ

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1.सदा धैर्य से काम लें 
बहुत पुराने समय की एक घटना है कि एक बार एक नाव सवारी लेकर जाते समय नदी के बीच में डूब गई।  
इस घटना की शिकायत वहाँ के राजा से की गई ... राजा का दरबार लगा और  दरबार में नाविक की पेशी हुई। 
नाविक से राजा ने पूछा "नाव किस वज़ह से डूबी होगी ?
राजा ने फिर प्रश्न किया कि "क्या नाव में कोई छेद था?"
नाविक ने राजा के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा – नहीं महाराज,  बिल्कुल नहीं, 
 नाव तो बहुत दुरुस्त थी!
राजा फिर नाविक से प्रश्न किया कि " तुमने नाव में क्या सवारी अधिक बिठाई थी ?"
नाविक ने राजा को उत्तर दिया–महाराज, मैंने सवारी अधिक नहीं बिठाई थी। सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थी। इससे पहले न जाने कितनी बार मैंने क्षमता से अधिक सवारी बिठाकर भी नाव पार लगाई थी। 
राजा ने आश्चर्य से फिर नाविक से प्रश्न किया– उस समय तो आँधी-तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी ?
नाविक ने राजा को उत्तर दिया कि "महाराज! उस दिन मौसम भी बहुत सुहाना था और नदी भी बिल्कुल शान्त थी।"
राजा ने गंभीर होकर नाविक से फिर प्रश्न किया – कहीं तुमने उस दिन मदिरा पान तो नहीं किया था ?
नाविक ने राजा से कहा  – "आप चाहें तो उन सवारियों से पूछ सकते हैं जो मेरे साथ थे कि मैंने मदिरा पान बिलकुल नहीं किया था। यह सभी लोग  मेरे साथ उस समय तैरकर जीवित लौटे हैं।"
महाराज थोड़ा क्रोधित होते हुए बोले – "फिर, तुमसे चूक कहाँ हुई? कैसे नाव डूब गई और इतनी बड़ी दुर्घटना कैसे हुई?"
नाविक ने राजा से कहा– "महाराज!, नाव धीरे-धीरे, बिना हिलकोरे लिए नदी में बड़े आराम से आगे बढ़ रही थी। उसी समय नाव में बैठी एक सवारी ने नाव के अंदर ही थूक दिया।"
मैंने पतवार रोककर उस आदमी की इस हरकत का विरोध किया और उस व्यक्ति से पूछा कि भाई "तुमने ये क्या किया ? नाव के अंदर थूका क्यों ?" 
उसने मेरा मज़ाक उड़ाते हुए मुझसे कहा – "क्या मेरे थूकने से ये नाव डूब जायेगी?"
मैंने उस आदमी से कहा – "नाव डूबने की बात नहीं है पर तुमने जो ये हरकत की है इससे हमें घृणा आ रही है। तुम एक बताओगे कि, तुमको जो नाव अपने ऊपर बिठाकर नदी के उस पार ले जा रही है तुम उसमें कैसे थूक सकते हो ?
राजा ने गंभीरता से नाविक से पूछा– फिर आगे बताओ ?
नाविक ने राजा से– महाराज! मेरी यह बात सुनकर वह क्रोधित हो गया और बोलने  लगा कि बदले में पैसा देते हैं हम नदी पार करवाने लिए। तुम और तुम्हारी नाव कोई एहसान नहीं कर रहे हम पर । 
राजा बड़ी हैरानी से पूछा – पैसे देने का क्या अर्थ होता है, यदि पैसे दिए हैं तो क्या नाव में थूकने का हक मिल गया ? अच्छा, आगे कहो। फिर क्या हुआ ज़रा आगे बताओ ?
नाविक बोला – महाराज,  वो इस बात पर मुझसे झगड़ा करने लगा। 
राजा ने नाविक की बात सुनकर कहा कि "नाव में बैठे बाकि लोग उस समय क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उस आदमी की बात का विरोध नहीं किया?
नाविक ने राजा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, " हाँ महाराज!  नाव में बैठे बहुत से लोगों ने मेरे साथ उस व्यक्ति का  विरोध किया। 
राजा ने नाविक से पूछा– फिर तो शायद उस आदमी की हिम्मत टूटी होगी। उसे अब तो अपने द्वारा किए गलत काम का कुछ एहसास हुआ होगा?
नाविक राजा की बात सुनकर बोला– महाराज! ऐसा बिलकुल नहीं हुआ । नाव में बैठे कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस आदमी के साथ उसके पक्ष में खड़े हो गए... नाव के अंदर ही दो खेमे बँट गए।  
और सभी यात्री आपस में नदी के बीचोंबीच झगड़ पड़े।
राजा बोले – चलती नाव में ही लोगों ने मारपीट शुरू कर दी , क्या तुमने उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया ? उन्हें समझाया  नहीं?
नाविक राजा से बोला– बहुत रोका महाराज, मैंने हाथ जोड़कर उनसे विनती भी की।
मैंने उन लोगों से कहा भी कि "नाव इस वक्त नदी के बीच नाजुक हालत में है।"
 नाव में इस समय थोड़ी सी भी हलचल हम सबकी जान का खतरा बन जायेगी लेकिन वे सब नहीं माने, उलटा सब एक-दूसरे पर टूट पड़े।  नाव जब बीच मझधार में पहुँची तो उसनेअपना संतुलन खो दिया। महाराज!...
कहानी का सार 
 जीवन में हमेशा धैर्य का बनाये रखें ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी लोग न मारे जाएँ। सयंम से काम लेना ही समझदारी है।


2.कुसंस्कारों का त्याग 
 एक समय रामदास स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हो गए और उन्होंने ज़ोर से आवाज लगाई , "जय रघुवीर जी।" 
महिला घर से बाहर निकली और उसने रामदास स्वामी जी की झोली में भिक्षा डाली। 
भिक्षा देने के पश्चात स्त्री बोली, "महात्मा जी कोई उपदेश दीजिए मुझे। " 
स्वामी जी उस स्त्री से बोले, "आज नहीं उपदेश कल दूँगा" 
 स्वामी जी ने अगले दिन फिर उस घर के सामने आकर भिक्षा माँगने के लिए आवाज लगाई- "जय रघुवीर जी।"
 उस स्त्री ने उस दिन अपने घर में खीर बनाई थी, उसने उस खीर में बहुत से मेवे भी डाले थे। 
जैसे ही उसने स्वामी जी की आवाज़  सुनी तो वह खीर का कटोरा लेकर स्वामी जी को देने के लिए बाहर आ गई । 
स्वामी जी ने अपना कमंडल उस स्त्री के आगे बढ़ा दिया। जैसे ही स्त्री खीर कमंडल में डालने लगी, तो उसकी नज़र कमंडल के अंदर पड़ी। 
उसने देखा कि कमंडल के अंदर तो गोबर और कूड़ा भरा हुआ था। अंदर से तो वह बहुत गंदा हो रखा था। 
उसने  स्वामी जी से कहा, "महाराज! कमंडल तो बहुत गंदा हो रखा है । 
 स्वामी जी बोले, "गंदा तो है परंतु तुम खीर इसमें ही डाल दो। स्त्री स्वामी से बोली, "नहीं महाराज, अगर खीर इसमें डाल दी तो वह खराब हो जाएगी। आप कमंडल मुझे दीजिए। मैं इस कमंडल को धोकर इसे शुद्ध करके ले लाती हूँ।"
 स्वामी जी उस स्त्री की बात सुनकर बोले, "इसका मतलब यह है कि जब यह कमंडल साफ हो जाएगा, तभी तुम इसमें खीर डालोगी ?"
  स्त्री ने स्वामी जी को कहा, "जी महाराज! बिलकुल जैसे ही कमंडल साफ़ हो जाएगा तब मैं इसमें खीर डाल दूँगी।"
स्वामी जी उससे बोले, "मैं भी तुम्हें यही उपदेश देना चाहता हूँ कि जब तक मन में  चिंताओं,बुरे विचारों का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्कारों का गोबर भरा है तब तक किसी उपदेश को सुनने का कोई लाभ नहीं । 
अगर सच में उपदेशामृत पान करना चाहते हो तो सबसे पहले अपने मन को शुद्ध करना बहुत जरूरी है, कुसंस्कारों का त्याग करना होगा, तभी मन को सच्चे सुख और आनंद की प्राप्ति होगी।"

सच्चा मित्र,धन और मित्रता, - लघुकथा

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1.सच्चा मित्र
एक लड़के था उसके बहुत-से मित्र थे और उसे इस बात का बहुत अभिमान था। ज़्यादा संख्या में मित्र होने के कारण उसे मित्रों का घमंड हो गया। उस लड़के के  पिता का केवल एक ही मित्र था लेकिन था सच्चा।
एक बार पिता अपने पुत्र से बोले कि, "बेटा तुम्हारे तो बहुत सारे मित्र है न। चलो आज रात तुम्हारे सभी मित्रों  में से तुम्हारे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते हैं।
बेटा सहर्ष तैयार हो गया।
पिता पुत्र के साथ उसके सबसे खास मित्र के घर रात को एक बजे पहुँचे।
पुत्र ने अपने मित्र के दरवाजे पर दस्तक दी, पर उसने दरवाजा नहीं खोला।
पुत्र ने फिर भी बार-बार दरवाजा खटखटाया परंतु इतना खटखटाने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला। लेकिन उन्हें सुनाई दिया कि अंदर से बेटे का दोस्त अपनी माताजी को कह रहा था...तुम कह दो माँ कि मैं घर पर नहीं हूँ।
अपने सबसे खास मित्र के ये शब्द सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ।  वह उदास होकर  निराश मन से पिता के साथ वापस अपने घर लौट आया ।
कुछ दिनों बाद पिता ने अपने पुत्र से कहा चलो, आज मैं तुम्हें अपने दोस्त मिलवाने ले चलता हूँ।
पिता के साथ पुत्र पिता के उस मित्र के घर पहुँच गए और वहाँ पहुँचते ही पिता ने बाहर से ही अपने मित्र को आवाज़ लगाई।
मित्र ने अंदर से दिया कि थोड़ा ठहरो मित्र, बस दो मिनट में आकर दरवाजा खोलता हूँ।
दरवाजा खुला और जैसे ही मित्र बाहर आया तो दोनों उसे देखकर हैरान रह गए। उन्होंने देखा पिता के उस मित्र के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में रुपए की पोटली है । 
यह देखकर पिता अपने मित्र से पूछते हैं कि, यह क्या है मित्र?
मित्र बोला.... इतनी रात को अगर मेरा मित्र ने मेरे दरवाजे पर आकर उसे खटखटाया है तो इसका मतलब है कि वह किसी-न-किसी मुसीबत में ज़रूर होगा।
देखो मित्र मुसीबत के दो रूप होते है एक रूप तो रुपये पैसे की जरूरत और दूसरा  किसी से झगड़ा या विवाद ।
मित्र यदि रुपये की आवश्यकता हो तुम्हें तो ये रुपये की पोटली अपने साथ ले जाओ। यदि झगड़ा हो गया है किसी से तब तो मैं ये तलवार लेकर तुम्हारे साथ वहाँ चलता हूँ।
अपने  मित्र की बात सुनकर और उसके दिल में अपने लिए प्रेम देखकर पिता की आँखे भर आई और अपने मित्र से उन्होंने कहा कि "मित्र मुझे किसी भी चीज की कोई जरूरत नहीं।  
मैं तो केवल अपने पुत्र को सच्चे मित्र और  मित्रता के बारे में समझा रहा था।"
हमेशा सोच-समझकर मित्र चुनो। ऐसे मित्र न चुनो जो खुदगर्ज़ हो, मतलबी हो और आपके काम पड़ने पर बहाने बनाने लगे। मित्र एक ही  पर सच्चा हो। अतः मित्र, एक चुनें लेकिन नेक चुनें।

2.धन और मित्रता 
विख्यात उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने जीवन में वह सब कुछ हासिल किया, जिसकी हर व्यक्ति, हर इंसान को तमन्ना रहती है। 
हेनरी फोर्ड अपनी  जिंदगी में जब एक उच्च शिखर पर पहुँच गए थे । 
 एक इंटरव्यू में उनसे एक रिपोर्टर ने यह पूछा, "सर! आपने अपने जीवन में बहुत सारी धन-संपत्ति, दौलत आदि के साथ-साथ यश और कीर्ति भी कमाई है। 
आपने तो बहुत से महान कार्यों का संपादन भी किया है। आपको क्या जीवन में अब  भी किसी चीज़ की कमी का आभास होता है।"
जैसे किसी ने हेनरी फोर्ड की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। 
हेनरी फोर्ड ने तपाक से पत्रकार को कहा, "यह ठीक है कि मैंने पर्याप्त धन-संपदा और प्रतिष्ठा कमाई है किंतु मेरी जिंदगी में सच्चे मित्र की रिक्तता मुझे सताती रहती है। 
अगर मुझे मौका मिले फिर से जीवन शुरू करने का तो मैं तलाश करूँगा सच्चे मित्रों की। 
"यदि ऐसा करने का आप सोचते हैं तो मित्र तो बहुत से मिल सकते हैं,आपको जीवन में परंतु तब भी सच्चा मित्र नहीं मिलेगा आपको ।"  हेनरी फोर्ड को पत्रकार दो-टूक शब्दों में जवाब दिया। 
"वह क्यों?" हेनरी फोर्ड ने प्रश्न किया।  
पत्रकार ने हेनरी फोर्ड से कहा, " आप अपने धन के बल पर अपने लिए मित्रों की तलाश करना चाहते हैं। परंतु धन से कभी भी सच्चे मित्र नहीं मिल सकते। 
उसके लिए आपको अहंकार को त्यागना पड़ता है, स्वयं को मिटाना सीखना पड़ता है। इस संसार की हर चीज़ धन से खरीदी जा सकती है परंतु आपका भला चाहने वाला सच्चा हितैषी व सच्चा मित्र आसानी से नहीं मिल सकता है । 
"आप बिलकुल सही कह रहे हैं।" हेनरी फोर्ड ने उससे कहा।  
"मैं कुछ नहीं लौटा पाया अपने उन मित्रों को इतना धन कमाने के बाद भी जिन मित्रों ने मेरी मदद की। मैंने अपने जिन मित्रों से बचपन में हर तरह की सहायता और सहानुभूति पाई उनके लिए मैंने कुछ भी नहीं किया । 
मेरे और मेरे मित्रों के बीच इस धन और वैभव ने तो जैसे दीवार खड़ी कर दी है। अब जीवन के इस पड़ाव में मेरे पास तो ऐसा कोई मित्र नहीं है जिससे मैं अपने मन के विचार, अपने मन का दर्द, अपनी समस्याएँ पर खुलकर बात सकूँ। 
मैं तो अत्यंत अभागा हूँ सच में। मेरे पास सब कुछ है- धन, दौलत, शौहरत लेकिन सच्चा मित्र नहीं है मेरे पास।"

Tuesday, 11 May 2021

डमरू,एक घंटे की कीमत,कंजूस- लघु कथाएँ

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1.डमरू

एक समय की बात है। देवताओं के राजा इंद्र ने सभी कृषकों से किसी कारणवश नाराज हो गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वे अब बारह साल तक बारिश नहीं करेंगे। इंद्र ने यह बात  किसानों से कही कि - "अब से बारह वर्षों तक आप अपने खेतों से फसल प्राप्त नहीं कर पाएँगे।"
यह सुनकर सभी किसान चिंतित होकर एक साथ इंद्रदेव से प्रार्थना करने लगे कि वे वर्षा करवाएँ । 
इंद्र ने किसानों से कहा -" अब मैं कुछ नहीं कर सकता पर भगवान शिव यदि  अपना डमरू एक बार बजा देंगे तो वर्षा अवश्य हो सकती है।" 
एक तरफ इंद्र ने किसानों को इसका समाधान तो बता दिया पर दूसरी तरफ  उन्होंने भगवान शिव से मिलकर उनसे यह आग्रह भी किया कि आप किसी भी सूरत में  किसानों की बात से मत मानना ।
सभी किसान मिलकर भगवान शंकर के पास पहुँच गए और उनसे विनती करने लगे परंतु भगवान शिव ने उन्हें कह दिया कि -"अभी नहीं बजेगा डमरू अब तो यह बारह वर्षों बाद ही बजेगा।"
यह सुनकर सभी किसान निराश हो गए उन्होंने सोचा अब खेती करने का कोई लाभ नहीं क्योंकि वर्षा तो होगी नहीं। 
अतः उन किसानों ने यह निर्णय किया कि वे  बारह वर्षों तक खेती नहीं करेंगे। 
उनमें  एक ऐसा  किसान भी था यह सब होने बाद भी खेत में अपना काम करना बंद नहीं किया। 
वह प्रतिदिन खेत में जाता और अपने खेतों की जुताई, निंदाई, गुड़ाई करता और बीज भी बोता। वह सारे का काम पहले की तरह वैसे ही करता रहा।
 उसे खेतों में काम करता देख गाँव के सारे किसान उसका मज़ाक उड़ाने लगे। 
कुछ साल बीतने के बाद गाँव के सभी किसान इस मेहनती किसान से पूछने लगे कि "जब तुम्हें पता है कि बारह साल तक वर्षा नहीं होगी तो अपना समय और ऊर्जा क्यों मेहनत करके व्यर्थ कर रहे हो?" 
परिश्रमी किसान ने उनसे कहा - मैं, भी सब जानता हूँ कि हमारे यहाँ बारह साल  फसल नहीं उगने वाली लेकिन ये काम मैं अपने अभ्यास के लिए कर रहा हूँ।
क्योंकि बारह वर्षों तक अगर कुछ खेती का काम न किया तो शायद मैं,खेती किसानी का काम करना ही भूल जाऊँगा।
मेरे शरीर को काम करने की आदत  नहीं रहेगी और मेरी भी श्रम करने की आदत बिलकुल  छूट जाएगी। 
मैं यह खेती का सारा काम नियमित रूप से रोज़ करता हूँ ताकि जब बारह वर्षों  बाद अगर वर्षा हुई तो समय मुझे अपना यह काम करने में कोई मुश्किल नहीं होगी। 
किसानों की यह तार्किक चर्चा माता पार्वती भी बड़े ध्यान से सुन रही थीं । उन सब की बातें सुनने के बाद माता पार्वती भगवान शिव के पास गई और उनसे बड़े सहज भाव से बोली - 'हे प्रभु! ऐसा न हो कि कहीं आप भी बारह सालों के बाद डमरू बजाना ही भूल जाएँ।"
 यह बात सुन कर भगवान शिव भी चिंतित हो उठे। अब उन्हें यही चिंता सताने लगी और इसी चिंता में डूबे हुए भगवान शिव ने डमरू उठा लिया  और उसे जाँचने के लिए कि वह अभी भी बजता है या नहीं। उन्होंने उसे बजाने का प्रयास किया।
 उनके डमरू बजाने के प्रयास से शिव का डमरू बजना शुरू हो गया और उसके बजते ही वर्षा शुरू हो गई.... वह किसान जो समय से अपने खेत में नियमित रूप प्रतिदिन काम कर रहा था उसके खेत में वर्षा के कारण भरपूर फसल हुई और बाकी किसान जो समु के भरोसे बैठे थे, वे केवल पश्याताप ही करते रह गए।


2.एक घंटे की कीमत
 एक बार एक व्यक्तिऑफिस में काम करने के बाद थका हुआ अपने घर पहुँचा। जैसे ही उसने घर में कदम रखा उसने देखा कि उसका 8 साल का बेटा उसका इंतजार कर रहा था। 
पापा को देखते ही बेटे ने पूछा, "पापा!  क्या आप एक बात बताओगे ?"?"
पापा ने कहा, "हाँ, पूछो ।" 
पापा के हाँ बोलने पर बेटा उनसे कहता है, "पापा आप एक घंटे में कितना पैसा कमाते हो?"
यह सुनते ही वह व्यक्ति गुस्सा हो गया और बेटे को डाँटने लगा। 
बेटे ने कहा कि वह बस जानना चाहता है। इस पर व्यक्ति ने कहा कि करीब सौ  रुपए। 
यह सुनकर बेटे ने फिर सवाल किया कि क्या आप मुझे पचास रुपए दे सकते हैं ?
इस पर उस व्यक्ति का गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया और उसने अपने बेटे को डाँटते  हुए कमरे से चले जाने को कहा। 
बेटा रोता हुआ कमरे से चला  गया। 
जब उस व्यक्ति का थोड़ी देर में गुस्सा शांत हुआ तब वह अपने बेटे के पास गया और उसे 50 रुपए देते हुए उससे अपने गुस्से के लिए माफी माँगी। 
बेटा बहुत खुश हुआ और उसने तुरंत अपनी गुल्लक से पैसे निकाल कर उन्हें गिनना शुरू किया। 
 उस व्यक्ति को बेटे के पास इतने पैसे देखकर हैरानी हुई और उसने बेटे से पूछा कि तुम्हारे पास जब इतने पैसे थे फिर तुमने मुझसे पैसे क्यों माँगे, बताओ ?
 आखिर तुम खरीदना क्या चाहते हो ?
बेटा कहता है कि पापा मेरे पास बहुत कम पैसे थे। 
आप सारे पैसे ले लीजिए और कल अपना एक घंटा मुझे दे दीजिए। 
मैं आपके साथ रहने चाहता हूँ आपके साथ बैठकर खाना खाना चाहता हूँ। 


 सार:  काम में इतने व्यस्त न हो जाएँ कि परिवार को आपका समय खरीदना पड़े।


3.कंजूस
एक व्यापारी था। उसका व्यापार बहुतअच्छा था। पैसों की कोई कमी नहीं थी।  उसकी कोई औलाद नहीं थी लेकिन कंजूस बहुत था। 
पत्नी को भी घर चलने के लिए पूरा खर्चा नहीं देता था। पत्नी अगर उसे  तो वह पत्नी से कहता कि "तुम्हें पता है धन की समाज में पूजा होती है। लोग मुझे लाला कहकर पुकारते हैं। मेरी समाज में बहुत इज्ज़त है।"
पत्नी भी उसे बहुत समझाती, कि "कुछ दान-पुण्य भी कर दिया करो। हमारी कोई औलाद भी नहीं है। परमात्मा शायद हमें औलाद दे दे। हम इतने धन का क्या करेंगे ?"
व्यापारी लाला कहता कि औलाद तो पैसा बर्बाद कर देती है।  मैंने अपने कई साथियों को उजड़ते देखा है। 
कई लोग मेरे पास आकर बच्चों की बुराई करते हैं, मैंने उनसे सीख ले ली है।  तू भी यह सीख ले और अच्छी तरह से इस बात को समझ ले। 
 यह सब बातें सुनकर वह चुप रह जाती। इस तरह जब तक पत्नी जिंदा रही, जिंदगी अच्छी चलती रही। 
समय बीतने के साथ अब पत्नी बीमार रहने लग गई। सेठ इलाज के लिए उसे न तो पूरी दवाइयाँ लाता और न ही उसे डॉक्टर की फीस देता। पत्नी का देहांत हो गया। 
अब लाला अकेला रह गया। लोग रिश्तेदार लाला को ताने कसने लगे। 
उसकी सेवा करने वाला कोई नहीं रहा। व्यापार भी ठप्प होना शुरू हो गया। 
वह बस पैसों को ही देखता ही रह गया। जब उसके जीवन का अंतिम समय आया तो उसने पैसों की तरफ से मुँह फेर लिया। 
लोग हैरान थे कि इतना कंजूस लाला पैसों की तरफ से क्यों मुँह मोड़ रहा है ?
लाला उनसे कहता, "मैं अकेला इतनी धन-दौलत का क्या करूँगा ? मेरा जीवन अर्थहीन है। व्यर्थ जा रहा है।"
उसकी आँखों में आँसू थे। उसकी मृत्यु हो गई। जीवन के अंत में जब कंजूस लाला को पैसे की उपयोगिता समझ आई, तब तक देर बहुत हो चुकी थी। 


लघु कथाएँ- '10 मिनट का धैर्य, चित्रकार

Top Best Famous Moral Stories In Hindi  
1.धैर्य 
टीचर ने अपनी कक्षा के सभी दस बच्चों को एक बहुत ही अच्छी और खूबसूरत टॉफ़ी दी। 
टॉफ़ी देने के बाद टीचर ने बच्चों से कहा , "बच्चो ! आप सब को इस टॉफी को अभी नहीं खाना है। दस मिनट तक आप अपनी टॉफी नहीं खाओगे। 
यह बात कहकर वो टीचर  क्लास रूम से बाहर चला गया ।"
कुछ समय के लिए पूरी कक्षा में पूरा सन्नाटा छा गया, सभी बच्चे अपने सामने पड़ी उस टॉफ़ी को देख रहे थे और जैसे-जैसे पल गुज़रते जा रहे थे, उन बच्चों को खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था। 
दस मिनट बीतने के बाद टीचर वापस अपनी क्लास रूम में आ गए और उन्होंने समीक्षा की। 
पूरी कक्षा में केवल सात बच्चे थे, जिन्होंने अपनी टॉफी को उठाया नहीं था। उन बच्चों की टाफियाँ वैसी की वैसी वहीं पड़ी थीं। 
मगर कक्षा के बाकी सभी बच्चे अपनी-अपनी टॉफ़ी को खाने के बाद उसके स्वाद व रंग के बारे में अपनी राय दे रहे थे।   
 टीचर ने कक्षा में आकर देखा कि सात बच्चों ने अपनी टॉफी को छुआ भी नहीं है।   उन्होंने अपनी डायरी निकलकर उन सात बच्चों के नाम अपनी डायरी में लिख लिए  और नाम लिखने के बाद उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया ।

कुछ वर्षों के बाद प्रोफेसर ने अपनी वही डायरी खोली जिसमें उन्होंने उन बच्चों के नाम लिखे थे। उन्होंने उन  सात बच्चों के नाम निकाल कर उनके बारे में खोज करना शुरू कर दिया । 
काफ़ी समय और मेहनत के बाद,  प्रोफेसर को पता चला कि उन सात बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपनी-अपनी फील्ड में सबसे वे सब बहुत सफल हैं। 
यह शिक्षक थे - 'प्रोफेसर वाल्टर मशाल'।
प्रोफेसर वाल्टर ने अपनी बाकी कक्षा के छात्रों की भी समीक्षा की और उन्हें यह पता चला कि उनमें से अधिकतर एक आम व साधारण जीवन जी रहे थे, परंतु उसी श्रेणी में कुछ  ऐसे भी लोग थे जो बहुत ही कठिन सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का सामना कर रहे थे। 

इस  शोध का परिणाम प्रोफेसर ने जो निकाला, वह यह था।

अपने अंदर केवल दस मिनट का तक का धैर्य जो व्यक्ति नहीं रख पाता, जीवन में वह कुछ नहीं कर पाता और न ही जीवन में कभी आगे बढ़ पाता है । वह जीवन में केवल असफलता का सामना करते है और सफल नहीं हो पाते।”


उस टीचर के इस शोध को पूरी दुनिया में बहुत शोहरत मिली और इस शोध का  नाम "मार्श मेलो थ्योरी" रखा गया  क्योंकि प्रोफेसर वाल्टर ने बच्चों को जो टॉफ़ी दी थी उस टॉफी का नाम "मार्श मेलो" ही था। यह टॉफी फोम की तरह बहुत ही नरम थी।

इस थ्योरी यह बताती है कि दुनिया के सबसे सफल लोगों में बहुत सारे गुणों के साथ एक प्रमुख गुण 'धैर्य' भी पाया जाता है, क्योंकि यह वह ख़ूबी है जो इंसान को  बर्दाश्त की ताक़त देती है। 
यही ख़ूबी उस ताकत को और भी बढ़ाती है,जिसकी बदौलत एक आदमी अपनी कठिन परिस्थितियों में निराश नहीं होता और इन्हीं खूबियों से वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता है।

धैर्य कठिन परिस्थितियों में वह स्थिति है जो एक व्यक्ति की सहनशीलता की अवस्था है जो उस व्यक्ति के उस व्यक्ति के व्यवहार को क्रोध और खीझ जैसी नकारात्मकता से बचाती है। 
लंबे समय तक समस्याओं से घिरे होने के कारण व्यक्ति जो दबाव या तनाव अनुभव करने लगता है उससे उसमें सहनशीलता का गुण विकसित होता है। धैर्य का एक उदाहरण है समस्याओं को आसानी से सहन कर पाने की क्षमता।  
यही मनुष्य की सबसे बड़ी चरित्रदृढ़ता का परिचय भी है।

व्यक्ति को धैर्य के बिना धन की प्राप्ति नहीं होती, उसे वीरता के बिना विजय की प्राप्ति नहीं होती, उसे ज्ञान के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और साथ ही उसे दान के बिना यश भी प्राप्त नहीं होता है।

2. महान चित्रकार  
 चित्रकला ही उसकी पहचान थी और चित्रकारी मुहाल का शौक था। वह जब बहुत छोटा था तभी से चित्रकारी कर रहा था। 
चित्रकारी करना मेरा शौक है, यह मैं कोई सम्मान पाने की इच्छा नहीं करता हूँ -मुहाल का यह कहना था। उसने जीवनभर कहीं कोई ओर कार्य भी नहीं किया। कहीं किसी के पास नौकरी भी नहीं की। वह ताउम्र चित्रकार ही रहा और चित्रकारी ही करता रहा। 
अनेक प्रकृति चित्रों, फूलों में , विभिन्न व्यक्तित्व के चित्रों में वह अपनी चित्रकारी से अजीब व खूबसूरत सौंदर्य भर देता था।
उसने कभी लालच नहीं किया और जीवनभर दरिद्रता के साये में ख़ामोशी से जीवन जीता रहा। 
चित्रकारी के माध्यम से वह बिना किसी स्वार्थ के चित्रकला की सेवा करता रहा। उसका यही प्रयास और कोशिश रहती कि वह छोटे-छोटे बच्चों में चित्रकारी के माध्यम से प्रेम-भाव जगाए। 
उसके प्रयास से कई बच्चों ने चित्रकला में नाम भी कमाया। 
मुहाल कहता था कि निःस्वार्थ भाव की कला है चित्रकारी । चित्रकारी एक बाजारी वस्तु नहीं है न ही इसका प्रयोग धन या सम्मान पाने के लिए करना चाहिए। चित्रकारी एक आभूषण है। यह हृदय की गहराई का संगीत है। "
जीवन की अंतिम क्षणों तक यही उसका लक्ष्य रहा। 
उसके दोस्तों ने उसकी चित्रकला का बहुत लाभ उठाने का प्रयास किया और  कई प्रशंसा पत्र चित्रकला में प्राप्त भी किए। 
 वह हँस कर कहता कि छोटी-छोटी चित्रकारी के लिए आज सम्मान पाने की प्रतियोगिता लगी हुई है। 
कोई भी क्षेत्र हो चाहे साहित्य क्षेत्र हो अथवा चित्रकला , लोग सम्मान पाते हैं और दिखावे के लिए उसे वापस भी करते हैं।
उसकी मृत्यु अचानक हृदय गतिरोध से हो गई। पूरे जीवनकाल में किसी ने उसे  पूछा तक नहीं कि वह एक कलाकार है।परंतु मृत्यु के बाद अब उसे देश का महान चित्रकार कहा जाने लगा। 
अपना सारा जीवन चित्रकारी में लगा दिया। वह सही अर्थों में एक सच्चा कलाकार था। उसको जीवनकल में जीवित रहते हुए कभी कोई सम्मान नहीं मिला परंतु मृत्यु के बाद 'महान चित्रकार' की  उपाधि से उसे सम्मानित किया गया।