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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Saturday, 7 June 2025

Important points Class 10 बड़े भाई साहब मुख्य बिंदु


समूची शिक्षा के तौर-तरीकों पर व्यंग्य किया गया है :
 (i) अंग्रेजी पढ़ना लिखना या बोलना आए या न आए, लेकिन उस पर अत्यधिक बल दिया जाता है। 
(ii) अपने देश के इतिहास के अतिरिक्त दूसरे देशों के इतिहास को जानकारी व्यर्थ में करवाना।
 (iii) रटत शिक्षा प्रणाली पर बल दिया जाता है। बच्चा समझे या न समझे, लेकिन उसे विषय को रहना ही पड़ता है। इस प्रकार विषय के प्रति रुचि समाप्त हो जाती है। (iv) अलजबरा व ज्योमेट्री ऐसे विषय है कि निरंतर अभ्यास करने पर भी गलत हो जाते हैं। 
(v) छोटे-छोटे विषयों पर लंबे-चौड़े निबंध लिखवाना जो बच्चों की रुचि के विपरीत होती है। अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसी शिक्षा प्रणाली का कोई लाभ नहीं जो बच्चों के लिए लाभदायक न होकर बोझ की तरह हो। 

बड़े भाई द्वारा छोटे भाई पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनाई गई युक्तियाँ-
 (i) वह हमेशा छोटे भाई के खेलकूद और उसकी स्वच्छंदता पर नियंत्रण रखता है। 
(ii) वह भाई द्वारा न पढ़ने और खेलने में मन लगाने पर लंबे-लंबे भाषण देता है। उसे भयभीत करने का हर संभव प्रयास भी करता है; जैसे कठिन पढ़ाई, अपने फेल होने की बात, खेलकूद से दूर रहना आदि।
(iii) लेखक द्वारा मनमानी करने पर उसे घमंड न करने की सीख देता है। ऐतिहासिक उदाहरणों द्वारा, जैसे- रावण, शैतान, शाहेरुम जैसे बड़े-बड़े अभिमानियों की फजीहत के उदाहरण देता है।
(iv) वह आचरण की महिमा को महत्त्वपूर्ण बताकर लेखक को अपमानित करता है। 
(v) वह इतिहास, अलजबरा, निबंध लेखन की शिक्षा को व्यर्थ बताता है। 
(vi) वह किताबी शिक्षा की बजाय जीवन के अनुभव को अधिक काम की चीज बताता है। 

बड़े भाई साहब का चारित्रिक (चरित्र-चित्रण) विशेषताएँ : (i) अध्ययनशील व गंभीर प्रवृत्ति- बड़े भाई साहब स्वभाव से ही अध्ययनशील थे। वे हरदम किताबें खोले बैठे रहते थे। उनमें रटने की प्रवृत्ति थी। वे गंभीर प्रवृत्ति के हैं। वे अपने छोटे भाई के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। उनका गंभीर स्वभाव हो उन्हें विशष्टता प्रदान करता है। 
(ii) घोर परिश्रमी - भाई साहब भले ही पढ़ाई को ठीक प्रकार से नहीं समझ पाते थे लेकिन उन्होंने परिश्रम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये एक ही कक्षा में तीन-तीन बार फेल होकर भी लगन से पढ़ते रहे। वे दिन-रात पढ़ते थे। उनकी तपस्या बड़े-बड़े तपस्वियों को भी मात करती है। 
(iii) वाक्पटु-बड़े भाई साहब वाक् कला में निपुण हैं। वे अपने छोटे भाई से ऐसे-ऐसे उदाहरण देकर बातें करते हैं कि वह उनके सामने नतमस्तक हो जाता है। उन्हें शब्दों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करना आता है। यही कारण है कि वे अपने छोटे भाई पर अपना पूरा दबदबा बनाए रखते हैं। (iv) संयमी व कर्तव्यपरायण - बड़े भाई साहब अत्यंत संयमी व कर्तव्यपरायण थे। उनका मन भी खेलने व पतंग उड़ाने का करता था; परंतु सोचते थे कि यदि व यह सब करेंगे तो अपने छोटे भाई को क्या सँभालेंगे। वे अपने कर्तव्य को भी बखूबी निभाते थे। जब उन्होंने देखा कि छोटे भाई को अपने अव्वल आने पर अभिमान हो गया है तो समय रहते उसे ऐसे आड़े हाथों लिया कि छोटे भाई का सिर श्रद्धा से झुक गया। 
(v) उपदेश देने की कला में निपुण - बड़े भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे। छोटे भाई को समझाने के लिए ऐसे-ऐसे सूक्ति- बाण चलाते थे कि उसका दिल पढ़ाई से उचाट हो जाता। 

अपने माता-पिता का उदाहरण : 
अपने माता-पिता का उदाहरण द्वारा छोटे भाई को समझाना कि जीवन में अनुभव पुस्तकीय ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण है। जीवन की समझ अनुभवों से आती है। हमारे बड़ों को हमसे अधिक जीवन की समय है। हम जिन परिस्थितियों में घबरा जाते हैं, बड़े-बुजुर्ग उन्हीं परिस्थितियों में समस्या का हल निकाल लेते हैं। उनके माता-पिता ने भले ही उनके जितनी किताबें न पड़ी हों, हाँ, लेकिन अपने अनुभव के आधार पर उन्हें दुनियादारी की असंख्य बातें पता है। 

बड़े भाई साहब की अंग्रेजी के बारे में नसीहत : 
अंग्रेजी पढ़ना कोई हँसी-खेल नहीं है। उसे पढ़ने के लिए रात-दिन आँखें फोड़नी पड़ती है और खून जाताना पड़ता है। ऐरागैराखेरा अग्रेजी नहीं पढ़ सकता। बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध नहीं लिख पाते बोलना तो दूर अंग्रेजी पढ़ने-समझने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। वे अपना उदाहरण भी देते थे कि उन्हें कितनी कठिनाई होती है अंग्रेज़ी पढ़ने में। 


बड़े भाई साहब पाठ से प्रेरणा : 
हमें अपनी स्थिति, शक्ति को समझना चाहिए उसी के अनुसार करना चाहिए। जो कार्य हम स्वयं नहीं करते, उसकी दूसरों से उम्मीद करना व्यर्थ है यदि हम खुद योग्य नहीं है, सफल नहीं है, तो हम किसी को उपदेश देने का अधिकार खो बैठते हैं। हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि परीक्षा के तनाव में सारा समय किताबों को पढ़ते रहने की अपेक्षा पढ़ाई सहज रूप से करें। पढ़ाई की रटने की बजाय उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। अपनी समझ को विकसित करें क्योंकि खेल-कूद पढ़ाई में बाधक नहीं बल्कि सहायक होता है। 

बड़े भाई साहब द्वारा छोटे भाई की सफलता को बेकार सिद्ध करने के लिए दिए गए तर्क :
 बड़े भाई साहब छोटे भाई की सफलता को बेकार सिद्ध करने के लिए पहला तर्क यह देते हैं कि केवल किताबी ज्ञान व्यर्थ होता है। असली चीज़ है- बुद्धि का विकास। उनका दूसरा तर्क यह है कि सच्ची सफलता परिश्रम करने से ही प्राप्त होती है। लेखक की सफलता आकस्मिक है। एक बार संयोग से वह प्रथम आ गया है, किंतु हर बार ऐसा नहीं होगा। अन्य तर्क यह है कि जीवन में किताबों का नहीं अनुभव का महत्त्व होता है। उस मामले में यह अभी बहुत छोटा है। 

बड़े भाई साहब के अध्ययनशील स्वभाव पर व्यंग्य :
 इस टिप्पणी में गहरा व्यंग्य है। बड़े भाई साहब स्वभाव से बहुत अध्ययनशील जान पड़ते हैं। जब भी देखो वे हमेशा पढ़ने में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि वे पढ़-पढ़कर अपना चेहरा कांतिहीन कर लेते हैं किंतु उनका अध्ययन एक नाटक था। वे समझते तो, कुछ नहीं थे। जब वे रटते-रटते बोर हो जाते थे, तब किताबों और कॉपियों के हाशियों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगते थे । 

बड़े भाई साहब का पतंग पकड़कर भागना:
  बड़े भाई साहब का पतंग पकड़कर भागना यह सिद्ध करता है कि उनके अंदर भी एक बच्चा छिपा हुआ है। उनमें भी खेलकूद और मौज-मस्ती करने की उमंग पैदा होती है। लेकिन उन्होंने उसे दबा रखा है। यदि वे पुस्तकों के बोझ को छाती से हटा लें, तो वे भी उल्लास और उत्साह से भरी जिंदगी जी सकते हैं। 

'अहंकार मनुष्य का विनाश करता है।’ - बड़े भाई के उदाहरण : 
अहंकार मनुष्य का विनाश कर देता है। अहंकार के कारण 'रावण' का भी नाश हो गया था। रावण भूमंडल का स्वामी था। वह एक चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी राजा उसके अधीन थे। वह अंग्रेज़ों से भी अधिक बलशाली व महान था, परंतु अहंकारी होने के कारण उसका विनाश हो गया। यहाँ तक कि 'आग' और 'पानी' के देवता भी रावण के दास थे, परंतु घमंड ने रावण का नामों-निशान तक मिटा दिया। रावण को मरते समय कोई उसे एक चुल्लू पानी देने वाला भी नहीं बचा। अभिमानी आदमी दीन-दुनिया दोनों से हाथ धो लेता है। बड़े भाई साहब ने शैतान का उदाहण भी दिया कि इसी 'अहंकार' के कारण ईश्वर ने शैतान को नरक में ढकेल दिया था। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था इसलिए वह भी भीख माँग- माँगकर मर गया। बड़े भाई साहब ने लेखक के परीक्षा में पास होने की तुलना अंधों के हाथ बटेर लगने से करते हुए कहा कि गुल्ली डंडे में भी कभी-कभी अंधा चोट निशाने पर लगा देता है, पर इससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं बन जाता। 

बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ : 
कोबड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ अनुभव रूपी ज्ञान से आती है, जो कि जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार पुस्तकीय ज्ञान से हर कक्षा पास करके अगली कक्षा में प्रवेश मिलता है, लेकिन वे इस पुस्तकीय ज्ञान को अनुभव में उतारे बिना अधूरा मानते हैं। दुनिया को देखने, परखने तथा बुजुर्गों के जीवन से हमें अनुभव रूपी ज्ञान को प्राप्त करना आवश्यक है क्योंकि यह ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है। हमारे बड़े-बुजुर्ग बेशक शिक्षित नहीं होते थे, परंतु वे अपने अनुभव से हर विपरीत परिस्थिति में भी समस्या का समाधान निकाल लेते थे। इसलिए उनके अनुसार अनुभव पढ़ाई से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, जिससे जीवन को परखा और सँवारा जाता है तथा जीवन को समझने की समझ आती है। 

शैतान और शाहेरूम का अहंकार का उदाहरण :
 शैतान को यह अभिमान हुआ था कि ईश्वर का उससे बढ़कर सच्चा भक्त कोई है ही नहीं, तो उसे स्वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। इसी प्रकार शाहेरूम को भी अहंकार हो गया था। बाद में वह भी भीख माँग- माँगकर मर गया अर्थात दोनों का ही अहंकार करने से नामो-निशान मिट गया। 

छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होना : 
बड़े भाई साहब अक्सर अपने छोटे भाई को पढ़ाई में दिलचस्पी लेने के लिए कभी प्यार से, तो कभी डाँटकर समझाने का प्रयास करते रहते थे, लेकिन छोटा भाई खेल-कूद कर भी हर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर लेता। इससे उसमें अभिमान-सा आ गया था। इस अभिमान को भाई साहब ने जिस युक्ति से दूर किया, उससे छोटे भाई के मन में उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। 

कहानी के अनुसार बड़े भाई साहब को प्राप्त विशेषाधिकार : 
'बड़े भाई साहब' कहानी में बड़े भाई लेखक से पाँच साल बड़े थे। इस नाते उन्हें अपने छोटे भाई को डाँटने-डपटने का पूरा अधिकार था। इतने पर भी यदि छोटा भाई (लेखक) बेराह चलने की कोशिश करेगा, तो वे थप्पड़ का प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उनके अनुसार बड़ा होने के कारण उनका यह विशेषाधिकार स्वयं विधाता भी उनसे नहीं छीन सकता। 

छोटा भाई अपने भाई से डरना: 
छोटा भाई अपने बड़े भाई की भाँति हर समय पढ़ने-लिखने में रुचि नहीं रखता था । वह प्रतिभाशाली तो था परंतु खेलकूद, सैर-सपाटे, दोस्तों के साथ गप्पें मारने जैसे कामों में उसे अधिक आनंद आता था। समय को व्यर्थ नष्ट करने पर बड़े भाई साहब उसे कड़ी डाँट लगाते थे तथा बात-बात पर उपदेश देते थे। हर समय बड़े भाई की फटकार और घुड़कियाँ सुनकर वह सहम-सा जाता था। अतः पढ़ाई के अतिरिक्त जब भी वह कोई अन्य कार्य करता तब वह डरता रहता कि कहीं भाईसाहब उसे डाँट न दें।

Class 10 साखी - कबीर मुख्य बिंदु

साखी - कबीर मुख्य बिंदु 

मीठी वाणी का महत्त्व : 
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी बोलने से मन का अहंकार समाप्त हो जाता है तथा मन प्रसन्न होता है और मन प्रसन्न रहने से तन भी शीतल रहता है। मीठी वाणी सुननेवालों को सुख तथा प्रसन्नता की अनुभूति कराती है इसलिए सदा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली व अपने को भी शीतलता प्रदान करने वाली मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। 

संसार में सुखी व्यक्ति और दुखी व्यक्ति : 
संसार में सुखी वही व्यक्ति है, जिसने घट-घट और कण-कण में बसने वाले ईश्वर से प्रीति कर ली है, उसके तत्व ज्ञान को जान और मान लिया है। दुखी मनुष्य वह है, जो दिन में खाकर और रात में सोकर हीरे जैसे अनमोल जीवन को व्यर्थ गँवाकर भौतिक सुखों की चकाचौंध में खोया हुआ है। यहाँ जो व्यक्ति संसार के विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर में मन को लगाए हुए है, वह 'जागना' (जागरूकता) का प्रतीक है और जो व्यक्ति विषय-विकारों में लिप्त है, भौतिक दृष्टि से उसकी आँखें बेशक खुली हुई हैं, पर वास्तव में वह सोया हुआ है, अर्थात 'सोना' (उदासीनता) का प्रतीक है। 

कबीर का निंदक को अपने निकट रहने रखने का परामर्श : 
संत कबीर ने हमें अपने दोहों के माध्यम से करणीय तथा अकरणीय की सीख दी है। उनका एक दोहा, हमें अपने स्वभाव को निर्मल करने का एक विचित्र उपाय बता रहा है। उसके अनुसार, हमें निंदक व्यक्ति को सदा अपने पास रखना चाहिए। जब-जब वह हमारी कमियाँ, हमारी बुराइयाँ हमारे सामने रखेगा, तब-तब हमें उन्हें दूर करने का या अपनी बुराइयों को अच्छाइयों में रूपांतरित करने का अवसर मिलेगा और इस प्रकार स्वतः हमारा स्वभाव निर्मल हो जाएगा। इस प्रकार, निंदा करने वाले व्यक्ति का साथ स्वभाव को निर्मल बनाने का एक सरल उपाय है। कबीर के अनुसार सच्चा ज्ञानी : केवल शास्त्र पढ़ने को कबीर ज्ञान नहीं मानते। शास्त्र विद्या कभी-कभी व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। यह अहंकार हमारे अंदर अनेक विकारों को जन्म देता है। एक बार अंहकार मन में आ जाए तो सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है जबकि एक प्रेम का भाव मन में पैदा होने से अन्य सभी विकार मिट जाते हैं और व्यक्ति सच्चा ज्ञानी बन जाता है। इस प्रकार कबीर सच्चा ज्ञानी उसे मानते हैं जिसके हृदय में प्रत्येक जड़-चेतन के लिए, संपूर्ण सृष्टि के लिए भरपूर प्रेम है। जिसके हृदय में किसी अन्य विकार के लिए कोई स्थान नहीं है वही सच्चा ज्ञानी है। 

मृग के उदाहरण द्वारा कबीर ने संदेश :
 मृग की नाभि में एक विशेष प्रकार की सुगंध समाई होती है। यह उस सुगंध से आकर्षित होता है और उस सुगंध की तलाश में इधर-उधर भटकता है। जीवन भर भटकाव के बावजूद भी वह समझ नहीं पाता कि यह सुगंध कहाँ से आ रही है क्योंकि वास्तव में उसका स्रोत कहीं बाहर नहीं उसी के शरीर में होता है। यही स्थिति हम सभी की है जो ईश्वर को पाना चाहते हैं किंतु उसकी तलाश, तीर्थ स्थानों और कर्मकांडों में करते हैं और उन्हीं में उलझकर जीवन गंवा देते हैं। यदि हमें एहसास हो जाए कि ईश्वर कण-कण में है, हमारे रोम-रोम में भी उसी का वास है, तो हमें उसके लिए भटकना नहीं होगा। हमें सर्वत्र, हर रूप में ईश्वर के दर्शन हो पाएँगे। 

कबीर के अनुसार ईश्वर को न देख सकने के कारण : संसार में दो तरह के लोग हैं। एक वे जो सांसारिक भोग विलास में लिप्त रहकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने में ही विश्वास रखते हैं। दूसरे वे जिन्हें ईश्वर से बिछड़ने का एहसास है और ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। कबीर ने लोगों को दो श्रेणियों में बाँटा है-सुखी और दुखी। कबीर खुद को दुखी लोगों की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि वे भौतिक सुख साधनों में सुख नहीं ढूंढ पाते। उन्हें तो ईश्वर के विरह से पीड़ा होती है और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानते हैं और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर बढ़ना चाहते हैं।

 कबीर के अनुसार निंदक के साथ व्यवहार : 
जो व्यक्ति सबकी निंदा करता रहे, सब में बुराई ढूँढता रहे, वह निंदक कहलाता है। सामान्यतः ऐसे लोगों सब दूर रहना चाहते हैं। कोई उन्हें पसंद नहीं करता। किंतु कबीर का मानना है कि निंदक व्यक्ति का साथ हमारे स्वभाव को निर्मल बना सकता है। जितना हम निंदक के पास रहेंगे, उतना ही हमें अपनी कमियों को जानने का अवसर मिलता रहेगा और हम उन्हें दूर कर पाएँगे। अतः हमें निंदक को अपने से दूर नहीं बल्कि अपने करीब रखना चाहिए। वह किसी शुभचितक की तरह हमारी सहायता करता है, भले अप्रत्यक्ष रूप से ही। 

कबीर के दोहों का प्रतिपाद्य : 
कबीर, संत संप्रदाय के श्रेष्ठ कवियों में से एक है। उन्होंने अनुभवजन्य ज्ञान को दोहों में पिरोकर जीवंत बना दिया है। कबीर ने अपने जीवन में खूब भ्रमण किया, जिसके कारण उनकी भाषा में अनेक भाषाओं के शब्द शामिल हो गए हैं। जन-जन की भाषा को उन्होंने अपनाया और अपने स्वभाव को निर्मल बनाने का, ईश्वर प्राप्ति का, अहंकार रहित जीवन जीने का मार्ग सुझाया है। कबीर ने सदैव बाहरी आडंबर का विरोध करके मानव सेवा रूपी सच्ची भक्ति का ही समर्थन किया है। 

ईश्वर भक्ति से कबीर का अहंकार दूर होना : 
कबीर ने अपने जीवन में प्राप्त अनुभव के आधार पर, जो ज्ञान प्राप्त किया, उसे अपने दोहों के माध्यम से हम तक पहुँचाया। उसी अनुभव के आधार पर, उन्होंने सदा धर्म के नाम पर किए जाने वाले कर्मकांडों का विरोध किया तथा सच्चे मन से की जाने वाली भक्ति और जनसेवा को ही सच्चा धर्म बताया। उनके अनुसार विकारों से मुक्त होना ही सच्चे भक्तों की पहचान है। जैसे-जैसे हम भक्ति में लीन होते जाते हैं, हमारा अहंकार दूर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो स्पष्ट है कि हम भक्ति के उचित मार्ग पर नहीं चल रहे हैं। संत कबीर ने अहंकार से मुक्त होकर प्रेम भाव की उत्पत्ति को ही सच्चे ज्ञान की परिभाषा माना है। कबीर का हृदय अहंकार शून्य था तथा प्रेम से भरपूर था। यही उनके ईश्वर भक्त होने की पहचान है। 

अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर अँधियारा मिट जाना : 
प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में, रोम-रोम में ईश्वर का, परम आनंद का वास होता है। किंतु भौतिक संसार में लिप्त होकर हम इस अनुभूति से दूर होते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारे हृदय में ज्ञान का दीपक बुझ जाता है और अज्ञान का अंधकार छाया रहता है। यदि हम ज्ञान के मार्ग पर चल पड़े और सच्चे हृदय से भक्ति करें तो धीरे-धीरे अहंकार, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि विकारों से मुक्त होते जाते हैं और प्रेम का भाव हमारे हृदय में विस्तार लेने लगता है। ज्ञान रूपी दीपक जब हृदय में प्रज्ज्वलित हो जाता है तब अज्ञान का अंधकार मिट जाता है। प्रत्येक जड़-चेतन के प्रति समान रूप से प्रेम पैदा हो जाता है। वास्तव में संपूर्ण संसार एक समान पाँच तत्वों से मिलकर बना है, किसी में कोई भेद नहीं है। यह भेद हमें तभी तक दृष्टिगत होता है, जब तक हम अज्ञान में होते हैं। ज्ञान का दीपक जल जाने पर हर ओर केवल उस, एक ही तत्व, परमसत्ता, ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं। 

कबीर की साखियाँ / दोहे आज भी प्रासंगिक हैं : 
कबीर की साखियाँ / दोहे हमेशा की तरह आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि साखियों में कहीं भी पुस्तकीय ज्ञान नहीं है। कबीर ने जगह-जगह घूमकर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया था तथा उनके अनुभव का क्षेत्र बड़ा विस्तृत था। इसलिए अनुभव के आधार पर होने के कारण ये साखियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगी। 


साखी के आधार पर कबीर द्वारा बताए गए जीवनमूल्य: कबीर की प्रत्येक साखी मानव जीवन को जीवन-मूल्यों से प्रेरित करती है। उनमें से एक, जैसे वाणी की मधुरता का महत्त्व कबीर प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक मानते हैं। वाणी की मधुरता से सोच-समझ कर बोली गई वाणी से तथा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली वाणी से मनुष्य संसार में किसी को भी अपना प्रिय बना सकता है।

कथा सागर कहानी वफादार कुत्ता

वफादार कुत्ता 

अमीर महाजन था। दयावान था। सुबह सैर पर जाते हुए एक छोटा-सा भटका हुआ पिल्ला मिल गया। महाजन को उसे देखकर दया आ गई। घर ले आया। उसकी बच्चों की तरह देखभाल करने लगा। पिल्ला भी घर की निगरानी करता और बच्चों से खेलता-कूदता।


महाजन बीमार पड़ गया। पिल्ला अब कुछ बड़ा था। पास बैठा रहता। आँखों में उसके दर्द झलकता था। रात्रि को महाजन बीमारी के कारण कहराने लगा। पिल्ला बार-बार देखता, प्यार करता। सारी रात देखता रहा। दूसरे दिन महाजन की मृत्यु हो गई। पिल्ला एक कोने में आंखों में आँसू लिए बैठा रहा। पार्थिव शरीर को श्मशानघाट ले गए। अग्रि देनी थी। आखिरी बार कुत्ते ने पैरों को चूमा। सामने बैठ गया। अग्नि शरीर को दी गई। सामने कुत्ता शांत था। परिवार के सदस्यों की नज़र पड़ी। देखा वह कुत्ता हमेशा के लिए शांत था। सब लोग हैरान रह गए कि एक जानवर ऐसा वफादार हो सकता है। कुत्ते को भी वहीं पर दफना दिया गया। वह भी एक परिवार का हिस्सा था।

सब लोग सोच में थे कि कुत्ता इंसान से अधिक वफादार जानवर है। दर्द महसूस करता है। काश! इंसान भी जानवरों से कुछ सीख ले।

Thursday, 10 April 2025

समर्पण कविता व्याख्या

पाठ में संकलित 'समर्पण' कविता कवि रामावतार त्यागी द्वारा रची गई है। इसमें कवि ने मातृभमि के प्रति भक्ति व प्रेम का भाव प्रकट कर अपना सब कुछ न्योछावर करने का संकल्प प्रकट किया है। यह कविता देश-प्रेम पर आधारित है। 

सप्रसंग व्याख्या

(1) मन समर्पित -------------------------और भी हूँ।

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' के पाठ-1 'प्रियतम' नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के रचियता  'श्रीरामावतार त्यागी जी'  हैं। इस कविता में  मातृभूमि के लिए देशप्रेम, समर्पण व त्याग का भाव व्यक्त किया गया है।

व्याख्या-कवि कहते हैं कि मेरे देश की धरती के लिए मेरा मन समर्पित है और मेरा शरीर भी इसके लिए समर्पित है। कवि देश की धरती अर्थात् मातृभूमि के लिए कुछ और भी बहुत कुछ देना चाहते हैं। वे धरती माँ से कहते हैं कि हे मातृभूमि! तुझे मैं सब कुछ भेंट करना चाहता हूँ।

(2) माँ तुम्हारा ऋण-----------------------------------और भी दें।

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' के पाठ-1 'प्रियतम' नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के रचियता  'श्रीरामावतार त्यागी जी'  हैं। इन पंक्तियों में कवि ने स्वदेश के प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया है। अपना सर्वस्व देश के लिए भेंट करने का निवेदन कर रहे हैं।

व्याख्या-कवि के हृदय में स्वदेश प्रेम का महासागर हिलोरे ले रहा है।  वह अपने तन, मन, प्राण और रक्त की एक-एक बूँद देश को समर्पित करना चाहते हैं। कवि कहते हैं कि हमारी धरती माँ का हम पर बहुत बड़ा उपकार है। इस धरती ने हमें बहुत कुछ दिया है और हम अपना सब  कुछ देकर भी इस माँ का ऋण नहीं चुका सकते हैं। कवि धरती माँ से यह प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि माँ!  तुम्हारा बहुत ऋण है, परंतु  मैं एकदम गरीब हूँ अर्थात् तुम्हारा ऋण चुकाने में असमर्थ हूँ। किंतु मैं फिर भी इतना निवेदन कर रहा हूँ कि जब भी मैं थाल में अपना सिर सजा कर लाऊँ, तो तब तुम मेरी वह भेंट दया करके स्वीकार कर लेना। अर्थात् मैं देश के लिए अपना बलिदान करूँ तो उसे मना मत करना। कवि कहते हैं कि मेरा मन भी और प्राण भी तुम्हें समर्पित हैं, मेरे रक्त का एक-एक कण भी तुम्हें समर्पित है। हे देश की धरती, मैं इससे भी अधिक और कुछ भी तुम्हें भेंट करना चाहता हूँ।

भाव - कवि अपने देश की रक्षा करते हुए बलिदान देना चाहते हैं। 

(3) माँज दो तलवार और भी दूँ।
व्याख्या - इन पंक्तियों में कवि ने देश की रक्षा के लिए युद्ध भूमि में जाने की इच्छा प्रकट की है। कवि कहते हैं कि वे अपने दाएँ हाथ में तेज़ धार वाली तलवार लेकर और कमर पर ढाल बाँधकर मातृभूमि की रक्षा करना चाहते हैं। कवि को यह विश्वास है कि धरती माँ का  पूरा आशीर्वाद उनके सर पर है। वे अपने सभी सपने, अपनी जिज्ञासा और आयु का एक-एक पल धरती माँ को भेंट करना चाहते हैं। 

भाव - कवि मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर करना चाहते हैं। 

तोड़ता हूँ -------------------------------------------------और भी दूँ। 
व्याख्या - इन पंक्तियों में कवि अपने परिवार, गाँव और रिश्तेदारों से क्षमा माँग रहे हैं। वे सबसे नाता तोड़कर देश के लिए शहीद होने जा रहे हैं।  वे अपने दाएँ हाथ में तलवार और बाएँ  हाथ में देश का झंडा लेकर देश की रक्षा के लिए बलिदान देने जा रहे हैं। वे अपने बगीचे के सभी फूल और घर की एक-एक ईंट व घर से जुड़ी हर वस्तु धरती माँ को भेंट करना चाहते हैं। 

भाव - कवि अपने जीवन से जुड़ी हर वस्तु चढ़ाने के बाद भी संतुष्ट नहीं हैं। वे धरती माँ के लिए कुछ और भी देना चाहते हैं। 




प्रश्न-उत्तर 


प्रश्न - 'समर्पण' कविता के माध्यम से कवि क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर - इस कविता के माध्यम से कवि यह कहना चाहते हैं कि अपनी मातृभूमि के प्रति हर व्यक्ति के मन में समर्पण, त्याग और श्रद्धा की भावना होनी चाहिए।


प्रश्न - कवि अपने समर्पण से संतुष्ट क्यों नहीं हैं ?

उत्तर - कवि अपने समर्पण से संतुष्ट नहीं है, क्योंकि देश की धरती का ऋण बहुत बड़ा है और उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि देश के लिए तन, मन और जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी समर्पित करना चाहिए।


प्रश्न - कवि थाल में सजाकर देश की धरती को क्या भेंट करना चाहते हैं ?

उत्तर - कवि अपने शीश को थाल में सजाकर अपने देश की धरती को भेंट करना चाहते हैं। कवि स्वयं पर मातृभूमि का  ऋण मानते हैं अतः वे अपना सर्वस्व देश हेतु समर्पित करना चाहते हैं।



प्रश्न - कवि अपने गाँव और अपने घर से मोह का बंधन क्यों तोड़ना चाहते हैं ?

उत्तर - कवि अपने गाँव और अपने घर से मोह का बंधन तोड़ना चाहते हैं, क्योंकि वे देश के सच्चे सपूत हैं और वे अपने देश की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई भी मोहपाश उन्हें बंधन में जकड़ सके अतः वे मुक्त होकर देश को सर्वस्व अर्पित करना चाहते हैं।


प्रश्न - 'नीड़ का तृण-तृण समर्पित' कहकर कवि ने किस ओर संकेत किया है ?

उत्तर -  'नीड़ का तृण-तृण समर्पित' कहकर कवि ने अपने देश के रक्षा के लिए अपने घोंसले अर्थात घर के तिनके-तिनके को भी समर्पित करने की ओर संकेत किया है। कवि ने स्पष्ट किया है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए घर, परिवार, समाज और स्वयं को हँसते-हँसते समर्पित कर देना चाहिए।


प्रश्न - कवि के समर्पण की भावना को अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर - कवि ने अपने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देना चाहते हैं, क्योंकि उनके अंदर देशभक्ति की सच्ची भावना है अर्थात वे अपने देश के सच्चे सपूत हैं तथा अपने को शरीर अर्पित कर देना चाहते हैं। वे अपने आप को धरती माँ का कर्ज़दार समझते हैं जिसका कर्ज़  वे अपना बलिदान देकर भी नहीं चूका सकते हैं। उनके समर्पण की भावना अनमोल है क्योंकि वे अपने तन, मन, धन और जीवन को मातृभूमि पर सहर्ष न्योछावर करने को तत्पर हैं।




Thursday, 17 October 2024

छोटा जादूगर


 पठित गद्यांश 
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न 

दस बज चुके थे-----------------------------------------मोटर वाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा। 

(क) लेखक ने छोटे जादूगर को कहाँ और किस स्थिति में देखा ?
 उत्तर - लेखक ने छोटे जादूगर को साफ धूप में सड़क के किनारे देखा था, जहाँ एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा हुआ था। मगर खेल दिखाते समय वह स्वयं काँप जाता था। उसकी वाणी में प्रसन्नता नहीं थी।

(ख) दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर क्यों लड़खड़ा रहा था ?
 उत्तर - दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर लड़खड़ा रहा था, क्योंकि उसकी माँ ने कहा था कि जल्दी वापस आना। मेरी घड़ी समीप है।

(ग) भीड़ में लेखक को देखकर छोटे जादूगर की स्थिति कैसी हो गई ?
 उत्तर - भीड़ में लेखक को देखकर छोटा जादूगर क्षण भर के लिए मूर्तिमान हो गया।

(घ) छोटे जादूगर द्वारा "क्यों न आता!" कहने से कौन-सा भाव झलकता है ?
 उत्तर - छोटे जादूगर द्वारा 'क्यों न आता!' कहने से विवशता और आर्थिक विपन्नता का भाव झलकता है। इन शब्दों से स्पष्ट है कि आना उसकी मज़बूरी थी। इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।



लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क)  लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का क्या कारण बताया ?
 उत्तर - लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का कारण बताते हुए कि माँ बीमार हैं इसलिए मैं उसकी दवा-दारू खरीदने और पथ्य देने तथा स्वयं का पेट भरने के लिए कुछ पैसे कमाने आया हूँ, क्योंकि मेरे पिताजी जेल में हैं।

(ख) लेखक ने लड़के को कितने टिकट खरीदकर दिए ?
 उत्तर - लेखक ने लड़के को बारह टिकट खरीदकर दिए।

(ग) हिंडोले से लेखक को किसने पुकारा ?
 उत्तर - हिंडोले से लेखक को छोटे जादूगर ने पुकारा।

(घ) लेखक की पत्नी द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने क्या-क्या खरीदा ?
 उत्तर - लेखक की पत्नी के द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने पकौड़ी और एक सूती कंबल खरीदा।

(ङ) लता-कुंज का वर्णन कीजिए। 
 उत्तर - लता-कुंज एक छोटा सा बनावटी महल था। वहाँ संध्या होने पर साँय-साँय की आवाज़ आती थी। डूबते हुए सूर्य की अंतिम किरणें पत्तियों से विदाई लेती नज़र आती थीं। यह लता-कुंज चारों तरफ से सुनसान था

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क) पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक क्यों          दिखाई दी ?
 उत्तर - पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक दिखाई दी, क्योंकि वह सबको खाते-पीते देख रहा था। मगर किसी से कुछ माँग नहीं रहा था। अभावग्रस्त होते हुए भी उसके मन में संतोष और तृप्ति का भाव था।

(ख) तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी क्यों उठा रहा था ?
 उत्तर - तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहा था, क्योंकि उसके पिता देश के लिए जेल में थे और घर पर उसकी माँ बीमार थी, जिसकी देखभाल के लिए उसके सिवा घर पर और कोई नहीं था।

(ग) बॉटेनिकल -उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट क्यों हो गए ?
 उत्तर -बॉटेनिकल उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए, क्योंकि उसके सभी खिलौने अभिनय करने लगे थे। भालू मनाने लगा था। बिल्ली रूठने लगी थी। बंदर घुड़कने लगा था। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला आदि सभी कार्य जादूगर की बातों से हो रहे थे।

(घ) लड़का खेल-तमाशा क्यों दिखाना चाहता था ?
उत्तर-  लड़का खेल-तमाशा दिखाना चाहता था, क्योंकि उसको ऐसा करने से कुछ पैसे मिल जाएँगे, तो वह अपनी बीमार माँ को दवाइयाँ व पथ्य देगा और खुद का भी पेट भरेगा।

(ङ)  “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक क्या स्पष्ट करना चाहते हैं ?
 “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक ने संसार के सत्य को अनावृत्त करना चाहा है। संसार की स्वार्थपरता और भौतिकता की चकाचौंध के बीच जीवन का सार्वभौमिक सत्य लेखक के समक्ष उपस्थित हो जाता है। इसे देखकर लेखक किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में खड़ा रह जाता है और सारा संसार उसे एक जादू की भाँति नाचता हुआ प्रतीत होता है।

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर) CLASS 8

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर)
(क) हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव इतना सुव्यवस्थित कैसे हो गया था ?
उत्तर - हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव तो वैसे का वैसा ही था। हॉस्टल में उसकी सब चीजें अस्त-व्यस्त रहती थी। उसे व्यवस्था और करीने की आदत नहीं थी। घर की बैठक की सजावट उसकी पत्नी रमा ने की थी, जिसको देखकर लेखक को लगा था कि उसका मित्र अब सुव्यवस्थित हो गया है।

(ख) वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए क्या कहा ?
 उत्तर - वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए कहा कि उसने एम०ए० प्रथम श्रेणी में पास कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। अब पी.एच.डी कर रही है। डी लिए भी करना चाहती है। वह कॉलेज पढ़ाने जाती है और घर का सारा काम भी करती है। साथ ही साथ सास-ससुर दोनों की सेवा भी करती है।

(ग) वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना क्या थी ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना यह थी कि वे पचास हजार रुपए दहेज में लेकर मैट्रिक पास बहू को घर लाए थे। यदि उससे कोई भी काम करने के लिए कहता, तो फौरन उलटा जवाब देती थी कि वह घर की बेगारी करने नहीं आई है। वह अपने पिताजी द्वारा दिए गए रुपयों का जिक्र करते हुए कहती कि उससे नौकर रख लो।

(घ) राव ने 'ऐश-ट्रे' को उनके थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न क्यों कहा ?
उत्तर - राव तो दहेज लेना नहीं चाहते थे, परंतु अपनी पत्नी रमा के दबाव में आकर उन्हें दहेज माँगना पड़ा। इसके फलस्वरूप उन्हें साठ हजार रुपयों के सहित चाँदी का बना 'ऐश-ट्रे', जो उलटे पैर के जूते की आकृति का था, मिला, जिसको उन्होंने अपने थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न कहा था।

(ङ) वह कौन-सी विवशता थी, जिसके तहत लेखक ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही ?
उत्तर - दहेज माँगने के लिए रमा ने अपने पति पर दबाव डाला था, जिसके तहत राव ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही। रमा उनकी पत्नी थी और पुत्र के विवाह को लेकर उसकी अनेक आकांक्षाएँ थीं। वह स्वयं दहेज की माँग करने की अपेक्षा पति पर दवाब बना रही थी कि वे दहेज की रकम माँगे। उसके आगे वेंकटेश्वर राव झुक गए।

(च) वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो क्या वे अपने साथ न्याय करते ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो वह अपने साथ तो न्याय करते ही, साथ ही सीमा और पूरे समाज की लड़कियों के साथ भी न्याय करते। पत्नी के दबाव में आकर भी किया गया गलत कार्य तो गलत ही कहलाता है। मात्र पत्नी के आग्रह और प्रसन्नता का तो उन्होंने विचार किया, परंतु उन्होंने न स्वयं के विचारों का मान रखा और न दूसरों के।

CLASS 9 वैज्ञानिक चेतना के वाहक : रामन


(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

1. कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर - कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा यही थी कि वे अपना सारा जीवन शोध कार्यों को समर्पित कर दें। परंतु उन दिनों कैरियर के रूप में शोधकार्य को जीवन भर के लिए अपनाने की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी।

2. वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर - वाद्य यंत्रों पर की गई खोजों और वैज्ञानिक सिद्धांतों के 
(ख) आधार पर रामन् ने पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्य-यंत्रों की तुलना में घटिया हैं। उन्होंने वाद्ययंत्रों के कंपन के पीछे छिपे गणित पर अच्छा-खासा काम किया और कई शोध-पत्र भी प्रकाशित किए।

3. रामन् के लिए नौकरी संबंधी कौन-सा निर्णय कठिन था और क्यों ? 
                                            अथवा

सरकारी नौकरी छोड़ना रामन् के लिए एक कठिन निर्णय क्यों था? 'वैज्ञानिक चेतना के वाहक' पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर -उस ज़माने के प्रसद्धि शिक्षा शास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी ने रामन् के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में रिक्त प्रोफेसर पद को स्वीकार कर लें। रामन् के समक्ष नौकरी संबंधी यह निर्णय अत्यंत कठिन था कि वे सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी में बने रहें या उसे छोड़कर इस पद को स्वीकार कर लें। अंततः रामन् ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार किया और माँ सरस्वती की साधना हेतु सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को त्याग दिया।

4. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को समय-समय पर किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर -'रामन् प्रभाव' की खोज ने रामन् को विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों की श्रेणी में प्रतिस्थापित कर दिया। समय-समय पर उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता, 1929 में 'सर' की उपाधि तथा 1930 में विश्व के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें रोम के मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी के ह्यूज पदक, फिलोडेल्फिया इंस्टीट्यूट के फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस के लेनिन पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया।

5. रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय-चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?

उत्तर- रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया क्योंकि उन्हें ये सम्मान और पुरस्कार उस दौर में मिले, किब भारत अंग्रेज़ों के अधीन था। दासता की बेड़ियों में जकडी भारतीय जनता के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का निरंतर हास हो रहा था। ऐसी परिस्थिति में रामन् की इन उपलब्धियों ने भारत को एक नई गरिमा प्रदान की और इसे विश्व में शीर्ष स्थान पर प्रतिस्थापित कर दिया।

 निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए- 

1. रामन् के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर - कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी रामन् ने अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा और स्वाभाविक रुचि को अक्षुण्ण बनाए रखा। दफ्तर से छुट्टी मिलते ही वे बहू बाजार स्थित 'इंडियन एसोसिऐशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की प्रयोगशाला में कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य करते थे। इस संस्था की प्रयोगशाला में संसाधनों का नितांत अभाव था। यह एक आधुनिक हठयोग ही था, जिसमें साधक रामन् दिनभर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के पश्चात् सीमित संसाधनों की सहायता से प्रयोगशाला में शोधकार्य करते थे। रामन् अपनी इच्छाशक्ति के बल पर भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने का प्रयास करते रहे और उन्होंने विज्ञान को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान की।

2. रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश किरणों के प्रभाव का अध्ययन किया और यह पाया कि, जब एक वर्षीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से होकर गुज़रती है तो गुज़रने के पश्चात् उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। कारण यह है कि एकवर्षीय प्रकाश किरण के फोटॉन जब तरल अथवा ठोस रखे से गुज़रते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इसके परिणामस्वरूप उसकी ऊर्जा का कुछ अंश या तो खो जाता है या उसमें बढ़ोत्तरी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। एक वर्षीय प्रकाश की किरणों में सर्वाधिक ऊर्जा बैंगनी तथा सबसे कम ऊर्जा लाल वर्ण के प्रकाश में होती है। रामन् की इसी खोज को 'रामन् प्रभाव' के नाम से जाना जाता है।

3. 'रामन् प्रभाव' की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य संभव हो सके ?
उत्तर - रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' की सहायता से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन करना सरल हो गया। पहले इसके लिए 'इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी' की मदद ली जाती थी, जिसमें त्रुटियों की संभावना अधिक रहती थी परंतु रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से यह कार्य अत्यंत सहज हो गया। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक जानकारी प्रदान करती है। इससे प्रयोगशाला में पदार्थों का संश्लेषण तथा अनेक पदार्थों का कृत्रिम रूप से निर्माण संभव हो गया है।

4. देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालिए ।
                             अथवा
रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी। इस कथन के आलोक में चंद्रशेखर वेंकट रामन् के योगदान पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था ' उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था 'रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट' के नाम से जानी जाती है। रामन् के अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि तथा चिंतन के विकास में उन्होंने सैकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने आगे चलकर बहुत अच्छा काम किया। इस प्रकार ज्योति से ज्योति प्रज्वलित होती रही और कई छात्र उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने 'करेंट साइंस' नामक एक पत्रिका का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त भौतिकी में अनुसंधान के विकास हेतु 'इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स' नामक शोध-पत्रिका भी निकाली। वे लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति पूर्णतः समर्पित थे।

5. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
                                                  अथवा
रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर - सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् ने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से संपूर्ण देश को आलोकित किया। वे वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें सदैव यही संदेश दिया कि हम अपने इर्द-गिर्द घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तथा उसी के अनुसार उसकी जाँच-पड़ताल करें। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों, समुद्र की अथाह जलराशि तथा प्रकाश की किरणों में से वैज्ञानिक सिद्धांतों को ढूँढ़ निकाला। उनका व्यक्तित्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम भी अपने आसपास बिखरी चीजों और विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और रहस्यों पर से पर्दा उठाएँ और विज्ञान को समुन्नत बनाने का प्रयास करें।


 निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

1. उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर- यह कथन सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के विशिष्ट व्यक्तित्व और वैज्ञानिक चेतना के प्रति उनके समर्पण का सूचक है। कलकत्ता के वित्त विभाग में अफसर के रूप में तैनात रामन् दफ्तर से छुट्टी मिलने के बाद बहू बाज़ार स्थित प्रयोगशाला में जाकर शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते थे। विज्ञान के प्रति उनके इस समर्पण ने उन्हें सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी को छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। इससे स्पष्ट होता है कि रामन् के लिए माँ सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

2. हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर - यह कथन हमें रामन् के जीवन से प्रेरणा लेते हुए प्रकृति के विभिन्न क्रियाकलापों और घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने और सोचने की शिक्षा देता है। हमारे आसपास प्रकृति में अनगिनत चीजें बिखरी पड़ी हैं। ब्रह्मांड के कई रहस्य ऐसे हैं, जिनपर पर्दा पड़ा हुआ है। आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति और अटूट लगन के साथ विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और वस्तुओं की वैज्ञानिक दृष्टि से छानबीन करने तथा उसपर गहराई से मनन करने की। जाने कितने ही रहस्य वैज्ञानिक करकमलों द्वारा परदे से बाहर आने की प्रतीक्षा में है। परंतु इसके लिए हमें रामन् की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होना होगा।

3. यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था। 
उत्तर - यह कथन विज्ञान के प्रति रामन् के स्वाभाविक रुझान और समर्पण को व्यक्त करता है। 'हठयोग' प्राचीन योग साधना का वह अंग है, जिसमें साधक अत्यंत कठिन मुद्राओं और आसनों के द्वारा सिद्धि प्राप्त करता है। सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् कलकत्ता के वित्त विभाग में अफ़सर के रूप में तैनात थे। दिन भर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के बाद छुट्टी मिलते ही वे बहू बाज़ार स्थित 'इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की मामूली-सी प्रयोगशाला में पहुँचते और कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते। सीमित संसाधनों वाली उस अभावग्रस्त प्रयोगशाला में दिन भर के थके रामन् विज्ञान को समृद्ध करने का प्रयास करते। उनकी यह कठिन साधना आधुनिक हठयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।