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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Wednesday, 9 February 2022

Class 9 Lesson Diey Jal Uthey Summary/पाठ-दिये जल उठे लेखक-मधुकर उपाध्याय, पाठ का सार

 पाठ परिचय  
सरदार वल्लभ भाई पटेल 
* दांडी कूच की तैयारी के सिलसिले में सात मार्च को रास पहुँचे। 
* उपस्थित जनसमुदाय के आग्रह पर दो शब्द कहना स्वीकार किया। 
* स्थानीय कलेक्टर शिलिडी के आदेश पर गिरफ़्तारी। 
* पुलिस पहरे में बोरसद की दालत में ले जाया गया।
* जज को आठ लाइन का फैसला लिखने में डेढ़ घंटा लगा। 
* 500 रुपये जुर्माने के साथ तीन महीने की जेल। साबरमती जेल ले जाया गया।  
* आश्रम के बाहर गांधी जी से एक संक्षिप्त मुलाकात। 
* गांधी जी से कहा कि मैं चलता हूँ। अब आपकी बारी है। 
* पटेल की गिरफ्तारी की देशभर में कड़ी प्रतिक्रिया।
महात्मा गांधी 
* ब्रिटिश आधिपत्य वाले भूभाग से ही यात्रा करने का निश्चय किया। 
* गाजे-बाजे के साथ सत्याग्रही तथा गांधी जी रास पहुँचे। 
* सरदार पटेल की गिरफ्तारी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें यह पुरस्कार आपकी सेवा करने के कारण मिला है। 
* एक 105 साल की बूढ़ी महिला ने गांधी जी से कहा कि स्वराज्य लेकर ही वापस आना । 
* सरदार पटेल से मिलने के लिए आश्रम से बाहर आए। 
* गांधी जी के रास पहुँचने पर भी वह कानून लागू था, जिसके अंतर्गत पटेल की गिरफ्तारी की गई थी। 
* रास में गांधी जी का भव्य स्वागत। 
* लोगों की आत्मा को जगाते हुए कहा कि आप लोग दरवार लोगों से त्याग और हिम्मत सीखें। 
* 'धर्मयात्रा' का नाम देते हुए अपनी पूरी यात्रा पैदल ही तय की । 
* नदी तट पर दोनों ओर कई हज़ार लोग हाथों में दिए लेकर खड़े थे। 
* उसी समय गांधी जी ने नाव से नदी पार की। 
* घनघोर अँधेरे में उपस्थित जनसमूह का उत्साह और गांधी जी का दृढ़ निश्चय का अदुभुत दृश्य दर्शनीय था।
रघुनाथ काका 
* गांधी जी को नदी पार कराने की जिम्मेदारी मिली। 
* इसके लिए काका ने नई नाव खरीदी। 
* नाव को लेकर कनकापुरा पहुँचे। 
* बदलपुर निवासी रघुनाथ काका को सत्याग्रहियों ने 'निषादराज' नाम दिया। 
* रात बारह बजे के बाद गांधी जी को नाव में बैठाकर रवाना हुए। 
* नदी तट के दोनों तरफ़ हाथ में दिए लिए हुए कई हजार लोगों के बीच गांधी जी को सकुशल नदी 
   पार कराई और अपने उत्तरदायित्व का भली प्रकार निर्वहन किया।

पाठ का सार 
'दिये जल उठे' पाठ मधुकर उपाध्याय द्वारा लिखित है। इसमें उन्होंने देश की स्वतंत्र कराने में नेताओं के योगदान को दर्शाया है। सरदार वल्लभभाई पटेल, महात्मा गांधी जी और जवाहर लाल नेहरू ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए समय-समय पर अनेक आंदोलन किए। इन आंदोलनों में एक दाड़ी कूच भी था। सरदार पटेल इसी दांडो कूच को तैयारी के सिलसिले में गुजरात के रास नामक स्थान पर गए थे। वहाँ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 500 रुपये के जुरमाने के साथ तीन महीने की सखा सुनाई गई पटेल को इस गिरफ्तारी से लोगों में बड़ा रोष था। देशभर में उनकी गिरफ्तारी पर अनेक प्रतिक्रियाएँ हुई। मदनमोहन मालवीय ने केंद्रीय सभा में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें बिना मुकदमा चलाए पटेल को जेल भेजने के सरकारी कदम की निंदा की गई। उधर मो. अली जिन्ना ने सरदार वल्लभभाई पटेल की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। सरदार पटेल को रास से बोरसद की अदालत लाया गया और वहाँ से साबरमती जेल भेज दिया गया। जेल का रास्ता साबरमती आश्रम के सामने से होकर जाता था। आश्रमवासी अपने प्रिय नेता पटेल की एक झलक पाने के लिए उत्सुक थे। वे सड़क के दोनों किनारे खड़े हो गए। वहाँ पटेल और गांधी जी की एक संक्षिप्त मुलाकात हुई। पटेल ने गांधी जी और आश्रमवासियों से कहा, "मैं चलता हूँ अब आपकी बारी है।" पटेल के गिरफ्तार होने के बाद गांधी जी ने सारी जिम्मेवारी सँभाल ली। रास पहुँचे और उन्होंने दरबार समुदाय के लोगों को देश को आजाद कराने में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया। इस बीच जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की किंतु गांधी जी ने मना कर दिया। गांधी जी ने दांडी कूच शुरू करने से पहले ही निर्णय किया था कि वे अपनी यात्रा ब्रिटिश अधिकार वाले भू-भाग से ही करेंगे। गांधी जी और अन्य सत्याग्रही गाजे-बाजे के साथ रास पहुँचे। गांधी जी ने वहाँ उपस्थित लोगों को सरकारी नौकरियाँ छोड़ने के लिए प्रेरित किया। गांधी जी और सत्याग्रही जब रास से चलकर कनकपुरा पहुंचे तो एक वृद्धा ने गांधी जी से देश को आजाद कराने की बात कही। उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि अब वे देश आजाद कराकर ही लौटेंगे। गांधी जी ने अपने दाडी यात्रा को धर्मयात्रा कहा और उसमें किसी प्रकार का आराम न करने की बात कही । गांधी जी और अन्य सत्याग्रही मही नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ उनके स्वागत के लिए बहुत लोग खड़े थे। आधी रात के समय मही नदी के तट पर अद्भुत नजारा था। सभी लोग हाथों में दिये लेकर खड़े थे। जैसे ही महात्मा गाँधी नदी पार करने के लिए नाव तक पहुँचे तो महात्मा गांधी जी, नेहरू और पटेल के जयकारों से नदी के दोनों तट गूँज उठे । गाँधी जी नदी पार करके विश्राम करने के लिए झोंपड़ी में चले गए। गांधी जी के पार उतरने के बाद भी लोग हाथों में दिये लिए खड़े रहे। वे अन्य सत्याग्रहियों के पार उतरने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय मही नदी के दोनों किनारों पर हाथों में दिये लिए खड़े लोग इस बात के प्रतीक थे कि उनके हृदय में अपने देश को आजाद करानेवाले नेताओं के प्रति कितनी श्रद्धा थी। वे देश को शीघ्र आज़ाद हुआ देखना चाहते थे।

ऋतुराज कविता का सारांश

इस ऋतु में प्रकृति की सुंदरता सबको आनंदित करती है। प्रकृति में 
हर तरफ मस्ती छाई होती है। वसंत ऋतु में प्रकृति हमारे शरीर को 
ऊर्जा से भरकर हमें आत्मविश्वास के साथ नए कार्य को शुरू करने 
की प्रेरणा देती है।वसंत ऋतु में न केवल मनुष्य बल्कि पशु-पक्षी भी 
आनंद से भर जाते हैं। आसमान में पक्षी किलकारियाँ मारकर वसंत 
का आगमन करते हैं। वसंत ऋतु बहुत प्रभावशाली होती है। चिड़ियों 
की आवाज और रात में चाँद की चाँदनी दोनों ही बहुत सुहावने, ठंडे 
और शांत हो जाते हैं। इस ऋतु में सरसों के पीले-पीले फूल खिल-
खिलाकर खुशी व्यक्त करते हैं। तालाबों में कमल के फूल खिल कर
 इस तरह पानी को इस तरह ढक लेते हैं जैसे मनुष्य को संकेत दे रहे 
हों कि अपने सारे दुखों को भूलकर अपनी जिंदगी का आनंद लो। 
वसंत ऋतु जब आती है तो वह प्रकृति में सब कुछ जागृत कर देती है, जैसे यह पेड़-पौधे को  फूल-
फसलों को, मनुष्योंव पशुओं और अन्य वस्तुओं को सर्दी के मौसम की लंबी नींद से जगाती हैं और 
प्रकृति रंगीन हो जाती है। इस ऋतु में कोयल के गाने सुनाई देते हैं, वह मधुर स्वर में गाने लगती है। हर 
तरफ फूलों की खुशबू और रोमांच होता है क्योंकि फूल खिलना शुरू कर देते हैं, पेड़ों पर नए पत्ते आ 
जाते हैं। ऐसा लगता है कि पूरी प्रकृति आनंद के साथ घोषणा करती है कि वसंत आ गया है। अब उठने 
का समय है। 
 कविता 
आया है ऋतुराज सलोना, 
आया है ऋतुराज। 
गेंदा और गुलाब खिले हैं, 
भौंरे गुन-गुन गाते हैं। 
पुरवइया के प्यारे झोंके, 
सबको मस्त बनाते हैं। 
सबको मस्त बनाने वाला, 
आया है ऋतुराज। 
        पहन बसंती कपड़ा सरसों, 
          खेतों में लहराती है। 
         आमों की डारी पर कोयल, 
          पंचम स्वर में गाती है। 
          पंचम राग सुनाने वाला, 
           आया है ऋतुराज। 
नींबू और आम के बौर, 
झूम-झूम कर महक रहे हैं। 
शीतल मंद सुगंध हवा में, 
पक्षी मिलकर चहक रहे हैं। 
विहगों को चहकाने वाला, 
आया है ऋतुराज ।।
कविता की सारांश :
इस कविता में कवि ने ऋतुराज वसंत के आगमन का वर्णन है। कवि कहते हैं कि हमारी प्यारी वसंत 
ऋतु का आ गई है। वसंत के आते ही गेंदा और गुलाब के फूल खिल गए हैं। बाग में भौंरे भी गुन-गुन
करके फूलों पर मँडराने लगे हैं। वसंत ऋतु में चलने हवा भी शीतल होकर सबको मस्त कर रही है। 
सबको आनंद से भरने वाला वसंत आ गया है। खेत-खलिहानों में भी सरसों ने पीले वस्त्र पहन लिए हैं 
यानी खेतों में सरसों पर पीले-पीले फूल खिले हुए हैं। कोयल भी आम की डाली पर बैठकर अपने मधुर 
स्वर में गाती है। वसंत ऋतु में चारों ओर मधुर संगीत सुनाई देता है। नींबू और आम के पेड़ों पर छोटे-
छोटे फूल निकल आए हैं और इस वसंती हवा का स्पर्श पाकर वे झूमते हुए महक रहे हैं। वसंत ऋतु के 
आते ही वातावरण में चारों ओर सुगंधित शीतल हवा धीरे-धीरे बहने लगी है। वसंत ऋतु में सभी पक्षियों 
 की चहचहाट सुनाई देने लगी है। चारों और आनंद और उत्साह का वातावरण बना हुआ है क्योंकि 
वसंत का आगमन हो चुका है। 
अभ्यास प्रश्न :
1- कविता में किस ऋतु का वर्णन है ? 
उत्तर- कविता में वसंत ऋतु का वर्णन किया गया है। 
2- ऋतुराज के आने पर कौन-से फूल खिल गए हैं ? 
उत्तर- ऋतुराज के आते ही गेंदा और गुलाब के फूल खिल जाते हैं। 
3- सरसों ने कैसे कपड़े पहन रखे हैं ?
उत्तर- सरसों ने पीले कपड़े पहन रखे हैं। 
4- कोयल कौन-से सुर में गाती है ? 
उत्तर- कोयल पंचम स्वर में गीत गाती है। 
5- नींबू व आम पर क्या आ गए हैं ?
उत्तर- नींबू व आम पर बौर निकल आए हैं। 
6- वसंत ऋतु में फूलों पर क्या पड़ता है ?
उत्तर- वसंत ऋतु के आते ही गेंदा और गुलाब के फूल खिल उठते हैं। फूलों की सुगंध पूरे वातावरण 
को मदहोश कर देती है। 
7- वसंत में खेतों में कैसा दृश्य दिखाई देता है ?
उत्तर- वसंत आने पर खेत पीले फूलों से लहलहा उठते हैं। सरसों पर पीले फूल खिल जाते हैं। इन 
सरसों के फूलों को देखकर ऐसा लगता मानों सरसों ने पीले वस्त्र पहन लिए हों। 
8- वसंत ऋतु में कोयल क्या करने लगती है ?
उत्तर- वसंत ऋतु के आने पर कोयल आमों की डाली पर बैठकर मधुर स्वर में अपना पंचम राग सुनाने 
लगती है। 
9- वसंत ऋतु का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर- वसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। वसंत ऋतु के आते ही सारा वातावरण उत्साह और 
ऊर्जा से भर जाता है। बागों में हर रंग के फूल खिलने लगते है। पेड़ों पर नए-नए पत्ते निकलने लगते हैं। 
प्रकृति में हर तरफ हरियाली छा जाती है। वसंत ऋतु में कोयल भी अपना मधुर राग सुनाने लगती है।
पक्षियों का कलरव मन को आनंद से भर देता है। खेतों में सरसों के पीले फूल लहलहराते हुए मस्ती में 
झूम उठते हैं।   

Saturday, 5 February 2022

Class 9 Lesson Dharm Ki Aad / पाठ धर्म की आड़

 पाठ पर आधारित प्रश्न-उत्तर 
प्रश्न1- धर्म की आड़ में किस प्रकार के प्रपंच रचे जा रहे हैं ?  
उत्तर- धर्म के ठेकेदार और मठाधीश धर्म के नाम पर साधारण लोगों को मूर्ख बनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहे हैं। धर्म और ईमान की दुहाई देकर लोगों को ठगना ही उनका पेशा बन गया है। धार्मिक अनुष्ठान करवाकर धन एकत्रित कर रहे हैं। इन लोगों ने प्रपचों का ऐसा जाल बिछा रखा है कि एक साधारण गरीब आदमी उस जाल से निकलने की हिम्मत नहीं कर पाता क्योंकि उसे धर्म के नाम पर डराकर मूर्ख बनाया जा रहा है। 
2- रमुआ पासी और बुधू मियाँ का उदाहरण लेखक ने किस संदर्भ में दिया है ? 
उत्तर- रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ का उदाहरण देकर लेखक ने समाज के कुछ ऐसे लोगों की ओर संकेत किया है, जो धर्म के नाम पर काँप जाते हैं चाहे वे लोग धर्म को जाने या न जाने, ईमान का अर्थ उन्हें समझ आए या नहीं, पर उनके धर्म के विरुद्ध यदि कोई एक शब्द भी कहे तो फिर बरस पड़ते हैं। 3- रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ किस भाव को प्रदर्शित करते हैं ? 
उत्तर- ये दोनों विभिन्न धर्मों की भावनाओं को प्रदर्शित करते हैं। ये दोनों मुसलमान और हिंदू के नाम पर भावुक हो उठते हैं और एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार जाते हैं । वास्तव में ये अपने-अपने धर्म को जानते तक नहीं। 
4- 'लकीर पीटते रहना' से लेखक का क्या तात्पर्य है ? 
उत्तर- लकीर पीटते रहने से लेखक का यह तात्पर्य है कि एक ही ढरे पर चलते रहना; किसी भी बदलाव को स्वीकार न करना। गरीब साधारण व्यक्ति बेचारा धर्म के ठेकेदारों द्वारा मूर्ख बनाया जाता है, लूटा जाता है, पर उसमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि इसके खिलाफ़ आवाज उठाए। वह धर्म के तत्वों को नहीं जानता। लकीर पीटते रहना को ही अपना धर्म समझता है। 
5- धर्म का सही आचरण क्या है ? 
उत्तर- सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग पर चलना ही सही आचरण कहलाता है। मानवता का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। सत्य के मार्ग पर चलना, सदाचार का पालन करना और मानव सेवा करना ही धर्म का सही स्वरूप कहा गया है।  
6- नास्तिक और ला-मजहब लोग लेखक की दृष्टि में क्यों सही है ?
उत्तर- नास्तिक और ला-मराहब लोग लेखक इसलिए सही हैं क्योंकि वे मंत्र, नमाज़, पूजा-पाठ न करके सदाचार का पालन करते हैं। धर्म का झूठा नाटक न करके मानव- मात्र की सेवा करते हैं। ऐसे ही लोगों का इश्वर द्वारा पसंद किया जाता है। 
7- धर्म और ईमान के नाम पर लोगों को किस प्रकार मूर्ख बनाया जा रहा है ? 
उत्तर- धर्म और ईमान के नाम पर ऐसा घिनौना व्यापार चल रहा है कि धर्म के ठेकेदार साधारण को मूर्ख बनाकर संप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। वे लोग एक-दूसरे को उनके धर्म के विरुद्ध भड़काकर उत्पात मचवाते हैं और अपना वर्चस्व बनाए रखते हैं। वे केवल अपनी गद्दों को सुरक्षित रखना चाहते हैं। 
8- गरीब और अधिक गरीब कैसे हो रहे हैं ? 'धर्म की आड़' पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए । 
उत्तर- गरीब और साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठी हुई है कि धर्म और ईमान की रक्षा के लिए  तक दे देना वाजिब हैं। धर्म के ठेकेदार ऐसे लोगों को मूर्ख बनाकर लूटने का प्रयास करते रहते हैं और वे बेचारे लुटते चले जाते है। धर्म के नाम पर इन्हें मूर्ख बनाया जाता है और मूर्ख बेचारे धर्म की दुहाइयाँ देते और दीन-दीन चिल्लाते हैं।
9- ईश्वर का ईश्वरत्व कैसे कायम रह सकता है। 'धर्म की आड़' पाठ के आधार पर उत्तर लिखिए। 
उत्तर- लेखक कहते हैं कि यह आवश्यक नहीं कि पाँचों वक्त की नमाज, पूजा-पाठ और गायत्री मंत्र के जाप से ही ईश्वर का ईश्वरत्व कायम रहेगा। यदि हम समार्ग पर चलते हैं, सदाचार का पालन करते हैं , मानव-मात्र की सेवा करते हैं, तो ईश्वर का ईश्वरत्व  रहता है। क्योंकि- 'ईश्वर उनकी सहायता करते हैं जो मानव मात्र की सहायता करता है।' 
10- 'नास्तिक' और 'आस्तिक' में से लेखक ने किसे श्रेष्ठ बताया है ? 
उत्तर- लेखक ने उस नास्तिक व्यक्ति को श्रेष्ठ बताया है जो धर्म का आडंबर नहीं करता। पूजा-पाठ, नमाज, गायत्री मंत्र का जाप नहीं करता मगर सदाचार का पालन करता है। वह बेईमान नहीं है। मानवता की सेवा करता है। यह सब करते हुए यदि वह नास्तिक कहलाए, तो भी ईश्वर को इसमें आपत्ति नहीं है। इसके विपरीत धर्म के नाम पर पूजा-पाठ करके लोगों को ठगने वालों से ईश्वर कभी प्रसन्न नहीं रहता। 
11- धर्म के स्पष्ट चिह्न क्या हैं ? 
उत्तर- अजॉँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाज पढ़ने का नाम धर्म नहीं है। शुद्धाचरण और सदाचार ही धर्म के स्पष्ट चिह्न है। दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच-वक्ता नमाज भी अदा कीजिए, परंतु ईश्वर को इस प्रकार रिश्वत के दे चुकने के पश्चात् यदि आप अपने को दिन-भर बेईमानी करने और दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए आजाद समझते हैं, तो इस धर्म को, अब आगे आने समय कदापि नहीं टिकने देगा।
12- चलते पुर्जे लोग धर्म के नाम पर किस प्रकार व्यापार करते हैं ? 
उत्तर- चलते-पुर्जे लोग मूर्ख लोगों का लाभ उठाते हैं। धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाना उनका पेशा बन गया है। अशिक्षित और भोली-भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। उनकी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं। साधारण व्यक्ति धर्म के क्षेत्र में फैले अधविश्वास के कारण अपनी आवाज़ उठा नहीं पाता और चलते पुर्जे लोगों का वर्चस्व बना रहता है।जनता उनके द्वारा किए गए शोषण का शिकार बनती रहती है।  
13- 'देश में धर्म की धूम है' से लेखक का क्या आशय है ?
 उत्तर- 'देश में धर्म की धूम है' से लेखक का आशय यह है कि आजकल देश में धर्म के नाम पर खूब चर्चाएँ, सभाएँ, सम्मेलन आदि हो रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने धर्म को एक-दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगा हुआ है। इस प्रकार देश में चारों ओर धार्मिक कट्टरता का वातावरण बन गया। 
14- 'धर्म और ईमान को जाने या न जाने' - लेखक ने किन लोगों के लिए और क्यों कहा है ? 
उत्तर- लेखक साधारण व्यक्तियों को धर्म का वास्तविक रहस्य जानने वाला नहीं मानता है। ऐसे लोग अपने धर्मगुरुओं को बातों को बिना विचार किए स्वीकार कर लेते हैं। वे उनके उकसाने पर मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं। उनकी इस विचारहीनता के कारण धर्म के नाम पर उत्पात होने लग जाते हैं। 
15- लेखक धार्मिक झगड़ों को समाप्त करने के लिए क्या सुझाव देता है ? 
उत्तर- लेखक का मानना है यदि हम धर्म और ईमान के नाम पर होने वाले उत्पातों को रोकना चाहते हैं तो हमें साहस और दृढ़ता के साथ स्वार्थी तत्वों को बेनकाब करना होगा। धर्म और उपासना के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने दी जाए और प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म की पूजा-अर्चना करने में स्वतंत्र हो। कोई किसी के धार्मिक कार्यों में अड़चन न डाले। 
16- धर्म और ईमान के नाम पर कैसा व्यापार हो रहा है ? 
उत्तर- धर्म और ईमान के नाम पर बड़े-बड़े धर्माचार्य और मठाधीश अपना स्वार्थ सिद्ध करने और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के विरुद्ध भड़काकर उत्पात करा देते हैं, जिससे उनकी गद्दी सुरक्षित रहे और उनकी मनमानी चलती रहे। 
17- लेखक गांधी जी से क्या सीखने के लिए कहता है ? 
उत्तर- लेखक चाहता है कि हम भी गांधी जी से यह सीखें कि हमें अपने जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के अनुसार आचरण करना है, जिससे हम एक अच्छा समाज बना सकें। ऐसे समाज में धर्म के नाम पर उत्पात नहीं होंगे तथा सब परस्पर मिल-जुलकर रहेंगे।
18- अच्छे आचरण वालों के लिए लेखक ने क्या कहा है ? 
उत्तर- यदि कोई नास्तिक या ला-मजहब है, परंतु उसके विचार ऊँचे व अच्छे हैं,. आचरण अच्छा है, जो दूसरों के सुख-दुख का ख्याल रखते हैं और जो मूर्खों को किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए उकसाना बुरा समझते हैं। ईश्वर इन नास्तिकों और ला-मजहब लोगों को अधिक प्यार करेगा और वह अपने पवित्र नाम पर अपवित्र काम करने वालों से यही कहना पसंद करेगा, मुझे मानो या न मानो, तुम्हारे मानने ही से मेरा ईश्वरत्व कायम नहीं रहेगा, दया करके मनुष्यता को मानो पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो !  
19-  पाश्चात्य देशों में धनी और निर्धन में क्या अंतर है ? 'धर्म की आड़' पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए। 
उत्तर- पाश्चात्य देशों में धार्मिकता की भावना को अमीरी और गरीबों के तराजू में तोला जाता है। अमीर तथा गरीब दो अलग-अलग दल बन जाते हैं। अमीर लोग गरीब लोगों का शोषण करते हैं। धनी लोगों की आकाश से छूती अट्टालिकाएँ गरीबों की झोपड़ियों का मज़ाक उड़ाती हैं। गरीबों को लूटकर हो ये लोग अमीर बनते हैं। यह भयंकर अवस्था है। इसी के कारण साम्यवाद व बोल्शेविस्म आदि का पाश्चात्य देशों जन्म हुआ। 
20- धर्म और ईमान के नाम पर किए जाने वाले इस भीषण व्यापार को कैसे रोका जा सकता है ? 
उत्तर- धर्म और ईमान के नाम पर किए जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ विरोध होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक भारतवर्ष में नित्य प्रति बढ़ते जाने वाले झगड़े कम न होंगे। धर्म की उपासना के मार्ग में कोई रुकावट न हो। जिसका मन जिस प्रकार चाहे, उसी प्रकार धर्म की भावना को मन में जगाए। किसी दशा में भी दूसरे व्यक्ति की स्वाधीनता कुचलने या छीनने का साधन न बने। धर्म के ठेकेदारों को अपनी उन दुकानों को बंद करना होगा, जिनमें बैठकर वे लोग गरीबों की भावनाओं से खिलवाड़ का व्यापार करते हैं यदि ऐसा हुआ तो धर्म और ईमान के नाम पर किया जाने वाला व्यापार बंद हो जाएगा। 
21- महात्मा गांधी ने धर्म का क्या स्वरूप बताया ?
उत्तर- महात्मा गांधी ने धर्म को सर्वत्र स्थान दिया है । वे एक पग भी धर्म के बिना चलने को तैयार नहीं थे। उनकी बात ग्रहण करने से पहले प्रत्येक का यह कर्तव्य है कि वह भली-भाँति समझ ले कि महात्मा जी के 'धर्म' का स्वरूप क्या है ? धर्म से महात्मा जी का मतलब धर्म ऊँचे और उदार तत्वों ही का हुआ करता है। ऊँचे और उदार तत्वों से अभिप्राय सदाचार और मानवता में है। उनके मानने में भला किसे एतराज हो सकता है। 
22- कौन-सा कार्य देश की स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाए ? 
उत्तर- स्वाधीनता के क्षेत्र में खिलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचायों को स्थान दिया जाना स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाए। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हमें इसका फल भोगना ही पड़ेगा। धर्म के ठेकेदारों का वह व्यापार जिसके बल पर वे अशिक्षित और भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाते हैं, वह बंद होना चाहिए। मानवता ही सर्वोपरि धर्म है, इसी धारणा का प्रसार होना चाहिए। 
23- मूर्ख लोगों की शक्तियों का दुरुपयोग किस प्रकार किया जा रहा है ? 
उत्तर- हमाने देश में धर्म के नाम पर कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए करोड़ो आदमियों की शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। मूर्ख बेचार धर्म का दुहाइयाँ देते और दीन-दीन चिल्लाते हैं, अपने प्राणों की बाजियाँ खेलते और थोड़े से अनियंत्रित और धूर्त आदमियों का आसन ऊँचा करते और उनका बल बढ़ाते हैं। इस प्रकार का व्यापार बंद होने पर ही शक्तियों का दुरुपयोग नहीं होगा। 
24- पाश्चात्य देशों में धनी लोगों की अट्टालिकाएँ किसका मजाक उड़ाती हैं ? 
उत्तर- पाश्चात्य देशों में धनी लोगों की अट्टालिकाएँ (बड़े-बड़े भवन, इमारतें) गरीबों की झोपड़ियों का मजाक उड़ाती है। गरीबों का खून चूसकर ही इनके महल खड़े किए जाते हैं। उनका सदैव यही प्रयास रहता है कि गरीब शोषित किया जा सके और उसके शोषण के बल पर वे आगे बढ़ते रहें।  पाश्चात्य देशों में धर्म के वर्ग भी धन के आधार पर घंटे हैं। वहाँ धन की मार है। धन दिखाकर करोड़ों को वश में किया जाता है और फिर मनमाना धन पैदा करने के लिए जोर दिया जाता है।

निबंधात्मक प्रश्न 
1- प्रस्तुत निबंध 'धर्म की आड़' का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- 'धर्म की आड़' निबंध के लेखक गणेशशंकर विद्यार्थी हैं। इस निबंध में लेखक ने धर्माचार्यों की स्वार्थ सिद्धि का पर्दाफाश किया है। ये लोग किस प्रकार समाज में एक धर्म के विरुद्ध दूसरे धर्मवालों को भड़काकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। धर्म की आड़ लेकर जनता को भड़काते हैं। लेखक का मानना है कि एक सामान्य व्यक्ति धर्म के रहस्य को नहीं समझ पाता। इसलिए उसके भोलेपन का लाभ तथाकथित धर्मगुरु उठाते हैं। वे उन्हें गुमराह कर दूसरे धर्मवालों से लड़ाते रहते हैं और अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। लेखक ऐसे लोगों से बचकर मानव धर्म को अपनाने पर बल देता है । हम सुख-दुख में एक-दूसरे की सहायता करें। हमारा आचरण शुद्ध हो। हम किसी के धार्मिक अनुष्ठानों में बाधक न बनें। हम सब को अपने-अपने धर्म के अनुसार पूजा-पाठ की स्वतंत्रता हो। यही सच्चा धर्म है । 
2- अच्छे आदमी की पहचान क्या है ? धर्म की आड़ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पाठ में गणेशशंकर विद्यार्थी के विचार प्रकट हुए हैं। लेखक बताते हैं कि अच्छे आदमी की सही पहचान है उसका सदाचरण। जो व्यक्ति भला है, सबकी भलाई चाहता है, सबके कल्याण के लिए कर्म करता है वह अच्छा है।  इसके विपरीत जो धर्म के नाम पर संप्रदाय के नाम पर लोगों को आपस में लड़वाता है, उन्हें एक-दूसरे से अलग करता है, वह धार्मिक होते हुए भी उत्पाती है, मानवता का विरोधी है। लेखक के शब्दों में ऐसे धार्मिक और दीनदार आदमियों से तो, वे लामजहब और नास्तिक आदमी कहीं अधिक अच्छे और ऊँचे हैं जिनका आचरण अच्छा है, जो दूसरों के सुख-दुख का ख्याल रखते हैं और जो मूखों को किसी स्वार्थसिद्धि के लिए उकसाना बहुत बुरा समझते हैं।
3- "उबल पड़ने वाले आदमी का इसमें केवल यही दोष है कि वह कुछ सूझबूझ नहीं रखता और दूसरे लोग उसे देते हैं उधर ही जुत जाता है।" पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति से लेखक का यह आशय है कि कुछ लोग इतने सीधे होते हैं कि सदियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं परंपराओं की ही मानते चले जाते हैं। धर्म के ठेकेदार इस बात का लाभ उठाकर अपनी स्वार्थ सिद्ध करते चले जाते हैं। ऐसे सीधे लोगों में एक यहाँ दोष होता है कि अपनी सूझ-बूझ से काम नहीं लेते और एक ही लीक पर चलते हैं। धर्म में उनका इतना अधिक अंधविश्वास होता है कि उन्हें लगता है यदि वे धर्म के विरुद्ध जाएँगे या परंपराओं में कुछ भी फेर-बदल करेंगे तो उनका अनिष्ट अवश्य हो जाएगा। ये लोग धर्म के पाखंडों में इस प्रकार लिप्त हो जाते हैं कि किसी प्रकार के बदलाव को स्वीकार होना पाते। धार्मिक मान्यताओं में बदलाव न करने के कारण कुछ धर्म के ठेकेदारों के शोषण का शिकार बन जाते हैं । जिसने जिधर धकेल दिया, उधर ही हो जाते हैं। इनकी अपनी सूझ-बूझ न के बराबर होती है यदि कोई इनकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध बोले तो ये क्रोधित हो जाते हैं। लेखक कहते हैं इस प्रकार की परिस्थितियाँ हमारी स्वाधीनता के विरुद्ध है। हमें इनसे लड़ना ही होगा। 
4- "यहाँ बुद्धि का परदा डालकर पहले ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना फिर धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाना, भिड़ाना।" 'धर्म की आड़' पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर-  प्रस्तुत पंक्ति उन धर्माडंबरियों के लिए कही गई हैं जो साधारण लोगों की सूझ-बूझ को सामने नहीं आने देते। मूर्ख और साधारण लोग, जिन्हें अधिक सूझ-बूझ नहीं है, वे ऐसे धर्म ठेकेदारों के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं। ये लोग धर्म के अंधविश्वासों में इस प्रकार लिप्त हो जाते हैं कि किसी भी प्रकार का बदलाव या परिवर्तन इन्हें मान्य नहीं। यदि इन्हें 'कूप-मंडूक' भी कहा जाए तो इस अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी बात का लाभ उठाकर कुछ धनी लोग अपना बल बनाए रखते हैं और वर्चस्व कायम रखते हैं। धर्म के प्रति आस्था को इस प्रकार कूट-कूट कर भर देते हैं कि अपने धर्म के विरुद्ध कुछ भी सुनना इन्हें सहन नहीं होता। इन परिस्थितियों के फलस्वरूप ही तो उत्पातों और सांप्रदायिक दंगों का जन्म होता है। धन और धर्म के रखवाले ये बात भली प्रकार जानते हैं कि यदि इनके अंदर की मानवता जाग गई तो उनकी गद्दी अवश्य छीन जाएगी। धर्म, ईमान और ईश्वर के नाम की दुहाई देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। भोली-भाली जनता इनके मनसूबों को समझ नहीं पाती और इनके हाथों का खिलौना बन जाती है। समाज के समुचित विकास के लिए सीधे-साधे लोगों की बुद्धि पर पड़े पर्दों को हटाना होगा और धर्म के ठेकेदारों की अनुचित मनमानी को रोकना होगा।  
5-  साधारण मूर्ख व्यक्तियों की क्या दशा है और धूर्त उनकी इस दशा का क्या-क्या लाभ उठाते हैं ? 
उत्तर- साधारण मूर्ख व्यक्तियों की यह दशा है कि वे कुछ भी नहीं समझते-बूझते और दूसरे लोग उन्हें जिस दशा की ओर मोड़ते हैं उधर ही मुड़ जाते हैं। यथार्थ दोष है, कुछ चलते-पुरज़े , पढ़े-लिखे लोगों का, जो मूख लोगों की शक्तियों और उत्साह का दुरूपयोग इसलिए कर रहे है कि ऐसा करने से इन्हीं जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्व और बड़प्पन कायम रहे। इसके लिए धर्म और ईमान की बुराइयों से काम लेना इन्हें बहुत आसान लगता है। आसान तो है ही, दूसरों को मूर्ख बनाओ और अपना उल्लू सीधा करो। पाश्चात्य देशों में देखा जाए तो और भी बुरा हाल है। वहाँ धनी लोगों के ऊँचे-ऊँचे महल गरीबों की झोपड़ियों का मजाक बनाते हैं। गरीबों की कमाई से ही वे लोग फलते-फूलते हैं और सदैव उनका यही प्रयास रहता है कि गरीब कभी अपनी आवाज न उठाए और वे लोग निरंतर उसका शोषण करते रहे। गरीब बेचारा चूसा जाता रहे और इनका बाल भी बांका न हो। यह भयंकर परिस्थियाँ हैं। इन्हीं के कारण साम्यवाद, बोल्शेविरम की उत्पत्ति हुई। हमारे अपने देश में साधारण लोगों की  बुद्धि पर परदा डाल दिया जाता है। बुद्धि पर परदा डालकर ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना और फिर धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वार्थ पूर्ति के लोगों को लड़ाना-भिड़ाना ही इन धूर्त लोगो का मकसद बन गया है ।   
6- सबके कल्याण हेतु अपने आचरण को सुधारना क्यों आवश्यक है ? 'धर्म की आड़ पाठ के आधार पर बताएँ ?
उत्तर- समय परिवर्तनशील है। आज समय बदल चुका है। पूजा-पाठ, पाँच समय की नमाज़ या गायत्री मंत्र जपने का नाम धर्म नहीं है। लोग धर्म के पाखंडों की बजाय मानवता का श्रेष्ठ मानते है। आज के समय में शुद्ध आचरण और शिष्टाचार ही धर्म के चिह्न हैं। यदि आप दो घंटे बैठकर पूजा-पाठ करते हैं या पाँचों समय की नमाज़ पढ़ते हैं और फिर उसके बाद आपका बेईमानी का दौर शुरू होता है। आप सारा दिन बेईमानी करके लोगों को लूटते हैं और दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए स्वयं को आज़ाद समझते हैं, तो इस धर्म को आगे आने वाला समय कदापि टिकने नहीं देगा। ये वास्तव में धर्म नहीं, धर्म के नाम पर लोगों का अंधविश्वास है। अब पूजा-पाठ को महत्व न देकर भलमनसाहत और अच्छाई देखी जाएगी। जो जितना अधिक भला मानस है, उसका धर्म उतना ही ऊँचा माना जाएगा। सबके कल्याण के लिए अपने आचरण को सुधारना होगा। यदि आचरण को सुधारा नहीं जाएगा तो नमाज, रोजे, पूजा-पाठ द्वारा  आप देश के अन्य लोगों की आजादी तो छीनेंगे ही, साथ-ही-साथ उत्पातों को भी जन्म मिलेगा। चाहे आप आस्तिक (ईश्वर को मानने वाला) न होकर नास्तिक (ईश्वर को न मानने वाला) हैं, तो भी यदि आपका आचरण अच्छा है तो आप सच्चा धर्म का पाठ पढ़ना जानते हैं। ईश्वर का ईश्वरत्व केवल आस्तिकों की आस्था का गुलाम नहीं है। ईश्वर का ईश्वरत्व तो मानव-मात्र की भलाई में है। समाज कल्याण में है। शुद्ध आचरण में है और सदाचार में है । 



Friday, 4 February 2022

कविता- पहरुए सावधान रहना/Phuruy Savdhan Rhna KAVITA

पहरुए सावधान रहना - लेखक गिरिजाकुमार माथुर 

सारांश :
इस कविता में कवि ने देश के रक्षक और सीमा पर पहरेदारों को देश की रक्षा व देश में आने वाले समय में नव-निर्माण के लिए प्रेरित किया है। देश को आज़ाद करवाने के लिए देश के कितने ही स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। स्वाधीनता संग्राम में न जाने कितने ही लोगों का लहू बहा तथा कितनी ही घोर यातनाओं को सहकर हमारे देश भारत ने जो स्वतंत्रता प्राप्त की उसे हमें सांप्रदायिक एकता, मानव प्रेम, देश प्रेम तथा नैतिकता के बल पर सुरक्षित रखना है। कवि इस कविता को देश की एकता अखंडता के लिए समर्पित युवा पीढ़ी को जिन्हें अब देश की बागडोर अपने सबल हाथों में सँभालकर रखनी है, समर्पित करते हुए उन्हें सावधान करना चाहता है कि वे भविष्य में भी भारत की अखंडता का स्वर उच्च रखें ताकि कोई शत्रु इस ओर आँख उठाकर देखने का साहस न कर सके।

कविता की व्याख्या 
1. आज जीत की रात --------------------------  पहरुए, सावधान रहना।।
व्याख्या : कवि इन पंक्तियों के माध्यम से देश के पहरेदारों से कहते हैं कि देश के पहरेदारों! आज जीत की रात है। देश की रक्षा के लिए सावधान रहना। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद देश के कई बंद दरवाज़े खुल गए हैं। उसमें तुम स्थिर दीपक के समान गतिहीन होकर प्रकाश करते रहना। हमें मिली स्वतंत्रता नए स्वर्ग को पाने की पहली मंजिल है। लोगों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किया आंदोलन बिलकुल उस सुनहरे अवसर के समान है जो रत्न से भरी जल तरंग के जैसा है। अभी तो हमें जीवन के विकास व समृद्धि और देश के पुनः निर्माण अर्थात नवनिर्माण के लिए बहुत कुछ करना है। पराधीन भारत को गुलामी के कारण बहुत हानि उतनी पड़ी है परंतु आज़ादी के बाद भी वह की काली छाया बनी हुई है अर्थात आज भी कई बड़ी समस्याएँ हैं जिनका समय रहते हल नहीं निकला गया तो वे हमारे देश को कमज़ोर को बना देंगी। इस नए युग रूपी नाव की पतवार को लेकर तुम सागर के समान महान बनकर इस देश की बड़ी सावधानी से रक्षा करो। पहरेदारों, देश के रक्षकों तुम सावधान रहना। 

2. विषम शृंखलाएँ टूटी हैं ----------------------------पहरुए सावधान रहना।।
व्याख्या : गुलाम भारत के समय जो भीषण परिस्थितियाँ बाधा बनी हुई थीं, इस समय वो दूर हो चुकी हैं और अब हम सभी दिशाओं में आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। लंबे समय से बँधी हुई हवाएँ अब खुल कर प्रचंड होकर चलने लगी हैं। हमारी सीमाएँ जो हमसे ले ली गई यानी जिन्हें हमसे छीन लिया गया आज वो प्रश्नचिह्न बनकर हमारे सामने खड़ी हैं। अंग्रेजों द्वारा बनाई प्रतिमाएँ आज टूट गई हैं और उनकी जगह नए प्रतीक बन रहे हैं। अब हम प्रगतिपथ पर आगे बढ़ रहे हैं, इस प्रगति के तूफान को तुम चंद्रमा की तरह प्रकाशमान होकर आगे बढ़ाओ। देश के रक्षको सावधान रहकर देश की रक्षा करो। 

3. ऊँची हुई मशाल हमारी ------------------------------पहरुए, सावधान रहना।।कवि कहते हैं 
व्याख्या : कवि कहते हैं कि आज़ादी तो पा ली हमने परंतु अब हमें कठिन रास्ते पर चलना है। अब हमें विकास की राह पर आगे बढ़ना है। रास्ता कठिन और अंधकार भरा है परंतु इस रास्ते पर चलने के लिए और आगे राह देखने के लिए हमने अपनी मशाल ऊँची कर दी है। भले ही हमारे देश से शत्रु चले गए हैं परंतु उनकी छाया, उनकी परछाई से हमें सावधान रहना है, सतर्क रहना है। शत्रु के दिए शोषण हमारा देश और समाज मृत जीवन जी रहा है परंतु अब हमें अभावग्रस्त व कमज़ोर देश में, समाज में प्रगति करनी है। देश की जनसमूह रूपी गंगा में नया उत्साह उत्पन्न हुआ है अर्थात लोगों में एक नया जोश भर गया है। देश के पहरेदारों तुम इस जनसमुदाय रूपी गंगा में लहर बनकर ऐसे अच्छी तरह प्रवाह दो, एक गति दो। देश के पहरेदारों! देश के रक्षकों! सावधानी से देश की सुरक्षा करो। 

अभ्यास प्रश्न :
* निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
प्रश्न 1- 'पहरुए सावधान रहना' कविता के रचियता का नाम बताइए। 
उत्तर- 'पहरुए सावधान रहना' कविता 'गिरिजाकुमार माथुर' द्वारा रचित है। 
प्रश्न 2 - इस कविता में कवि किससे सावधान रहने को कह रहा है ?
उत्तर- कवि देश के शत्रुओं और भीतरी समस्यों से सावधान रहने को कह रहा है। 
प्रश्न 3 - आपके विचार से यह कविता कब लिखी गई होगी ?
उत्तर- हमारे विचार से यह कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लिखी गई है। 
प्रश्न 4- इस कविता का संदेश क्या है ?
उत्तर- इस कविता के माध्यम कवि यह संदेश देना चाहते हैं कि हमें अपने देश की सांप्रदायिक एकता, मानव प्रेम, देशप्रेम और नैतिकता को सदा बनाए रखना है। देश को प्रगति पथ पर आगे ले जाने के लिए सबको साथ मिलकर चलना होगा। देश ने यह आज़ादी बहुत बलिदान देकर पाई है। इन बलिदानों बहुमूल्य समझते हुए ज़रूरत पड़ने पर हमें भी देश के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। देश के लोगों को सावधान रहते हुए अपने देश की रक्षा करनी है। 
प्रश्न 5- विषम शृंखला टूटने से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर- पराधीनता के समय जो भीषण परिस्थितियाँ हमारी राह में, हमारे विकास में बाधा बनी हुई थीं,  आज़ादी मिलने के बाद वे बाधा रूपी जंजीरें टूट चुकी हैं। अब हमारा देश हर दिशा में विकास करने को आगे बढ़ने को तैयार है। गुलामी के कारण देश का जो विकास रुक गया था अब पूरी गति से देश का स्वतंत्र विकास होगा। 
प्रश्न 6- 'शत्रु हट गए, लेकिन उसकी छायाओं का डर है'- इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर- इन पंक्तियों का यह अर्थ है कि आज़ादी प्राप्त करने के बाद देश शत्रुओं से तो मुक्त हो गया है परंतु उनकी छाया के रूप में साम्प्रदायिकता, जाति के नाम पर भेदभाव आदि देश की समस्याएँ कभी सर उठा सकती हैं और देश को कमज़ोर कर सकती हैं।  

 
 

Wednesday, 2 February 2022

CLASS 6,7Anuchched Lekhn /अनुच्छेद लेखन

अनुच्छेद लेखन 
अनुच्छेद लेखन एक कला है। इसमें एक ही विषय पर सीमित शब्दों में वाक्यों को प्रस्तुत किया जाता है। शब्द संख्या अत्यंत सीमित होने के कारण अनुच्छेद लेखन में विशेष सतर्कता (सावधानी) रखनी चाहिए। 

अनुच्छेद लिखते समय ध्यान रखने योग्य बातें :
1.अनुच्छेद अधिक से अधिक १०० शब्दों का होना चाहिए। 
2. विषय को स्पष्ट करने के लिए वाक्य क्रम सोच लेना चाहिए। 
3. वाक्य छोटे-छोटे और एक-दूसरे से जुड़े होने चाहिए। 
4. अनुच्छेद की भाषा स्पष्ट, सरल, रोचक तथा शुध्द होनी चाहिए।
5. अनुच्छेद लिखने के बाद उसे एक बार जरूर पढ़ें ।

अनुच्छेद लेखन के उदाहरण :

                                  हमारे राष्ट्रीय पर्व 
संकेत-बिंदु :  * पर्व और उसके रूप        * राष्ट्रीय पर्व          *संदेश 

भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है । इसके दो राष्ट्रीय पर्व विशेष हैं। ये दोनों भारत में रहने वाले हर वर्ग और संप्रदाय के द्वारा पूजनीय हैं। 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ था। हमने वर्षों बाद आज़ादी की खुली हवा में साँस ली थी। इस दिन हर भारतवासी का सीना गर्व से चौड़ा और माथा उन्नत हो गया था। तब से आज तक यह दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। यह दिवस गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन दोनों विशेष पर्वों के अतिरिक्त हम भारत की स्वतंत्रता के प्रमुख सेनापति महात्मा गांधी का जन्मदिन, 2 अक्तूबर भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं। ये तीनों पूर्व भारत में प्रतिवर्ष पूर्ण उत्साह व जोश से मनाए जाते हैं। ये भारतवासियों के दिल में देश-प्रेम की भावना जगाते हैं और संदेश देते हैं- स्वदेश के लिए जिओ और अपने देश के हित में प्राण न्योछावर कर दो।

                               मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन 
संकेत बिंदु :  *जीवन का अच्छा दिन       * जीवन का बुरा दिन       *भाई से मिलने का खुशी 

मनुष्य के जीवन का हर दिन एक समान नहीं होता। जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। कई दिन तो इतने बुरे बीतते हैं कि हम उन्हें भूल जाना चाहते हैं, परंतु कुछ दिन ऐसे होते हैं जिन्हें हम अपनी यादों में सदा के लिए संजोकर रख लेना चाहते हैं। उन्हें याद करने मात्र से ही हमें सुख और खुशी का एहसास होता है। मेरे अब तक के जीवन में भी कई दिन आए और गए, परंतु 6 जून, 2021 मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन था। उसे मैं सदा अपनी यादों में सँजोकर रखना चाहती हूँ। नानी जी ने मेरा माथा चूमते हुए बताया कि मेरा भाई आया है। मैं तो खुशी से झूम उठी। मुझे लगा, आज मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि मैं भगवान से भाई के लिए रोज़ प्रार्थना करती थी। अब रक्षाबंधन के दिन मैं भी अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधा करूँगी। यह सोचकर मन खुशी से नाचने लगा। मैं अपनी नानी से जल्दी अस्पताल चलने के लिए कहने लगी, क्योंकि मुझे अपने देखना था। अस्पताल पहँचकर सब लोगों ने मुझे प्यार दिन मैं भी अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधा करुँगी। यह सोचकर मन खुशी से नाचने लगा। मैं अपनी नानी से जल्दी अस्पताल चलने के लिए कहने लगी, क्योंकि मुझे अपने भाई को देखना था। अस्पताल पहुँचकर सब लोगों ने मुझे प्यार किया और बधाई दी। लोगों में मिठाई बाँटी गई। चारों ओर खुशी का माहौल था। मैं तो फूली न समाई और यही मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन था। वह दिन मेरे मन के आकाश में चाँद-तारे और सूरज की भाँति सदा चमकता रहेगा । 

                                      अनुशासन 
संकेत-बिंदु:  * अनुशासन का अर्थ     * परिवार और अनुशासन      *अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम 

अनुशासन का अर्थ है- नियम पालन। परिवार अनुशासन की पहली पाठशाला है। बच्चा अपने परिवार में जैसा देखता है, वैसा ही सीखता है। जो माता-पिता अपने बच्चों को अनुशासन में देखना चाहते हैं, वे स्वयं अनुशासन का पालन करते हैं। विद्यार्थी जीवन में अनुशासन अनिवार्य है। जो छात्र अपने जीवन को अनुशासित कर लेते हैं, रंग-बिरंगी दुनिया की चमक और उसके विभिन्न आकर्षणों से वे स्वयं को बचा लेते हैं। आज विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में अनुशासनहीनता का बोलबाला है। जो विद्यालय विद्या के मंदिर माने जाते थे, आज अनुशासनहीनता को प्राप्त हुए उसके छात्र अनेक दुष्कर्मों में लिप्त होकर अपने जीवन की बलि चढ़ा रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज देश के नौजवान, जिन्हें राष्ट्र की धरोहर कहा जाता है, अनुशासनहीनता का शिकार होकर अपने जीवन के श्रेष्ठतम समय को व्यर्थ गँवा रहे हैं।

Saturday, 29 January 2022

विलोम शब्द (Antonyms)


विलोम शब्द /विपरीतार्थक शब्द 
जो शब्द एक-दूसरे से उलटा अथवा विपरीत अर्थ देते हैं, उन्हें विलोमार्थी या विपरीतार्थक शब्द कहते हैं।
       
           सुगंध                              दुर्गंध 

                                                                                 बूढ़ा                                जवान 

   
           जीत                              हार 

   
             गर्म                                  ठंडा  
कुछ प्रमुख विलोम शब्द -

 शब्द                                     विलोम 
1.अँधेरा                    -             उजाला 
2.अंधकार                -              प्रकाश 
3. मौखिक                -              लिखित 
4.रक्षक                     -             भक्षक 
5.विशाल                  -              लघु 
6.समान                   -             असमान 
7.जीवित                  -               मृत 
8.स्वच्छ                   -               दूषित 
9.पाप                      -               पुण्य 
10.प्रेम                     -               घृणा 
11.क्रय                     -               विक्रय 
12.पक्ष                      -               निष्पक्ष 
13.सरस                   -               नीरस 
14. स्वतंत्र                 -               परतंत्र 
15.युवा                    -                 वृद्ध 
16.शीत                   -                 उष्ण 
17.धीर                    -                 अधीर 
18.अमीर                 -                 गरीब 
19.धर्म                    -                  अधर्म 
20.निंदा                   -                  स्तुति 
21.यश                    -                  अपयश 
22.ज्ञान                    -                  अज्ञान 
23.पुरस्कार             -                   दंड 
24.विशिष्ट                -                   साधारण 
25.सावधान              -                   लापरवाह 
26.शांति                   -                   युद्ध 
27.दयालु                  -                   निर्दय 
28.प्रथम                   -                  अंतिम 
29.तरल                   -                   ठोस 
30.भूत                     -                   भविष्य 
31.बलवान                -                  शक्तिहीन 
32.सज्जन                 -                   दुर्जन 
33.सचेत                   -                   मूर्च्छित 
34.जय                      -                  पराजय 
35.हार                      -                   जीत 
36.जड़                      -                  चेतन 
37.क्रोध                     -                  क्षमा 
38.सुगंध                    -                  दुर्गंध 
39.जीवन                   -                  मरण 
40.उपस्थित               -                  अनुपस्थित 
41.उधार                    -                  नकद 
42.जन्म                     -                   मृत्यु 
43.उत्तर                     -                  दक्षिण 
44.गुण                       -                   दोष/ अवगुण 
45.उत्तीर्ण                   -                   अनुत्तीर्ण 
46.अमृत                    -                    विष 
47.ईमानदार               -                    बेईमान 
48.उदय                     -                    अस्त 
49.आलसी                  -                    उद्धमी  
50.एक                        -                   अनेक 
51.आदान                   -                    प्रदान 
52.ऊँचा                      -                    नीचा 
53.प्रातः                       -                    सांय 
54.प्राचीन                    -                     नवीन 
55.धनवान                   -                     निर्धन 
56.सबल                      -                     निर्बल 
57.मधुर                       -                     कटु 
58.आकाश                  -                      पाताल 
59.सच                        -                       झूठ 
60.साक्षर                     -                       निरक्षर 
61.,बंधन                     -                       मुक्ति 
62.सुपुत्र                      -                       कुपुत्र 
63.अपना                    -                        पराया 
64.अच्छा                    -                        बुरा 
65.प्रश्न                        -                        उत्तर 
66.हानि                      -                        लाभ 
67.आस्तिक                -                        नास्तिक 
68.मूक                       -                       वाचाल 
69.आवश्यक               -                       अनावश्यक 
70.लघु                        -                        दीर्घ 
71.सौभाग्य                  -                        दुर्भाग्य 
72.निर्भय                     -                        भयभीत 
73.कोमल                    -                        कठोर 
74.निर्माण                    -                        विनाश 
75.उचित                     -                        अनुचित 
76.वीर                         -                         कायर 
77.मित्र                         -                        शत्रु 
78.उन्नति                      -                        अवनति 
79.दुर्गम                       -                         सुगम 
80.साकार                    -                          निराकार 
81.आशा                      -                          निराशा 
82.हल्का                      -                          भारी 
 
1. निम्नलिखित शब्दों का विलोम/विपरीतार्थक शब्दों से मिलान कीजिए -
क) प्रसन्न                                        अंधकार 
ख ) मित्र                                          गीला 
ग) प्रकाश                                        अप्रसन्न 
घ) अमीर                                          भारी 
ङ)हल्का                                           गरीब 
च) अच्छा                                           शत्रु 
छ) सूखा                                            बुरा 
ज) ठंडा                                             उत्तर 
झ) प्रश्न                                               गर्म/गरम 
ञ) अपना                                           साफ 
ट) गंदा                                               पराया
 

2. मोटे लिखे शब्दों के विलोम शब्दों से खाली स्थान भरिए  -
क) यहाँ कौन अपना  है कौन------------ कहना मुश्किल है।  
ख) वहाँ सर्वत्र अंधकार फैला था, -------------  का नामोनिशान भी न था। 
ग) सभी मानव समान हैं, कोई बड़ा नहीं कोई -------------- नहीं।  
घ) जीवन में कभी आशा का उजाला रहता है कभी--------------  का अँधेरा। 
ङ) सब से प्रेम रखो, किसी से--------------- न करो। 
च) आग और -------------का मेल नहीं हो सकता।
छ) हमें -----और नीच का भेदभाव नहीं करना चाहिए। 
ज) जीवन में लेना -------------तो लगा रहता है। 
झ) आपके लिए ठंडा लाऊँ या-------------। 

3. वाक्य में दिए गए विलोम शब्दों को छाँटकर लिखिए -
क) बर्फ़ जल का ठोस रूप है और पानी तरल रूप। 
ख) निम्नलिखित मौखिक प्रश्नों के लिखित रूप में उत्तर दीजिए। 
ग) प्रत्येक मानव में गुण-अवगुण होते हैं। 
घ) चोर को पकड़ने के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया। 
ङ) उन्नति और अवनति हमारे परिश्रम पर निर्भर करते हैं। 
च) गांधी जी ने हमें हिंसा का पाठ पढ़ाया अहिंसा का नहीं। 
छ) गाँव में अधिकतर लोग निरक्षर होते हैं और शहर में साक्षर ऐसा सोचना गलत है। 
ज) सभा में कुछ लोग मेरे परिचित थे किंतु शीघ्र ही अपनी बातों से मैंने अपरिचित लोगों को भी परिचित बना लिया। 
झ) सत्य की हमेशा जय होती है और असत्य की पराजय। 
ञ) जो दूसरों का अपमान करता है वह दूसरों से सम्मान कैसे पा सकता है ?
ट) आस्तिक लोग आशावादी होते हैं और नास्तिक लोग निराशावादी। 

4. अ' तथा 'अन' उपसर्ग की सहायता से विलोम शब्द बनाइए- 
 i.  आदर 
 ii. सहयोग 
iii. सहमत
iv. उत्तीर्ण 
v. स्वस्थ 
vi. हित 
vii. नियंत्रित 
viii. साधारण 
ix. उपयोगी 
x. आदि
xi. सफल  
xii. एक 
xiii. उदार 
xiv. इच्छा
xv. संतोष
xvi. संभव   

5. नीचे दिए शब्द का उचित विलोम शब्द छाँटिए -
i. राजा-         गरीब         रंक         अमीर            मंत्री 
ii. सफल -    फलदार    फलहीन      निष्फल      असफल 
iii. देश -      पृथ्वी          प्रदेश         स्वदेश          विदेश 
iv. आकाश - पृथ्वी         धरती        पाताल          मृत्युलोक 
v. कोमल -    मधुर        मुलायम     कड़वा           कटु 
vi. पुत्र -       बेटी           पुत्री           बेटा              आत्मजा  

6. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति कोष्टक में दिए गए शब्द से उचित विलोम शब्द से कीजिए-
 i. अचानक बत्ती के जाते ही ----------छा गया।   (प्रकाश)
 ii. हमेशा ----------वचन बोलने चाहिए।              (कटु) 
iii. यह सभी मेरे ------------अनन्य हैं।                (शत्रु)
iv. हमारा देश अनेक वर्षों तक------------ रहा है। (स्वतंत्र)
v. -------------- लोगों से कभी दोस्ती नहीं करनी चाहिए।  (ज्ञानी)
vi. रोज-रोज का ये-----------  अच्छी बात नहीं। (सम्मान)
vii. यह गिलास बिल्कुल------------- है।             (पूर्ण)
viii. दिनेश बहुत--------------- लड़का है।  (अभागा)

   



Thursday, 27 January 2022

DAV Class 6 Lesson10 YOGYH SHISHYH/दशम : पाठ -योग्य : शिष्य :

योग्य : शिष्य :  
 एकस्मिन् आश्रमे एकः आचार्य : वसति स्म । तेन सह शिष्याः अपि वसन्ति स्म। सर्वे शिष्याः गुरोः आदरं कुर्वन्ति स्म। ते शिष्या परिश्रमिण: आज्ञाकारिण: विनयशीला: च आसन् । एकदा आचार्य अचिन्तयत् सर्वेषु शिष्येषुकः योग्य ? इति चिन्तयित्वा सः सर्वान् शिष्यान् आहूय सर्वेभ्यः एकम् एकम् कपोतम् अयच्छत्। सः तान् अवदत्- " स्वं स्वं कपोतं कुत्रचित् एतादृशे स्थाने मुञ्चन्तु यत्र कोऽपि भवतः न पश्यतु ।"
अनुवाद :-  एक आश्रम में एक गुरु रहते थे। उनके साथ शिष्य भी रहते थे। सभी शिष्य गुरु का आदर करते थे। वे शिष्य परिश्रमी, आज्ञाकारी और विनयशील थे। एक बार गुरु ने सोचा कौन मेरा योग्य शिष्य है? ऐसा सोचकर उसने सभी शिष्यों को बुलाकर सभी को  एक-एक कबूतर दिया। वह उनसे बोले - अपने-अपने कबूतर को इस तरह के स्थान पर छोड़े जहाँ कोई भी तुम्हें न देखे। 

सर्वे शिष्याः कपोतान् गृहीत्वा आश्रमात् बहि: अगच्छन्। किञ्चित् कालस्य पश्चात् सर्वे शिष्याः कपोतान् मोचयित्वा आश्रमम् आगच्छन् । परन्तु एक: शिष्य: स्वं कपोतं न अमुञ्चत्।  गुरु: तम् अपृच्छत् - "वत्स ! त्वं कपोतं किमर्थं न अमुञ्यः ?"
अनुवाद :- सभी शिष्य कबूतरों को लेकर आश्रम से बाहर गए। कुछ समय बाद सभी शिष्य कबूतरों को छोड़कर आश्रम में वापस आए। लेकिन एक शिष्य ने अपने कबूतर को नहीं छोड़ा। गुरु ने उससे पूछा- वत्स! तुमने कबूतर को कौन नहीं छोड़ा। 

 शिष्यः अवदत्- "गुरुवर! अहं तादृशं स्थानं न अपश्यम् यत्र कोऽपि मां न पश्यति ।" गुरुः पुनः अवदत्- "कस्मिंश्चित् एकान्ते स्थाने गत्वा एतं कपोत मुञ्च।" 
शिष्यः अवदत्- "गुरुवर! एकान्ते अपि अहं स्वकार्य पश्यामि। सूर्य: चन्द्र:  वृक्षाः पादपाः इत्यादयः अपि सर्वे मां पश्यन्ति। कुत्रापि एकान्तं स्थानं न अस्ति।" 
एतत् श्रुत्वा गुरुः अतीव प्रसन्नः अभवत्। सः तं शिष्यम् अकथयत्- भवान् एव मम योग्यः शिष्यः अस्ति।
अनुवाद :- शिष्य बोला - गुरु जी! मुझे  ऐसा स्थान नहीं मिला जहाँ कोई भी मुझे देखता न हो। 
गुरु ने फिर से कहा - किसी एकांत स्थान पर जाकर इसे छोड़ो। 
शिष्य ने कहा - हे गुरु! एकांत में भी मैं अपने कार्य को देखूँगा। सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे इत्यादि भी सभी मुझे देखते हैं। कहीं भी एकांत स्थान नहीं है। 
ऐसा सुनकर गुरु बहुत अधिक प्रसन्न हुए। वह उस शिष्य से  बोले- तुम ही मेरे योग्य शिष्य हो। 

अभ्यासः 
1. प्रश्नान् पठित्वा वदन्तु लिखन्तु च 'आम् ' अथवा 'न'-
(i) किम् आचार्य: आश्रमे वसति स्म ?                                    
 उत्तर - आम् 
(ii) किम् आचार्य: शिष्येभ्य : काकम् अयच्छत्?                     
 उत्तर -  न
(iii) किं सर्व शिष्यः स्वं स्वं कपोतम् अमुञ्चन् ?                      
 उत्तर  -  न
(iv) किं शिष्या: आश्रमात् बहिः अगच्छन् ?                              
 उत्तर - आम् 
(v) किं सूर्य: चन्द्रः वृक्षाः पादपाः इत्यादय सर्व अस्मान् पश्यन्ति ? 
 उत्तर - आम् 

2. उचित पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पुरयन्तु -
    ( कपोतन्  एकान्तं  अमुञ्चन्   शिष्येभ्यः  कपोतं  अकथयत्)
(i)  एकदा आचार्य: सर्वेभ्यः  शिष्येभ्यः एकम् एकम् कपोतम् अयच्छत्। 
(ii)  आचार्य: तान् अकथयत्   यत् स्वं स्वं कपोतं एकान्ते स्थाने मुञ्चन्तु। 
(iii) सर्वे शिष्याः कपोतान् गृहीत्वा आश्रमात् बहि: अगच्छन्।
(iv)  ते सर्वे  कपोतन् अमुञ्चन्। 
(v)  एक: शिष्य: स्वं कपोतं न अमुञ्चत्।
(vi) सः कुत्रापि एकान्तं स्थानं न अपश्यत्।

3. विपरीतार्थकं पदं चित्वा लिखन्तु-
   ( आगत्य    अन्तः    पूर्वम्    अयोग्याः   एतादृश्यम्    मोचयित्वा )
(i) योग्याः        -        अयोग्याः    
(ii) तादृशम्     -        एतादृश्यम्
(iii) गृहीत्वा     -        मोचयित्वा
(iv) बहिः         -         अन्तः 
(v) पश्चात्         -          पूर्वम्  
(vi) गत्वा         -         आगत्य  

4. एतेषाम् प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन वदन्तु लिखन्तु च-
(i) आचार्य: कान् आहूतवान् ?
उत्तर-  शिष्यान् 
(ii) आचार्य: शिष्येभ्यः किम् अयच्छत् ?
उत्तर- कपोतम् 
(iii) सर्वे शिष्याः कपोतान् गृहीत्वा कुत्र अगच्छन् ?
उत्तर-  आश्रमात् बहि: 
(iv) एक: शिष्य: कं न अमुञ्चत्?
उत्तर- कपोतम् 
(v) कः अतीव प्रसन्नः अभवत् ? 
उत्तर- गुरुः
 
5. एतेषाम् प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु -
(i) आचार्य: कान् अकथयत् ? 
उत्तर- आचार्य: सर्वान् शिष्यान् अकथयत्।
(ii) आचार्य: किम् अकथयत् ?
उत्तर- आचार्य: अकथयत् - स्वं स्वं कपोतं कुत्रचित् एतादृशे स्थाने मुञ्चन्तु यत्र कोऽपि भवतः न पश्यतु।
(iii) कः स्वकपोतं न अमुञ्चत् ?
उत्तर- एक: शिष्य: स्वं कपोतं न अमुञ्चत्।
(iv) अस्माकं कार्याणि के पश्यन्ति ?
उत्तर- अस्माकं कार्याणि सूर्य: चन्द्र:  वृक्षाः पादपाः इत्यादयः पश्यन्ति।
(v) शिष्याः कपोतान् मोचवित्या कुत्र आगच्छन् ? 
उत्तर- शिष्याः कपोतान् मोचवित्या आश्रमम् आगच्छन्। 

6. स्थूलपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु- 
 i) आचार्य: स्वशिष्यान्  परीक्षते स्म। 
उत्तर- कः स्वशिष्यान् परीक्षते स्म ?
(ii) आचार्य: शिष्येभ्यः कपोतम् अयच्छत्। 
उत्तर- आचार्य: केश्यः कपोतम् अयच्छत्? 
(iii) शिष्याः कपोतम् गृहीत्वा अगच्छन् । 
उत्तर- के कपोतम् गृहीत्वा अगच्छन् ? 
(iv) शिष्याः कपोतान् अमुञ्चन्। 
उत्तर- शिष्याः कान् अमुञ्चन् ?
(v) गुरु: अतीव प्रसन्नः अभवत् । 
उत्तर- कः अतीव प्रसन्नः अभवत् ? 
(vi) गुरु:  शिष्येषु स्नियति । 
उत्तर- गुरु: केषु स्नियति ? 

7. अधोलिखितानि वाक्यानि कथाक्रमानुसारेण लिखन्तु- 
(i) एकदा आचार्यः शिष्येभ्यः कपोतान् दत्वा एकान्ते स्थाने मोचयितुम् अकथयत्। 
(ii)  एकः शिष्यः स्वं कपोत न अमुञ्चत् । 
(iii) एक आचार्य आश्रमे वसति स्म। 
(iv) स: अकथयत् अहं कुत्रापि एकान्त स्थान न अपश्यम् । 
(v) तेन सह शिष्याः अपि वसन्ति स्म । 
(vi) सर्वे शिष्या कपोतान् अमुज्यन्। 
उत्तरम्-
(i) एक आचार्य आश्रमे वसति स्म। 
(ii) तेन सह शिष्याः अपि वसन्ति स्म। 
(iii) एकदा आचार्यः शिष्येभ्यः कपोतान् दत्वा एकान्ते स्थाने मोचयितुम् अकथयत्। 
(iv) सर्वे शिष्या कपोतान् अमुज्यन्। 
(v) एकः शिष्यः स्वं कपोत न अमुञ्चत्। 
(vi) स: अकथयत् अहं कुत्रापि एकान्त स्थान न अपश्यम्।