HINDI BLOG : स्वदेश प्रेम....भावार्थ .(KAVITA) कवि 'माखनलाल चतुर्वेदी'

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Saturday, 17 April 2021

स्वदेश प्रेम....भावार्थ .(KAVITA) कवि 'माखनलाल चतुर्वेदी'


 कविता
सेवा में -----------------------पाएँगे हम। 
                                                                            
कविता का भावार्थ-  

'स्वदेश प्रेम' कविता के माध्यम से कवि 'माखनलाल 'चतुर्वेदी' भारत की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि इस मातृभूमि की सेवा में  हमें पूरे तन-मन से करनी  चाहिए क्योंकि इस धरती की सेवा करते हुए, इसे विकास के मार्ग पर ले जाते हुए इसे स्वर्ग के समान अर्थात उसके भाई का स्थान प्रदान करेंगे।
 कवि कहते हैं कि इसी धरती पर हमने जन्म लिया। इसी धरती ने हमारा पालन किया है। 
 इस धरती का उपकार हम पर इतना ज़्यादा  है कि हम उसे भूल भी नहीं पाएँगे। 
इस धरती ने  इतने उपकार किए हैं कि हम कौन-कौन से उसके उपकार गिनाएँ? 
इस धरती के उपकारों का ऋण उतारने का  हम पूरा प्रयत्न करेंगे पर शायद ही हम इस  ऋण को उतार पाएँ।
 कवि  लोगों में  देश प्रेम की भावना जगाते हुए कहते हैं कि तेरे लिए ही हम जिएँगे और तेरे लिए ही अपने प्राणों का बलिदान कर देंगे। 
हे भारत! तेरी ही सेवा में हम अपना सारा जीवन बिताएँगे क्योंकि तू ही हमारा स्वर्ग है, तू ही हमारा मित्र और  हमारा घर है। इस विश्व में भारत जैसी पवित्र भूमि कही नहीं है। यह धरती स्वर्ग के समान पवित्र है।  
इसी  पवित्र धरती से ही हमारा प्रेम का नाता है,जो चाह कर भी छूट नहीं सकता। इसलिए इसी धरती को हम स्वर्ग के समान सुंदर बनाएँगे। 
कवि कहते हैं कि जो इस धरती पर जन्म लेकर भी अभी तक  भ्रम और अहंकार से भरे हुए हैं और अपने कर्तव्य से दूर हैं। 
उन प्यारे फूलों में अर्थात उन लोगों में  देश प्रेम की भावना हम भरेंगे। 

हम  उन शत्रुओं  का घमंड तोड़ेंगे जिनके अंदर अहंकार भरा हुआ है जो भारत की छवि को खराब  करने का  प्रयास करते हैं। 
भारत की  संस्कृति को ठेस पहुँचाने का प्रयास करते हैं। कवि  ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं अब हमें तुम ही पूर्ण व  पवित्र बल प्रदान करो जिससे हम अपने शत्रुओं का अहंकार तोड़ सके। 
अपने देश को विकास के मार्ग पर  ले जाने और देश में एकता में बनाए रखने के लिए हमे आपके शेयर की आवश्यकता है।  
आप के सहारे के बिना हम इस धरती के लिए कुछ भी नहीं कर पाएँगे। 
कवि इस कविता के माध्यम से देशप्रेम और सेवाभाव की भावना देशवासियों के सामने प्रकट कर रहे हैं और सभी देशवासियों से यही उम्मीद करते हैं  कि सभी देशवासी अपनी  संस्कृति व धरती का सम्मान करें।
 भारत की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है। हमें अपने देश पर गर्व होना चाहिए।


कविता से संबंधित प्रश्न-उत्तर :

1.कवि देश के लिए क्या करना चाहते हैं ?

उत्तर- कवि  देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि वह अपना तन-मन सभी कुछ अपने देश पर कुर्बान कर दें क्योंकि इस देश ने ही उनका पालन पोषण किया है। यह मातृभूमि हमें जान से भी प्यारी है।  हमें भारत देश ने ही उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाया है। 


2. कवि 'बेहोश पड़े हैं' जो पंक्ति के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर- 'बेहोश पड़े हैं' पंक्ति से कवि का तात्पर्य है कि जो लोग अभी तक देश के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे या देश के विकास में अपना सहयोग नहीं दे रहे हैं,उन्हें जाग जाना चाहिए। साथ ही यह पंक्ति उन लोगों की ओर भी संकेत कर रही है जो देश में अराजकता फैलाते हैं। कवि कहते हैं कि उन्हें अब होश में आ जाना चाहिए क्योंकि भारतवासी एक हैं और भारत की एकता और अखंडता को कोई भी तोड़ नहीं सकता। 

3. इस कविता का मुख्य संदेश क्या है ?

उत्तर- 'स्वदेश प्रेम' कविता से हमें यह संदेश मिलता है कि भारतवासी होने के नाते हमें अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए और जरूरत पड़ने पर अपने देश के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर देनी चाहिए। 

4.कवि  ईश्वर से क्या माँग रहे हैं ?

उत्तर- कवि ईश्वर से कहते हैं कि हे ईश्वर हमें ऐसा पवित्र बल दो, शक्ति दो जिसके बल से हम अपने देश के रक्षा कर सकें। हम उस शक्ति के सहारे अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकें।  बिना आपके सहारे के हम अपने देश के लिए कुछ नहीं कर पाएँगे। हे ईश्वर! हमें इतना बल दो कि हम तेरी सेवा में इस मातृभूमि की सेवा में अपना पूरा जीवन बिता दें। 

5.'स्वदेश प्रेम' कविता का मुख्य स्वर क्या है ?

उत्तर- 'स्वदेश प्रेम' कविता का मुख्य स्वर सेवाभाव व देश-प्रेम, देशभक्ति है। कवि चाहते हैं कि हम अपना सर्वस्व अपने देश के लिए अर्पित कर दें और भारत माता के चरणों में अपना जीवन व्यतीत करें। 

6.हम भारत माता के ऋण से कभी मुक्त क्यों नहीं हो पाएँगे ?

उत्तर- कवि कहते हैं कि हम भारत माता के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे  क्योंकि इसी धरती पर हम ने जन्म दिया है और एक माँ की भाँति इसने हमारा पालन-पोषण किया है। जैसे एक पुत्र अपनी माँ के ऋण से मुक्त नहीं हो पाता उसी प्रकार हम भारत माता की संतान हैं और कभी इसके ऋण को उतार नहीं पाएँगे। हम यही पले बढ़े हैं इसी धरती पर हम पले-बढ़े, इसी ने हमारा संरक्षण किया है। इसलिए हम चाह कर भी इसके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे। 


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