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रहीम के दोहे

रहीम के दोहे  अति लघु उत्तरीय प्रश्न 1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए? उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्...

Sunday, 24 August 2025

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे 


अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को किस प्रकार नहीं टूटने देना चाहिए?

उत्तर-  कवि रहीम के अनुसार प्रेम के धागे को विश्वास की कमी व अहंभाव की ठेस से नहीं टूटने देना चाहिए ।

2. लोगों के साथ जीवन की किस अनुभूति को नहीं बाँटना चाहिए और क्यों?

उत्तर - लोगों के साथ दुख की अनुभूति को नहीं बाँटना चाहिए क्योंकि सामान्यतः लोग दूसरों को दुखी देखकर मन ही मन इठलाते हैं।


3. रहीम ने बड़े लोगों और छोटे अथवा सामान्य लोगों की तुलना किससे की है?

उत्तर - रहीम ने बड़े लोगों की तुलना तलवार से और छोटे अथवा सामान्य लोगों की तुलना सुई से की है।

4. मनुष्य को आपसी प्रेम-सद्भाव को बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्यों? प्रेम का धागा टूटने से क्या परिवर्तन आता है? यह न टूटे, इसके लिए क्या अपेक्षित है?

उत्तर -मनुष्य को आपसी प्रेम और सद्भाव को बनाए रखने के लिए कभी-भी विश्वास की कमी या अहंभाव की ठेस से अपने संबंधों को नहीं तोड़ना चाहिए। भूलकर भी प्रेम में दरार नहीं डालनी चाहिए क्योंकि प्रेम रूपी धागा एक बार टूटने के पश्चात कभी जुड़ नहीं सकता। एक बार यदि प्रेम में दरार पड़ जाए तो लाख कोशिश करने पर भी व्यवहार में पहले जैसी समरसता नहीं आ पाती। दो धागों को जोड़ने से पड़ी गाँठ के समान मन में भी संशय की गाँठ पड़ जाती है।

5. 'निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय' कह कर कवि ने क्या शिक्षा दी है?

उत्तर- इस कथन के द्वारा कवि ने लोगों को व्यवहार-कुशल बनने की शिक्षा देते हुए कहा है कि अपने मन का दुखदर्द मन में छिपाकर रखना चाहिए क्योंकि लोग किसी का दुखदर्द नहीं बाँटते हैं अपितु दूसरों को दुखी देखकर मन ही मन प्रसन्न होते हैं। . रहीम ने एक दोहे में सागर की अपेक्षा कीचड़युक्त जल को अधिक उपयोगी बताया है।

6. आपके विचार से कौन-सा जल अधिक उपयोगी है और क्यों?
                              अथवा
रहीम के अनुसार कौन-सा जल अधिक उपयोगी होता है?

उत्तर - रहीम के अनुसार जिस जल में प्राणी की प्यास बुझाने की क्षमता हो, वही जल उपयोगी होता है। छोटे-से पोखर का कीचड़युक्त जल पीकर छोटे-छोटे जीव-जंतु अपनी प्राण-रक्षा करते हैं, अतः वह गंदा पानी भी सागर की अथाह जलराशि की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी होता है। सागर का जल अपने खारेपन के कारण किसी की प्यास नहीं बुझा पाता है।

7. रहीम ने पशुओं से भी अधिक गया-गुजरा हुआ किसे कहा है?

उत्तर - रहीम ने उन लोगों को पशुओं से भी अधिक गया-गुजरा हुआ माना है. जो अपने कृपण स्वभाव के कारण प्रसन्न होने पर भी किसी को कुछ नहीं देते हैं।

7. पौधों को सींचते समय उसके किस भाग पर विशेष ध्यान देना चाहिए और क्यों?

उत्तर- पौधों को सींचते समय उसके जड़ की सिंचाई भली-भाँति करनी चाहिए क्योंकि जड़ को सींचने से ही फलों और फूलों में पौधे का जीवन-रस पहुँच जाता है।

8. 'रहीम के नीतिपरक दोहे, सरल, स्वाभाविक और दृष्टांतों से युक्त हैं।'
इस कथन के आलोक में रहीम के दोहों की विशेषताएँ लिखिए।
                             अथवा
रहीम के नीतिपरक दोहों की क्या विशेषताएँ है?

उत्तर - रहीम के इन संकलित दोहों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि ये दोहे सरल, मन को छू लेने वाले, दैनिक जीवन के आचरण और व्यवहार से संबंधित और सहज बोधगम्य हैं। ये दोहे जहाँ एक ओर पाठक को औरों के साथ उचित व्यवहार करने की शिक्षा देते हैं, वहीं मानव मात्र को करने योग्य और न करने योग्य आचरण की भी शिक्षा देते हैं। दोहों की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और दृष्टांतों से युक्त है। बड़े ही सरल और स्वाभाविक उदाहरणों के द्वारा कवि ने नीति की बातों को पुष्ट किया है। लोक-व्यवहार में कुशलता एवं जीवन में सुख-शांति प्राप्त करने के लिए रहीम के ये दोहे प्रत्येक व्यक्ति हेतु नितांत उपयोगी हैं।

9. 'रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय' से रहीम ने लोगों को क्या समझाने का प्रयास किया है?

उत्तर - इस लोक प्रसिद्ध उक्ति के माध्यम से रहीम ने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि एक बार जो बात बिगड़ जाती है वह लाख कोशिश करने पर भी नहीं बन पाती। जिस प्रकार दूध के फट जाने पर उसे बार-बार मथने पर भी उससे मक्खन नहीं निकलता, उसी प्रकार बिगड़ी हुई बात को सुधारने का प्रयास व्यर्थ हो जाता है।

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(क) प्रेम का धागा टूटने पर पहले की भाँति क्यों नहीं हो पाता ?
उत्तर - प्रेम आपसी विश्वास, लगाव एवं स्नेह का प्रतीक होता है। इस प्रेमपूर्ण संबंध की डोर यदि एक बार टूट जाती है तो उसमें पहले जैसी सरसता और अपनापन नहीं रह जाता और मन में दरार पड़ जाती है। जिस प्रकार धागे को जोड़ने की कोशिश में धागे में गाँठ पड़ जाती है, उसकी समरसता नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार प्रेमपूर्ण संबंधों की डोरी टूटने पर उसमें संशय की गाँठ पड़ जाती है।

(ख) हमें अपना दुख दूसरों पर क्यों नहीं प्रकट करना चाहिए? अपने मन की व्यथा दूसरों से कहने पर उनका व्यवहार कैसा हो जाता है?
उत्तर - हमें अपना दुख दूसरों के सामने इसलिए नहीं प्रकट करना चाहिए क्योंकि दूसरे लोग हमारे दुख की बात सुनकर मन ही मन प्रसन्न होते हैं। कोई किसी का दुख-दर्द नहीं बाँटता है। दूसरे लोग दुखदर्द की बात सुनकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं, सच्ची सहानुभूति कोई नहीं जताता है।

(ग) रहीम ने सागर की अपेक्षा पंक जल को धन्य क्यों कहा है?
उत्तर - रहीम ने पंक-जल को धन्य इसलिए कहा है क्योंकि उस कीचड़ युक्त जल को पीकर कई कीट-पतंगे और लघु प्राणी अपनी प्यास बुझा लेते है। परंतु सागर का खारा पानी किसी की प्यास नहीं बुझाता। दूसरे प्राणियों की प्यास बुझाकर जीवन-रक्षा करने के कारण कवि ने पंक-जल को अथाह जलराशि संपन्न सागर के जल की अपेक्षा धन्य माना है।

(घ) एक को साधने से सब कैसे सध जाता है ?
उत्तर - एक ही परमात्मा को साधने से अर्थात निष्ठापूर्वक ध्यान करने से जीवन के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं क्योंकि परमात्मा ही जीवन का मूल आधार है। जिस प्रकार जड़ को सींचने से फल-फूल-पत्तियाँ स्वयं विकसित होने लगते हैं, उसी प्रकार जीवन के आधारभूत सत्य परमात्मा के चिंतन-मनन और ध्यान से जीवन के सभी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। आशय यह है कि एक मुख्य कार्य की सिद्धि से व्यक्ति के सभी कार्य स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।

(ङ) जलहीन कमल की रक्षा सूर्य भी क्यों नहीं कर पाता ?
उत्तर - जलहीन कमल की रक्षा सूर्य भी नहीं कर पाता, क्योंकि जल ही कमल की मूल संपत्ति है। जल कमल को जीवित रखता है। यही वह आंतरिक और अनिवार्य शक्ति है जो कमल-पुष्प को विकसित करती है। सूर्य की किरणें अपनी गर्मी से कमल की पंखुडियों को खोलकर उसे खिला देती है परंतु उन पंखुडियों में सुंदरता, तरलता, कोमलता और सुगंध का संचार जल ही करता है। अतएव जलहीन सरोवर में कमल नहीं खिल सकता।


(च) अवध नरेश को चित्रकूट क्यों जाना पड़ा?
उत्तर - अवध नरेश श्री रामचंद्र जी ने माता-पिता की आज्ञा से चौदह वर्ष का वनवास काटने के लिए अयोध्या से प्रस्थान किया था। चित्रकूट में आकर उन्होंने वनवास के कुछ दिन व्यतीत किए। यहाँ पर उन्हें शांति प्राप्त हुई और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर वे यहाँ पर रम गए।

(छ) नट किस कला में सिद्ध होने के कारण ऊपर चढ़ जाता है?
उत्तर - नट अपने शरीर को गोलाकार आकृति में समेटकर, कुंडली मारकर खंभे के ऊपर चढ़ जाता है। इस प्रकार वह अपने शरीर को गोलाकार आकृति में समेटने और कुंडली मारकर ऊपर चढ़ने की कला में सिद्धहस्त होता है।

(ज) मोती, मानुष, चून के संदर्भ में पानी के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ है चमक, मानुष के संदर्भ में आत्मसम्मान और चून के संदर्भ में पानी आटा गूँधने के काम आता है। कवि का कहना है कि पानी के बिना मोती पर चमक नहीं आती है और चमक न होने से मोती का कोई मूल्य नहीं होता। उसी प्रकार पानी रूपी आत्मसम्मान के बिना मनुष्य का भी कोई मोल नहीं होता है। पानी के अभाव में आटा गूँध कर रोटी नहीं बनाई जा सकती, इसलिए मोती, मानुष, चून के संदर्भ में पानी का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

2. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।
उत्तर - इस पंक्ति से यह भाव स्पष्ट होता है कि आपसी प्रेमपूर्ण संबंध यदि एक बार टूट जाते हैं तो दुबारा जोड़ने पर उनमें पहले जैसी सरसता नहीं आती है। मन में संदेह की गाँठ पड़ जाती है। ठीक उसी प्रकार, जैसे कि टूटे हुए धागे को पुनः जोड़ने से उसमें गाँठ पड़ जाती है।

(ख) सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।
उत्तर - इस पंक्ति से यह भाव स्पष्ट होता है कि लोग दूसरों के दुख दर्द को सुनकर मन ही मन प्रसन्न होते हैं, कोई किसी का दुख दर्द नहीं बाँटता। इसलिए अपने मन की पीड़ा को, दुखदर्द को अपने मन में ही छिपाकर रखना चाहिए।

(ग) रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै-फलै अघाय ।
उत्तर - इस पंक्ति से रहीम दास जी यह कहना चाहते हैं कि किसी वृक्ष या पौधे के जड़ को भली भाँति सींचने से फूल और फल स्वयं ही विकसित होने लगते हैं। जड़ से ही उन्हें सार तत्व मिल जाता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य सच्चे मन से एक ही परमात्मा का ध्यान कर ले तो उसे संसार के सारे सुख स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं।

(घ)  दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं ।
उत्तर - इस पंक्ति के द्वारा कवि दोहा छंद की विशेषता बताते हुए कह रहे हैं कि दोहे में शब्द तो बहुत कम होते हैं परंतु उन शब्दों में गहन अर्थ छिपा होता है। देखने में छोटे और सरल प्रतीत होने वाले दोहे अपने में व्यापक और गंभीर अर्थ को समेटे हुए होते हैं।

(ङ) नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत ।
उत्तर - इस पंक्ति से कवि यह भाव स्पष्ट करना चाहते हैं कि संगीत की सुमधुर सुर-लहरियों को सुनकर हिरन मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस धुन को सुनते हुए अपनी सुध-बुध खोकर शिकारी के जाल में फँसकर अपने प्राण तक न्योछावर कर देते हैं। इसी प्रकार प्रसन्न होने पर मनुष्य प्रेम सहित धन अर्पित कर देता है। प्रसन्नता की स्थिति में व्यक्ति धन आदि देकर अपनी उदारता व्यक्त करता है।

(च) जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।
उत्तर - इस पंक्ति के द्वारा कवि पैनी धार वाले, तलवार और तीखी नोक वाले सुई के प्रयोग और महत्व को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार की कोई उपयोगिता नहीं होती है। इस पंक्ति में यही भाव स्पष्ट होता है कि उपयोगिता की दृष्टि से छोटी-सी सुई का महत्व बड़ी तलवार की अपेक्षा कुछ कम नहीं है। अतः छोटी और बड़ी चीज़ों का अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण स्थान है।

(छ)  पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।
उत्तर - इस पंक्ति से यह भाव स्पष्ट होता है कि 'पानी' का जीवन में विशेष महत्व है। 'पानी' अर्थात चमक के बिना मोती की कोई उपयोगिता नहीं होती। 'पानी' अर्थात आत्मसम्मान के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है। 'पानी' के बिना आटा नहीं गूँधा जा सकता, इसलिए मनुष्य को जीवन में 'पानी' के महत्व को समझना चाहिए।







Sunday, 29 June 2025

कहानी 'आप जीत सकते हैं'



'आप जीत सकते हैं

एक भिखारी पेंसिलों से भरा कटोरा लेकर ट्रेन स्टेशन पर बैठा था। एक युवा कार्यकारी अधिकारी वहाँ से गुजरा और उसने कटोरे में एक डॉलर डाला, लेकिन कोई पेंसिल नहीं ली। फिर वह ट्रेन में चढ़ गया, लेकिन दरवाज़े बंद होने से ठीक पहले, कार्यकारी अधिकारी अचानक ट्रेन से बाहर निकला और भिखारी के पास वापस  गया। उसने पेंसिलों का एक गुच्छा पकड़ा, और कहा, "मैं कुछ पेंसिल लूँगा। उनकी कीमत सही है। आखिरकार, आप एक व्यवसायी व्यक्ति हैं और मैं भी," और वह वापस ट्रेन में चढ़ गया। छह महीने बाद, कार्यकारी अधिकारी एक पार्टी में गया। भिखारी भी वहाँ था, सूट और टाई पहने हुए। भिखारी ने कार्यकारी अधिकारी को पहचान लिया, उसके पास गया, और कहा, "आप शायद मुझे नहीं पहचानते, लेकिन मुझे याद है।" फिर उसने छह महीने पहले हुई घटना के बारे में बताया। कार्यकारी अधिकारी ने कहा, "अब जब आपने मुझे याद दिलाया है, तो मुझे याद है कि आप भीख माँग रहे थे। आप यहाँ सूट और टाई पहनकर क्या कर रहे हैं?" भिखारी ने जवाब दिया, "शायद आपको पता नहीं है कि आपने उस दिन मेरे लिए क्या किया। आप मेरे जीवन में पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने मुझे दान देने के बजाय, मेरी गरिमा वापस लौटाई, जब आपने पेंसिलों का एक गुच्छा पकड़ा और कहा, 'इनकी कीमत सही है। आखिरकार, आप एक व्यवसायी व्यक्ति हैं और मैं भी।' आपके जाने के बाद, मैंने खुद से सोचना शुरू किया-मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैं भीख क्यों माँग रहा हूँ? मैंने अपने जीवन के साथ कुछ रचनात्मक करने का फैसला किया। मैंने अपना बैग पैक किया, काम करना शुरू किया और यहाँ मैं हूँ। मैं बस आपको मेरी गरिमा वापस देने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। उस घटना ने मेरी ज़िंदगी बदल दी।"

भिखारी के जीवन में क्या बदला ? जो बदला वह था उसका 'आत्म-रूपांतरण' था।

Saturday, 21 June 2025

भक्ति कथा : मणिदास पर भगवान जगन्नाथ की कृपा

 मणिदास पर भगवान जगन्नाथ की कृपा 

श्री जगन्नाथ पुरी धाम में मणिदास नाम के माली रहते थे। इनकी जन्म तिथि का ठीक ठीक पता नहीं है परंतु संत बताते है कि मणिदास जी का जन्म संवत् 1600 के लगभग जगन्नाथ पुरी में हुआ था। फूल-माला बेचकर जो कुछ मिलता था, उसमें से साधु-ब्राह्मणों की वे सेवा भी करते थे, दीन-दु:खियों को, भूखों को भी दान करते थे और अपने कुटुम्‍ब का काम भी चलाते थे। अक्षर-ज्ञान मणिदास ने नहीं पाया था; पर यह सच्‍ची शिक्षा उन्‍होंने ग्रहण कर ली थी कि दीन-दु:खी प्राणियों पर दया करनी चाहिये और दुष्‍कर्मो का त्‍याग करके भगवान का भजन करना चाहिये। संतो में इनका बहुत भाव था और नित्य मणिराम जी सत्संग में जाया करते थे।

मणिराम का एक छोटा सा खेत था जहां पर यह सुंदर फूल उगाता। मणिराम माली प्रेम से फूलों की माला बनाकर जगन्नाथ जी के मंदिर के सामने ले जाकर बेचनेे के लिए रखता। एक माला सबसे पहले भगवान को समर्पित करता और शेष मालाएं भगवान के दर्शनों के लिए आने वाले भक्तों को बेच देता। फूल मालाएं बेचकर जो कुछ धन आता उसमे साधू संत, गौ सेवा करता और बचे हुए धन से अपने परिवार का पालन पोषण करता था। कुछ समय बाद मणिदास के स्‍त्री-पुत्र एक भयंकर रोग की चपेट में आ गए और एक-एक करके सबका परलोक वास हो गया। जो संसार के विषयों में आसक्त, माया-मोह में लिपटे प्राणी हैं, वे सम्‍पत्ति तथा परिवार का नाश होने पर दु:खी होते हैं और भगवान को दोष देते हैं; किंतु मणिदास ने तो इसे भगवान की कृपा मानी।

उन्‍होंने सोचा- मेरे प्रभु कितने दयामय हैं कि उन्‍होंने मुझे सब ओर से बन्‍धन-मुक्त कर दिया। मेरा मन स्‍त्री-पुत्र को अपना मानकर उनके मोह में फँसा रहता था, श्री हरि ने कृपा करके मेरे कल्‍याण के लिये अपनी वस्‍तुएँ लौटा लीं। मैं मोह-मदिरा से मतवाला होकर अपने सच्‍चे कर्तव्‍य को भूला हुआ था। अब तो जीवन का प्रत्‍येक क्षण प्रभु के स्‍मरण में लगाउँगा। मणिदास अब साधु के वेश में अपना सारा जीवन भगवान के भजन में ही बिताने लगे। हाथों में करताल लेकर प्रात: काल ही स्‍नानादि करके वे श्री जगन्नाथ जी के सिंह द्वार पर आकर कीर्तन प्रारम्‍भ कर देते थे। कभी-कभी प्रेम में उन्‍मत्त होकर नाचने लगते थे। मन्दिर के द्वार खुलने पर भीतर जाकर श्री जगन्‍नाथ जी की मूर्ति के पास गरुड़-स्‍तम्‍भ के पीछे खड़े होकर देर तक अपलक दर्शन करते रहते और फिर साष्‍टांग प्रणाम करके कीर्तन करने लगते थे।

कीर्तन के समय मणिदास को शरीर की सुधि भूल जाती थी। कभी नृत्‍य करते, कभी खड़े रह जाते। कभी गाते, स्‍तुति करते या रोने लगते। कभी प्रणाम करते, कभी जय-जयकार करते और कभी भूमि में लोटने लगते थे। उनके शरीर में अश्रु, स्‍वेद, कम्‍प, रोमांच आदि आठों सात्त्विक भावों का उदय हो जाता था। उस समय श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में मण्‍डप के एक भाग में पुराण की कथा हुआ करती थी। कथावाचक जी विद्वान तो थे, पर भगवान की भक्ति उनमें नहीं थी। वे कथा में अपनी प्रतिभा से ऐसे-ऐसे भाव बतलाते थे कि श्रोता मुग्‍ध हो जाते थे। एक दिन कथा हो रही थी, पण्डित जी कोई अदभुत भाव बता रहे थे कि इतने में करताल बजाता ‘राम-कृष्‍ण-गोविन्‍द-हरि’ की उच्‍च ध्‍वनि करता मणिदास वहाँ आ पहुँचा। मणिदास तो जगन्नाथ जी के दर्शन करते ही बेसुध हो गया। 

मणिराम माली को पता नहीं कि कहाँ कौन बैठा है या क्‍या हो रहा है। वह तो उन्‍मत्त होकर नाम-ध्‍वनि करता हुआ नाचने लगा। कथा वाचक जी को उसका यह ढंग बहुत बुरा लगा। उन्‍होंने डाँटकर उसे हट जाने के लिये कहा, परंतु मणिदास तो अपनी धुन में था। उसके कान कुछ नहीं सुन रहे थे। कथा वाचक जी को क्रोध आ गया। कथा में विघ्‍न पड़ने से श्रोता भी उत्तेजित हो गये। मणिदास पर गालियों के साथ-साथ थप्‍पड़ पड़ने लगे। जब मणिदास को बाह्यज्ञान हुआ, तब वह भौंचक्‍का रह गया। सब बातें समझ में आने पर उसके मन में प्रणय कोप जागा। उसने सोचा- जब प्रभु के सामने ही उनकी कथा कहने तथा सुनने वाले मुझे मारते हैं, तब मैं वहाँ क्‍यों जाऊँ ? जो प्रेम करता है, उसी को रूठने का भी अधिकार है। मणिदास आज श्री जगन्नाथ जी से रूठकर भूखा-प्‍यासा पास ही के एक मठ में दिनभर पड़ा रहा। 

मंदिर में संध्या-आरती हुई, पट बंद हो गये, पर मणिदास आया नहीं। रात्रि को द्वार बंद हो गये। पुरी-नरेश ने उसी रात्रि में स्‍वप्‍न में श्री जगन्‍नाथ जी के दर्शन किये। प्रभु कह रहे थे- तू कैसा राजा है! मेरे मन्दिर में क्‍या होता है, तुझे इसकी खबर भी नहीं रहती। मेरा भक्त मणिदास नित्‍य मन्दिर में करताल बजाकर नृत्‍य किया करता है। तेरे कथावाचक ने उसे आज मारकर मन्दिर से निकाल दिया। उसका कीर्तन सुने बिना मुझे सब फीका जान पड़ता है। मेरा मणिदास आज मठ में भूखा-प्‍यासा पड़ा है। तू स्‍वयं जाकर उसे सन्‍तुष्‍ट कर। अब से उसके कीर्तन में कोई विघ्‍न नहीं होना चाहिये। कोई कथावाचक आज से मेरे मन्दिर में कथा नहीं करेगा। मेरा मन्दिर तो मेरे भक्तों के कीर्तन करने के लिये सुरक्षित रहेगा। कथा अब लक्ष्‍मी जी के मन्दिर में होगी। 

उधर मठ में पड़े मणिदास ने देखा कि सहसा कोटि-कोटि सूर्यों के समान शीतल प्रकाश चारों ओर फैल गया है। स्‍वयं जगन्‍नाथ जी प्रकट होकर उसके सिर पर हाथ रखकर कह रहे हैं- बेटा मणिदास! तू भूखा क्‍यों है। देख तेरे भूखे रहने से मैंने भी आज उपवास किया है। उठ, तू जल्‍दी भोजन तो कर ले! भगवान अन्‍तर्धान हो गए। मणिदास ने देखा कि महाप्रसाद का थाल सामने रखा है। उसका प्रणयरोष दूर हो गया। प्रसाद पाया उसने। उधर राजा की निद्रा टूटी। घोड़े पर सवार होकर वह स्‍वयं जाँच करने मन्दिर पहुँचा। पता लगाकर मठ में मणिदास के पास गया और प्रणाम् करके अपना स्वप्न सुनाया। 

राजा ने विनती करके कहा कि आप पुनः नित्य की भाँति भगवान को कीर्तन सुनाया करे। मणिदास में अभिमान तो था नहीं, वह राज़ी हो गया। राजा ने उसका सत्‍कार किया। करताल लेकर मणिदास स्‍तुति करता हुआ श्री जगन्‍नाथ जी के सम्‍मुख नृत्‍य करने लगा। उसी दिन से श्री जगन्‍नाथ-मन्दिर में कथा का बाँचना बन्‍द हो गया। कथा अब तक श्री जगन्‍नाथ जी के मन्दिर के नैर्ऋत्‍य कोण में स्थित श्री लक्ष्‍मी जी के मन्दिर में होती है। 

 मणिदास जीवन भर श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में कीर्तन करते रहे। अन्‍त मे श्री जगन्‍नाथ जी की सेवा के लिये लगभग 80 वर्ष की आयु में मणिदास जी भगवान् के दिव्‍य धाम पधारे। 

जय श्री राधे 🙏🌹
संकलित

Friday, 20 June 2025

कहानी 'जलपरी '

एक राजकुमार था। उसका नाम था तेजप्रताप । जैसा नाम वैसा काम । तेजप्रताप बहुत जिद्दी था। वह जिस किसी चीज को पाने की जिद्द कर लेता उसे हासिल कर के ही रहता था।

एक रात तेजप्रताप ने सपने में एक अत्यंत सुंदर जलपरी को देखा। उसकी सुंदरता देख कर तेजप्रताप उस पर मोहित हो गया। उसने जलपरी से शादी करने की मन में ठान ली।

अगले दिन राजकुमार तेजप्रताप ने अपने पिता से कहा, "पिता जी मैं जलपरी से शादी करूँगा।" इतना सुनना था कि उसके पिता ने कहा, "बेटा तेजप्रताप तू पागल हो गया है क्या?"

"जलपरी समुद्र के अंदर रहती है, वहाँ तुम कैसे जा पाओगे। समुंद्र के अंदर बड़े खतरनाक जानवर रहते हैं।
वह तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे।
तुम जलपरी से शादी करने की जिद्द छोड़ दो।" "नहीं पिता जी मैं जलपरी को अपनी रानी बना कर ही रहूँगा। वह जहाँ भी रहती होगी उसे वहाँ से ढूँढ़ कर लाऊँगा। मेरा यह आखिरी फैसला है।" इतना कह कर राजकुमार तेजप्रताप अपनी तलवार ले कर घोड़े पर बैठा और जलपरी से शादी करने के लिए चल दिया।

कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद राजकुमार तेजप्रताप समुंद्र के पास जा पहुँचा।

वहाँ पहुँच कर राजकुमार तेजप्रताप ने समुंद्र देव से हाथ जोड़ कर कहा, "हे समुंद्र देव मैं आप की शरण में आया हूँ, आप हमारी मदद कीजिए । मैं इस समुंद्र के बीच रहने वाली जलपरी से शादी करना चाहता हूँ।" राजकुमार तेजप्रताप की बात सुनकर समुंद्र देव जल में प्रकट हो कर बोले, "राजकुमार मैं तुम्हारी हिम्मत देख कर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक नाव दे रहा हूँ। तुम इसमें बैठ कर जलपरी तक आसानी से पहुँच जाओगे। यह नाव तुम्हें जलपरी के महल तक पहुँचा देगी। रास्ते में तुम्हे बड़े-बड़े सर्प, मगरमच्छ, जहरीले जीव-जंतु राक्षस तथा खतरनाक दरियाई घोड़े मिलेंगे। तुम सबको मारते काटते आगे बढ़ते जाना। समुंद्र के बीच पहुँचते ही तुम्हें पानी पर तैरता हुआ एक सुंदर महल दिखाई देगा। महल के बाहर बड़े-बड़े दो राक्षस पहरा देते मिलेंगे। उन्हें तुम मार कर महल के अंदर घुस जाना। महल के अंदर जलपरी पलंग पर सोती मिलेगी। उसके पास पहुँच कर जैसे ही जलपरी को छुओगे तो जलपरी उठ कर बैठ जाएगी। और तुमसे एक सवाल पूछेगी। अगर तुम जलपरी के सवाल का जवाब दे दोगे तो जलपरी तुमसे शादी करने को तैयार हो जाएगी। अगर तुम उसके सवाल का जवाब नहीं दे सके तो जलपरी तुम्हें तोता बना कर अपने महल में हमेशा के लिए कैद कर लेगी।

"मैं तुम्हें यह सोने की अँगूठी दे रहा हूँ इसे तुम पहन लो इस अँगूठी के पहनने से जलपरी के सवाल का जवाब मालूम हो जाएगा।"

राजकुमार समुंद्र देव से इजाजत लेकर आगे की ओर नाव में बैठ कर चल दिया।

ठुमार तेजप्रताप बड़े-बड़े सर्पों, राजकुमार मगरमच्छों, जहरीले जीवों, राक्षसों तथा दरियाई घोड़ों को मारते काटते कई दिनों की यात्रा के बाद समुद्र के बीच समुद्र में तैरते जलपरी के महल के पास जा पहुँचा। महल के बाहर पहरा दे रहे दो राक्षसों को तलवार से मार कर महल के अंदर जा पहुँचा।
वहाँ जलपरी एक पलंग पर गहरी नींद में सोई हुई थी। राजकुमार तेजप्रताप ने जलपरी के पलंग के पास पहुँच कर जैसे ही उसके बदन को छुआ वैसे ही जलपरी नींद से जागकर पलंग पर बैठ गई।

जलपरी ने राजकुमार तेजप्रताप से पूछा, "तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आए हो ?"

जलपरी की बात सुन राजकुमार तेजप्रताप बोला, "मेरा नाम राजकुमार तेजप्रताप है। मैं धर्मपुर के राजा चंदन सिंह का पुत्र हूँ। मैं यहाँ तुमसे शादी करने के लिए आया हूँ। इतनी बात सुनकर जलपरी बोली, "तुम बड़े हिम्मत वाले राजकुमार हो। मैं तुम्हें देख कर बहुत खुश हूँ। मैं तुमसे शादी करने को तैयार हूँ। मगर तुम्हें हमारे एक सवाल का जवाब देना होगा। अगर तुमने मेरे सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं तुमसे शादी कर लूँगी। अगर तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया तो मैं तुम्हें तोता बना कर इस पिंजड़े में हमेशा के लिए कैद कर लूँगी।"

जलपरी ने पूछा, "बताओ सुबह जो निकलता है, शाम को डूब जाता है, वह क्या है? समुंद्र देव की दी हुई अँगूठी ने राजकुमार तेजप्रताप के कान में धीरे से कहा, "कह दो सूरज है"। कुछ देर रुक कर राजकुमार तेजप्रताप ने कहा, "सूरज है।" इतना सुनते ही जलपरी हँस पड़ी और पलंग से नीचे उतर कर राजकुमार तेजप्रताप से लिपट कर बोली, "तुम्हारा उत्तर सही है, आज से मैं तुम्हारी पत्नी बन गई। मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे महल चलने को तैयार हूँ।"

राजकुमार तेजप्रताप ने अपनी जेब में रखा सिंदूर निकाला और जलपरी की माँग में भर कर जलपरी को अपनी रानी बना लिया। जलपरी ने तुरंत एक उड़न खटोला मँगवाया और उसमें राजकुमार तेजप्रताप के संग बैठ कर धर्मपुर राज्य की ओर उड़ चली।





Thursday, 19 June 2025

कहानी खुश रहने का राज'

किसी गाँव में एक ऋषि रहते थे। लोग उनके पास अपनी कठिनाइयाँ लेकर आते थे और ऋषि उनका मार्गदर्शन करते थे। एक दिन एक व्यक्ति, ऋषि के पास आया और उनसे पूछा, "गुरुदेव हमेशा खुश रहने का राज क्या है?" ऋषि ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताता हूँ।

ऐसा कहकर ऋषि और वह व्यक्ति जंगल की तरफ चलने लगे। रास्ते में ऋषि ने एक बड़ा-सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति से कहा इसे लेकर चलो। उस व्यक्ति ने पत्थर को उठाया और वह ऋषि के साथ-साथ जंगल की तरफ चलने लगा।

कुछ समय बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा। लेकिन जब चलते हुए बहुत समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया तो उसने ऋषि से कहा कि उसे दर्द हो रहा है।



तो ऋषि ने कहा का राज' इस पत्थर को नीचे रख दो। पत्थर को नीचे रखने पर उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुई।



तभी ऋषि ने कहा, "यही है खुश रहने का राज।" व्यक्ति ने कहा, "गुरुवर मैं समझा नहीं। ऋषि बोले जिस तरह इस पत्थर को एक मिनट तक हाथ में रखने पर थोड़ा-सा दर्द एक घंटे तक हाथ में रखें तो थोड़ा ज्यादा दर्द होता है और अगर इसे और ज़्यादा समय तक उठाए रखेंगे तो दर्द बढ़ता जाएगा, उसी तरह दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाए रखेंगे, उतने ही ज़्यादा हम दुखी और निराश रहेंगे। यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को एक मिनट तक उठाए रखते हैं या जिंदगी भर। अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो दुख रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और हो सके तो उसे उठाओ ही नहीं।


Wednesday, 18 June 2025

कहानी 'चंद्रगुप्त की विजय का रहस्य'

चंद्रगुप्त की विजय का रहस्य

ईसा से 305 वर्ष पूर्व भारत में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था। चंद्रगुप्त भारत के महान शासकों में से एक थे। एक बार यूनान के सम्राट सेल्यूकस के साथ चंद्रगुप्त का युद्ध हुआ। युद्ध में सेल्यूकस बुरी तरह पराजित हुआ और उसे अपना गंधार प्रदेश दंडस्वरूप चंद्रगुप्त को देना पड़ा।

सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से करके उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। सेल्यूकस युद्ध में हुई अपनी पराजय के कारणों पर निरंतर विचार करता रहा, किंतु वह यह समझ नहीं पा रहा था कि उसकी विश्व-विजयी सेना को पराजय कैसे मिली?

एक दिन वह अपने चतुर कूटनीतिज्ञ मेगस्थनीज़ के साथ बैठा अपनी पराजय के कारणों पर विचार कर रहा था। उसने मेगस्थनीज़ से पूछा, "चंद्रगुप्त की विजय किसके कुशल नेतृत्व के कारण हुई है?"

सम्राट की बात का उत्तर देते हुए मेगस्थनीज़ ने कहा, "सम्राट चंद्रगुप्त की जो विजय हुई है, उसका कारण उनका कुशल नेतृत्व नहीं है। उनकी इस विजय के प्रेरणा स्त्रोत हैं-चंद्रगुप्त के गुरु, मार्गदर्शक और महान कूटनीतिज्ञ 'चाणक्य'।"

"चाणक्य ! यह नाम तो मैं बहुत पहले से सुन रहा हूँ। मैं उस महान कूटनीतिज्ञ के दर्शन करना चाहता हूँ। मैं उस महान व्यक्ति को निकट से देखना चाहता हूँ।" सेल्यूकस ने कहा।

मेगस्थनीज़ बोला, "सम्राट, इसमें क्या बाधा है! इस समय आप भारत सम्राट चंद्रगुप्त के सम्माननीय अतिथि हैं। हम आज ही चाणक्य के दर्शनों के लिए चलते हैं।"

सेल्यूकस मेगस्थनीज़ के साथ घोड़े पर बैठकर चाणक्य के दर्शनों के लिए चल पड़ा। सेल्यूकस सोच रहा था कि महान चाणक्य का भवन तो बड़ा भव्य होगा। उसकी रक्षा के लिए अनेक सैनिक तैनात होंगे। मन-ही-मन ऐसी कल्पना करता हुआ वह गंगा पार कर गया, लेकिन उसे कहीं भी भव्य महलों के दर्शन नहीं हुए। तभी उसने एक व्यक्ति से चाणक्य के घर का पता पूछा। उस व्यक्ति ने सामने एक साधारण से मकान की ओर संकेत कर दिया। सेल्यूकस को लगा कि वह व्यक्ति उससे मज़ाक कर रहा है।

सेल्यूकस ने पुनः पूछा, "मुझे प्रधानमंत्री चाणक्य का पता चाहिए, किसी अन्य चाणक्य का नहीं।" वह व्यक्ति बोला, "यह प्रधानमंत्री चाणक्य का ही निवास स्थान है।"

यह सुनते ही सेल्यूकस आश्चर्यचकित रह गया। इतना महान व्यक्ति जो देश का प्रधानमंत्री है, इतने साधारण घर में रहता है! सेल्यूकस उस मकान के द्वार पर पहुँचे तो एक ब्रह्मचारी ने उनका स्वागत किया और अंदर एक अँधेरी कोठरी में अपने गुरु के पास ले गया।

चाणक्य उस समय 'अर्थशास्त्र' लिखने में व्यस्त थे। उनके आगे एक दीपक जल रहा था और वे मृगचर्म पर बैठकर, भोजपत्र पर मयूर पंख से लिख रहे थे। ब्रह्मचारी ने जैसे ही आगंतुकों का परिचय कराया, वैसे ही चाणक्य ने अपने सामने जल रहे दीपक को बुझा दिया और दूसरा दीपक जला दिया।

सेल्यूकस यह देखकर हैरान रह गया। उसने चाणक्य से एक दीपक बुझाकर दूसरा दीपक जलाने का रहस्य पूछा। चाणक्य बोले, “पहले मैं राजकीय कार्य कर रहा था, इसलिए राजकीय सहायता से प्राप्त दीपक जला रहा था। अब मैं आपसे बातें करूँगा, इसलिए मैंने राजकीय दीपक बुझा दिया और अपना दीपक जला लिया।"

चाणक्य की बात सुनकर सेल्यूकस ने उनके चरण छू लिए। उन्हें चंद्रगुप्त की सफलता का रहस्य पता चल गया। मन-ही-मन चाणक्य को प्रणाम करते हुए सेल्यूकस मेगस्थनीज़ के साथ वापस लौट आए।

श्रेष्ठ पुरुषों का चरित्र सदैव अनुकरणीय होता है तथा वे सादा जीवन, उच्च विचार में विश्वास रखते हैं।


Thursday, 12 June 2025

कहानी 'अछूत व्यक्ति'

'अछूत व्यक्ति'

एक दिन गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एकदम शांत बैठे हुए थे। उन्हें इस प्रकार बैठे हुए देख उनके शिष्य चिंतित हुए कि कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं हैं। एक शिष्य ने उनसे पूछा कि आज वह मौन क्यों बैठे हैं। क्या शिष्यों से कोई गलती हो गई है ? इसी बीच एक अन्य शिष्य ने पूछा कि क्या वह अस्वस्थ हैं? पर बुद्ध मौन रहे।

तभी कुछ दूर खड़ा व्यक्ति ज़ोर से चिल्लाया, "आज मुझे सभा में बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी गई?" बुद्ध आँखें बंद करके ध्यानमग्न हो गए। वह व्यक्ति फिर से चिल्लाया, "मुझे प्रवेश की अनुमति क्यों नहीं मिली ?" इसी बीच एक उदार शिष्य ने उसका पक्ष लेते हुए कहा कि उसे सभा में आने की अनुमति प्रदान की जाए। बुद्ध ने आँखें खोलीं और बोले, "नहीं वह अछूत है, उसे आज्ञा नहीं दी जा सकती।" यह सुन शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

बुद्ध उनके मन के भाव समझ गए और बोले, "हां, वह अछूत है।" इस पर कई शिष्य बोले कि हमारे धर्म में तो जात-पात का कोई भेद ही नहीं, फिर वह अछूत कैसे हो गया ? तब बुद्ध ने समझाया, "आज वह क्रोधित होकर आया है। क्रोध से जीवन की एकाग्रता भंग होती है। क्रोधी व्यक्ति प्रायः मानसिक हिंसा कर बैठता है। इसलिए वह जब तक क्रोध में रहता है तब तक अछूत होता है। इसलिए उसे कुछ समय एकांत में ही खड़े रहना चाहिए।" क्रोधित शिष्य भी बुद्ध की बातें सुन रहा था, पश्चाताप की अग्नि में तपकर वह समझ चुका था कि अहिंसा ही महान कर्त्तव्य व परम धर्म है। वह बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और कभी क्रोध न करने की शपथ ली।

आशय यह कि क्रोध के कारण व्यक्ति अनर्थ कर बैठता है, क्रोध में जल रहे व्यक्ति को पता नहीं होता कि वह क्या कर रहा है और पल भर के क्रोध के कारण वह गलत कदम उठा बैठता है और बाद में उसे पश्चाताप होता है कि उसने क्या कर दिया, इसलिए हमें कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

Sunday, 8 June 2025

वैज्ञानिक चेतना के वाहक 'चंद्रशेखर वेंकट रामन्

वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन्
                      पाठ का सार

इस पाठ में लेखक ने महान् भारतीय वैज्ञानिक श्री चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन संघर्ष तथा उनकी असाधारण उपलब्धियों का बखूबी चित्रण किया है। सन् 1921 में एक समुद्री यात्रा के दौरान समुद्र की नीलवर्णीय आभा उनकी जिज्ञासा का कारण बनी। इन्होंने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और विश्व भर में विख्यात बन गए।

स्कूल और कॉलेज में उच्च अंक तथा स्वर्णपदक पाने वाले रामन् को मात्र अठारह वर्ष में भारत सरकार के वित्त-विभाग में नियुक्ति मिली। सन् 1930 में नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय वैज्ञानिक रामन् के मन में अपने देश के प्रति अथाह श्रद्धा थी। भारत की स्वतंत्रता के पक्षधर तथा भारत में विज्ञान की उन्नति के अभिलाषी वेंकट रामन् के जीवन संघर्ष तथा एक प्रतिभावान छात्र से एक महान वैज्ञानिक तक की गाथा को लेखक ने प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में जन्में श्री रामन् बचपन से ही वैज्ञानिक रहस्यों को सुलझाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। अपने कॉलेज के दिनों से ही इन्होंने शोधकार्यों में दिलचस्पी लेना प्रारंभ कर दिया था। उनका प्रथम शोधपत्र 'फिलॉसॉफिकल मैगजीन' में प्रकाशित हुआ था। बहू बाज़ार स्थित 'इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की प्रयोगशाला में अभावों के बावजूद वे भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने की साधना करते रहे। इन्हीं दिनों रामन् वाद्य यंत्रों की ओर आकृष्ट हुए और विभिन्न देशी तथा विदेशी वाद्ययंत्रों पर शोध करके पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ा कि भारतीय वाद्य यंत्र विदेशी वाद्य यंत्रों की अपेक्षा घटिया हैं। इन्होंने अनेक ठोस रवेदार तथा तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरणों का अध्ययन किया तथा 'रामन् प्रभाव' की खोज ने भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति उत्पन्न कर दी। रामन् की खोज के परिणामस्वरूप अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सरल हो गया। रामन् प्रभाव की खोज ने इन्हें विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। सन् 1929 में रामन् को 'सर' की उपाधि प्रदान की गई। इन्हें विश्व के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' तथा देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की प्रतिमूर्ति थे। रामन् ने अपने बचपन में संसाधनों के अभाव को झेला इसीलिए उन्होंने बंगलौर में 'रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट' नामक शोध संस्थान की स्थापना की तथा 'इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स' नामक शोध-पत्रिका प्रारंभ की। आज हमें भी रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने और प्रकृति में छिपे रहस्यों को अनावृत करने की आवश्यकता है।


Saturday, 7 June 2025

Important points Class 10 बड़े भाई साहब मुख्य बिंदु


समूची शिक्षा के तौर-तरीकों पर व्यंग्य किया गया है :
 (i) अंग्रेजी पढ़ना लिखना या बोलना आए या न आए, लेकिन उस पर अत्यधिक बल दिया जाता है। 
(ii) अपने देश के इतिहास के अतिरिक्त दूसरे देशों के इतिहास को जानकारी व्यर्थ में करवाना।
 (iii) रटत शिक्षा प्रणाली पर बल दिया जाता है। बच्चा समझे या न समझे, लेकिन उसे विषय को रहना ही पड़ता है। इस प्रकार विषय के प्रति रुचि समाप्त हो जाती है। (iv) अलजबरा व ज्योमेट्री ऐसे विषय है कि निरंतर अभ्यास करने पर भी गलत हो जाते हैं। 
(v) छोटे-छोटे विषयों पर लंबे-चौड़े निबंध लिखवाना जो बच्चों की रुचि के विपरीत होती है। अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसी शिक्षा प्रणाली का कोई लाभ नहीं जो बच्चों के लिए लाभदायक न होकर बोझ की तरह हो। 

बड़े भाई द्वारा छोटे भाई पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनाई गई युक्तियाँ-
 (i) वह हमेशा छोटे भाई के खेलकूद और उसकी स्वच्छंदता पर नियंत्रण रखता है। 
(ii) वह भाई द्वारा न पढ़ने और खेलने में मन लगाने पर लंबे-लंबे भाषण देता है। उसे भयभीत करने का हर संभव प्रयास भी करता है; जैसे कठिन पढ़ाई, अपने फेल होने की बात, खेलकूद से दूर रहना आदि।
(iii) लेखक द्वारा मनमानी करने पर उसे घमंड न करने की सीख देता है। ऐतिहासिक उदाहरणों द्वारा, जैसे- रावण, शैतान, शाहेरुम जैसे बड़े-बड़े अभिमानियों की फजीहत के उदाहरण देता है।
(iv) वह आचरण की महिमा को महत्त्वपूर्ण बताकर लेखक को अपमानित करता है। 
(v) वह इतिहास, अलजबरा, निबंध लेखन की शिक्षा को व्यर्थ बताता है। 
(vi) वह किताबी शिक्षा की बजाय जीवन के अनुभव को अधिक काम की चीज बताता है। 

बड़े भाई साहब का चारित्रिक (चरित्र-चित्रण) विशेषताएँ : (i) अध्ययनशील व गंभीर प्रवृत्ति- बड़े भाई साहब स्वभाव से ही अध्ययनशील थे। वे हरदम किताबें खोले बैठे रहते थे। उनमें रटने की प्रवृत्ति थी। वे गंभीर प्रवृत्ति के हैं। वे अपने छोटे भाई के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। उनका गंभीर स्वभाव हो उन्हें विशष्टता प्रदान करता है। 
(ii) घोर परिश्रमी - भाई साहब भले ही पढ़ाई को ठीक प्रकार से नहीं समझ पाते थे लेकिन उन्होंने परिश्रम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये एक ही कक्षा में तीन-तीन बार फेल होकर भी लगन से पढ़ते रहे। वे दिन-रात पढ़ते थे। उनकी तपस्या बड़े-बड़े तपस्वियों को भी मात करती है। 
(iii) वाक्पटु-बड़े भाई साहब वाक् कला में निपुण हैं। वे अपने छोटे भाई से ऐसे-ऐसे उदाहरण देकर बातें करते हैं कि वह उनके सामने नतमस्तक हो जाता है। उन्हें शब्दों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करना आता है। यही कारण है कि वे अपने छोटे भाई पर अपना पूरा दबदबा बनाए रखते हैं। (iv) संयमी व कर्तव्यपरायण - बड़े भाई साहब अत्यंत संयमी व कर्तव्यपरायण थे। उनका मन भी खेलने व पतंग उड़ाने का करता था; परंतु सोचते थे कि यदि व यह सब करेंगे तो अपने छोटे भाई को क्या सँभालेंगे। वे अपने कर्तव्य को भी बखूबी निभाते थे। जब उन्होंने देखा कि छोटे भाई को अपने अव्वल आने पर अभिमान हो गया है तो समय रहते उसे ऐसे आड़े हाथों लिया कि छोटे भाई का सिर श्रद्धा से झुक गया। 
(v) उपदेश देने की कला में निपुण - बड़े भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे। छोटे भाई को समझाने के लिए ऐसे-ऐसे सूक्ति- बाण चलाते थे कि उसका दिल पढ़ाई से उचाट हो जाता। 

अपने माता-पिता का उदाहरण : 
अपने माता-पिता का उदाहरण द्वारा छोटे भाई को समझाना कि जीवन में अनुभव पुस्तकीय ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण है। जीवन की समझ अनुभवों से आती है। हमारे बड़ों को हमसे अधिक जीवन की समय है। हम जिन परिस्थितियों में घबरा जाते हैं, बड़े-बुजुर्ग उन्हीं परिस्थितियों में समस्या का हल निकाल लेते हैं। उनके माता-पिता ने भले ही उनके जितनी किताबें न पड़ी हों, हाँ, लेकिन अपने अनुभव के आधार पर उन्हें दुनियादारी की असंख्य बातें पता है। 

बड़े भाई साहब की अंग्रेजी के बारे में नसीहत : 
अंग्रेजी पढ़ना कोई हँसी-खेल नहीं है। उसे पढ़ने के लिए रात-दिन आँखें फोड़नी पड़ती है और खून जाताना पड़ता है। ऐरागैराखेरा अग्रेजी नहीं पढ़ सकता। बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध नहीं लिख पाते बोलना तो दूर अंग्रेजी पढ़ने-समझने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। वे अपना उदाहरण भी देते थे कि उन्हें कितनी कठिनाई होती है अंग्रेज़ी पढ़ने में। 


बड़े भाई साहब पाठ से प्रेरणा : 
हमें अपनी स्थिति, शक्ति को समझना चाहिए उसी के अनुसार करना चाहिए। जो कार्य हम स्वयं नहीं करते, उसकी दूसरों से उम्मीद करना व्यर्थ है यदि हम खुद योग्य नहीं है, सफल नहीं है, तो हम किसी को उपदेश देने का अधिकार खो बैठते हैं। हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि परीक्षा के तनाव में सारा समय किताबों को पढ़ते रहने की अपेक्षा पढ़ाई सहज रूप से करें। पढ़ाई की रटने की बजाय उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। अपनी समझ को विकसित करें क्योंकि खेल-कूद पढ़ाई में बाधक नहीं बल्कि सहायक होता है। 

बड़े भाई साहब द्वारा छोटे भाई की सफलता को बेकार सिद्ध करने के लिए दिए गए तर्क :
 बड़े भाई साहब छोटे भाई की सफलता को बेकार सिद्ध करने के लिए पहला तर्क यह देते हैं कि केवल किताबी ज्ञान व्यर्थ होता है। असली चीज़ है- बुद्धि का विकास। उनका दूसरा तर्क यह है कि सच्ची सफलता परिश्रम करने से ही प्राप्त होती है। लेखक की सफलता आकस्मिक है। एक बार संयोग से वह प्रथम आ गया है, किंतु हर बार ऐसा नहीं होगा। अन्य तर्क यह है कि जीवन में किताबों का नहीं अनुभव का महत्त्व होता है। उस मामले में यह अभी बहुत छोटा है। 

बड़े भाई साहब के अध्ययनशील स्वभाव पर व्यंग्य :
 इस टिप्पणी में गहरा व्यंग्य है। बड़े भाई साहब स्वभाव से बहुत अध्ययनशील जान पड़ते हैं। जब भी देखो वे हमेशा पढ़ने में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि वे पढ़-पढ़कर अपना चेहरा कांतिहीन कर लेते हैं किंतु उनका अध्ययन एक नाटक था। वे समझते तो, कुछ नहीं थे। जब वे रटते-रटते बोर हो जाते थे, तब किताबों और कॉपियों के हाशियों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगते थे । 

बड़े भाई साहब का पतंग पकड़कर भागना:
  बड़े भाई साहब का पतंग पकड़कर भागना यह सिद्ध करता है कि उनके अंदर भी एक बच्चा छिपा हुआ है। उनमें भी खेलकूद और मौज-मस्ती करने की उमंग पैदा होती है। लेकिन उन्होंने उसे दबा रखा है। यदि वे पुस्तकों के बोझ को छाती से हटा लें, तो वे भी उल्लास और उत्साह से भरी जिंदगी जी सकते हैं। 

'अहंकार मनुष्य का विनाश करता है।’ - बड़े भाई के उदाहरण : 
अहंकार मनुष्य का विनाश कर देता है। अहंकार के कारण 'रावण' का भी नाश हो गया था। रावण भूमंडल का स्वामी था। वह एक चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी राजा उसके अधीन थे। वह अंग्रेज़ों से भी अधिक बलशाली व महान था, परंतु अहंकारी होने के कारण उसका विनाश हो गया। यहाँ तक कि 'आग' और 'पानी' के देवता भी रावण के दास थे, परंतु घमंड ने रावण का नामों-निशान तक मिटा दिया। रावण को मरते समय कोई उसे एक चुल्लू पानी देने वाला भी नहीं बचा। अभिमानी आदमी दीन-दुनिया दोनों से हाथ धो लेता है। बड़े भाई साहब ने शैतान का उदाहण भी दिया कि इसी 'अहंकार' के कारण ईश्वर ने शैतान को नरक में ढकेल दिया था। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था इसलिए वह भी भीख माँग- माँगकर मर गया। बड़े भाई साहब ने लेखक के परीक्षा में पास होने की तुलना अंधों के हाथ बटेर लगने से करते हुए कहा कि गुल्ली डंडे में भी कभी-कभी अंधा चोट निशाने पर लगा देता है, पर इससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं बन जाता। 

बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ : 
कोबड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ अनुभव रूपी ज्ञान से आती है, जो कि जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार पुस्तकीय ज्ञान से हर कक्षा पास करके अगली कक्षा में प्रवेश मिलता है, लेकिन वे इस पुस्तकीय ज्ञान को अनुभव में उतारे बिना अधूरा मानते हैं। दुनिया को देखने, परखने तथा बुजुर्गों के जीवन से हमें अनुभव रूपी ज्ञान को प्राप्त करना आवश्यक है क्योंकि यह ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है। हमारे बड़े-बुजुर्ग बेशक शिक्षित नहीं होते थे, परंतु वे अपने अनुभव से हर विपरीत परिस्थिति में भी समस्या का समाधान निकाल लेते थे। इसलिए उनके अनुसार अनुभव पढ़ाई से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, जिससे जीवन को परखा और सँवारा जाता है तथा जीवन को समझने की समझ आती है। 

शैतान और शाहेरूम का अहंकार का उदाहरण :
 शैतान को यह अभिमान हुआ था कि ईश्वर का उससे बढ़कर सच्चा भक्त कोई है ही नहीं, तो उसे स्वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। इसी प्रकार शाहेरूम को भी अहंकार हो गया था। बाद में वह भी भीख माँग- माँगकर मर गया अर्थात दोनों का ही अहंकार करने से नामो-निशान मिट गया। 

छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होना : 
बड़े भाई साहब अक्सर अपने छोटे भाई को पढ़ाई में दिलचस्पी लेने के लिए कभी प्यार से, तो कभी डाँटकर समझाने का प्रयास करते रहते थे, लेकिन छोटा भाई खेल-कूद कर भी हर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर लेता। इससे उसमें अभिमान-सा आ गया था। इस अभिमान को भाई साहब ने जिस युक्ति से दूर किया, उससे छोटे भाई के मन में उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। 

कहानी के अनुसार बड़े भाई साहब को प्राप्त विशेषाधिकार : 
'बड़े भाई साहब' कहानी में बड़े भाई लेखक से पाँच साल बड़े थे। इस नाते उन्हें अपने छोटे भाई को डाँटने-डपटने का पूरा अधिकार था। इतने पर भी यदि छोटा भाई (लेखक) बेराह चलने की कोशिश करेगा, तो वे थप्पड़ का प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उनके अनुसार बड़ा होने के कारण उनका यह विशेषाधिकार स्वयं विधाता भी उनसे नहीं छीन सकता। 

छोटा भाई अपने भाई से डरना: 
छोटा भाई अपने बड़े भाई की भाँति हर समय पढ़ने-लिखने में रुचि नहीं रखता था । वह प्रतिभाशाली तो था परंतु खेलकूद, सैर-सपाटे, दोस्तों के साथ गप्पें मारने जैसे कामों में उसे अधिक आनंद आता था। समय को व्यर्थ नष्ट करने पर बड़े भाई साहब उसे कड़ी डाँट लगाते थे तथा बात-बात पर उपदेश देते थे। हर समय बड़े भाई की फटकार और घुड़कियाँ सुनकर वह सहम-सा जाता था। अतः पढ़ाई के अतिरिक्त जब भी वह कोई अन्य कार्य करता तब वह डरता रहता कि कहीं भाईसाहब उसे डाँट न दें।

Class 10 साखी - कबीर मुख्य बिंदु

साखी - कबीर मुख्य बिंदु 

मीठी वाणी का महत्त्व : 
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी बोलने से मन का अहंकार समाप्त हो जाता है तथा मन प्रसन्न होता है और मन प्रसन्न रहने से तन भी शीतल रहता है। मीठी वाणी सुननेवालों को सुख तथा प्रसन्नता की अनुभूति कराती है इसलिए सदा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली व अपने को भी शीतलता प्रदान करने वाली मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। 

संसार में सुखी व्यक्ति और दुखी व्यक्ति : 
संसार में सुखी वही व्यक्ति है, जिसने घट-घट और कण-कण में बसने वाले ईश्वर से प्रीति कर ली है, उसके तत्व ज्ञान को जान और मान लिया है। दुखी मनुष्य वह है, जो दिन में खाकर और रात में सोकर हीरे जैसे अनमोल जीवन को व्यर्थ गँवाकर भौतिक सुखों की चकाचौंध में खोया हुआ है। यहाँ जो व्यक्ति संसार के विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर में मन को लगाए हुए है, वह 'जागना' (जागरूकता) का प्रतीक है और जो व्यक्ति विषय-विकारों में लिप्त है, भौतिक दृष्टि से उसकी आँखें बेशक खुली हुई हैं, पर वास्तव में वह सोया हुआ है, अर्थात 'सोना' (उदासीनता) का प्रतीक है। 

कबीर का निंदक को अपने निकट रहने रखने का परामर्श : 
संत कबीर ने हमें अपने दोहों के माध्यम से करणीय तथा अकरणीय की सीख दी है। उनका एक दोहा, हमें अपने स्वभाव को निर्मल करने का एक विचित्र उपाय बता रहा है। उसके अनुसार, हमें निंदक व्यक्ति को सदा अपने पास रखना चाहिए। जब-जब वह हमारी कमियाँ, हमारी बुराइयाँ हमारे सामने रखेगा, तब-तब हमें उन्हें दूर करने का या अपनी बुराइयों को अच्छाइयों में रूपांतरित करने का अवसर मिलेगा और इस प्रकार स्वतः हमारा स्वभाव निर्मल हो जाएगा। इस प्रकार, निंदा करने वाले व्यक्ति का साथ स्वभाव को निर्मल बनाने का एक सरल उपाय है। कबीर के अनुसार सच्चा ज्ञानी : केवल शास्त्र पढ़ने को कबीर ज्ञान नहीं मानते। शास्त्र विद्या कभी-कभी व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। यह अहंकार हमारे अंदर अनेक विकारों को जन्म देता है। एक बार अंहकार मन में आ जाए तो सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है जबकि एक प्रेम का भाव मन में पैदा होने से अन्य सभी विकार मिट जाते हैं और व्यक्ति सच्चा ज्ञानी बन जाता है। इस प्रकार कबीर सच्चा ज्ञानी उसे मानते हैं जिसके हृदय में प्रत्येक जड़-चेतन के लिए, संपूर्ण सृष्टि के लिए भरपूर प्रेम है। जिसके हृदय में किसी अन्य विकार के लिए कोई स्थान नहीं है वही सच्चा ज्ञानी है। 

मृग के उदाहरण द्वारा कबीर ने संदेश :
 मृग की नाभि में एक विशेष प्रकार की सुगंध समाई होती है। यह उस सुगंध से आकर्षित होता है और उस सुगंध की तलाश में इधर-उधर भटकता है। जीवन भर भटकाव के बावजूद भी वह समझ नहीं पाता कि यह सुगंध कहाँ से आ रही है क्योंकि वास्तव में उसका स्रोत कहीं बाहर नहीं उसी के शरीर में होता है। यही स्थिति हम सभी की है जो ईश्वर को पाना चाहते हैं किंतु उसकी तलाश, तीर्थ स्थानों और कर्मकांडों में करते हैं और उन्हीं में उलझकर जीवन गंवा देते हैं। यदि हमें एहसास हो जाए कि ईश्वर कण-कण में है, हमारे रोम-रोम में भी उसी का वास है, तो हमें उसके लिए भटकना नहीं होगा। हमें सर्वत्र, हर रूप में ईश्वर के दर्शन हो पाएँगे। 

कबीर के अनुसार ईश्वर को न देख सकने के कारण : संसार में दो तरह के लोग हैं। एक वे जो सांसारिक भोग विलास में लिप्त रहकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने में ही विश्वास रखते हैं। दूसरे वे जिन्हें ईश्वर से बिछड़ने का एहसास है और ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। कबीर ने लोगों को दो श्रेणियों में बाँटा है-सुखी और दुखी। कबीर खुद को दुखी लोगों की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि वे भौतिक सुख साधनों में सुख नहीं ढूंढ पाते। उन्हें तो ईश्वर के विरह से पीड़ा होती है और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानते हैं और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर बढ़ना चाहते हैं।

 कबीर के अनुसार निंदक के साथ व्यवहार : 
जो व्यक्ति सबकी निंदा करता रहे, सब में बुराई ढूँढता रहे, वह निंदक कहलाता है। सामान्यतः ऐसे लोगों सब दूर रहना चाहते हैं। कोई उन्हें पसंद नहीं करता। किंतु कबीर का मानना है कि निंदक व्यक्ति का साथ हमारे स्वभाव को निर्मल बना सकता है। जितना हम निंदक के पास रहेंगे, उतना ही हमें अपनी कमियों को जानने का अवसर मिलता रहेगा और हम उन्हें दूर कर पाएँगे। अतः हमें निंदक को अपने से दूर नहीं बल्कि अपने करीब रखना चाहिए। वह किसी शुभचितक की तरह हमारी सहायता करता है, भले अप्रत्यक्ष रूप से ही। 

कबीर के दोहों का प्रतिपाद्य : 
कबीर, संत संप्रदाय के श्रेष्ठ कवियों में से एक है। उन्होंने अनुभवजन्य ज्ञान को दोहों में पिरोकर जीवंत बना दिया है। कबीर ने अपने जीवन में खूब भ्रमण किया, जिसके कारण उनकी भाषा में अनेक भाषाओं के शब्द शामिल हो गए हैं। जन-जन की भाषा को उन्होंने अपनाया और अपने स्वभाव को निर्मल बनाने का, ईश्वर प्राप्ति का, अहंकार रहित जीवन जीने का मार्ग सुझाया है। कबीर ने सदैव बाहरी आडंबर का विरोध करके मानव सेवा रूपी सच्ची भक्ति का ही समर्थन किया है। 

ईश्वर भक्ति से कबीर का अहंकार दूर होना : 
कबीर ने अपने जीवन में प्राप्त अनुभव के आधार पर, जो ज्ञान प्राप्त किया, उसे अपने दोहों के माध्यम से हम तक पहुँचाया। उसी अनुभव के आधार पर, उन्होंने सदा धर्म के नाम पर किए जाने वाले कर्मकांडों का विरोध किया तथा सच्चे मन से की जाने वाली भक्ति और जनसेवा को ही सच्चा धर्म बताया। उनके अनुसार विकारों से मुक्त होना ही सच्चे भक्तों की पहचान है। जैसे-जैसे हम भक्ति में लीन होते जाते हैं, हमारा अहंकार दूर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो स्पष्ट है कि हम भक्ति के उचित मार्ग पर नहीं चल रहे हैं। संत कबीर ने अहंकार से मुक्त होकर प्रेम भाव की उत्पत्ति को ही सच्चे ज्ञान की परिभाषा माना है। कबीर का हृदय अहंकार शून्य था तथा प्रेम से भरपूर था। यही उनके ईश्वर भक्त होने की पहचान है। 

अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर अँधियारा मिट जाना : 
प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में, रोम-रोम में ईश्वर का, परम आनंद का वास होता है। किंतु भौतिक संसार में लिप्त होकर हम इस अनुभूति से दूर होते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप हमारे हृदय में ज्ञान का दीपक बुझ जाता है और अज्ञान का अंधकार छाया रहता है। यदि हम ज्ञान के मार्ग पर चल पड़े और सच्चे हृदय से भक्ति करें तो धीरे-धीरे अहंकार, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि विकारों से मुक्त होते जाते हैं और प्रेम का भाव हमारे हृदय में विस्तार लेने लगता है। ज्ञान रूपी दीपक जब हृदय में प्रज्ज्वलित हो जाता है तब अज्ञान का अंधकार मिट जाता है। प्रत्येक जड़-चेतन के प्रति समान रूप से प्रेम पैदा हो जाता है। वास्तव में संपूर्ण संसार एक समान पाँच तत्वों से मिलकर बना है, किसी में कोई भेद नहीं है। यह भेद हमें तभी तक दृष्टिगत होता है, जब तक हम अज्ञान में होते हैं। ज्ञान का दीपक जल जाने पर हर ओर केवल उस, एक ही तत्व, परमसत्ता, ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं। 

कबीर की साखियाँ / दोहे आज भी प्रासंगिक हैं : 
कबीर की साखियाँ / दोहे हमेशा की तरह आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि साखियों में कहीं भी पुस्तकीय ज्ञान नहीं है। कबीर ने जगह-जगह घूमकर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया था तथा उनके अनुभव का क्षेत्र बड़ा विस्तृत था। इसलिए अनुभव के आधार पर होने के कारण ये साखियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगी। 


साखी के आधार पर कबीर द्वारा बताए गए जीवनमूल्य: कबीर की प्रत्येक साखी मानव जीवन को जीवन-मूल्यों से प्रेरित करती है। उनमें से एक, जैसे वाणी की मधुरता का महत्त्व कबीर प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक मानते हैं। वाणी की मधुरता से सोच-समझ कर बोली गई वाणी से तथा दूसरों को सुख पहुँचाने वाली वाणी से मनुष्य संसार में किसी को भी अपना प्रिय बना सकता है।

कथा सागर कहानी वफादार कुत्ता

वफादार कुत्ता 

अमीर महाजन था। दयावान था। सुबह सैर पर जाते हुए एक छोटा-सा भटका हुआ पिल्ला मिल गया। महाजन को उसे देखकर दया आ गई। घर ले आया। उसकी बच्चों की तरह देखभाल करने लगा। पिल्ला भी घर की निगरानी करता और बच्चों से खेलता-कूदता।


महाजन बीमार पड़ गया। पिल्ला अब कुछ बड़ा था। पास बैठा रहता। आँखों में उसके दर्द झलकता था। रात्रि को महाजन बीमारी के कारण कहराने लगा। पिल्ला बार-बार देखता, प्यार करता। सारी रात देखता रहा। दूसरे दिन महाजन की मृत्यु हो गई। पिल्ला एक कोने में आंखों में आँसू लिए बैठा रहा। पार्थिव शरीर को श्मशानघाट ले गए। अग्रि देनी थी। आखिरी बार कुत्ते ने पैरों को चूमा। सामने बैठ गया। अग्नि शरीर को दी गई। सामने कुत्ता शांत था। परिवार के सदस्यों की नज़र पड़ी। देखा वह कुत्ता हमेशा के लिए शांत था। सब लोग हैरान रह गए कि एक जानवर ऐसा वफादार हो सकता है। कुत्ते को भी वहीं पर दफना दिया गया। वह भी एक परिवार का हिस्सा था।

सब लोग सोच में थे कि कुत्ता इंसान से अधिक वफादार जानवर है। दर्द महसूस करता है। काश! इंसान भी जानवरों से कुछ सीख ले।

Thursday, 10 April 2025

समर्पण कविता व्याख्या

पाठ में संकलित 'समर्पण' कविता कवि रामावतार त्यागी द्वारा रची गई है। इसमें कवि ने मातृभमि के प्रति भक्ति व प्रेम का भाव प्रकट कर अपना सब कुछ न्योछावर करने का संकल्प प्रकट किया है। यह कविता देश-प्रेम पर आधारित है। 

सप्रसंग व्याख्या

(1) मन समर्पित -------------------------और भी हूँ।

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' के पाठ-1 'प्रियतम' नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के रचियता  'श्रीरामावतार त्यागी जी'  हैं। इस कविता में  मातृभूमि के लिए देशप्रेम, समर्पण व त्याग का भाव व्यक्त किया गया है।

व्याख्या-कवि कहते हैं कि मेरे देश की धरती के लिए मेरा मन समर्पित है और मेरा शरीर भी इसके लिए समर्पित है। कवि देश की धरती अर्थात् मातृभूमि के लिए कुछ और भी बहुत कुछ देना चाहते हैं। वे धरती माँ से कहते हैं कि हे मातृभूमि! तुझे मैं सब कुछ भेंट करना चाहता हूँ।

(2) माँ तुम्हारा ऋण-----------------------------------और भी दें।

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक 'सुनहरी धूप' के पाठ-1 'प्रियतम' नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के रचियता  'श्रीरामावतार त्यागी जी'  हैं। इन पंक्तियों में कवि ने स्वदेश के प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया है। अपना सर्वस्व देश के लिए भेंट करने का निवेदन कर रहे हैं।

व्याख्या-कवि के हृदय में स्वदेश प्रेम का महासागर हिलोरे ले रहा है।  वह अपने तन, मन, प्राण और रक्त की एक-एक बूँद देश को समर्पित करना चाहते हैं। कवि कहते हैं कि हमारी धरती माँ का हम पर बहुत बड़ा उपकार है। इस धरती ने हमें बहुत कुछ दिया है और हम अपना सब  कुछ देकर भी इस माँ का ऋण नहीं चुका सकते हैं। कवि धरती माँ से यह प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि माँ!  तुम्हारा बहुत ऋण है, परंतु  मैं एकदम गरीब हूँ अर्थात् तुम्हारा ऋण चुकाने में असमर्थ हूँ। किंतु मैं फिर भी इतना निवेदन कर रहा हूँ कि जब भी मैं थाल में अपना सिर सजा कर लाऊँ, तो तब तुम मेरी वह भेंट दया करके स्वीकार कर लेना। अर्थात् मैं देश के लिए अपना बलिदान करूँ तो उसे मना मत करना। कवि कहते हैं कि मेरा मन भी और प्राण भी तुम्हें समर्पित हैं, मेरे रक्त का एक-एक कण भी तुम्हें समर्पित है। हे देश की धरती, मैं इससे भी अधिक और कुछ भी तुम्हें भेंट करना चाहता हूँ।

भाव - कवि अपने देश की रक्षा करते हुए बलिदान देना चाहते हैं। 

(3) माँज दो तलवार और भी दूँ।
व्याख्या - इन पंक्तियों में कवि ने देश की रक्षा के लिए युद्ध भूमि में जाने की इच्छा प्रकट की है। कवि कहते हैं कि वे अपने दाएँ हाथ में तेज़ धार वाली तलवार लेकर और कमर पर ढाल बाँधकर मातृभूमि की रक्षा करना चाहते हैं। कवि को यह विश्वास है कि धरती माँ का  पूरा आशीर्वाद उनके सर पर है। वे अपने सभी सपने, अपनी जिज्ञासा और आयु का एक-एक पल धरती माँ को भेंट करना चाहते हैं। 

भाव - कवि मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर करना चाहते हैं। 

तोड़ता हूँ -------------------------------------------------और भी दूँ। 
व्याख्या - इन पंक्तियों में कवि अपने परिवार, गाँव और रिश्तेदारों से क्षमा माँग रहे हैं। वे सबसे नाता तोड़कर देश के लिए शहीद होने जा रहे हैं।  वे अपने दाएँ हाथ में तलवार और बाएँ  हाथ में देश का झंडा लेकर देश की रक्षा के लिए बलिदान देने जा रहे हैं। वे अपने बगीचे के सभी फूल और घर की एक-एक ईंट व घर से जुड़ी हर वस्तु धरती माँ को भेंट करना चाहते हैं। 

भाव - कवि अपने जीवन से जुड़ी हर वस्तु चढ़ाने के बाद भी संतुष्ट नहीं हैं। वे धरती माँ के लिए कुछ और भी देना चाहते हैं। 




प्रश्न-उत्तर 


प्रश्न - 'समर्पण' कविता के माध्यम से कवि क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर - इस कविता के माध्यम से कवि यह कहना चाहते हैं कि अपनी मातृभूमि के प्रति हर व्यक्ति के मन में समर्पण, त्याग और श्रद्धा की भावना होनी चाहिए।


प्रश्न - कवि अपने समर्पण से संतुष्ट क्यों नहीं हैं ?

उत्तर - कवि अपने समर्पण से संतुष्ट नहीं है, क्योंकि देश की धरती का ऋण बहुत बड़ा है और उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि देश के लिए तन, मन और जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी समर्पित करना चाहिए।


प्रश्न - कवि थाल में सजाकर देश की धरती को क्या भेंट करना चाहते हैं ?

उत्तर - कवि अपने शीश को थाल में सजाकर अपने देश की धरती को भेंट करना चाहते हैं। कवि स्वयं पर मातृभूमि का  ऋण मानते हैं अतः वे अपना सर्वस्व देश हेतु समर्पित करना चाहते हैं।



प्रश्न - कवि अपने गाँव और अपने घर से मोह का बंधन क्यों तोड़ना चाहते हैं ?

उत्तर - कवि अपने गाँव और अपने घर से मोह का बंधन तोड़ना चाहते हैं, क्योंकि वे देश के सच्चे सपूत हैं और वे अपने देश की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई भी मोहपाश उन्हें बंधन में जकड़ सके अतः वे मुक्त होकर देश को सर्वस्व अर्पित करना चाहते हैं।


प्रश्न - 'नीड़ का तृण-तृण समर्पित' कहकर कवि ने किस ओर संकेत किया है ?

उत्तर -  'नीड़ का तृण-तृण समर्पित' कहकर कवि ने अपने देश के रक्षा के लिए अपने घोंसले अर्थात घर के तिनके-तिनके को भी समर्पित करने की ओर संकेत किया है। कवि ने स्पष्ट किया है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए घर, परिवार, समाज और स्वयं को हँसते-हँसते समर्पित कर देना चाहिए।


प्रश्न - कवि के समर्पण की भावना को अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर - कवि ने अपने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देना चाहते हैं, क्योंकि उनके अंदर देशभक्ति की सच्ची भावना है अर्थात वे अपने देश के सच्चे सपूत हैं तथा अपने को शरीर अर्पित कर देना चाहते हैं। वे अपने आप को धरती माँ का कर्ज़दार समझते हैं जिसका कर्ज़  वे अपना बलिदान देकर भी नहीं चूका सकते हैं। उनके समर्पण की भावना अनमोल है क्योंकि वे अपने तन, मन, धन और जीवन को मातृभूमि पर सहर्ष न्योछावर करने को तत्पर हैं।




Thursday, 17 October 2024

छोटा जादूगर


 पठित गद्यांश 
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न 

दस बज चुके थे-----------------------------------------मोटर वाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा। 

(क) लेखक ने छोटे जादूगर को कहाँ और किस स्थिति में देखा ?
 उत्तर - लेखक ने छोटे जादूगर को साफ धूप में सड़क के किनारे देखा था, जहाँ एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा हुआ था। मगर खेल दिखाते समय वह स्वयं काँप जाता था। उसकी वाणी में प्रसन्नता नहीं थी।

(ख) दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर क्यों लड़खड़ा रहा था ?
 उत्तर - दूसरों को हँसाने की चेष्टा में छोटे जादूगर का स्वर लड़खड़ा रहा था, क्योंकि उसकी माँ ने कहा था कि जल्दी वापस आना। मेरी घड़ी समीप है।

(ग) भीड़ में लेखक को देखकर छोटे जादूगर की स्थिति कैसी हो गई ?
 उत्तर - भीड़ में लेखक को देखकर छोटा जादूगर क्षण भर के लिए मूर्तिमान हो गया।

(घ) छोटे जादूगर द्वारा "क्यों न आता!" कहने से कौन-सा भाव झलकता है ?
 उत्तर - छोटे जादूगर द्वारा 'क्यों न आता!' कहने से विवशता और आर्थिक विपन्नता का भाव झलकता है। इन शब्दों से स्पष्ट है कि आना उसकी मज़बूरी थी। इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।



लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क)  लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का क्या कारण बताया ?
 उत्तर - लड़के ने लेखक को कार्निवल के मैदान में आने का कारण बताते हुए कि माँ बीमार हैं इसलिए मैं उसकी दवा-दारू खरीदने और पथ्य देने तथा स्वयं का पेट भरने के लिए कुछ पैसे कमाने आया हूँ, क्योंकि मेरे पिताजी जेल में हैं।

(ख) लेखक ने लड़के को कितने टिकट खरीदकर दिए ?
 उत्तर - लेखक ने लड़के को बारह टिकट खरीदकर दिए।

(ग) हिंडोले से लेखक को किसने पुकारा ?
 उत्तर - हिंडोले से लेखक को छोटे जादूगर ने पुकारा।

(घ) लेखक की पत्नी द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने क्या-क्या खरीदा ?
 उत्तर - लेखक की पत्नी के द्वारा दिए गए रुपये से छोटे जादूगर ने पकौड़ी और एक सूती कंबल खरीदा।

(ङ) लता-कुंज का वर्णन कीजिए। 
 उत्तर - लता-कुंज एक छोटा सा बनावटी महल था। वहाँ संध्या होने पर साँय-साँय की आवाज़ आती थी। डूबते हुए सूर्य की अंतिम किरणें पत्तियों से विदाई लेती नज़र आती थीं। यह लता-कुंज चारों तरफ से सुनसान था

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

(क) पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक क्यों          दिखाई दी ?
 उत्तर - पहली बार छोटे जादूगर को देखकर लेखक को उसके अभाव में भी संपूर्णता की झलक दिखाई दी, क्योंकि वह सबको खाते-पीते देख रहा था। मगर किसी से कुछ माँग नहीं रहा था। अभावग्रस्त होते हुए भी उसके मन में संतोष और तृप्ति का भाव था।

(ख) तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी क्यों उठा रहा था ?
 उत्तर - तेरह-चौदह वर्ष की आयु में ही वह बालक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहा था, क्योंकि उसके पिता देश के लिए जेल में थे और घर पर उसकी माँ बीमार थी, जिसकी देखभाल के लिए उसके सिवा घर पर और कोई नहीं था।

(ग) बॉटेनिकल -उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट क्यों हो गए ?
 उत्तर -बॉटेनिकल उद्यान में छोटे जादूगर का खेल देखने वाले हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए, क्योंकि उसके सभी खिलौने अभिनय करने लगे थे। भालू मनाने लगा था। बिल्ली रूठने लगी थी। बंदर घुड़कने लगा था। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला आदि सभी कार्य जादूगर की बातों से हो रहे थे।

(घ) लड़का खेल-तमाशा क्यों दिखाना चाहता था ?
उत्तर-  लड़का खेल-तमाशा दिखाना चाहता था, क्योंकि उसको ऐसा करने से कुछ पैसे मिल जाएँगे, तो वह अपनी बीमार माँ को दवाइयाँ व पथ्य देगा और खुद का भी पेट भरेगा।

(ङ)  “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक क्या स्पष्ट करना चाहते हैं ?
 “सारा संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नाच रहा था।" इस कथन से लेखक ने संसार के सत्य को अनावृत्त करना चाहा है। संसार की स्वार्थपरता और भौतिकता की चकाचौंध के बीच जीवन का सार्वभौमिक सत्य लेखक के समक्ष उपस्थित हो जाता है। इसे देखकर लेखक किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में खड़ा रह जाता है और सारा संसार उसे एक जादू की भाँति नाचता हुआ प्रतीत होता है।

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर) CLASS 8

चाँदी का जूता (प्रश्न-उत्तर)
(क) हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव इतना सुव्यवस्थित कैसे हो गया था ?
उत्तर - हॉस्टल का लापरवाह वेंकटेश्वर राव तो वैसे का वैसा ही था। हॉस्टल में उसकी सब चीजें अस्त-व्यस्त रहती थी। उसे व्यवस्था और करीने की आदत नहीं थी। घर की बैठक की सजावट उसकी पत्नी रमा ने की थी, जिसको देखकर लेखक को लगा था कि उसका मित्र अब सुव्यवस्थित हो गया है।

(ख) वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए क्या कहा ?
 उत्तर - वेंकटेश्वर राव और उनकी पत्नी रमा ने सीमा की विशेषताएँ बताते हुए कहा कि उसने एम०ए० प्रथम श्रेणी में पास कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। अब पी.एच.डी कर रही है। डी लिए भी करना चाहती है। वह कॉलेज पढ़ाने जाती है और घर का सारा काम भी करती है। साथ ही साथ सास-ससुर दोनों की सेवा भी करती है।

(ग) वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना क्या थी ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव के भाई के घर की विडंबना यह थी कि वे पचास हजार रुपए दहेज में लेकर मैट्रिक पास बहू को घर लाए थे। यदि उससे कोई भी काम करने के लिए कहता, तो फौरन उलटा जवाब देती थी कि वह घर की बेगारी करने नहीं आई है। वह अपने पिताजी द्वारा दिए गए रुपयों का जिक्र करते हुए कहती कि उससे नौकर रख लो।

(घ) राव ने 'ऐश-ट्रे' को उनके थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न क्यों कहा ?
उत्तर - राव तो दहेज लेना नहीं चाहते थे, परंतु अपनी पत्नी रमा के दबाव में आकर उन्हें दहेज माँगना पड़ा। इसके फलस्वरूप उन्हें साठ हजार रुपयों के सहित चाँदी का बना 'ऐश-ट्रे', जो उलटे पैर के जूते की आकृति का था, मिला, जिसको उन्होंने अपने थोथे आदर्शों का उपहास करने वाला अविस्मरणीय चिह्न कहा था।

(ङ) वह कौन-सी विवशता थी, जिसके तहत लेखक ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही ?
उत्तर - दहेज माँगने के लिए रमा ने अपने पति पर दबाव डाला था, जिसके तहत राव ने विवाह में उचित रकम देने की बात सीमा के पिता से कही। रमा उनकी पत्नी थी और पुत्र के विवाह को लेकर उसकी अनेक आकांक्षाएँ थीं। वह स्वयं दहेज की माँग करने की अपेक्षा पति पर दवाब बना रही थी कि वे दहेज की रकम माँगे। उसके आगे वेंकटेश्वर राव झुक गए।

(च) वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो क्या वे अपने साथ न्याय करते ?
उत्तर - वेंकटेश्वर राव यदि पत्नी के आग्रह के सामने न झुकते, तो वह अपने साथ तो न्याय करते ही, साथ ही सीमा और पूरे समाज की लड़कियों के साथ भी न्याय करते। पत्नी के दबाव में आकर भी किया गया गलत कार्य तो गलत ही कहलाता है। मात्र पत्नी के आग्रह और प्रसन्नता का तो उन्होंने विचार किया, परंतु उन्होंने न स्वयं के विचारों का मान रखा और न दूसरों के।

CLASS 9 वैज्ञानिक चेतना के वाहक : रामन


(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

1. कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर - कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा यही थी कि वे अपना सारा जीवन शोध कार्यों को समर्पित कर दें। परंतु उन दिनों कैरियर के रूप में शोधकार्य को जीवन भर के लिए अपनाने की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी।

2. वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर - वाद्य यंत्रों पर की गई खोजों और वैज्ञानिक सिद्धांतों के 
(ख) आधार पर रामन् ने पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्य-यंत्रों की तुलना में घटिया हैं। उन्होंने वाद्ययंत्रों के कंपन के पीछे छिपे गणित पर अच्छा-खासा काम किया और कई शोध-पत्र भी प्रकाशित किए।

3. रामन् के लिए नौकरी संबंधी कौन-सा निर्णय कठिन था और क्यों ? 
                                            अथवा

सरकारी नौकरी छोड़ना रामन् के लिए एक कठिन निर्णय क्यों था? 'वैज्ञानिक चेतना के वाहक' पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर -उस ज़माने के प्रसद्धि शिक्षा शास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी ने रामन् के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में रिक्त प्रोफेसर पद को स्वीकार कर लें। रामन् के समक्ष नौकरी संबंधी यह निर्णय अत्यंत कठिन था कि वे सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी में बने रहें या उसे छोड़कर इस पद को स्वीकार कर लें। अंततः रामन् ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार किया और माँ सरस्वती की साधना हेतु सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को त्याग दिया।

4. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को समय-समय पर किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उत्तर -'रामन् प्रभाव' की खोज ने रामन् को विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों की श्रेणी में प्रतिस्थापित कर दिया। समय-समय पर उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता, 1929 में 'सर' की उपाधि तथा 1930 में विश्व के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें रोम के मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी के ह्यूज पदक, फिलोडेल्फिया इंस्टीट्यूट के फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस के लेनिन पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया।

5. रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय-चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?

उत्तर- रामन को मिलने वाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया क्योंकि उन्हें ये सम्मान और पुरस्कार उस दौर में मिले, किब भारत अंग्रेज़ों के अधीन था। दासता की बेड़ियों में जकडी भारतीय जनता के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का निरंतर हास हो रहा था। ऐसी परिस्थिति में रामन् की इन उपलब्धियों ने भारत को एक नई गरिमा प्रदान की और इसे विश्व में शीर्ष स्थान पर प्रतिस्थापित कर दिया।

 निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए- 

1. रामन् के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?
उत्तर - कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी रामन् ने अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा और स्वाभाविक रुचि को अक्षुण्ण बनाए रखा। दफ्तर से छुट्टी मिलते ही वे बहू बाजार स्थित 'इंडियन एसोसिऐशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की प्रयोगशाला में कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य करते थे। इस संस्था की प्रयोगशाला में संसाधनों का नितांत अभाव था। यह एक आधुनिक हठयोग ही था, जिसमें साधक रामन् दिनभर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के पश्चात् सीमित संसाधनों की सहायता से प्रयोगशाला में शोधकार्य करते थे। रामन् अपनी इच्छाशक्ति के बल पर भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने का प्रयास करते रहे और उन्होंने विज्ञान को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान की।

2. रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश किरणों के प्रभाव का अध्ययन किया और यह पाया कि, जब एक वर्षीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से होकर गुज़रती है तो गुज़रने के पश्चात् उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। कारण यह है कि एकवर्षीय प्रकाश किरण के फोटॉन जब तरल अथवा ठोस रखे से गुज़रते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इसके परिणामस्वरूप उसकी ऊर्जा का कुछ अंश या तो खो जाता है या उसमें बढ़ोत्तरी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। एक वर्षीय प्रकाश की किरणों में सर्वाधिक ऊर्जा बैंगनी तथा सबसे कम ऊर्जा लाल वर्ण के प्रकाश में होती है। रामन् की इसी खोज को 'रामन् प्रभाव' के नाम से जाना जाता है।

3. 'रामन् प्रभाव' की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य संभव हो सके ?
उत्तर - रामन् की खोज 'रामन् प्रभाव' की सहायता से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन करना सरल हो गया। पहले इसके लिए 'इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी' की मदद ली जाती थी, जिसमें त्रुटियों की संभावना अधिक रहती थी परंतु रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से यह कार्य अत्यंत सहज हो गया। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक जानकारी प्रदान करती है। इससे प्रयोगशाला में पदार्थों का संश्लेषण तथा अनेक पदार्थों का कृत्रिम रूप से निर्माण संभव हो गया है।

4. देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालिए ।
                             अथवा
रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी। इस कथन के आलोक में चंद्रशेखर वेंकट रामन् के योगदान पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था ' उत्तर - रामन् को अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में काम-चलाऊ उपकरणों की मदद से एक साधारण-सी प्रयोगशाला में कार्य करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्था 'रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट' के नाम से जानी जाती है। रामन् के अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि तथा चिंतन के विकास में उन्होंने सैकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने आगे चलकर बहुत अच्छा काम किया। इस प्रकार ज्योति से ज्योति प्रज्वलित होती रही और कई छात्र उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने 'करेंट साइंस' नामक एक पत्रिका का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त भौतिकी में अनुसंधान के विकास हेतु 'इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स' नामक शोध-पत्रिका भी निकाली। वे लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति पूर्णतः समर्पित थे।

5. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।
                                                  अथवा
रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर - सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् ने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से संपूर्ण देश को आलोकित किया। वे वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें सदैव यही संदेश दिया कि हम अपने इर्द-गिर्द घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तथा उसी के अनुसार उसकी जाँच-पड़ताल करें। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों, समुद्र की अथाह जलराशि तथा प्रकाश की किरणों में से वैज्ञानिक सिद्धांतों को ढूँढ़ निकाला। उनका व्यक्तित्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम भी अपने आसपास बिखरी चीजों और विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और रहस्यों पर से पर्दा उठाएँ और विज्ञान को समुन्नत बनाने का प्रयास करें।


 निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

1. उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
उत्तर- यह कथन सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के विशिष्ट व्यक्तित्व और वैज्ञानिक चेतना के प्रति उनके समर्पण का सूचक है। कलकत्ता के वित्त विभाग में अफसर के रूप में तैनात रामन् दफ्तर से छुट्टी मिलने के बाद बहू बाज़ार स्थित प्रयोगशाला में जाकर शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते थे। विज्ञान के प्रति उनके इस समर्पण ने उन्हें सुख-सुविधापूर्ण सरकारी नौकरी को छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पद को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। इससे स्पष्ट होता है कि रामन् के लिए माँ सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

2. हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।
उत्तर - यह कथन हमें रामन् के जीवन से प्रेरणा लेते हुए प्रकृति के विभिन्न क्रियाकलापों और घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने और सोचने की शिक्षा देता है। हमारे आसपास प्रकृति में अनगिनत चीजें बिखरी पड़ी हैं। ब्रह्मांड के कई रहस्य ऐसे हैं, जिनपर पर्दा पड़ा हुआ है। आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति और अटूट लगन के साथ विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं और वस्तुओं की वैज्ञानिक दृष्टि से छानबीन करने तथा उसपर गहराई से मनन करने की। जाने कितने ही रहस्य वैज्ञानिक करकमलों द्वारा परदे से बाहर आने की प्रतीक्षा में है। परंतु इसके लिए हमें रामन् की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होना होगा।

3. यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था। 
उत्तर - यह कथन विज्ञान के प्रति रामन् के स्वाभाविक रुझान और समर्पण को व्यक्त करता है। 'हठयोग' प्राचीन योग साधना का वह अंग है, जिसमें साधक अत्यंत कठिन मुद्राओं और आसनों के द्वारा सिद्धि प्राप्त करता है। सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् कलकत्ता के वित्त विभाग में अफ़सर के रूप में तैनात थे। दिन भर दफ़्तर की कड़ी मेहनत के बाद छुट्टी मिलते ही वे बहू बाज़ार स्थित 'इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस' की मामूली-सी प्रयोगशाला में पहुँचते और कामचलाऊ उपकरणों की सहायता से शोधकार्य रूपी कठिन साधना करते। सीमित संसाधनों वाली उस अभावग्रस्त प्रयोगशाला में दिन भर के थके रामन् विज्ञान को समृद्ध करने का प्रयास करते। उनकी यह कठिन साधना आधुनिक हठयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

Sunday, 25 August 2024

CLASS 10 मनुष्यता


कविता का भावार्थ 

1. विचार लो कि मर्त्य हो.......................................................  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ– मैथिलीशरण गुप्त जी की यह कविता मनुष्यता पर आधारित है। कवि ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में मृत्यु की सच्चाई बताई है। मनुष्य को समझाया है कि जब मृत्यु निश्चित ही है तो फिर इसका भय क्यों? जीवन रहते उसे सार्थक बनाइए और ऐसे कार्य कीजिए कि मरने के बाद भी दुनिया आपको स्मरण करे जब तक जियो गर्व के साथ और मरो भी तो गर्व के साथ कि हम इस संसार में अपनी कुछ अच्छाइयाँ छोड़कर जा रहे हैं। मरने के बाद भी दुनिया तुम्हें स्मरण करेगी। तुम्हारी यह मृत्यु ही सुमृत्यु होगी। स्वयं के लिए जीना तो पशु-तुल्य जीना है जो केवल अपना पेट भरना ही जानते हैं। वास्तव में परहित के लिए जीना ही मनुष्यता की सही परिभाषा है। 

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य –
1.  'सुमृत्यु' को समझाते हुए दूसरों के लिए जीने की प्रेरणा दी गई है। 
2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। 
3.  उद्बोधनात्मक शैली व तुकांत रचना की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। 
4.  जो जिया, पशु-प्रवृत्ति, आप आप शब्दों में अनुप्रास अलंकार व पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की छटा दिखाई देती है।


2. उसी उदार की कथा सरस्वती ........................................................  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि ने उदार मनुष्य के जीवन के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहा है जो दूसरों के लिए जीता है;  उसका जीवन एक कहानी बन जाता है। सरस्वती भी उसका गुणगान करती है। धरती ऐसे उदार मनुष्य को जन्म देकर उसके प्रति अपना आभार प्रकट करती है जो इस संसार में एकता और आत्मीयता का भाव रखता है। ऐसे लोगों का यश पूरे संसार में फैल जाता है। वास्तव में वह सभी प्राणियों में श्रेष्ठ और पूजनीय माना जाता है। वह अपना सारा जीवन कल्याण के कार्यों में लगा देता है। सच्चा मानव संसार के लिए ही जीता है और संसार के लिए ही मरता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि की भाषा सरस, सरल और प्रभाव पूर्ण है।
2.  खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है जो कि  संस्कृत भाषा से प्रभावित है। 
3. अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार है।
4.  'सजीव कीर्ति गूँजती' में मानवीकरण अलंकार है। 
5. सदा-सजीव और समस्त-सृष्टि में 'स' वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
6.  वीर रस की प्रधानता है।

3. क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ------------------------------------ जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने समाज का कल्याण करने वाले कुछ उदाहरणों को प्रस्तुत करते हुए यह समझाने का प्रयास किया है कि उसी मानव का जीवन ही सफल होता है जो दूसरों के लिए जीता है। राजा रंतिदेव ने अपने सामने पड़ा भोजन का थाल भिक्षु को दे दिया था जबकि वे स्वयं भूखे रहे। महर्षि दधीचि ने असुरों के वध के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। दानवीर कर्ण ने अपने कवच व कुंडल उतार दिए थे। गांधार नरेश शिवि ने अपने शरीर का मांस कबूतर की प्राण रक्षा के लिए दे दिया था। यह शरीर तो नश्वर है आत्मा अमर है, फिर हम इस नश्वर शरीर के लिए मृत्यु से क्यो डरते हैं? सच्चा मनुष्य वही है, जो दूसरों के कल्याण के लिए जीता है और परहित के लिए मरता भी है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य – 
1.  अनेक उदाहरणों द्वारा परोपकार का महत्व बताया गया है। 
2.. खड़ी बोली का प्रयोग है जिसमें संस्कृत का प्रभाव दिखता है। 
3...वीर रस की अभिव्यक्ति है और प्रश्न शैली का प्रयोग है। 
4..भाषा अलंकृत है। अनुप्रास अलंकार की झलक है।
5. तुकांत शब्दों का प्रयोग हुआ है। 


4. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही---------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ -  कवि ने सहानुभूति को हमारी सबसे बड़ी पूँजी इसलिए कहा है क्योंकि इससे आप किसी के भी मन को जीत सकते हैं। सहानुभूति आपको उदार तथा महान बनाती है। दूसरों के प्रति दया तथा सहानुभूति का व्यवहार करके संपूर्ण धरती को वश में किया जा सकता है। अच्छे व्यवहार की ओर सभी खिंचे चले आते हैं। महात्मा बुद्ध ने तत्कालीन गलत धारणाओं का विरोध किया था किंतु अंत में लोगों को उनकी बात माननी ही पड़ी थी। सच्चा मनुष्य वास्तव में वही है। जो परोपकारी है। जिसका जीना और मरना दूसरों के लिए है। वही सफल है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य –
 1.  कवि उदारता का संदेश देते हुए सहानुभूति का महत्व बता रहे हैं।
 2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली और प्रश्न शैली प्रयुक्त हुई है। 
3.  भाषा अलंकृत है और अनुप्रास अलंकार की छटा कवि ने बिखेरी है। 
4.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है।


5. रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में  --------------------------------------------जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि ने अहंकारी न बनने के लिए कहा है और यह समझाने का प्रयास किया है कि धनवान होने पर अहंकार में अंधे मत बनो। यह धन तो आता-जाता रहता है। उसे पाकर घमंड करना मूर्खता है। ईश्वर परमपिता हैं। संसार के पालक और संरक्षक हैं। इसलिए कोई स्वयं को अनाथ न समझे। कई बार मनुष्य परिजनों और धन का साथ पाकर स्वयं को सनाथ समझने लगता है और घमंडी हो जाता है, लेकिन ऐसा मानव सच्चा मानव नहीं है। सच्चा मनुष्य तो वही है जो जग-कल्याण करता है। आवश्यकता पड़ने पर अपना शरीर तक बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटता। वह प्राणी भाग्यहीन है जो असंतुष्ट-अशांत और अतृप्त रहता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. मनुष्य को अहंकार न करने का संदेश देते हुए कवि ने संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया है। 
2. लयात्मक भाषा है। 
3.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
4. यथासंभव अलंकारों की छटा बिखरी है।
5. उद्बोधन शैली का प्रयोग किया गया है। 
6. भाषा में प्रवाह है। सामासिक शब्दों का प्रयोग है।


6. अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े ------------------------------------------------- जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में कवि मनुष्य को परोपकार करने तथा मानवीयता का पालन करने के लिए कहते हैं। कवि के अनुसार ऐसा जीवन जीयो जो दूसरों के काम आ सके। एक-दूसरे की मदद करो। ऐसे लोग देव-तुल्य होते हैं। ऐसे लोगों की हमारे देश में कमी नहीं है। इतिहास पर नजर डालें तो असंख्य ऐसे उदाहरण मिलेंगे।
कवि के अनुसार जीवन उसी का सफल है जो परोपकार करता है। एक-दूसरे के सहयोग से महान कार्य करो और अमर हो जाओ। व्यर्थ है वह जीवन जो किसी के काम न आ सके।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि ने देव-तुल्य जीवन बिताने के लिए और परोपकारी बनने का संदेश दिया है। 
2. उद्बोधन शैली का प्रयोग किया गया है। 
3. भाषा खड़ी बोली है और संस्कृत से प्रभावित है।
4. 'अनंत अंतरिक्ष' समक्ष स्वबाहु में अनुप्रास अलंकार है।
5.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। 
6. भाषा में प्रवाह है।


7. 'मनुष्य मात्र बंधु है' यही बड़ा विवेक है ------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि समस्त मानव-जाति एक-दूसरे की सहायक बने। सबको अपना भाई-बंधु माने। संसार में ऐसे लोग ही विवेकी माने जाते हैं। संसार की विविधता केवल मनुष्य के कर्मों द्वारा मिले फल हैं। यह केवल बाहरी भेद हैं। मूल रूप से सभी प्राणी एक हैं। सब एक ही परमपिता की संतान हैं। उनका रचयिता एक है। सब में एक ही चेतना, एक ही प्राण और एक ही ईश्वर समाया है। फिर भी विडंबना देखो कि एक-दूसरे की विपदा और दुख को हरने का प्रयास नहीं किया जाता। यही इस संसार का सबसे बड़ा अनर्थ है। मनुष्य मात्र का यह कर्तव्य है कि परस्पर भाईचारे की भावना स्थापित करे। यही सच्ची मनुष्यता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य - 
1. कवि के द्वारा परस्पर सहयोग की भावना विकसित करने का संदेश दिया गया है। 
2. खड़ी बोली में संस्कृत का प्रभाव है। 
3. भाषा में लयात्मककता है। 
4. यथासंभव अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
 5. वीर रस की अभिव्यक्ति है।
 तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है।


8. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए-------------------------------------------  जो मनुष्य के लिए मरे।।

भावार्थ - इन पंक्तियों में जीवन की अनेक रुकावटों को मार्ग से हटाते हुए आगे बढ़ने का संदेश दिया गया है। हमें विपत्तियों से घबराना नहीं चाहिए और लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। हम सबका अंतिम लक्ष्य समाज में एकता और भाईचारा लाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें प्रयासरत रहना है। आपसी मतभेद को समाप्त करके आपस में मिल-जुलकर रहना है। अपनी सफलता के साथ-साथ दूसरों को भी सफल बनाने की कोशिश करें यही सच्चा समर्थ भाव है। सच्चा मानव वही है जो दूसरों के लिए जीता है और दूसरों के लिए मरता है।

काव्यांश का शिल्प-सौंदर्य – 
1.  कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से परस्पर मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया है। समस्त संसार को एक परिवार 
      मानना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। 
2.  संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। 
3.  लयात्मक भाषा है। 
4.  तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। 
5.  समास का प्रयोग यथास्थान किया गया है। 
6.  विपत्ति-विघ्न में अनुप्रास अलंकार है।


Thursday, 30 May 2024

कहानी - सही उत्तर


सही उत्तर

राजा भोज बड़े उदार और कुशल शासक थे। अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए वे अकसर वेश बदलकर घूमा करते थे। उनके दरबार में महाकवि कालिदास का बड़ा सम्मान था। कालिदास महाकवि होने के साथ-साथ अत्यंत बुद्धिमान व व्यवहार कुशल भी थे।

एक दिन राजा भोज वेश बदलकर कालिदास के साथ प्रजा का कुशल-क्षेम जानने के लिए नगर में घूम रहे थे। बातों-बातों में राजा भोज ने कालिदास से पूछा, "महाकवि बताओ, खाता कौन है?" प्रश्न बड़ा अटपटा-सा था। कालिदास कुछ सोच में पड़ गए। राजा भोज ने हँसते हुए कहा, "क्यों, पड़ गए न सोच में!" कालिदास बोले, "राजन, बिना सोचे समझे उत्तर देने वाला मूर्ख होता है।"

"प्रश्न तो बड़ा सीधा-सा है महाकवि। ऐसे प्रश्नों के उत्तर के लिए बुद्धिमानों को विचार नहीं करना पड़ता।" राजा ने कहा।

"तो आप ही इसका उत्तर देने की कृपा करें", कालिदास बोले।

"अच्छा ठीक है। सीधे से प्रश्न का सीधा-सरल उत्तर है कि भूखा ही खाता है" राजा भोज उत्तर दिया। "गलत" कालिदास ने कहा। ने

राजा भोज बोले, "प्रमाणित कीजिए।"

"अवश्य। कल मैं अपनी बात प्रमाणित करूंगा," कालिदास ने उत्तर दिया।

अगले दिन कालिदास के कहे अनुसार राजा भोज ने पंडित का और कालिदास ने उनके शिष्य का वेश धारण किया। कालिदास ने राजा से कहा, "राजन ध्यान रखिएगा कि आपको कुछ नहीं बोलना है, जो बोलना है, मैं बोलूँगा। बस आप मेरे साथ चलते रहिएगा।"

राजा भोज ने कहा, "ठीक है।"

दोनों चल दिए। चलते-चलते दोपहर हो गई। दोनों को ज़ोरों से भूख लग रही थी। सामने ही उन्हें एक बड़ी हवेली दिखाई दी। दोनों ने सोचा कि हमने ब्राह्मण वेश धारण किया हुआ है अतः हवेली के द्वार पर भोजन मिल ही जाएगा। वे दोनों हवेली के द्वार पर जा पहुँचे। सेठ का मुनीम वहीं खड़ा था। उसने पूछा, "आप कौन हैं? आपको क्या चाहिए?" कालिदास कटु स्वर में बोले, "मूर्ख, देखते नहीं हो हम कौन हैं? तुम बताओ, तुम कौन हो?" मुनीम को बड़ा क्रोध आया और वह भुनभुनाता हुआ भीतर चला गया। राजा भोज चकित से कालिदास का मुँह देखने लगे।

तभी सेठ की दासी बाहर आई। उन्हें देखकर उसने भी पूछा, "आप लोग कौन हैं?" कालिदास फिर बोले, "आँखें होते हुए भी तुम्हें नहीं दिखाई देता कि हम कौन हैं। दोपहर का समय है, हम भूखे हैं।" दासी को भी क्रोध आ गया। गुस्से से बोली, "भूखे हैं तो मैं क्या करूँ।" यह कहकर वह अंदर चली गई।

तभी सेठ और सेठानी मंदिर से पूजा करके लौटे। द्वार पर दो जनों को खड़ा देखकर सेठ पूछा, "कौन हैं आप लोग ? क्या कुछ दान चाहिए?" कालिदास चिढ़कर बोले, "क्या कहा-दान लगता है इस हवेली में रहने वाले सभी मूर्ख हैं। हमें देखकर भी नहीं पहचानते। हम पंडित हैं। हमारे साथ ये हमारे गुरु हैं। हम भूखे हैं, इसलिए यहाँ आए हैं।" अपने लिए मूर्ख शब्द सुनकर सेठ गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर दरबान से कहा, "इन पंडितों को धक्के देकर बाहर निकाल दो।"

यह सुनते ही दोनों वहाँ से भाग खड़े हुए। कुछ दूर जाकर राजा बोले, "महाकवि, यह नाटक है?"

"नाटक नहीं महाराज, यह आपके उत्तर को गलत सिद्ध करने का प्रमाण था। समझे आप?" कालिदास ने कहा। "अब मैं आपको आपके प्रश्न का सही उत्तर दूँगा।"

कुछ महीने बाद कालिदास और राजा ने फिर से पंडित का वेश धारण किया और उसी हवेली के सामने जा पहुँचे। राजा भोज तो डर रहे थे कि कहीं मार न खानी पड़े पर का "देखते रहिए राजन। आज मैं आपको बढ़िया भोजन खिलवाऊँगा। बस आप कुछ न बोलिएगा।" तभी हवेली में से वही दासी बाहर आई। कालिदास बोले, "धन्य हो, धन्य हो । बड़ी सौभाग्यवती हो बहन। तभी सेठानी भी आ पहुँची। कालिदास उसे देखते ही बोल उठे, "धन्य हो माँ। साक्षात सीता मैया का रूप हो देवी।" संयोग से सेठ और उनका मुनीम भी उसी समय बाहर से हवेली सीता मैया का उस्होंने पूछा, "क्या बात है ? कौन हैं ये लोग ? " कालिदास तुरंत बोल उठे, "धन्य है सेठ जी। मस्तक पर क्या तेज है! आपका सूर्य चमक रहा है। सब मंगल ही मंगल है।" कालिदास की बात सुनकर सेठ बड़ा प्रसन्न हुआ। कालिदास आगे कहने लगे, "आप तो दाता के दाता दानवीर कर्ण हैं। ईश्वर आपका भला करे। हम चलते हैं। भोजन का समय हो गया है।"

सेठ आगे बढ़कर बोला, "नहीं पंडित जी, आप ऐसे नहीं जाएँगे। आज हवेली में भोजन करके ही जाइएगा।" फिर मुनीम से कहा, "मुनीम जी, इनके लिए भोजन की व्यवस्था कीजिए।" आदर के साथ दोनों को आसन पर बिठाकर भोजन परोसा गया।

दोनों ने छककर स्वादिष्ट भोजन किया और दान-दक्षिणा लेकर लौटे।

कुछ आगे चलकर कालिदास ने कहा, "कहिए राजन कैसी रही? यह था आपके प्रश्न का सही उत्तर। भूखा नहीं खाता बल्कि जो पाता है वही खाता है।" राजा भोज कालिदास के कंधे पर हाथ रखकर मुसकराने लगे।




Monday, 27 May 2024

मणि की चोरी - पौराणिक कथा


मणि की चोरी

बहुत समय पहले द्वारिका पुरी में कृष्ण के राज्य में सत्रजित नाम का एक यादव नायक था। वह द्वारिका में सबसे धनवान व्यक्ति था। उसका भवन अत्यंत वैभवशाली था और उसके घोड़े और गायें सर्वोत्तम थीं। सबसे बड़ी बात थी कि प्रभास तीर्थ के देवता भगवान सूर्य की उस पर विशेष कृपा थी। वह भगवान सूर्य का अनन्य उपासक था। भगवान सूर्य ने अपनी कृपा के चिह्न स्वरूप उसे स्यमंतक नाम की मणि प्रदान की थी। स्यमंतक मणि एक ऐसा चामत्कारिक रत्न था जिसकी समुचित पूजा करने पर वह निकृष्ट धातुओं को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देता था।

स्यमंतक मणि की सहायता से सत्रजित ने अकूत संपत्ति एकत्र कर ली थी और वह अभिमानी एवं अहंकारी हो गया था। सत्रजित कृष्ण से घोर शत्रुता रखता था और उन्हें अन्य यादव नायकों की तरह भगवान मानने को तैयार नहीं था। वह अपनी संपत्ति वैभव-विलास में उड़ा रहा था। दूसरी ओर कृष्ण उसकी संपदा का बड़ा भाग राज्य हित में लगाना चाहते थे, जिसके लिए सत्रजित बिलकुल तैयार नहीं था।

यादवों की धर्म रक्षा हेतु कृष्ण सत्रजित से मिलने उसके भवन गए। सत्रजित ने गले में स्यमंतक मणि धारण कर रखी थी। सूर्य के प्रकाश में मणि भव्यता के साथ दमक रही थी। ऐसा लगता था मानो एक छोटा सूर्य अपने प्रभा-मंडल के साथ उग आया हो। कृष्ण की दृष्टि मणि पर टिकी थी ऐसा सत्रजित को लग रहा था। कृष्ण ने सौहार्द्रपूर्ण ढंग से यादवों की रक्षा हेतु संपत्ति की माँग का प्रश्न उठाया पर अहंकारी सत्रजित ने उनकी एक बात भी नहीं मानी। उसे लगा कि कृष्ण उसकी मणि हथियाना चाहते हैं।

कृष्ण को नीचा दिखाने के लिए सत्रजित ने एक षड्यंत्र रचा। उसने मणि अपने भाई प्रसेनजित को देकर उसे जंगल में सूर्य देवता की पवित्र गुफा में रख देने के लिए कहा। प्रसेनजित के जाने के बाद सत्रजित ने पूरी द्वारिका में इस बात का प्रचार कर दिया कि कृष्ण ने उसकी स्यमंतक मणि चुरा ली है। कृष्ण छली और कपटी है। कृष्ण के लिए यह आरोप असहनीय था। वे नहीं चाहते थे कि यादवों का उनमें विश्वास टूट जाए। इसके लिए स्वयं को निरपराध सिद्ध करना आवश्यक था और स्यमंतक मणि को खोज लाना भी बहुत ज़रूरी था। अतः कृष्ण ने घोषणा की कि वे स्यमंतक मणि ढूँढ़ कर लाएँगे या आत्मघात कर लेंगे।

दुर्भाग्य से प्रसेनजित जब जंगल में जा रहा था तो उसका सामना भयंकर सिंह से हो गया। सिंह मणि की चमक से आकर्षित हो गया था। प्रसेनजित ने बहादुरी से सिंह का मुकाबला किया किंतु आखिर में उसके हाथों मारा गया। मणि लेकर सिंह कुछ दूर ही गया था कि उसकी मुठभेड़ एक विशालकाय रीछ से हुई। रोछ अत्यंत बलवान और शक्तिशाली था। सिंह रीछ के हाथों मारा गया और रीछ वह मणि लेकर अपनी गुफा में चला गया।

उधर सत्रजित अपने भाई के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था कि तभी उसे समाचार मिला कि प्रसेनजित जंगल में सिंह के हाथों मारा गया है। सत्रजित पर मानो वज्रपात हुआ। उसका अहंकार, आत्मविश्वास, यादवों पर आधिपत्य जमाने की महत्त्वाकांक्षा, सब ध्वस्त हो गया।

स्यमंतक मणि की खोज में शिकारी वेश में श्रीकृष्ण उसी जंगल में पहुँचे जहाँ प्रसेनजित गया था। बहुत खोजने पर उन्हें एक स्थान पर प्रसेनजित का मृत शरीर पड़ा मिला पर उसके पास स्यमंतक का कोई नामो निशान नहीं था, केवल उस जंजीर का कुछ भाग गले में लटका था जिसमें कृष्ण ने मणि को सत्रजित के गले में देखा था। कृष्ण को विश्वास हो गया कि मणि प्रसेनजित के ही पास थी।

कुछ दूर आगे चलने पर उन्हें झाड़ी के पास सिंह का मृत शरीर दिखाई दिया। सिंह के पंजे में प्रसेनजित के वस्त्र का टुकड़ा फँसा हुआ था। यह वही सिंह था जिसने प्रसेनजित को मारा था। सिंह के पास किसी विशालकाय रीछ के बड़े-बड़े पैरों के निशान थे। ये निशान एक दिशा में जा रहे थे। कृष्ण ने उन पदचिह्नों का पीछा किया तो वे एक गुफा के सामने पहुँच गए। कृष्ण को विश्वास था कि रीछ मणि लेकर इसी गुफा में गया है।

कृष्ण गुफा में प्रवेश कर गए। बड़ी अद्भुत थी वह गुफा। उसमें एक लंबा रास्ता था जो अंत में एक विशाल कक्ष में जाकर समाप्त हुआ। कृष्ण ने वहाँ कुछ रीछ बालकों को उस मणि के साथ खेलते देखा। संभवतः वह रीछों की गुफा थी।

तभी गुफा में घोर गर्जना हुई। श्रीकृष्ण ने देखा कि एक विशालकाय रीछ तेज़ी से उनकी ओर बढ़ा आ रहा है। कृष्ण के पास अवसर न था। अतः दोनों गुत्थमगुत्था होकर युद्ध करने लगे। दोनों एक दूसरे के वार को बचाने का प्रयास कर रहे थे। काफ़ी देर तक दोनों इसी प्रकार लड़ते रहे। रीछ वृद्ध होते हुए भी बड़ा शक्तिशाली था। अंत में कृष्ण ने रीछ को दोनों हाथों से उठाकर गुफा के फर्श पर पटक दिया।

रीछ के अचरज की सीमा न थी। उसे आज तक कोई हरा नहीं सका था। वास्तव में वह रीछ और कोई नहीं, रामायण काल का जांबवान था। जांबवान ने गौर से कृष्ण की ओर देखा। उसे श्रीकृष्ण में अपने प्रभु श्रीराम की छवि दिखाई दी। तुरंत जांबवान को प्रभु का दिया वायदा याद आ गया कि मैं द्वापर युग में एक बार तुमसे फिर मिलूँगा।

जांबवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा माँगने लगा। उसने अपने प्रभु राम को तुरंत क्यों नहीं पहचान लिया, इसका उसे बड़ा दुख था। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, शरीर पुलकित हो उठा। उसके आनंद की सीमा न रही। उसका जीवन सुफल हो गया था।

श्रीकृष्ण से जंगल में आने का कारण और गुफा तक पहुँचने की पूरी कहानी सुनने के बाद जांबवान ने वह मणि आदरपूर्वक कृष्ण को सौंप दी। अपने प्रभु के दर्शन पाने के लिए उसने लंबी प्रतीक्षा की थी। हर्षातिरेक में उसका कंठ अवरुद्ध हो गया। कृष्ण उसकी दशा समझ रहे थे।

जांबवान और उसके परिवार को आशीर्वाद देकर कृष्ण मणि लेकर गुफा से बाहर आ गए और सत्रजित से मिलने चल दिए।

स्यमंतक को दुबारा पाकर सत्रजित की खुशी का ठिकाना न था। उसकी आँखों से मोह व अहंकार का परदा हट गया था। श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर उसने अपने पापों के लिए क्षमा माँगी। कृष्ण को भी इस बात की खुशी थी कि द्वारिका पुरी के समस्त नागरिकों में अपने प्रति विश्वास को बचाने में वे सफल रहे थे। उन्होंने स्वयं को मणि की चोरी के आरोप से मुक्त कर लिया था।